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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

३१८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
है । वाणीद्वारा प्रार्थना करके मनुष्य शरीरके पोषण और उसे उन्नत करनेकी सभी सामग्री प्राप्त कर सकता है । तथा ओङ्कार-
रूप परमेश्वरके नाम जपसे परमात्माको भी प्राप्त कर सकता है । इस प्रकार वाणीमे शारीरिक और आत्मविषयक-दोनों तरह-
की उन्नति करनेकी सामर्थ्य भरी हुई है । इस रहस्यको समझकर जो मनुष्य अपनी वाणीका यथायोग्य उपयोग करता है,
वह वाक्शक्ति पाकर उसके द्वारा अभीष्ट फल प्राप्त करनेमें समर्थ हो जाता है ।
इतीमा महासꣳहिता य एवमेता महासꣳहिता व्याख्याता वेद । संधीयते प्रजया पशुभिः ।
ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन सुवर्गेण लोकेन ।
इति = इस प्रकार, इमाः = ये, महासंहिताः = पाँच महासंहिताएँ कही गयी ह, यः = जो मनुष्य, एवम् = इस प्रकार;
एताः = इन; व्याख्याताः = ऊपर बतायी हुई, महासंहिताः = महासंहिताओंको, वेद = जान लेता है; (वह) प्रजया =
सन्तानसे, पशुभिः = पशुओंसे, ब्रह्मवर्चसेन = ब्रह्मतेजसे, अन्नाद्येन = अन्न आदि भोग्य पदार्थोसे (और) सुवर्गेण = स्वर्गरूप;
लोकेन = लोकसे, संधीयते = सम्पन्न हो जाता है ।
व्याख्या - इस मन्त्रमें पाँच प्रकारसे कही हुई महासंहिताओंके यथार्थ ज्ञानका फल बताया गया है । इनको जानने-
वाला अपनी इच्छाके अनुकूल संतान प्राप्त कर सकता है, विद्याके द्वारा ब्रह्मतेज सम्पन्न हो जाता है, अपनी इच्छाके अनुसार
नाना प्रकारके पशुओंको और अन्न आदि आवश्यक भोग्य पदार्थोंको प्राप्त कर सकता है। इतना ही नहीं, उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति
भी हो जाती है । इनमेंसे लोकविषयक सहिताके ज्ञानसे स्वर्ग आदि उत्तम लोक, ज्योति-विषयक सहिताके ज्ञानसे नाना
प्रकारकी भौतिक सामग्री, प्रजाविषयक संधिके ज्ञानसे संतान, विद्याविषयक सहिताके ज्ञानसे विद्या और ब्रह्मतेज तथा अध्यात्म-
सहिताके विज्ञानसे वाक्शक्तिकी प्राप्ति-इस प्रकार पृथक् पृथक् फल समझना चाहिये । श्रुतिमे समस्त संहिताओंके ज्ञानका
सामूहिक फल बताया गया है । श्रुति ईश्वरकी वाणी है, अतः इसका रहस्य समझकर श्रद्धा और विश्वासके साथ उपर्युक्त
उपासना करनेसे निस्सन्देह वे सभी फल प्राप्त हो सकते हैं, जिनकी चर्चा ऊपर की गयी है ।
॥ तृतीय अनुवाक समाप्त ॥ ३ ॥
चतुर्थ अनुवाक
यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः । छन्दोभ्योऽध्यमृतात्सम्बभूव । स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु । अमृतस्य
देव धारणो भूयासम् । शरीरं मे विचर्षणम् । जिह्वा मे मधुमत्तमा । कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम् । ब्रह्मणः
कोशोऽसि मेधया पिहितः । श्रुतं मे गोपाय ।
यः = जो, छन्दसाम् = वेदोंमें, ऋषभः = सर्वश्रेष्ठ है, विश्वरूपः = सर्वरूप है, (और) अमृतात् = अमृतरूप,
छन्दोभ्यः = वेदोंसे, अधि = प्रधानरूपसे, सम्बभूव = प्रकट हुआ है, सः = वह (ओङ्कारस्वरूप) इन्द्रः = सबका स्वामी
(परमेश्वर), मा = मुझे, मेधया = धारणाद्युक्त बुद्धिसे, स्पृणोतु = सम्पन्न करे देव = हे देव, (मैं आपकी कृपासे) अमृतस्य
धारणः = अमृतमय परमात्माको (अपने हृदयमें) धारण करनेवाला, भूयासम् = बन जाऊँ, मे = मेरा; शरीरम् = शरीर,
विचर्षणम् = विशेष फुर्तीला-सब प्रकारसे रोगरहित हो, (और) मे = मेरी, जिह्वा = जिह्वा, मधुमत्तमा = अतिशय
मधुमती (मधुरभाषिणी), [भूयात् = हो जाय,] कर्णाभ्याम् = (मैं) दोनों कानोंद्वारा, भूरि = अधिक, विश्रुवम् = सुनता
रहूँ, (हे प्रणव ! तू) मेधया = लौकिक बुद्धिसे, पिहितः = ढकी हुई, ब्रह्मणः = परमात्माकी, कोशः = निधि, असि = है,
(तू) मे = मेरे, श्रुतम् गोपाय = सुने हुए उपदेशकी रक्षा कर ।
व्याख्या - इस चतुर्थ अनुवाकमें 'मे श्रुतम् गोपाय' इस वाक्यतक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये आवश्यक

  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३१९
    बुद्धिबल और शारीरिक बलकी प्राप्तिके उद्देश्यसे परमेश्वरसे उनके नाम ओंकारद्वारा प्रार्थना करनेका प्रकार बताया गया है।
    भाव यह है कि 'ओम्' यह परमेश्वरका नाम वेदोक्त जितने भी मन्त्र हैं, उन सबमें श्रेष्ठ है और सर्वरूप है, क्योंकि प्रत्येक
    मन्त्रके आदिमे ओंकारका उच्चारण किया जाता है और ओंकारके उच्चारणसे सम्पूर्ण वेदोंके उच्चारणका फल प्राप्त होता
    है। तथा अविनाशी वेदोंसे यह ओंकार प्रधानरूपमे प्रकट हुआ है। ओंकार नाम है और परमेश्वर नामी, अतः दोनों
    परस्पर अभिन्न है। वे प्रणवरूप परमात्मा सबके परमेश्वर होनेके कारण 'इन्द्र' नामसे प्रसिद्ध है। वे इन्द्र मुझे मेधासे
    सम्पन्न करें। 'धीर्धारणावती मेधा' इस कोषवाक्यके अनुसार धारणाशक्तिसे सम्पन्न बुद्धिका नाम मेधा है। तात्पर्य यह कि
    परमात्मा मुझे पढे और समझे हुए भावोंको धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न करे। हे देव ! मै आपकी अहैतुकी कृपासे आपके
    अमृतमय स्वरूपको अपने हृदयमें धारण करनेवाला बन जाऊँ। मेरा शरीर रोगरहित रहे, जिससे आपकी उपासनामें किसी
    प्रकारका विघ्न न पड़े। मेरी जिह्वा अतिशय मधुमती अर्थात् मधुर स्वरसे आपके अत्यन्त मधुर नाम और गुणोंका कीर्तन
    करके उनके मधुर रसका आस्वादन करनेवाली बन जाय। मै अपने दोनों कानोंद्वारा कल्याणमय बहुतसे शब्दोंको सुनता रहूँ,
    अर्थात् मेरे कानोंमें आचार्यद्वारा वर्णन किये हुए रहस्यको पूर्णतया सुननेकी शक्ति आ जाय और मुझे आपका कल्याणमय
    यश सुननेको मिलता रहे। हे ओंकार ! तू परमेश्वरकी निधि है, अर्थात् वे पूर्णब्रह्म परमेश्वर तुझमे भरे हुए हैं, क्योंकि
    नामी नामके ही आश्रित रहता है। ऐसा होते हुए भी तू मनुष्योंकी लौकिक बुद्धिसे ढका हुआ है-लौकिक तर्कसे अनुसन्धान
    करनेवालोंकी बुद्धिमे तेरा प्रभाव व्यक्त नहीं होता। हे देव ! तू सुने हुए उपदेशकी रक्षा कर अर्थात् ऐसी कृपा कर कि
    मुझे जो उपदेश सुननेको मिले, उसे मैं स्मरण रखता हुआ उसके अनुसार अपना जीवन बना सकूँ।
    सम्बन्ध-अब ऐश्वर्यकी कामनावालेके लिये हवन करनेके मन्त्रोंका आरम्भ करते है—
    आवहन्ती वितन्वाना कुर्वाणाचीरमात्मनः । वासांसि मम गावश्च । अन्नपाने च सर्वदा ।
    ततो मे श्रियमावह । लोमशां पशुभिः सह स्वाहा ।
    ततः = उसके बाद (अब ऐश्वर्य प्राप्त करनेकी रीति बताते हैं—हे देव !), [या श्रीः = जो श्री,] मम = मेरे,
    आत्मनः = अपने लिये, अचीरम् = तत्काल ही, वासांसि = नाना प्रकारके वस्त्र, च = और, गावः = गौएँ, च = तथा,
    अन्नपाने = खाने-पीनेके पदार्थ, सर्वदा = सदैव, आवहन्ती = ला देनेवाली, वितन्वाना = उनका विस्तार करनेवाली,
    [च = तथा,] कुर्वाणा = उन्हें बनानेवाली है, लोमशाम् = रोएँवाले—भेड़-बकरी आदि पशुओसे युक्त, पशुभिः सह =
    (तथा अन्य) पशुओंके सहित; [ताम्] श्रियम् = उस श्रीको, मे = (तू) मेरे लिये, आवह = ले आ, स्वाहा = स्वाहा
    (इसी उद्देश्यसे तुझे यह आहुति समर्पित की जाती है)।
    व्याख्या—चतुर्थ अनुवाकके इस अङ्गमें 'ततः' पदसे लेकर 'आवह स्वाहा' यहाँतक ऐश्वर्यकी कामनावाले सकाम
    मनुष्योंके लिये, परमेश्वरसे प्रार्थना करते हुए अग्निमें आहुति देनेकी रीति बतायी गयी है। प्रार्थनाका भाव यह है कि 'हे
    अग्निके अधिष्ठाता परमेश्वर ! जो मेरे निजके लिये आवश्यकता होनेपर बिना विलम्ब तत्काल ही नाना प्रकारके
    वस्त्र, गौएँ और खाने-पीनेकी विविध सामग्री सदैव प्रस्तुत कर दे, उन्हें बढाती रहे तथा उन्हें नवीनरूपसे रच दे, ऐसी
    श्रीको तू मेरे लिये भेड़-बकरी आदि रोएँवाले एव अन्य प्रकारके पशुओंसहित ला दे। अर्थात् समस्त भोग-सामग्रीका
    साधनरूप धन मुझे प्रदान कर। इस मन्त्रका उच्चारण करके 'स्वाहा' इस शब्दके साथ अग्निमे आहुति देनी चाहिये,
    ˗ यह ऐश्वर्यकी प्राप्तिका साधन है।
    सम्बन्ध—आचार्यको ब्रह्मचारियोंके हितार्थ किस प्रकार हवन करना चाहिये, इसकी विधि बतायी जाती है—
    आमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । विमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । प्रमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा ।
    दमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । शमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा ।
    ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारीलोग, मा = मेरे पास; आयन्तु = आयें, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति दी

