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सर्वकोश
मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

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टिप्पणियाँ ७५
राजविहारमेव (पृ० ३६) —
काञ्ची में स्थित विहार सम्भवतः बहुत बड़े थे जैसा कि इत्सिंग ने,
जो भारत में ६७३ ई० से ६८८ ई० तक रहा, वर्णन किया है। वे बड़े-बड़े
विहार ही कदाचित् राजविहार कहे जाते हों।
पञ्चसुगन्धब्बोवहिअं (पृ० ३६) —
एला (इलायची), लवंग, कस्तूरी, केसर, चन्दन ये पाँच सुगन्धित
पदार्थ ताम्बूल (पान) में प्रयुक्त होते हैं।
सर्वज्ञ (पृ० ३६) —
सर्वज्ञ शब्द बुद्ध के लिए प्रयुक्त होता है।
सर्वज्ञः सुगतो बुद्धो धर्मराजस्तथागतः ।
समन्तभद्रो भगवान्मारजिल्लोकजिज्जिनः ॥१३॥
—अमरकोषः (प्र. का., स्वर्गवर्गः १)
स्थविरेः (पृ० ३६) –
इस पद में श्लेष है। एक ओर स्थविर पद का अर्थ वृद्ध लिया
जा सकता है और दूसरी ओर बौद्धों के स्थविरवाद की ओर भी संकेत
मिलता है।
स्थविरवाद सम्प्रदाय बौद्ध धर्म का सर्वाधिक प्राचीन सम्प्रदाय है।
इस सम्प्रदाय के प्रवचनकार स्वयं भगवान् बुद्ध थे। स्थविरवाद का अर्थ
है स्थविरों अर्थात् वृद्ध ज्ञानी पुरुषों और तत्त्वदर्शियों का मत। बुद्ध के प्रथम
शिष्यों के लिए 'स्थविर' शब्द का प्रयोग किया गया है। बुद्ध मन्तव्य के
विषय में उन स्थविरों का मत ही अन्तिम प्रमाण था। अतः स्थविरवाद
का अर्थ प्रामाणिक मत भी हो गया। २
पिटकपुस्तकेषु (पृ० ३६) —
पिटक अर्थात् पिटारियाँ। बौद्ध धर्म में तीन पिटक सर्वस्व माने
जाते हैं—
१. विनयपिटक (ये आचार सम्बन्धी ग्रन्थ हैं।)
२. सुत्तपिटक (इसमें बुद्ध के उपदेश निहित हैं।)
२. वाचस्पति गैरोला, संस्कृत साहित्य का इतिहास, पृ० ३८३।