मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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एकाग्रवासी (पृ० ३८)—
'एकाम्र' शब्द काञ्चीपुरी का बोध कराता है।
संवृतसत्यं परमार्थसत्यं श्रोतुमिच्छामि (पृ० ४०)—
'संवृत' या संवृति का अर्थ है 'आवरण' अर्थात् अविद्या का आवरण।
इस आवरण द्वारा मृषा (झूठा) ज्ञान होता है। यह आवरण हमको उसी
प्रकार आच्छन्न कर लेता है जिस प्रकार जन्म होते ही हमको आकाश
प्रत्येक ओर से आच्छन्न कर लेता है। संवृति स्वतः सिद्ध है। इस
जगत् की सत्ता सांवृतिक है, पारमार्थिक नहीं। केवल परमार्थ सत्य के
अधिगम से ही संवृति सत्य मृषा सिद्ध हो सकता है। सब पदार्थों का स्वभाव
दो प्रकार का होता है—सांवृतिक और पारमार्थिक। मृषादर्शी का जो विषय है
वह संवृतिसत्य कहलाता है; सम्यग्दर्शी का जो विषय है वह परमार्थ सत्य
कहलाता है।
परमार्थ सत्य सर्वज्ञान का अतिक्रमण करता है। वह किसी प्रकार
भी बुद्धि का विषय नहीं हो सकता तथापि परमार्थ तत्त्व सर्वप्रपञ्च विनिर्मुक्त
होता है, इसलिए सर्वोपाधि से शून्य है। वस्तुतः सब भावों की शून्यता ही
परमार्थज्ञान है। संवृति सत्य तो किसी स्तर पर बाधित हो जाता है, परन्तु
परमार्थ सत्य कहीं भी बाधित नहीं होता है।
नागार्जुन ने माध्यमिक शास्त्र में संवृति सत्य और परमार्थ सत्य के
भेद को बताया है।
नमो खरपटाय (पृ० ४०)—
कौटिल्य के अर्थशास्त्र के समय (चौथी शताब्दी) से 'खरपट' चोर-
शास्त्र के रचयिता माने जाते हैं। भास ने भी अपने नाटक चारुदत्त में खर-
पट शब्द का प्रयोग किया है।
वेदान्तेभ्यो गृहीत्वार्थान् (श्लोक १२; पृ० ४०)—
वेदान्त का अर्थ है वेदों का अन्त या ज्ञान की चरम सीमा। आत्म-
साक्षात्कार से प्राप्त होने वाला अनिर्वचनीय सर्वोच्च सत्य अथवा ज्ञान। यही
उपनिषद् भी कहलाता है।
महाभारतादपि (श्लोक १२; पृ० ४०)—
महाभारत में भी इसी आत्म तत्त्व अथवा ब्रह्म का विस्तृत विवेचन