३२० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
जाती है); ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारीलोग, विमायन्तु = कपटशून्य हों, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है);
ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारीलोग, प्रमायन्तु = प्रामाणिक ज्ञानको ग्रहण करनेवाले हो, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह
आहुति है), ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारीलोग, दमयन्तु = इन्द्रियोका दमन करनेवाले हों, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह
आहुति है); ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारीलोग. शमायन्तु = मनको वशमे करनेवाले हों; स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे
यह आहुति है)।
व्याख्या—चतुर्थ अनुवाकके इस अंशमे शिष्योके हितार्थ आचार्यको जिन मन्त्रोद्वारा हवन करना चाहिये, उनका
वर्णन किया गया है। भाव यह है कि आचार्य 'उत्तम ब्रह्मचारीलोग मेरे पास विद्या पढनेके लिये आये' इस उद्देश्यने मन्त्र पढकर
'स्वाहा' शब्दके साथ पहली आहुति दे, 'मेरे ब्रह्मचारी कपटशून्य हों' इस उद्देश्यसे मन्त्र पढकर 'स्वाहा' शब्दके साथ दूसरी
आहुति दे, 'ब्रह्मचारीलोग उत्तम ज्ञानको ग्रहण करनेवाले हों' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ
तीसरी आहुति दे, 'ब्रह्मचारीलोग इन्द्रियोंका दमन करनेवाले हो' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ चौथी
आहुति दे तथा 'ब्रह्मचारीलोग मनको वशमे करनेवाले हों' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ पाँचवीं
आहुति दे।
सम्बन्ध—आचार्यको अपने लौकिक और पारलौकिक हितके लिये जिस प्रकार हवन करना चाहिये, उसकी विधि बतायी
जाती है--
यशो जनेऽसानि स्वाहा। श्रेयान् वस्यसोऽसानि स्वाहा। तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा। स मा
भग प्रविश स्वाहा। तस्मिन् सहस्रशाखे नि भगाहं त्वयि मृजे स्वाहा।
जने = लोगोंमें (मै), यशः = यशस्वी, असानि = होऊँ, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है); वस्यसः =
महान् धनवानोंकी अपेक्षा भी, श्रेयान् = अधिक धनवान्; असानि = हो जाऊँ, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति
है), भग = हे भगवन्, तम् त्वा = उस आपमें, प्रविशानि = मै प्रविष्ट हो जाऊँ, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह
आहुति है), भग = हे भगवन्!, सः = वह (तू); मा = मुझमें, प्रविश = प्रविष्ट हो जा, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यमे यह
आहुति है), भग = हे भगवन्!, तस्मिन् = उस, सहस्रशाखे = हजारो शाखावाले; त्वयि = आपमे, (ध्यानद्वारा निमग्न होकर)
अहम् = मै, निमृजे = अपनेको विशुद्ध कर लूँ, स्वाहा = स्वाहा (इस उद्देश्यसे यह आहुति है)।
व्याख्या-चतुर्थ अनुवाकके इस अंशमे आचार्यको अपने हितके लिये जिन मन्त्रोद्वारा हवन करना चाहिये, उनका वर्णन
किया गया है। भाव यह है कि आचार्यको 'लोगोंमें मै यशस्वी बनूँ, जगत्में मेरा यश सौरभ सर्वत्र फैल जाय, मुझसे कोई भी
ऐसा आचरण न बने, जो मेरे यशमें धब्बा लगानेवाला हो' इस उद्देश्यसे 'यशो जनेऽसानि' इस मन्त्रका उच्चारण करके 'स्वाहा'
शब्दके साथ पहली आहुति डालनी चाहिये। 'महान् धनवानोंकी अपेक्षा भी मैं अधिक सम्पत्तिशाली बन जाऊँ' इस उद्देश्यसे
मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ दूसरी आहुति अग्निमें डालनी चाहिये। 'हे भगवन्! आपके उस दिव्य स्वरूपमें मैं प्रविष्ट
हो जाऊँ' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ तीसरी आहुति अग्निमे डालनी चाहिये। 'हे भगवन्! वह
आपका दिव्य स्वरूप मुझमें प्रविष्ट हो जाय-मेरे मनमे बस जाय' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ चौथी
आहुति अग्निमें डालनी चाहिये। 'हे भगवन् ! हजारों शाखावाले आपके उस दिव्यरूपमे ध्यानद्वारा निमग्न होकर मै अपने
आपको विशुद्ध बना लूँ' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक 'स्वाहा' शब्दके साथ पाँचवीं आहुति अग्निमे डालनी चाहिये।
यथाऽऽपः प्रवता यन्ति यथा मासा अहर्जरम्। एवं मां ब्रह्मचारिणो धातरायन्तु सर्वतः स्वाहा।
प्रतिवेशोऽसि प्र मा भाहि प्र मा पद्यस्व ॥
यथा = जिस प्रकार, आपः = (नदी आदिके) जल, प्रवता = निम्न स्थानसे होकर; यन्ति = समुद्रमें चले जाते हैं,
यथा = जिस प्रकार, मासाः = महीने, अहर्जरम् = दिनोंका अन्त करनेवाले सम्वत्सररूप कालमे, [यन्ति = चले जाते हैं,]

धातः = हे विधाता; एवम् = इसी प्रकार; माम् = मेरे पास; सर्वतः = सब ओरसे; ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारीलोग; आयन्तु =
आयें; स्वाहा = स्वाहा ( इस उद्देश्यसे यह आहुति है); प्रतिवेशः = (तू) सबका विश्राम-स्थान; असि = है; मा = मेरे लिये;
प्रभाहि = अपनेको प्रकाशित कर; मा = मुझे; प्रपद्यस्व = प्राप्त हो जा।
व्याख्या - 'जिस प्रकार समस्त जल-प्रवाह नीचेकी ओर बहते हुए समुद्रमें मिल जाते हैं, तथा जिस प्रकार महीने
दिनोंका अन्त करनेवाले संवत्सररूप कालमें जा रहे हैं, हे विधाता ! उसी प्रकार मेरे पास सब ओरसे ब्रह्मचारीलोग आयें और मैं
उनको विद्याभ्यास कराकर तथा कल्याणका उपदेश देकर अपने कर्तव्यका एवं आपकी आज्ञाका पालन करता रहूँ।' इस
उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारण करके 'स्वाहा' शब्दके साथ छठी आहुति अग्निमें डालनी चाहिये । 'हे परमात्मन् ! आप सबके विश्राम-
स्थान हैं, अब मेरे लिये अपने दिव्य स्वरूपको प्रकाशित कर दीजिये और मुझे प्राप्त हो जाइये' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक
'स्वाहा' शब्दके साथ सातवीं आहुति अग्निमें डाले।
इस प्रकार इस चौथे अनुवाकमें इस लोक और परलोककी उन्नतिका उपाय परमात्माकी प्रार्थना और उसके
साथ-साथ हवनको बताया गया है। प्रकरण बड़ा ही सुन्दर और श्रेयस्कर है। अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको इसमें
बताये हुए प्रकारसे अपने लिये जिस अंशकी आवश्यकता प्रतीत हो, उस अंशके अनुसार अनुष्ठान आरम्भ कर देना चाहिये ।
॥ चतुर्थ अनुवाक ॥ ४ ॥
पञ्चम अनुवाक
भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्रो व्याहृतयः । तासामु ह स्मैतां चतुर्थीं माहाचमस्यः प्रवेदयते ।
मह इति । तद्ब्रह्म । स आत्मा । अङ्गान्यन्या देवताः । भूरिति वा अयं लोकः । भुव इत्यन्तरिक्षम् ।
सुवरित्यसौ लोकः । मह इत्यादित्यः । आदित्येन वाव सर्वे लोका महीयन्ते ।
भूः = भूः; भुवः = भुवः; सुवः = स्वः; इति = इस प्रकार; एताः = ये; वै = प्रसिद्ध; तिस्रः = तीन; व्याहृतयः = व्याहृतियाँ
हैं; तासाम् उ = उन तीनोंकी अपेक्षासे; चतुर्थीम् = जो चौथी व्याहृति; महः इति = 'मह' इस नामसे, ह = प्रसिद्ध है; एताम् =
इसको; माहाचमस्यः = महाचमसके पुत्रने, प्रवेदयते स्म = सबसे पहले जाना था, तत् = वह चौथी व्याहृति ही;
ब्रह्म = ब्रह्म है; सः = वह; आत्मा = ऊपर कही हुई व्याहृतियोंकी आत्मा है; अन्याः = अन्य; देवताः = सब
देवता; अङ्गानि = उसके अङ्ग हैं, भूः = 'भूः'; इति = यह व्याहृति; वै = ही; अयम् लोकः = यह पृथ्वी-लोक है, भुवः =
'भुवः'; इति = यह; अन्तरिक्षम् = अन्तरिक्ष-लोक है; सुवः = 'स्वः'; इति = यह, असौ लोकः = वह प्रसिद्ध स्वर्गलोक है;
महः = 'महः'; इति = यह, आदित्यः = आदित्य-सूर्य है; आदित्येन = (क्योंकि) आदित्यसे; वाव = ही; सर्वे = समस्त;
लोकाः = लोक, महीयन्ते = महिमान्वित होते हैं।
व्याख्या - इस पञ्चम अनुवाकमें भूः, भुवः, स्वः और महः - इन चारों व्याहृतियोंकी उपासनाका रहस्य बताकर
उसके फलका वर्णन किया गया है। पहले तो इसमें यह बात कही गयी है कि भूः, भुवः और स्वः - ये तीन व्याहृतियाँ तो
प्रसिद्ध हैं; परंतु इनके अतिरिक्त जो चौथी व्याहृति 'महः' है, इसकी उपासनाका रहस्य सबसे पहले महाचमसके पुत्रने
जाना था । भाव यह है कि इन चारों व्याहृतियोंको चार प्रकारसे प्रयोग करके उपासना करनेकी विधि, जो आगे
बतायी गयी है, तभीसे प्रचलित हुई है। इसके बाद उन चार व्याहृतियोंमें किस प्रकारकी भावना करके उपासना करनी
चाहिये, यह समझाया गया है। इन चारों व्याहृतियोंमें 'महः' यह चौथी व्याहृति सर्वप्रधान है। अतः उपास्य देवोंमें 'महः'
व्याहृतिको ब्रह्मका स्वरूप समझना चाहिये - यह भाव समझानेके लिये कहा गया है कि वह चौथी व्याहृति 'महः' ब्रह्मका नाम होनेसे
ब्रह्म ही है; क्योंकि ब्रह्म सबके आत्मा हैं, सर्वरूप हैं और अन्य सब देवता उनके अङ्ग हैं, अतः जिस किसी भी देवताकी
इन व्याहृतियोंके द्वारा उपासना की जाय, उसमें इस बातको नहीं भूलना चाहिये कि यह सर्वरूप परमेश्वरकी ही उपासना है।
उ० अं० ४१-४२-

