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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

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टिप्पणियाँ ७८
आस्थाय प्रयतो (श्लोक १७; पृ० ५०) —
अत्यन्त प्राचीन काल में समस्त लोक और उनमें विद्यमान सभी कुछ
एक समुद्र में जलमग्न हो गए। सूर्य, चन्द्रमा, तारे, वायु, अग्नि और घास
तथा झाड़ियाँ भी जल में डूब गए। समस्त संसार में घोर अन्धकार व्याप्त
हो गया। भगवान् (Supreme Being) सहस्रों रात्रियों से घोर निद्रा में
लीन थे। रात्रि के अन्त में रजोगुणमय होकर सृष्टि की रचना के लिए उद्यत
हुए। समस्त वेदों और वेदांगों के ज्ञाता वे भगवान् पाँच अद्भुत मुखों सहित
प्रकट हुए। इसी प्रकार तीन नेत्रों वाला जटाधारी, त्रिशूल हाथ में लिए
रुद्राक्ष माला पहने तमोगुण सम्पन्न पुरुष (The Male Creative Energy)
उत्पन्न हुआ। तब महात्मा (Supreme Spirit) ने अहङ्कार (Egoism)
को उत्पन्न किया। इससे ब्रह्मा और शिव दोनों प्रभावित हुए। अहङ्कार से
अभिभूत हुए ब्रह्मा और शिव दोनों में कलह हुआ जिसके फलस्वरूप भगवान्
(The Lord) का जन्म हुआ। जन्म के तुरन्त पश्चात् भगवान् ने एक
अद्वितीय बांसुरी ली और उसे बजाते हुए आकाश में चले गए। जब ब्रह्मा
से परास्त हुए शिव क्रोधित हुए खड़े थे तब ब्रह्मा के पाँचवे मुख ने कहा कि
'तीन नेत्रों वाले, रजोगुणमय वायु का वेष धारण करने वाले, वृषभ पर
सवारी करने वाले तुम संसार के संहारक हो।' शिव ने क्रोधावेश में अपने
तृतीय नेत्र की अग्नि से ब्रह्मा को भस्म करना चाहा। ब्रह्मा के मुख सूर्य
की तरह चमक रहे थे। उन्होंने शिव से कहा—'जब तुम जल पर प्रहार करोगे
तब बुलबुले निकलेंगे, पर क्या उनमें शक्ति होगी ?' इस पर शिव ने अत्यन्त
क्रोधित होकर अपने नख से ब्रह्मा के सिर को काट दिया।
—वामनपुराण, अध्याय २
नाथोऽपि त्रिदिवौकसाम् (पृ० ५०)—
इन्द्र द्वारा त्रिशिरा के सिर काटने की कथा देवीभागवतपुराण में इस
प्रकार आती है—
प्राचीन काल में त्वष्टा नाम के विख्यात प्रजापति थे। यद्यपि पूत-
स्वभाव वाले वे ब्राह्मणों व देवों की उन्नति में रुचि रखते थे, फिर भी वे
देवराज इन्द्र के विरोधी थे। अतः उन्होंने इन्द्र के संहार का विचार किया।
तब अपनी रचना से विश्वरूप नाम का एक शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न किया।
उसके तीन सिर थे। इसलिए उसका नाम त्रिशिरस् पड़ा। इन तीन सिरों का