मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० मत्तविलास-प्रहसन
प्रयोग वह एक ही बार में तीन कार्यों के लिए कर सकता था । एक का प्रयोग
वह वैदिक मन्त्रों के उच्चारण के लिए, दूसरे का मदिरा पीने के लिए और
तीसरे सिर का प्रयोग वह संसार देखने के लिए कर सकता था । बाल्यावस्था
से ही उसे सांसारिक सुखों से विरक्ति हो गई थी । वह भोजन का त्यागकर
तप करता था । ग्रीष्म ऋतु में अग्नि के मध्य बैठकर और शीत ऋतु में ठंड़े
पानी में बैठकर और कभी शीर्षासन लगाकर तप करता था । उसके इस प्रकार
के कठोर तप को देखकर इन्द्र को भय होने लगा । फलस्वरूप उसकी तपस्या
भङ्ग करने के लिए इन्द्र ने स्वर्ग की अप्सराएँ भी भेजीं परन्तु सब प्रयत्न
व्यर्थ गए । तब इन्द्र स्वयं अपने ऐरावत हाथी पर चढ़कर गए और अपने
वज्रायुध से त्रिशिरस् को मार दिया । परन्तु इस भय से कि कहीं अपने तप
के प्रभाव के कारण वह पुनर्जीवित न हो जाए, इन्द्र ने अपने समीपस्थ एक
बढ़ई से त्रिशिरस् के तीनों सिरों को उसके शरीर से अलग करके लाने के
लिए आदेश दिया । आदेशानुसार उस कर्मकार ने सिरों को काट दिया ।
परन्तु जैसे ही एक-एक सिर कटकर पृथ्वी पर गिरा, उनसे विभिन्न प्रकार
के पक्षी भागते हुए दिखाई दिए । जिस सिर से वह वैदिक मंत्रों का
उच्चारण करता था उससे कपिञ्जल नामक पक्षी, जिससे वह मदिरा पीता
था उससे कलपिङ्ग नामक पक्षी और संसार का निरीक्षण करने वाले सिर से
तित्तिरि नामक पक्षी उड़े । तब इन्द्र को यह पूर्ण विश्वास हो गया कि
त्रिशिरस् निश्चित रूप से मारा गया है ।
आगमानुगतमभिहितम् (पृ० ५०)—
निगम वेद हैं और वेदों को छोड़कर जिन ग्रन्थों को प्रमाण माना
जाता है वे आगम कहलाते हैं । ये तान्त्रिक ग्रन्थ हैं । शैवागम, शाक्तागम,
बौद्धागम, जैनागम इत्यादि ।
मायासन्तानसम्भवाः (पृ० ५२)—
'माया' शब्द श्लेषार्थक है । एक ओर बुद्ध की माता मायादेवी का
सङ्केत है—माया के पुत्र, अर्थात् बुद्ध के अनुयायी और दूसरी ओर बुद्ध
के मायावाद पर व्यंग्य है ।
दानपारमिता (पृ० ५२)—
पारमिता शब्द का अर्थ है 'पूर्णत्व' । पारमिताएँ छः होती हैं—दान,
शील, क्षान्ति, वीर्य, ध्यान तथा प्रज्ञा ।