३२२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *


सब देवता उन्हींके अङ्ग होनेसे अन्य देवोंकी उपासना भी उन्हींकी उपासना है। उसके पश्चात् इन व्याहृतियोंमें लोकोंका चिन्तन
करनेकी विधि इस प्रकार बतायी गयी है—'भूः' यह तो मानो पृथ्वीलोक है, 'भुवः' यह अन्तरिक्षलोक है, 'स्वः' यह सुप्रसिद्ध
स्वर्गलोक है और 'महः' यह सूर्य है, क्योंकि सूर्यसे ही सब लोक महिमान्वित हो रहे हैं। तात्पर्य यह कि भूः, भुवः, स्वः—ये
तीनों व्याहृतियाँ तो उन परमेश्वरके विराट् शरीररूप इस स्थूल ब्रह्माण्डको बतानेवाली—अर्थात् परमेश्वरके अङ्गोंके नाम
हैं तथा 'महः' यह चौथी व्याहृति इस विराट् शरीरको प्रकाशित करनेवाले उसके आत्मारूप स्वय परमेश्वरको बतानेवाली है।
'महः' यह सूर्यका नाम है, सूर्यके भी आत्मा हैं परमेश्वर, अतः सूर्यरूपसे सब लोकोंको वे ही प्रकाशित करते हैं। इसलिये
यहाँ सूर्यके उपलक्षणसे इस विराट् शरीरको आत्मारूपसे प्रकाशित करनेवाले परमेश्वरकी ही उपासनाका लक्ष्य
कराया गया है।

भूरिति वा अग्निः। भुव इति वायुः। सुवरित्यादित्यः। मह इति चन्द्रमाः। चन्द्रमसा वाव
सर्वाणि ज्योतीꣳषि महीयन्ते। भूरिति वा ऋचः। भुव इति सामानि। सुवरिति यजूंꣳषि। मह इति
ब्रह्म। ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते।

भूः=भूः; इति=यह व्याहृति; वै=ही; अग्निः=अग्नि है; [भुवः='भुवः', इति=यह; वायुः=वायु है;
सुवः='स्वः', इति=यह; आदित्यः=आदित्य है; महः='महः'; इति=यह; चन्द्रमाः=चन्द्रमा है; (क्योंकि)
चन्द्रमसा=चन्द्रमासे; वाव=ही; सर्वाणि=समस्त; ज्योतींषि=ज्योतियाँ; महीयन्ते=महिमावाली होती हैं; भूः='भूः';
इति=यह व्याहृति; वै=ही; ऋचः=ऋग्वेद है; भुवः='भुवः', इति=यह; सामानि=सामवेद है; सुवः='स्वः', इति=
यह; यजूंषि=यजुर्वेद है; महः='महः', इति=यह; ब्रह्म=ब्रह्म है; (क्योंकि) ब्रह्मणा=ब्रह्मसे; वाव=ही; सर्वे=समस्त;
वेदाः=वेद; महीयन्ते=महिमावान् होते हैं।

**व्याख्या—**इसी प्रकार फिर ज्योतियोंमें इन व्याहृतियोंद्वारा परमेश्वरकी उपासनाका प्रकार बताया गया है। भाव
यह है कि 'भूः' यह व्याहृति अग्निका नाम होनेसे मानो अग्नि ही है। अग्निदेवता वाणीका अधिष्ठाता है और वाणी भी प्रत्येक
विषयको व्यक्त करके स्वयं प्रकाशित होनेसे ज्योति है; अतः वह भी ज्योतियोंकी उपासनामें मानो 'भूः' है। 'भुवः' यह वायु
है। वायुदेवता त्वक् इन्द्रियका अधिष्ठाता है और त्वक्-इन्द्रिय स्पर्शको प्रकाशित करनेवाली ज्योति है; अतः ज्योतिविषयक
उपासनामे वायु और त्वचाको 'भुवः'रूप समझना चाहिये। 'स्वः' यह सूर्य है। सूर्य चक्षु-इन्द्रियका अधिष्ठातृ-देवता है;
चक्षु-इन्द्रिय भी सूर्यकी सहायतासे रूपको प्रकाशित करनेवाली ज्योति है; अतः ज्योति विषयक उपासनामें सूर्य और चक्षु-
इन्द्रियको 'स्वः' व्याहृतिस्वरूप समझना चाहिये। 'महः' यह चौथी व्याहृति ही मानो चन्द्रमा है; चन्द्रमा मनका अधिष्ठातृ-
देवता है। मनकी सहायतासे, मनके साथ रहनेपर ही समस्त इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयको प्रकाशित कर सकती हैं; मनके
बिना नहीं कर सकतीं; अतः सब ज्योतियोंमें प्रधान चन्द्रमा और मनको ही 'महः' व्याहृतिरूप समझना चाहिये; क्योंकि
चन्द्रमासे अर्थात् मनसे ही समस्त ज्योतिरूप इन्द्रियाँ महिमान्वित होती है। इस प्रकार मनके रूपमे परमेश्वरकी उपासना
करनेकी विधि समझायी गयी। फिर इसी भाँति वेदोंके विषयमें व्याहृतियोंके प्रयोगद्वारा परमेश्वरकी उपासनाका प्रकार बताया
गया है। भाव यह है कि 'भूः' यह ऋग्वेद है; 'भुवः' यह सामवेद है; 'स्वः' यह यजुर्वेद है और 'महः' यह ब्रह्म है; क्योंकि
ब्रह्मसे ही समस्त वेद महिमायुक्त होते हैं। तात्पर्य यह कि सम्पूर्ण वेदोंमें वर्णित समस्त ज्ञान परब्रह्म परमेश्वरसे ही प्रकट और
उन्हींसे व्याप्त है तथा उन परमेश्वरके तत्त्वका इन वेदोंमें वर्णन है; इसीलिये इनकी महिमा है। इस प्रकार वेदोंमें इन
व्याहृतियोंका प्रयोग करके उपासना करनी चाहिये।

भूरिति वै प्राणः। भुव इत्यपानः। सुवरिति व्यानः। मह इत्यन्नम्। अन्नेन वाव सर्वे प्राणा
महीयन्ते। ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धा। चतस्रश्चतस्रो व्याहृतयः। ता यो वेद। स वेद ब्रह्म। सर्वेऽस्मै
देवा बलिमावहन्ति।

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  • तैत्तिरीयोपनिषद् * | ३२३

भू:= 'भूः', इति = यह व्याहृति; वै = ही; प्राणः = प्राण है, भुवः = 'भुवः', इति = यह, अपानः = अपान- है;
सुवः = 'स्वः', इति = यह; व्यानः = व्यान है, महः = 'महः', इति = यह, अन्नम् = अन्न है, (क्योंकि) अन्नेन = अन्नसे, वाव =
ही; सर्वे = समस्त, प्राणाः = प्राण, महीयन्ते = महिमायुक्त होते हैं; ताः = वे, वै = ही; एताः = ये, चतस्रः = चारों
व्याहृतियाँ, चतुर्धा = चार प्रकारकी हैं, (अतएव) चतस्रः चतस्रः = एक-एकके चार-चार भेद होनेसे कुल सोलह;
व्याहृतयः = व्याहृतियाँ हैं; ताः = उनको; यः = जो; वेद = तत्त्वसे जानता है, सः = वह; ब्रह्म = ब्रह्मको, वेद = जानना है;
अस्मै = इस ब्रह्मवेत्ताके लिये, सर्वे = समस्त, देवाः = देवता, बलिम् = भेंट; आवहन्ति = समर्पण करते हैं ।

व्याख्या—उसके बाद प्राणोंके विषयमें इन व्याहृतियोंका प्रयोग करके उपासनाका प्रकार समझाया गया है । भाव
यह है कि 'भूः' यही मानो प्राण है, 'भुवः' यह अपान है, 'स्वः' यह व्यान है । इस प्रकार जगद्व्यापी समस्त प्राण-ही
मानो ये तीनों व्याहृतियाँ है और अन्न 'महः' रूप चतुर्थ व्याहृति है, क्योंकि जिस प्रकार व्याहृतियोंमें 'महः' प्रधान है,
उसी प्रकार समस्त प्राणोंका पोषण करके उनकी महिमाको बनाये रखने और बढ़ानेके कारण उनकी अपेक्षा अन्न प्रधान' है,
अतः प्राणोंके अन्तर्यामी परमेश्वरकी अन्नके रूपमें उपासना करनी चाहिये ।

इस तरह चारों व्याहृतियोंको चार प्रकारसे प्रयुक्त करके उपासना करनेकी रीति बताकर फिर उसे समझकर उपासना
करनेका फल बताया गया है । भाव यह कि चार प्रकारसे प्रयुक्त इन चारों व्याहृतियोंकी उपासनाके भेदको जो कोई जान
लेता है, अर्थात् समझकर उसके अनुसार परब्रह्म परमात्माकी उपासना करता है, वह ब्रह्मको जान लेता है और समस्त
देव उसको भेंट समर्पण करते हैं—उसे परमेश्वरका प्यारा समझकर उसका आदर-सत्कार करते हैं ।

॥ पञ्चम अनुवाक ॥ ५ ॥


अनुवाक

स य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः । तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः । अमृतो हिरण्मयः ।

सः = वह (पहले बताया हुआ); यः = जो, एषः = यह; अन्तर्हृदये = हृदयके भीतर, आकाशः = आकाश है;
तस्मिन् = उसमें; अयम् = यह, हिरण्मयः = विशुद्ध प्रकाशस्वरूप; अमृतः = अविनाशी, मनोमयः = मनोमय, पुरुषः = पुरुष-
(परमेश्वर) रहता है ।

व्याख्या—इस अनुवाकमें चार बातें कही गयी हैं, उनका पूर्व अनुवाकमें बतलाये हुए उपदेशसे अलग-अलग
संबन्ध है और उस उपदेशकी पूर्तिके लिये ही यह आरम्भ किया गया है, ऐसा अनुमान होता है ।

पूर्व अनुवाकमें मनके अधिष्ठातृ-देवता चन्द्रमाको इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ-देवताओंका प्रकाशक बताया गया है और उसकी
ब्रह्मरूपसे उपासना करनेकी युक्ति समझायी गयी है; वे मनोमय परब्रह्म—सबके अन्तर्यामी पुरुष कहाँ है, उनकी उपलब्धि
कहाँ होती है—यह बात इस अनुवाकके पहले अंशमें समझायी गयी है । अनुवाकके इस अंशका अभिप्राय यह है कि पहले
बतलाया हुआ जो यह हृदयके भीतर अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला आकाश है, उसीमें ये विशुद्ध प्रकाशस्वरूप अविनाशी मनोमय
अन्तर्यामी परम पुरुष परमेश्वर विराजमान हैं, वहीं उनका साक्षात्कार हो जाता है, उन्हें पानेके लिये कहीं दूसरी जगह नहीं
जाना पड़ता ।

