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सर्वकोश
मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

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पृष्ठ 93

टिप्पणियाँ ८१
महायान ग्रन्थों के अनुसार जो बुद्धत्व की प्राप्ति के लिए यत्नवान्
है अर्थात् जो बोधिसत्व है, उसे षट्पारमिता का ग्रहण करना चाहिए। इन
षट्पारमिताओं का अर्जन बुद्धत्व प्राप्ति का नैसर्गिक उपाय है। षट्-
पारमिता में प्रज्ञा का प्राधान्य है। प्रज्ञापारमिता यथार्थज्ञान को कहते हैं।
प्रज्ञा की प्राप्ति के लिए ही अन्य पारमिताओं की शिक्षा कही गई है। ये
पञ्चपारमिताएँ प्रज्ञा रहित होने पर लौकिक कहलाती हैं। जब पञ्च-
पारमिताएँ प्रज्ञापारमिता से समन्वगत होती हैं तभी वह सचक्षुक कहलाती
हैं और उसको लोकोत्तर संज्ञा प्राप्त होती है। प्रज्ञा की प्रधानता होते हुए भी
अन्य पारमिताओं का ग्रहण नितान्त आवश्यक है। सम्बोधि की प्राप्ति में
दान प्रथम कारण है, शील दूसरा। आत्मभाव का त्याग तथा निस्वार्थ बुद्धि
की प्रकृष्टता दानपारमिता है। दान, शील की अनुपालना क्षान्ति द्वारा
होती है। दानादि त्रितय पुण्यसंभार, वीर्य अर्थात् कुशलोत्साह के बिना नहीं
हो सकता; और बिना ध्यान अर्थात् चित्तैकाग्रता के प्रज्ञा का प्रादुर्भाव नहीं
होता क्योंकि समाहित चित्त होने से ही यथाभूत परिज्ञान होता है जिससे
सब आवरणों की अत्यन्त हानि होती है।³
भरतवाक्यम् (पृ० ६२)—
इससे नाट्याभिनय की समाप्ति पर सामाजिकों के लिए नट के द्वारा
आशीर्वाद दिया जाता है।
१. प्रस्तावना के अनन्तर वे नट ही नाट्य के विभिन्न पात्रों के
रूप में रङ्गशाला में प्रकट होते हैं। अभिनय की समाप्ति पर उसी
पहले रूप में प्रकट होना सम्भव नहीं होता है; अतः नटवाक्य न कहकर भरत-
वाक्य कहा जाता है।
२. नाट्यशास्त्र के रचयिता भरत मुनि की स्मृति में पुनः यह नट-
वाक्य भरतवाक्य कहा जाता है।
राजन्वान् (श्लोक; पृ० ६२)—
राजन् शब्द से राजवत् और राजन्वत् दोनों शब्द बनते हैं। राजवत्
शब्द का अर्थ है 'केवल राजा से युक्त' अर्थात् उस देश का राजा उत्तम नहीं
है; और जो देश न्यायपरायण तथा उत्तम राजा द्वारा शासित है वह
राजन्वत् है—
सुराज्ञि देशे राजन्वान् स्यात् ततोऽन्यत्र राजवान् । —अमरकोषः ।
३. आचार्य नरेन्द्रदेव, बौद्ध-धर्म-दर्शन', पृ० १८४ ।