मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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है । भगवद्गीता जो वस्तुतः भगवद्गीतोपनिषद् शब्द का संक्षिप्त रूप है;
तथा जिसमें महाभारत का और सभी उपनिषदों का सार आया है, वेदान्त
का स्रोत है ।
कपाली का यह कथन—'बुद्ध ने वेदान्तों और महाभारत से भी तत्त्वों
को ग्रहण करके अपना कोश भर लिया' — बौद्ध धर्म और वेदान्त तथा महा-
भारत के अनेक सिद्धान्तों के साम्य की ओर सङ्केत करता है ।
भिक्षु धर्म का प्रतिपादन, नैतिक आचरण तथा करुणा से बहुजन
समाज की सेवा—यह बुद्ध का उपदेश उपनिषद् सम्मत ही है । बुद्ध का
दुःखवाद सांख्य-योग दर्शन से आया है । दार्शनिक विचारों के विकासार्थ,
विशेषतः महायान सम्प्रदायों ने उपनिषदों से ही प्रेरणा ली है । वेदान्त और
बौद्ध सिद्धान्त दोनों ही अद्वैती हैं । अमरकोष के अनुसार अद्वयवादी बुद्ध का
पर्यायवाची शब्द है । माया, अविद्या, पुनर्जन्म, ब्रह्म, निर्वाण आदि की
धारणाएँ वेदान्त तथा बौद्ध धर्म में समान रूप से देखी जा सकती हैं ।
'कोशसञ्चय' शब्द के द्वारा कपाली का व्यंग्य भी प्रकट होता है
कि बुद्ध ने लोगों के देखते-देखते ही धनसञ्चय कर लिया ।
दृष्टानि वस्तूनि (श्लोक १३; पृ० ४४) —
बौद्धों के अनुसार जगत् की सत्ता सांवृतिक है, इस जगत् का अस्तित्व
नहीं है । इस संसार की सभी वस्तुएँ पृथ्वी, समुद्र, पर्वत इत्यादि जो दिखाई
देती हैं अविद्या के आवरण के कारण दिखाई देती हैं । वास्तव में उनका
कोई अस्तित्व नहीं है, सब शून्य है । योगाचार और माध्यमिक सम्प्रदाय
के लोग इस बाह्य जगत् की सत्ता को स्वीकार नहीं करते हैं ।
नहि प्रतिज्ञामात्रेण (पृ० ४४)—
अनुमान के पाँच अवयव होते हैं:- प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपगम
और निगमन । इनसे हेतुवादियों का अनुमान पूरा होता है । प्रतिज्ञा
(dogmatism) तो मात्र पहला ही अवयव है, अतः केवल अवयव से अनुमान
पूरा नहीं होता है ।
प्रत्यक्षे (पृ० ४८)—
'प्रत्यक्षे किं प्रमाणम्' ? अर्थात् जहाँ प्रत्यक्ष है वहाँ किसी दूसरे प्रमाण
की आवश्यकता नहीं है ।