अन्तरेण तालुके । य एष स्तन इवावलम्बते । सेन्द्रयोनिः । यत्रासौ केशान्तो विवर्तते । व्यपोह्य
शीर्षकपाले । भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति । भुव इति वायौ । सुवरित्यादित्ये । मह इति ब्रह्मणि ।

  • अन्तरेण तालुके = दोनों तालुओंके बीचमें, यः = जो, एषः = यह, स्तनः इव = स्तनके सदृश, अवलम्बते = लटक रहा
    है* [ तम् अपि अन्तरेण = उसके भी भीतर, ] यत्र = जहाँ, असौ = वह; केशान्तः = केशोंका मूलस्थान (ब्रह्मरन्ध्र); विवर्तते =

३२४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
स्थित है; (वहाँ) शीर्षकपाले = सिरके दोनो कपालोंको; व्यपोह्य = भेदन करके, [ विनिःसृता या = निकली हुई जो सुषुम्णा
नाड़ी है; ] सा = वह, इन्द्रयोनिः = इन्द्रयोनि (परमात्माकी प्राप्तिका द्वार) है; (अन्तकालमें साधक) भूः इति = 'भूः'
इस व्याहृतिके अर्थरूप, अग्नौ = अग्निमें, प्रतितिष्ठति = प्रतिष्ठित होता है; भुवः इति = 'भुवः' इस व्याहृतिके अर्थरूप;
वायौ = वायुदेवतामें स्थित होता है, (फिर) सुवः इति = 'स्वः' इस व्याहृतिके अर्थरूप; आदित्ये = सूर्यमे स्थित होता है;
(उसके बाद) महः इति = 'महः' इस व्याहृतिके अर्थस्वरूप; ब्रह्मणि = ब्रह्ममें स्थित होता है।
व्याख्या - उन परब्रह्म परमेश्वरको अपने हृदयमें प्रत्यक्ष देखनेवाला महापुरुष इस शरीरका त्याग करके जब
जाता है, तब किस प्रकार किस मार्गसे बाहर निकलकर किस क्रमसे भूः, भुवः और स्वःरूप समस्त लोकोंमें परिपूर्ण सबके
आत्मरूप परमेश्वरमें स्थित होता है—यह बात इस अनुवाकके दूसरे अर्धमें समझायी गयी है। भाव यह है कि मनुष्योंके
मुखमें तालुओंके बीचो-बीच जो एक थनके आकारका मास पिण्ड लटकता है जिसे बोलचालकी भाषामें 'घाँटी' कहते हैं,
उसके आगे केशोंका मूलस्थान ब्रह्मरन्ध्र है, वहाँ हृदय-देशसे निकलकर घाँटीके भीतरसे होती हुई दोनों कपालोंको भेद-
कर गयी हुई जो सुषुम्णा नामसे प्रसिद्ध नाड़ी है; वही उन इन्द्र नामसे कहे जानेवाले परमेश्वरकी प्राप्तिका द्वार है।
अन्तकालमें वह महापुरुष उस मार्गसे शरीरके बाहर निकलकर 'भूः' इस नामसे अभिहित अग्निमें स्थित होता है। गीतामें
भी यही बात कही गयी है कि ब्रह्मवेत्ता जब ब्रह्मलोकमें जाता है, तब वह सर्वप्रथम ज्योतिर्मय अग्निके अभिमानी देवताके
अधिकारमें आता है (गीता ८।२४)। उसके बाद वायुमें स्थित होता है। अर्थात् पृथ्वीसे लेकर सूर्यलोकतक समस्त
आकाशमें जिसका अधिकार है, जो सर्वत्र विचरनेवाली वायुका अभिमानी देवता है, और जो 'भुवः' नामसे पञ्चम अनुवाकमें
कहा गया है, उसीके अधिकारमे वह आता है। वह देवता उसे 'स्वः' इस नामसे कहे हुए सूर्यलोकमें पहुँचा देता है, वहाँसे
फिर वह 'महः' इस नामसे कहे हुए 'ब्रह्म' मे स्थित हो जाता है।

  • आप्नोति स्वाराज्यम् । आप्नोति मनसस्पतिम् । वाक्पतिश्चक्षुष्पतिः । श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिः ।
    एतत्ततो भवति ।
    स्वाराज्यम् = (वह) स्वराज्यको, आप्नोति = प्राप्त कर लेता है, मनसस्पतिम् = मनके स्वामीको, आप्नोति =
    पा लेता है, वाक्पतिः भवति ] = वाणीका स्वामी हो जाता है, चक्षुष्पतिः = नेत्रोंका स्वामी, श्रोत्रपतिः = कानोंका
    स्वामी; (और) विज्ञानपतिः = विज्ञानका स्वामी हो जाता है; ततः = उस पहले बताये हुए साधनसे, एतत् =
    यह फल, भवति = होता है।
    व्याख्या—वह ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित महापुरुष कैसा हो जाता है—यह बात इस अनुवाकके तीसरे अंशमे बतलायी
    गयी है। अनुवाकके इस अंशका अभिप्राय यह है कि वह स्वराट् बन जाता है। अर्थात् उसपर प्रकृतिका अधिकार नहीं
    रहता, अपितु वह स्वयं ही प्रकृतिका अधिष्ठाता बन जाता है, क्योंकि वह मनके अर्थात् समस्त अन्तःकरणसमुदायके स्वामी
    परमात्माको प्राप्त कर लेता है, इसलिये वह वाणी, चक्षु, श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियो और उनके देवताओंका तथा विज्ञान-
    स्वरूप बुद्धिका भी स्वामी हो जाता है। अर्थात् ये सब उसके अधीन हो जाते हैं। उस पहले बताये हुए साधनसे यह उपर्युक्त
    फल मिलता है।
    आकाशशरीरं ब्रह्म । सत्यात्म प्राणारामं मनआनन्दम् । शान्तिसमृद्धममृतम् । इति प्राचीन-
    योग्योपास्स्व ।
    ब्रह्म = वह ब्रह्म, आकाशशरीरम् = आकाशके सदृश शरीरवाला; सत्यात्म = सत्तारूप; प्राणारामम् = इन्द्रियादि
    समस्त प्राणोंको विश्राम देनेवाला, मनआनन्दम् = मनको आनन्द देनेवाला, शान्तिसमृद्धम् = शान्तिसे सम्पन्न; (तथा)
    अमृतम् = अविनाशी है, इति = यों मानकर, प्राचीनयोग्य = हे प्राचीनयोग्य; उपास्स्व = तू उसकी उपासना कर ।
    व्याख्या—वे प्राप्तव्य ब्रह्म कैसे है, उनका किस प्रकार चिन्तन और ध्यान करना चाहिये—यह बात इस
    अनुवाकके चौथे अशमें बतायी गयी है। अभिप्राय यह है कि वे ब्रह्म आकाशके सदृश निराकार, सर्वव्यापी और अतिशय
  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३२५
    सूक्ष्म शरीरवाले हैं। एकमात्र सत्तारूप हैं। समस्त इन्द्रियोंको विश्राम देनेवाले और मनके लिये परम आनन्ददायक हैं।
    अखण्ड शान्तिके भण्डार हैं और सर्वथा अविनाशी हैं। परम विश्वासके साथ यों मानकर साधकको उनकी प्राप्तिके लिये
    उनके चिन्तन और ध्यानमें तत्परताके साथ लग जाना चाहिये, यह भाव दिखलानेके लिये अन्तमें श्रुतिकी वाणीमें
    ऋषि अपने शिष्यसे कहते हैं—'हे प्राचीनयोग्य !* तू उन ब्रह्मका स्वरूप इस प्रकारका मानकर उनकी उपासना कर ।'
    ॥ षष्ठ अनुवाक ॥ ६ ॥
अनुवाक
पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवान्तरदिशः । अग्निवायुरादित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणि । आप ओषधयो
वनस्पतय आत्मा । इत्यधिभूतम् । अथाध्यात्मम् । प्राणो व्यानोऽपान उदानः : । चक्षुः
श्रोत्रं मनो वाक् त्वक् । चर्म मांसँस्नावास्थि । एतदधिविधाय ऋषिरवोचत् । पाङ्क्तं वा
इदं सर्वम् । पाङ्क्तेनैव पाङ्क्तँस्पृणोतीति ।
पृथिवी=पृथ्वीलोक; अन्तरिक्षम् = अन्तरिक्षलोक; द्यौः = स्वर्गलोक; दिशः=दिशाएँ; अवान्तरदिशः=अवान्तर
दिशाएँ—दिशाओंके बीचके कोण (यह पाँच लोकोंकी पङ्क्ति है); अग्निः=अग्नि; वायुः=वायु; आदित्यः=सूर्य; चन्द्रमाः=
चन्द्रमा; नक्षत्राणि = ( तथा ) समस्त नक्षत्र (यह पाँच ज्योतिःसमुदायकी पङ्क्ति है), आपः = जल, ओषधयः=ओषधियाँ;
:=वनस्पतियाँ, =आकाश; आत्मा=( तथा ) इनका संघातस्वरूप अन्नमय स्थूलशरीर (ये पाँचों
मिलकर स्थूल पदार्थोंकी पङ्क्ति है ), इति = यह; अधिभूतम् = आधिभौतिक दृष्टिसे वर्णन हुआ; अथ=अब; अध्यात्मम्=
आध्यात्मिक दृष्टिसे बतलाते हैं, प्राणः=प्राण, व्यानः=व्यान; अपानः=अपान; उदानः =उदान; (और) समानः =समान
( यह पाँचों प्राणोंकी पङ्क्ति है ); चक्षुः =नेत्र; श्रोत्रम् =कान; मनः=मन; वाक्=वाणी; (और) त्वक्=त्वचा ( यह
पाँचों करणोंकी पङ्क्ति है ); चर्म =चर्म, मांसम् = मास, स्नावा=नाड़ी, अस्थि=हड्डी; (और) मज्जा=मज्जा (यह
पाँच शरीरगत धातुओंकी पङ्क्ति है ), एतत् =यह ( इस प्रकार ); अधिविधाय =सम्यक कल्पना करके; ऋषिः=ऋषिने;
अवोचत्=कहा; इदम्=यह, सर्वम्=सव; वै=निश्चय ही; पाङ्क्तम्=पाङ्क्त है,† पाङ्क्तेन एव पाङ्क्तम्=
( साधक ) इस आध्यात्मिक पाङ्क्तसे ही बाह्य पाङ्क्तको और बाह्यसे अध्यात्म पाङ्क्तको; स्पृणोति इति=पूर्ण करता है।
—इस अनुवाकके दो भाग हैं। पहले भागमें मुख्य-मुख्य आधिभौतिक पदार्थोंको लोक, ज्योति और स्थूल-
पदार्थ—इन तीन पङ्क्तियोंमें विभक्त करके उनका वर्णन किया है और दूसरे भागमें मुख्य-मुख्य आध्यात्मिक ( शरीरस्थित )
पदार्थोंको प्राण, करण और धातु—इन तीन पङ्क्तियोंमें विभक्त करके उनका वर्णन किया है। अन्तमें उनका उपयोग करने-
की युक्ति बतायी गयी है।
भाव यह है कि पृथ्वीलोक, अन्तरिक्षलोक, स्वर्गलोक, पूर्व-पश्चिम आदि दिशाएँ और आग्नेय-नैर्ऋत्य आदि अवान्तर
दिशाएँ—इस प्रकार यह लोकोंकी आधिभौतिक पङ्क्ति है। अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र—इस प्रकार यह
ज्योतियोंकी आधिभौतिक पङ्क्ति है। तथा जल, ओषधियाँ, वनस्पति, आकाश और पाञ्चभौतिक स्थूलशरीर—इस प्रकार
यह स्थूल जड़-पदार्थोंकी आधिभौतिक पङ्क्ति है। यह सब मिलकर आधिभौतिक पाङ्क्त अर्थात् भौतिक पङ्क्तियोंका समूह है।
इसी प्रकार यह आगे बताया हुआ आध्यात्मिक—शरीरके भीतर रहनेवाला पाङ्क्त है। इसमें प्राण, व्यान, अपान, उदान और
समान—इस प्रकार यह प्राणोंकी पङ्क्ति है। नेत्र, कान, मन, वाणी और त्वचा—इस प्रकार यह करण-समुदायकी पङ्क्ति है।
तथा चर्म, मास, नाड़ी, हड्डी और मज्जा—इस प्रकार यह शरीरगत धातुओंकी पङ्क्ति है। इस प्रकार प्रधान-प्रधान आधिभौतिक
और आध्यात्मिक पदार्थोंकी त्रिविध पङ्क्तियाँ बनाकर वर्णन करना यहाँ उपलक्षणरूपमें है, अतः शेष पदार्थोंको भी इनके
* पहलेसे ही जिसमें ब्रह्म-प्राप्तिकी योग्यता हो, वह 'प्राचीनयोग्य' है। अथवा यह शिष्यका नाम है।
† पङ्क्तिका समूह ही 'पाङ्क्त' है।

