मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ : मत्त्तविलास-प्रहसन
पांच नियम जो 'पञ्चशील' कहे जाते हैं सर्वसाधारण के लिए
और उपासक के लिए आवश्यक हैं। उपासक के लिए मदिरा पीने और स्त्री-
सहवास की भी अनुमति थी परन्तु भिक्षुओं के लिए इन दोनों का पूर्ण निषेध
था। उनके लिए दस नियम हैं जो 'दशशील' कहे जाते हैं।
मोक्ष की प्राप्ति अत्यन्त दुष्कर है। गृहस्थ के लिए अनेक विघ्न हैं।
उसके लिए साधना सुलभ नहीं हैं। साधारणतः वह स्वर्गोपपत्ति चाहता है।
उसके लिए शील की शिक्षा है। उपासक होने के लिए त्रिशरण 'गमन' विधि
है। जो उपासक होना चाहता है वह बुद्ध, धर्म और सङ्घ की शरण में जाता
है। बुद्ध की शरण में जाने का अर्थ है बुद्धकारक धर्मों की शरण में जाना।
उपासकों के पञ्चशील और भिक्षुओं के दशशील ये हैं—
१. प्राणातिपातविरति, २. अदत्तादानविरति, ३. काममिथ्या-
चारविरति, ४. मृषावादविरति, ५. सुरामद्यमैरेयस्थानविरति, ६. अकाल-
भोजनविरति, ७. नृत्यगीतवादित्रविरति, ८. माल्यगन्धविलेपनविरति,
६. उच्चासनशयनविरति, १०. जातरूपरजतप्रतिग्रहविरति ।
इनमें पहले पाँच नियम पञ्चशील हैं। दशशील में पञ्चशील भी
अन्तर्भूत हैं।
उपासक धर्म श्रवण करते हैं, उपवास, व्रत रखते हैं, भिक्षुओं को
दान देते हैं और चार तीर्थों की यात्रा करते हैं। चार तीर्थ ये हैं—कपिल-
वस्तु, बोधिगया, सारनाथ और कुसिनारा (कुशीनगर)। उपासक को भद्रक-
शील और भद्रकदृष्टि से समन्वागत होना चाहिए। उसको मानसिक,
कायिक तथा वाचिक दुश्चरित से बचना चाहिए। उसको सुचरित करना
चाहिए। इस प्रकार वह अपाय गति से बचता है और स्वर्ग में उत्पन्न
होता है।१
मत्स्यमांसप्रकारबहुलोऽयं (पृ० ३६)—
बुद्ध ने प्रवृत्त मांस का निषेध नहीं किया। अहिंसा के वे अवश्य ही
पूर्ण पक्षपाती थे; परन्तु ऐसे पशु के मांस को, जिसको (पशु को) किसी दूसरे
व्यक्ति ने मारकर पकाया है, उसको खाने की अनुमति बुद्ध ने दी है। मांस,
मछली आदि जिसकी हिंसा स्वयं नहीं की है उसको खाने में कोई पाप नही
है, ऐसा बुद्ध ने माना है।
१. आचार्य नरेन्द्रदेव, 'बौद्ध-धर्म-दर्शन,' पृ० २४।