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मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

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पृष्ठ 82

७० 'टिप्पणियाँ
पेया सुरा (श्लोक ७; पृ० २८)—
भगवान् शिव कापालिक सम्प्रदाय के प्रवर्तक माने जाते हैं।
श्मशान में वास करना, कपाल धारण करना, भस्म का लेप करना, विकृत
वेष धारण करना इत्यादि इस सम्प्रदाय के नियम हैं। इसी सम्प्रदाय के
अनुसार मद्य-पान करना और स्त्री-सहवास को ही मोक्ष प्राप्ति का साधन
माना गया है। और उसी (कापालिक सम्प्रदाय) के अनुसार कपाली यहाँ
वर्णन करता हुआ कहता है कि इस प्रकार के मोक्ष के मार्ग को बताने वाले
वे भगवान् शिव दीर्घजीवी हों, अर्थात् यह कापालिक सम्प्रदाय लम्बे समय
तक चलता रहे।
अर्हन्तः (पृ० ३०)—
मोक्ष के लिए जो भी व्यक्ति पात्र हो गया है उसे अर्हन् कहते हैं।
सातवीं शताब्दी में अर्हन् शब्द बौद्धों तथा जैनों, दोनों के लिए प्रयुक्त
होता था। प्रस्तुत सन्दर्भ में यह शब्द जैनों के लिए प्रयुक्त हुआ है।
कार्यस्य निःसंशयमात्महेतोः (श्लोक ८; पृ० ३०)—
प्रस्तुत श्लोक में जैनों के हेतुवाद की ओर संकेत किया गया है।
जैन हेतुवादी ये मानते हैं कि कार्य अपने कारण से समान रूप वाला होता है।
कपाली का यह कहना है कि जैन लोग एक ओर तो हेतुवाद का समर्थन
करते हैं और दूसरी ओर तप, समाधि आदि दुःख का कार्य मोक्ष रूपी सुख
को मानते हैं। अर्थात् तपस्या आदि के द्वारा प्राप्त शारीरिक कष्टों से
मोक्ष रूपी आनन्द की प्राप्ति होती है। परन्तु दुःख से सुख की प्राप्ति
असम्भव है क्योंकि कारण (दुःख) और कार्य (सुख) ये दोनों परस्पर विरोधी
तत्त्व हैं। अतः कपाली के कथनानुसार इस प्रकार के कथन से वे बेचारे
हेतुवादी स्वयं ही परास्त हो गए। अर्थात् उनका सिद्धान्त उन्हीं पर व्यर्थ
सिद्ध हो गया।
कार्य-कारण का यही भाव 'बुद्धचरित' के सप्तम सर्ग में भी उप-
लब्ध होता है—
दुःखेन मार्गेण सुखं ह्युपैति सुखं हि धर्मस्य वदन्ति मूलम् ।।८।।
दुःख को सुख का हेतु मानना उचित नहीं है यही कपाली का
विचार है।