३२६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
अन्तर्गत समझ लेना चाहिये। इस प्रकार वर्णन करनेके बाद श्रुति कहती है कि ये पङ्क्तियोंमें विभक्त करके बताये हुए पदार्थ
सब-के-सब पङ्क्तियोंके समुदाय हैं। इनका आपसमें घनिष्ठ सम्बन्ध है। इस रहस्यको समझकर अर्थात् किस आधिभौतिक
पदार्थके साथ किस आध्यात्मिक पदार्थका क्या सम्बन्ध है, इस बातको भलीभाँति समझकर मनुष्य आध्यात्मिक शक्तिसे भौतिक
पदार्थोंका विकास कर लेता है और भौतिक पदार्थोंसे आध्यात्मिक शक्तियोंकी उन्नति कर लेता है।
पहली आधिभौतिक लोकसम्बन्धी पङ्क्तिसे चौथी प्राण-समुदायरूप आध्यात्मिक पङ्क्तिका सम्बन्ध है, क्योंकि एक
लोकसे दूसरे लोकको सम्बद्ध करनेमें प्राणोंकी ही प्रधानता है—यह बात सहिता-प्रकरणमें पहले बता आये हैं। दूसरी ज्योति-
विषयक आधिभौतिक पङ्क्तिसे पाँचवीं करण-समुदायरूप आध्यात्मिक पङ्क्तिका सम्बन्ध है; क्योंकि वे आधिभौतिक ज्योतियाँ
इन आध्यात्मिक ज्योतियोंकी सहायक हैं, यह बात शास्त्रोंमें जगह-जगह बतायी गयी है। इसी प्रकार तीसरी जो स्थूल पदार्थों-
की आधिभौतिक पङ्क्ति है, उसका छठी शरीरगत धातुओं की आध्यात्मिक पङ्क्तिसे सम्बन्ध है; क्योंकि ओषधि और वनस्पति-
रूप अन्नसे ही मास मज्जा आदिकी पुष्टि और वृद्धि होती है, यह प्रत्यक्ष है। इस प्रकार प्रत्येक स्थूल और सूक्ष्म तत्त्वको
भलीभाँति समझकर उनका उपयोग करनेसे मनुष्य सब प्रकारकी सासारिक उन्नति कर सकता है, यही इस वर्णनका भाव
मालूम होता है।
॥ सप्तम अनुवाक समाप्त ॥ ७ ॥
अष्टम अनुवाक
ओमिति ब्रह्म । ओमितीद ूँ सर्वम् । ओमित्येतदनुकृतिर्ह स्म वा अप्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति ।
ओमिति सामानि गायन्ति । ओ३शोमिति शस्त्राणि श ूँ सन्ति । ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति ।
ओमिति ब्रह्मा प्रसौति । ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति । ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपामवानीति ।
ब्रह्मैवोपामोति ।
ओम् = 'ओम्', इति = यह, ब्रह्म = ब्रह्म है, ओम् = 'ओम्', इति = ही, इदम् = यह प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला;
सर्वम् = समस्त जगत् है, ओम् = 'ओम्', इति = इस प्रकारका, एतत् = यह अक्षर, ह = ही, वै = निःसदेह, अनुकृतिः =
अनुकृति (अनुमोदन) है, स्म = यह बात प्रसिद्ध है; अपि = इसके सिवा, ओ = हे आचार्य; श्रावय = मुझे सुनाइये; इति =
यों कहनेपर, आश्रावयन्ति = ('ओम्' यों कहकर शिष्यको) उपदेश सुनाते हैं, ओम् = 'ओम्' (बहुत अच्छा), इति =
इस प्रकार (स्वीकृति देकर), [ सामगाः = सामगायक विद्वान्, ] सामानि = सामवेद, गायन्ति = गाते हैं, ओम् शोम् =
'ओम् शोम्', इति = यों कहकर ही, शस्त्राणि = शस्त्रोंको अर्थात् मन्त्रोंको, शंसन्ति = पढते हैं; ओम् = 'ओम्', इति =
यों कहकर; अध्वर्युः = अध्वर्यु नामक ऋत्विक, प्रतिगरम् प्रतिगृणाति = प्रतिगर-मन्त्रका उच्चारण करता है 'ओम्'=
'ओम्', इति = यों कहकर, ब्रह्मा = ब्रह्मा (चौथा ऋत्विक्); प्रसौति = अनुमति देता है; ओम् = 'ओम्', इति = यह
कहकर, अग्निहोत्रम् अनुजानाति = अग्निहोत्र करनेकी आज्ञा देता है, प्रवक्ष्यन् = अध्ययन करनेके लिये उद्यत;
ब्राह्मणः = ब्राह्मण, ओम् इति = पहले ओम् का उच्चारण करके, आह = कहता है, ब्रह्म = (मैं) वेदको, उपाप्नवानि इति =
प्राप्त करूँ, ब्रह्म = (फिर वह) वेदको, एव = निश्चय ही, उपाप्नोति = प्राप्त करता है।
व्याख्या—इस अनुवाकमें 'ॐ' इस परमेश्वरके नामके प्रति मनुष्यकी श्रद्धा और रुचि उत्पन्न करनेके लिये ॐकारकी
महिमाका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि 'ॐ' यह परब्रह्म परमात्माका नाम होनेसे साक्षात् ब्रह्म ही है, क्योंकि भगवान्का
नाम भी भगवत्स्वरूप ही होता है। यह प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला समस्त जगत् 'ॐ' है अर्थात् उस ब्रह्मका ही स्थूलरूप
है। 'ॐ' यह अनुकृति अर्थात् अनुमोदनका सूचक है। अर्थात् जब किसीकी बातका अनुमोदन करना होता है, तब श्रेष्ठ
पुरुष परमेश्वरके नामस्वरूप इस ॐ कारका उच्चारण करके संकेतसे उसका अनुमोदन कर दिया करते हैं, दूसरे व्यर्थ शब्द
नहीं बोलते—यह बात प्रसिद्ध है। जब शिष्य अपने गुरुसे तथा श्रोता किसी व्याख्यानदातासे उपदेश सुनानेके लिये प्रार्थना

करता है, तब गुरु और वक्ता भी 'ॐ' इस प्रकार कहकर ही उपदेश सुनाना आरम्भ करते हैं। सामवेदका गान
करनेवाले भी 'ॐ' इस प्रकार पहले परमेश्वरके नामका भलीभाँति गान करके उसके बाद सामवेदका गान किया करते हैं।
यज्ञकर्ममें शस्त्र-शंसनरूप कर्म करनेवाले शास्ता नामक ऋत्विक् 'ओम् शोम्' इस प्रकार कहकर ही शस्त्रोंका अर्थात् तद्विषयक
मन्त्रोंका पाठ करते हैं। यज्ञकर्म करानेवाला अध्वर्यु नामक ऋत्विक् भी 'ॐ' इस परमेश्वरके नामका उच्चारण करके ही
प्रतिगर-मन्त्रका उच्चारण करता है। ब्रह्मा (चौथा ऋत्विक्) भी 'ॐ' इस प्रकार परमात्माके नामका उच्चारण करके यज्ञ-
कर्म करनेके लिये अनुमति देता है, तथा 'ॐ' यों कहकर ही अग्निहोत्र करनेकी आज्ञा देता है। अध्ययन करनेके लिये
उद्यत ब्राह्मण ब्रह्मचारी भी 'ॐ' इस प्रकार परमेश्वरके नामका पहले उच्चारण करके कहता है कि 'मैं वेदको भली प्रकार पढ
सकूँ।' अर्थात् ॐकार जिसका नाम है, उस परमेश्वरसे ॐकारके उच्चारणपूर्वक यह प्रार्थना करता है कि 'मैं वेदको—वैदिक
ज्ञानको प्राप्त कर लूँ—ऐसी बुद्धि दीजिये।' इसके फलस्वरूप वह वेदको निःसन्देह प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार इस मन्त्रमें
ॐकारकी महिमाका वर्णन है।
॥ अष्टम अनुवाक समाप्त ॥ ८ ॥

नवम अनुवाक
ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च । तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च । दमश्च
स्वाध्यायप्रवचने च । शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्नयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्निहोत्रं च
स्वाध्यायप्रवचने च । अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजा च
स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यमिति सत्यवचा
राथीतरः । तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः । स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः । तद्धि तपस्तद्धि
तपः ।
ऋतम्=यथायोग्य सदाचारका पालन, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=शास्त्रका पढना-पढाना भी (यह सब
अवश्य करना चाहिये), सत्यम्=सत्यभाषण, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना-पढाना भी (साथ-साथ
करना चाहिये), तपः=तपश्चर्या, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना-पढाना भी (साथ-साथ करना चाहिये);
दमः=इन्द्रियोंका दमन, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना-पढाना भी (साथ-साथ करना चाहिये), शमः=
मनका निग्रह, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना-पढाना भी (साथ-साथ करना चाहिये), अग्नयः=अग्नियोंका
-चयन, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना-पढाना भी (साथ-साथ करना चाहिये), अग्निहोत्रम्=अग्निहोत्र;
च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना-पढाना भी (साथ-साथ करना चाहिये), अतिथयः=अतिथियोंकी सेवा,
च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना-पढाना भी (साथ-साथ करना चाहिये), मानुषम्=मनुष्योचित लौकिक
-व्यवहार, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना पढाना भी (साथ-साथ करना चाहिये), प्रजा=गर्भाधान-
-संस्काररूप कर्म, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना-पढाना भी (करना चाहिये), प्रजनः=शास्त्रविधिके
अनुसार स्त्रीसहवास, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=वेदोंका पढना-पढाना भी (करना चाहिये), प्रजातिः=कुटुम्ब-
-वृद्धिका कर्म, च=और, स्वाध्यायप्रवचने च=शास्त्रका पढना-पढाना भी (करना चाहिये), सत्यम्=सत्य ही इनमें
श्रेष्ठ है, इति=यो, राथीतरः=रथीतरका पुत्र, सत्यवचाः=सत्यवचा ऋषि कहते हैं; तपः=तप ही सर्वश्रेष्ठ है, इति=
-यों, पौरुशिष्टिः=पुरुशिष्टका पुत्र, तपोनित्यः=तपोनित्य नामक ऋषि कहते हैं; स्वाध्यायप्रवचने एव=वेदका पढना-
-पढाना ही सर्वश्रेष्ठ है, इति=यों, मौद्गल्यः=मुद्गलके पुत्र, नाकः='नाक' मुनि कहते हैं; हि=क्योंकि, तत्=वही, तपः=
तप है, तत् हि=वही, तपः=तप है।
व्याख्या—इस अनुवाकमें यह बात समझायी गयी है कि अध्ययन और अध्यापन करनेवालोंको अध्ययन-अध्यापन-

३२८ ~ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ›
के साथ-साथ शास्त्रोंमें बताये हुए मार्गपर स्वय चलना भी चाहिये । यही बात उपदेशक और उपदेश सुननेवालोंके विषयमें
भी समझनी चाहिये । अभिप्राय यह है कि अध्ययन और अध्यापन दोनों बहुत ही उपयोगी हैं, शास्त्रोंके अध्ययनसे ही मनुष्य-
को अपने कर्त्तव्यका तथा उसकी विधि और फलका ज्ञान होता है, अतः इसे करते हुए ही उसके साथ-साथ यथायोग्य सदा-
चारका पालन, सत्यभाषण, स्वधर्मपालनके लिये बड़े-से-बड़ा कष्ट सहना, इन्द्रियोंको वशमे रखना, मनको वशमे रखना, अग्नि-
होत्रके लिये अग्निको प्रदीप्त करना, फिर उसमे हवन करना, अतिथिकी यथायोग्य सेवा करना, सबके साथ सुन्दर मनुष्योचित
लौकिक व्यवहार करना, शास्त्रविधिके अनुसार गर्भाधान करना और ऋतुकालमे नियमितरूपसे स्त्री-सहवास करना तथा कुटुम्बको
बढ़ानेका उपाय करना—इस प्रकार इन सभी श्रेष्ठ कर्मोंका अनुष्ठान करते रहना चाहिये । अध्यापक तथा उपदेशकके लिये तो इन सब
कर्त्तव्योंका समुचित पालन और भी आवश्यक है, क्योकि उनका आदर्श उनके छात्र तथा श्रोता ग्रहण करते हैं। रथीतरके
पुत्र सत्यवचा नामक ऋषिका कहना है कि 'इन सब कमोंमें सत्य ही सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि प्रत्येक कर्म सत्यभाषण और
सत्यभावपूर्वक किये जानेपर ही यथार्थरूपसे सम्पन्न होता है।' पुरुशिष्टपुत्र तरोनित्य नामक ऋषिका कहना है कि 'तपश्चर्या
ही सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि तपसे ही सत्यभाषण आदि समस्त धर्मोके पालन करनेकी और उनमे दृढ़तापूर्वक स्थित रहनेकी शक्ति
आती है।' मुङ्गलके पुत्र नाक नामक मुनिका कहना है कि 'वेद और धर्मशास्त्रोंका पठन-पाठन ही सर्वश्रेष्ठ है; क्योंकि वही
तप है, वही तप है । अर्थात् इन्हींसे तप आदि समस्त धर्मोका ज्ञान होता है।' इन सभी ऋषियोंका कहना यथार्थ है । उनके
कथनको उद्धृत करके यह भाव दिखाया गया है कि प्रत्येक कर्ममे इन तीनोंकी प्रधानता रहनी चाहिये। जो कुछ कर्म किया
जाय, वह पठन-पाठनसे उपलब्ध शास्त्रज्ञानके अनुकूल होना चाहिये । कितने ही विघ्न क्यों न उपस्थित हों, अपने कर्तव्यपालनरूप
तपमे सदा दृढ रहना चाहिये और प्रत्येक क्रियामें सत्यभाव और सत्यभाषणपर विशेष ध्यान देना चाहिये।
॥ नवम अनुवाक समाप्त ॥ ९ ॥
दशम अनुवाक
अहं वृक्षस्य रेरिवा । कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव । ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि । द्रविणम् स-
वर्चसम् । सुमेधा अमृतोक्षितः । इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम् ।
अहम् = मैं; वृक्षस्य = संसारवृक्षका; रेरिवा = उच्छेद करनेवाला हूँ, [ मम ] कीर्तिः = मेरी कीर्ति, गिरेः = पर्वतके;
पृष्ठम् इव = शिखरकी भाँति उन्नत है, वाजिनि = अन्नोत्पादक शक्तिसे युक्त सूर्यमे, स्वमृतम् इव = जैसे उत्तम
अमृत है उसी प्रकार मैं भी, ऊर्ध्वपवित्रः अस्मि = अतिशय पवित्र अमृतरूप हूँ, (तथा मैं) सवर्चसम् = प्रकाशयुक्त;
द्रविणम् = धनका भडार हूँ, अमृतोक्षितः = ( परमानन्दमय ) अमृतसे अभिसिञ्चित; ( तथा ) सुमेधाः = श्रेष्ठ बुद्धि-
वाला हूँ, इति = इस प्रकार (यह), त्रिशङ्कोः = त्रिशङ्कु ऋषिका; वेदानुवचनम् = अनुभव किया हुआ वैदिक प्रवचन है।
व्याख्या—त्रिशङ्कु नामक ऋषिने परमात्माको प्राप्त होकर जो अपना अनुभव व्यक्त किया था, उसे ही इस अनुवाक-
में उद्धृत किया गया है । त्रिशङ्कुके वचनानुसार अपने अन्त:करणमें भावना करना भी परमात्माकी प्राप्तिका साधन है, यही
बतानेके लिये इस अनुवाकका आरम्भ हुआ है। श्रुतिका भावार्थ यह है कि मैं प्रवाहरूपमें अनादिकालसे चले आते
हुए इस जन्म-मृत्युरूप ससारवृक्षका उच्छेद करनेवाला हूँ । यह मेरा अन्तिम जन्म है। इसके बाद मेरा पुनः जन्म
नहीं होनेका। मेरी कीर्ति पर्वत शिखरकी भाँति उन्नत एव विशाल है। अन्नोत्पादक शक्तिसे युक्त सूर्यमे जैसे उत्तम
अमृतका निवास है, उसी प्रकार मैं भी विशुद्ध—रोग दोष आदिसे सर्वथा मुक्त हूँ, अमृतरूप हूँ। इसके सिवा मैं प्रकाशयुक्त
धनका भडार हूँ, परमानन्दरूप अमृतमें निमग्न और श्रेष्ठ धारणायुक्त बुद्धिसे सम्पन्न हूँ। इस प्रकार यह त्रिशङ्कु ऋषिका
वेदानुवचन है अर्थात् ज्ञानप्राप्तिके बाद व्यक्त किया हुआ आत्माका उद्गार है।
मनुष्य जिस प्रकारकी भावना करता है, वैसा ही बन जाता है, उसके संकल्पमें यह अपूर्व—आश्चर्यजनक शक्ति है।
अतः जो मनुष्य अपनेमें उपर्युक्त भावनाका अभ्यास करेगा, वह निश्चय वैसा ही बन जायगा । परंतु इस साधनमें पूर्ण

  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३२९
    सावधानीकी आवश्यकता है। यदि भावनाके अनुसार गुण न आकर अभिमान आ गया तो पतन भी हो सकता है। यदि
    इस वेदानुवचनके रहस्यको ठीक समझकर इसकी भावना की जाय तो अभिमानकी आशङ्का भी नहीं की जा सकती ।
    ॥ दशम अनुवाक ॥ १० ॥
    एकादश अनुवाक
    वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय
    प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न
    प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्यां न
    प्रमदितव्यम् ।
    वेदम् अनूच्य=वेदका भलीभाँति अध्ययन कराकर, आचार्यः = आचार्य, अन्तेवासिनम् = अपने आश्रममें
    रहनेवाले ब्रह्मचारी विद्यार्थीको, अनुशास्ति = शिक्षा देता है; सत्यम् वद = तुम सत्य बोलो, धर्मम् चर = धर्मका
    आचरण करो; स्वाध्यायात्=स्वाध्यायसे; मा प्रमदः = कभी न चूको, आचार्याय = आचार्यके लिये, प्रियम् धनम्=
    दक्षिणाके रूपमें वाञ्छित धन, आहृत्य=लाकर (दो, फिर उनकी आज्ञासे गृहस्थ-आश्रममें प्रवेश करके); प्रजातन्तुम् =
    संतान-परम्पराको (चालू रक्खो, उसका), मा व्यवच्छेत्सीः = उच्छेद न करना, सत्यात् = ( तुमको ) सत्यसे;
    न प्रमदितव्यम् = कभी नहीं डिगना चाहिये, धर्मात् = धर्मसे; न=नहीं; प्रमदितव्यम् = डिगना चाहिये, कुशलात् =
    शुभ कर्मोंसे; न प्रमदितव्यम् = कभी नहीं चूकना चाहिये; भूत्यै = उन्नतिके साधनोंसे, न प्रमदितव्यम् = कभी नहीं
    चूकना चाहिये; स्वाध्यायप्रवचनाभ्याम् = वेदोंके पढने और पढानेमे, न प्रमदितव्यम् = कभी भूल नहीं करनी चाहिये;
    देवपितृकार्याभ्याम् = देवकार्यसे और पितृकार्यसे, न प्रमदितव्यम् = कभी नहीं चूकना चाहिये ।
    व्याख्या- गृहस्थको अपना जीवन कैसा बनाना चाहिये, यह बात समझानेके लिये इस अनुवाकका आरम्भ किया
    गया है। आचार्य शिष्यको वेदका भलीभाँति अध्ययन कराकर समावर्त्तन-संस्कारके समय गृहस्थाश्रममे प्रवेश करके गृहस्थ-धर्मका
    पालन करनेकी शिक्षा देते हैं—'पुत्र ! तुम सदा सत्य-भाषण करना, आपत्ति पड़नेपर भी झूठका कदापि आश्रय न लेना, अपने
    वर्ण-आश्रमके अनुकूल शास्त्रसम्मत धर्मका अनुष्ठान करना; स्वाध्यायसे अर्थात् वेदोंके अभ्यास, सन्ध्यावन्दन, गायत्रीजप और
    भगवन्नाम-गुणकीर्तन आदि नित्यकर्ममें कभी भी प्रमाद न करना—अर्थात् न तो कभी उन्हें अनादरपूर्वक करना और न आलस्यवश
    उनका त्याग ही करना । गुरुके लिये दक्षिणाके रूपमें उनकी रुचिके अनुरूप धन लाकर प्रेमपूर्वक देना, फिर उनकी आज्ञासे
    गृहस्थाश्रममे प्रवेश करके स्वधर्मका पालन करते हुए संतान-परम्पराको सुरक्षित रखना—उसका लोप न करना। अर्थात् शास्त्रविधिके
    अनुसार विवाहित धर्मपत्नीके साथ ऋतुकालमें नियमित सहवास करके सन्तानोत्पत्तिका कार्य अनासक्तिपूर्वक करना। तुमको कभी
    भी सत्यसे नहीं चूकना चाहिये अर्थात् हँसी-दिल्लगी या व्यर्थकी बातोंमें वाणीकी शक्तिको न तो नष्ट करना चाहिये और न
    परिहास आदिके बहाने कभी झूठ ही बोलना चाहिये। इसी प्रकार धर्मपालनमें भी भूल नहीं करना चाहिये अर्थात् कोई
    बहाना बनाकर या आलस्यवश कभी धर्मकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। लौकिक और शास्त्रीय—जितने भी कर्तव्यरूपसे
    प्राप्त शुभ कर्म हैं, उनका कभी त्याग या उपेक्षा नहीं करनी चाहिये, अपितु यथायोग्य उनका अनुष्ठान करते रहना
    चाहिये । धन-सम्पत्तिको बढ़ानेवाले लौकिक उन्नतिके साधनोंके प्रति भी उदासीन नहीं होना चाहिये। इसके लिये भी वर्ण-
    धर्मानुकूल चेष्टा करनी चाहिये । पढने और पढानेका जो मुख्य नियम है, उसकी कभी अवहेलना या आलस्यपूर्वक
    त्याग नहीं करना चाहिये । इसी प्रकार अग्निहोत्र और यज्ञादिके अनुष्ठानरूप देवकार्य तथा श्राद्ध-तर्पण आदि पितृकार्यके
    सम्पादनमें भी आलस्य या अवहेलनापूर्वक प्रमाद नहीं करना चाहिये ।
    मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि ।
    तानि सेवितव्यानि । नो इतराणि । यान्यस्माकँसुचरितानि । तानि त्वयोपास्यानि । नो इतराणि । ये
  • ३३०
    *- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
    के चास्मच्छ्रेयाँसो ब्राह्मणाः । तेषां त्वयाऽऽसनेन प्रश्वसितव्यम् । श्रद्धया देयम् । अश्रद्धयादेयम् ।
    श्रिया देयम् । हिया भिया देयम् । संविदा देयम् ।
    मातृदेवः भव=तुम मातामे देवबुद्धि करनेवाले बनो, पितृदेवः=पिताको देवरूप समझनेवाले, भव=होओ;
    आचार्यदेवः=आचार्यको देवरूप समझनेवाले, भव=बनो, अतिथिदेवः= अतिथिको देवतुल्य समझनेवाले, भव=होओ;
    यानि=जो जो, अनवद्यानि=निर्दोष, कर्माणि=कर्म हैं, तानि=उन्हेंही, सेवितव्यानि=तुम्हें सेवन करना चाहिये;
    इतराणि=दूसरे ( दोषयुक्त ) कर्मोंका, नो=कभी आचरण नहीं करना चाहिये, अस्माकम्=हमारे ( आचरणोंमेंसे भी );
    यानि=जो-जो, सुचरितानि=अच्छे आचरण हैं तानि=उनका ही; त्वया=तुमको; उपास्यानि=सेवन करना चाहिये;
    इतराणि=दूसरोंका, नो=कभी नहीं, ये=जो, के=कोई, च=भी, अस्मत्=हमसे, श्रेयांसः= श्रेष्ठ ( गुरुजन एव );
    ब्राह्मणाः=ब्राह्मण आयें, तेषाम्=उनको, त्वया=तुम्हें, आसनेन=आसन दान आदिके द्वारा सेवा करके;
    प्रश्वसितव्यम्=विश्राम देना चाहिये; श्रद्धया देयम्=श्रद्धापूर्वक दान देना चाहिये, अश्रद्धया=बिना श्रद्धाके, अदेयम्=
    नहीं देना चाहिये, श्रिया=आर्थिक स्थितिके अनुसार, देयम्=देना चाहिये, हिया=लज्जासे, [देयम्=देना चाहिये;] भिया
    भयसे भी, देयम्=देना चाहिये, (और) सविदा=(जो कुछ भी दिया जाय, वह सब) विवेकपूर्वक, देयम्=
    देना चाहिये।
    व्याख्या-पुत्र ! तुम मातामे देवबुद्धि रखना, पितामे भी देवबुद्धि रखना, आचार्यमे देवबुद्धि रखना तथा अतिथिमें
    भी देवबुद्धि रखना। आशय यह कि इन चारोको ईश्वरकी प्रतिमूर्ति समझकर श्रद्धा और भक्तिपूर्वक सदा इनकी आज्ञाका
    पालन, नमस्कार और सेवा करते रहना, इन्हें सदा अपने विनयपूर्ण व्यवहारसे प्रसन्न रखना। जगत्‌में जो-जो निर्दोष कर्म हैं,
    उन्हींका तुम्हें सेवन करना चाहिये। उनसे भिन्न जो दोषयुक्त-निषिद्ध कर्म हैं, उनका कभी भूलकर-स्वप्नमें भी
    आचरण नहीं करना चाहिये। हमारे-अपने गुरुजनोंके आचार-व्यवहारमें भी जो उत्तम-शास्त्र एव शिष्ट पुरुषोंद्वारा
    अनुमोदित आचरण हैं, जिनके विषयमें किसी प्रकारकी शङ्काको स्थान नहीं है, उन्हींका तुम्हें अनुकरण करना चाहिये,
    उन्हींका सेवन करना चाहिये। जिनके विषयमें जरा-सी भी शङ्का हो, उनका अनुकरण कभी नहीं करना चाहिये। जो कोई भी
    हमसे श्रेष्ठ-वय, विद्या, तप, आचरण आदिमे बड़े तथा ब्राह्मण आदि पूज्य पुरुष घरपर पधारें, उनको पाद्य, अर्ध्य, आसन
    आदि प्रदान करके सब प्रकारसे उनका सम्मान तथा यथायोग्य सेवा करनी चाहिये। अपनी शक्तिके अनुसार दान करनेके
    लिये तुम्हें सदा उदारतापूर्वक तत्पर रहना चाहिये। जो कुछ भी दिया जाय, वह श्रद्धापूर्वक देना चाहिये। अश्रद्धापूर्वक नहीं
    देना चाहिये, क्योकि बिना श्रद्धाके किये हुए दान आदि कर्म असत् माने गये हैं (गीता १७।२७)। लज्जापूर्वक देना
    चाहिये। अर्थात् सारा धन भगवान्‌का है, मैने इसे अपना मानकर उनका अपराध किया है। इसे सब प्राणियोंके हृदयमे स्थित
    भगवान्‌की सेवामे ही लगाना उचित था, मैने ऐसा नहीं किया। मै जो कुछ दे रहा हूँ, वह भी बहुत कम है। यों सोचकर
    सङ्कोचका अनुभव करते हुए देना चाहिये। मनमे दानीपनके अभिमानको नहीं आने देना चाहिये। सर्वत्र और सबमें भगवान्
    हैं, अत' दान लेनेवाले भी भगवान् ही है। उनकी बड़ी कृपा है कि मेरा दान स्वीकार कर रहे हैं। यों विचारकर
    भगवान्‌से भय मानते हुए दान देना चाहिये। 'हम किसीका उपकार कर रहे हैं' ऐसी भावना मनमें लाकर अभिमान या
    अविनय नहीं प्रकट करना चाहिये। परंतु जो कुछ दिया जाय-वह विवेकपूर्वक, उसके परिणामको समझकर निष्कामभावसे
    कर्तव्य समझकर देना चाहिये (गीता १७।२०)। इस प्रकार दिया हुआ दान ही भगवान्‌की प्रीतिका-कल्याणका
    साधन हो सकता है। वही अक्षय फलका देनेवाला है।
    अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात् । ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः ।
    युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तत्र वर्तेरन् । तथा तत्र वर्तेथाः । अथाभ्याख्यातेषु ।
    ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तेषु वर्तेरन् । तथा
    तेषु वर्तेथाः । एष आदेशः । एष उपदेशः । एषा वेदोपनिषत् । एतदनुशासनम् । एवमुपासितव्यम् ।
    एवमु चैतदुपास्यम् ।
  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३३१
    अथ= इसके बाद, यदि = यदि, ते = तुमको, कर्मविचिकित्सा = कर्तव्यके निर्णय करनेमें किसी प्रकारकी शङ्का हो;
    वा = या, वृत्तविचिकित्सा = सदाचारके विषयमे कोई शङ्का, वा = कदाचित्; स्यात् = हो जाय तो, तत्र = वहाँ, ये = जो;
    संमर्शिनः = उत्तम विचारवाले, युक्ताः = परामर्श देनेमें कुशल, आयुक्ताः = कर्म और सदाचारमे पूर्णतया लगे
    हुए; अलूक्षाः = स्निग्ध स्वभाववाले, (तथा) धर्मकामाः = एकमात्र धर्मके ही अभिलाषी; ब्राह्मणाः = ब्राह्मण, स्युः = हों;
    ते = वे, यथा = जिस प्रकार, तत्र = उन कर्मोमे और आचरणोंमें, वर्तेरन् = बर्ताव करते हों, तत्र = उन कर्मों और आचरणोंमें;
    तथा = वैसे ही; वर्तेथाः = तुमको भी बर्ताव करना चाहिये; अथ = तथा यदि, अभ्याख्यातेषु = किसी दोषसे लाञ्छित
    मनुष्योंके साथ बर्ताव करनेमे (संदेह उत्पन्न हो जाय, तो भी), ये = जो, तत्र = वहाँ, संमर्शिनः = उत्तम विचार-
    वाले, युक्ताः = परामर्श देनेमें कुशल, आयुक्ताः = सब प्रकारसे यथायोग्य सत्कर्म और सदाचारमें भलीभाँति लगे हुए, अलूक्षाः =
    रूखेपनसे रहित, धर्मकामाः = धर्मके अभिलाषी, ब्राह्मणाः = (विद्वान्) ब्राह्मण, स्युः = हो, ते = वे, यथा = जिस प्रकार;
    तेषु = उनके साथ, वर्तेरन् = बर्ताव करें, तेषु = उनके साथ, तथा = वैसा ही, वर्तेथाः = तुमको भी बर्ताव करना चाहिये;
    एषः = यह, आदेशः = शास्त्रकी आज्ञा है, एषः = यही, उपदेशः = (गुरुजनोंका अपने शिष्यों और पुत्रोंके लिये) उपदेश
    है; एषा = यही, वेदोपनिषत् = वेदोंका रहस्य है, च = और, एतत् = यही, अनुशासनम् = परम्परागत शिक्षा है, एवम् =
    इसी प्रकार; उपासितव्यम् = तुमको अनुष्ठान करना चाहिये, एवम् उ = इसी प्रकार, एतत् = यह; उपास्यम् = अनुष्ठान
    करना चाहिये।
    व्याख्या - यह सब करते हुए भी यदि तुमको किसी अवसरपर अपना कर्तव्य निश्चित करनेमे दुविधा उत्पन्न हो
    जाय, अपनी बुद्धिसे किसी एक निश्चयपर पहुँचना कठिन हो जाय - तुम किंकर्तव्यविमूढ हो जाओ, तो ऐसी स्थितिमे वहाँ
    जो कोई उत्तम विचार रखनेवाले, उचित परामर्श देनेमें कुशल, सत्कर्म और सदाचारमें तत्परतापूर्वक लगे हुए,
    सबके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करनेवाले तथा एकमात्र धर्म-पालनकी ही इच्छा रखनेवाले विद्वान् ब्राह्मण (या अन्य कोई वैसे
    ही महापुरुष) हों - वे जिस प्रकार ऐसे प्रसङ्गोंपर आचरण करते हों, उसी प्रकारका आचरण तुम्हे भी करना चाहिये।
    ऐसे स्थलोंमें उन्हींके सत्परामर्शके अनुसार उन्हींके स्थापित आदर्शका अनुगमन करना चाहिये। इसके अतिरिक्त जो मनुष्य
    किसी दोषके कारण लाञ्छित हो गया हो, उसके साथ किम समय कैसा व्यवहार करना चाहिये - इस विषयमे भी यदि तुमको
    दुविधा प्राप्त हो जाय - तुम अपनी बुद्धिसे निर्णय न कर सको तो वहाँ भी जो विचारशील, परामर्श देनेमें कुशल, सत्कर्म और
    सदाचारमें पूर्णतया संलग्न तथा धर्मकामी (सासारिक धनादिकी कामनासे रहित) निःस्वार्थी विद्वान् ब्राह्मण हों, वे लोग
    उसके साथ जैसा व्यवहार करें, वैसा ही तुमको भी करना चाहिये। उनका व्यवहार ही इस विषयमें प्रमाण है।
    यही शास्त्रकी आज्ञा है - आज्ञाओंका निचोड़ है। यही गुरु एवं माता-पिताका अपने शिष्यों और सन्तानोके प्रति उपदेश
    है तथा यही सम्पूर्ण वेदोंका रहस्य है। इतना ही नहीं, अनुशासन भी यही है। ईश्वरकी आज्ञा तथा परम्परागत उपदेशका
    नाम अनुशासन है। इसलिये तुमको इसी प्रकार कर्तव्य एवं सदाचारका पालन करना चाहिये। इसी प्रकार कर्तव्य एवं
    सदाचारका पालन करना चाहिये।
    ॥ एकादश अनुवाक समाप्त ॥ ११ ॥
    द्वादश अनुवाक
    शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः ।
    नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम् । ऋतमवादिषम् ।
    सत्यमवादिषम् । तन्मामावीत् । तद्वक्तारमावीत् । आवीन्माम् । आवीद्वक्तारम् ॥
    ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
    नः = हमारे लिये, मित्रः = (दिन और प्राणके अधिष्ठाता) मित्रदेवता, शम् [भवतु]= कल्याणप्रद हों, (तथा)
    वरुणः = (रात्रि और अपानके अधिष्ठाता) वरुण भी, शम् [भवतु]=कल्याणप्रद हों; अर्यमा = (चक्षु और

३३२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *

सूर्यमण्डलके अधिष्ठाता) अर्यमा, नः = हमारे लिये, शम् = कल्याणमय, भवतु = हों, इन्द्रः = (बल और भुजाओंके अधिष्ठाता)
इन्द्र, (तथा) बृहस्पतिः = (वाणी और बुद्धिके अधिष्ठाता) बृहस्पति, नः = हमारे लिये, शम् [भवताम्]=शान्ति प्रदान
करनेवाले हों, उरुक्रमः = त्रिविक्रमरूपसे विशाल डगोंवाले, विष्णुः = विष्णु (जो पैरोंके अधिष्ठाता हैं), नः = हमारे लिये;
शम् [भवतु]=कल्याणमय हों; ब्रह्मणे=(उपर्युक्त सभी देवताओंके आत्मस्वरूप) ब्रह्मके लिये; नमः = नमस्कार है;
वायो = हे वायुदेव, ते=तुम्हारे लिये, नमः = नमस्कार है, त्वम् = तुम, एव = ही, प्रत्यक्षम् = प्रत्यक्ष (प्राणरूपसे प्रतीत
होनेवाले), ब्रह्मा = ब्रह्म; असि = हो, (इसलिये मैने) त्वाम् = तुमको, एव = ही, प्रत्यक्षम् = प्रत्यक्ष, ब्रह्म = ब्रह्म, अवादिषम् =
कहा है, ऋतम् = (तुम ऋतके अधिष्ठाता हो, इसलिये मैंने तुम्हें) ऋत नामसे, अवादिषम् = पुकारा है; सत्यम् =(तुम-
सत्यके अधिष्ठाता हो, अतः मैने तुम्हें) सत्य नामसे, अवादिषम् = कहा है; तत् = उस (सर्वशक्तिमान् परमेश्वरने); माम्
आवीत् = मेरी रक्षा की है; तत् = उसने, वक्तारम् आवीत् = वक्ताकी-आचार्यकी रक्षा की है; आवीत् माम् = रक्षा
की है मेरी, (और) आवीत् वक्तारम् = रक्षा की है मेरे आचार्यकी, ॐ शान्तिः = भगवान् शान्तिस्वरूप हैं; शान्तिः =
शान्तिस्वरूप हैं, शान्तिः = शान्तिस्वरूप हैं।

व्याख्या-शिक्षावल्लीके इस अन्तिम अनुवाकमें भिन्न-भिन्न शक्तियोंके अधिष्ठाता परब्रह्म परमेश्वरसे भिन्न-भिन्न
नाम और रूपोंमें उनकी स्तुति करते हुए प्रार्थनापूर्वक कृतज्ञता प्रकट की गयी है। भाव यह है कि समस्त आधिदैविक,
आध्यात्मिक और आधिभौतिक शक्तियोंके रूपमें तथा उनके अधिष्ठाता मित्र, वरुण आदि देवताओंके रूपमें जो सबके आत्मा
अन्तर्यामी परमेश्वर हैं, वे सब प्रकारसे हमारे लिये कल्याणमय हों-हमारी उन्नतिके मार्गमें किसी प्रकारका विघ्न न आने
दें। हम सबके अन्तर्यामी ब्रह्मको नमस्कार करते हैं।

इस प्रकार परमात्मासे शान्तिकी प्रार्थना करके सूत्रात्मा प्राणके रूपमें समस्त प्राणियोंमें व्याप्त परमेश्वरकी वायुके
नामसे स्तुति करते हैं-'हे सर्वशक्तिमान्, सबके प्राणस्वरूप वायुमय परमेश्वर ! आपको नमस्कार है। आप ही समस्त प्राणियोंके
प्राणस्वरूप प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं, अतः मैने आपको ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहकर पुकारा है। मैने ऋत नामसे भी आपको ही पुकारा है;
क्योंकि सारे प्राणियोंके लिये जो कल्याणकारी नियम है, उस नियमरूप ऋतके आप ही अधिष्ठाता हैं। यही नहीं, मैंने 'सत्य'
नामसे भी आपको ही पुकारा है, क्योंकि सत्य-यथार्थ भाषणके अधिष्ठातृ-देवता भी आप ही है। उन सर्वव्यापी अन्तर्यामी
परमेश्वरने मुझे सत्-आचरण एव सत्य भाषण करनेकी और सत्-विद्याको ग्रहण करनेकी शक्ति प्रदान करके इस जन्म मरणरूप
संसारचक्रसे मेरी रक्षा की है। तथा मेरे आचार्यको उन सबका उपदेश देकर सर्वत्र उस सत्यका प्रचार करनेकी शक्ति प्रदान
करके उनकी रक्षा-उनका भी सब प्रकारसे कल्याण किया है। यहाँ 'मेरी रक्षा की है, मेरे वक्ताकी रक्षा की है' इन
वाक्योंको दुहरानेका अभिप्राय शिक्षावल्लीकी समाप्तिकी सूचना देना है।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः-इस प्रकार तीन बार 'शान्तिः' पदका उच्चारण करनेका भाव यह है कि आधिभौतिक,
आधिदैविक और आध्यात्मिक-तीनों प्रकारके विघ्नोंका सर्वथा उपशमन हो जाय। भगवान् शान्तिस्वरूप हैं। अतः उनके
स्मरणसे सब प्रकारकी शान्ति निश्चित है।

द्वादश अनुवाक समाप्त ॥ १२ ॥
॥ प्रथम वल्ली समाप्त ॥ १ ॥

ब्रह्मानन्दवल्ली

ॐ
ब्रह्मानन्दवल्ली
शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
इसका अर्थ कठोपनिषद्के आरम्भमें दिया गया ।
प्रथम अनुवाक
ब्रह्मविदाप्नोति परम् । तदेषाभ्युक्ता ।
ब्रह्मवित् = ब्रह्मज्ञानी; परम् = परब्रह्मको; आप्नोति = प्राप्त कर लेता है; तत् = उसी भावको व्यक्त करनेवाली; एषा =
यह ( श्रुति ); अभ्युक्ता = कही गयी है ।
व्याख्या-ब्रह्मज्ञानी महात्मा परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, इसी बातको बतानेके लिये आगे आनेवाली श्रुति कही गयी है ।
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान्
सह विपश्चितेति ।
ब्रह्म = ब्रह्म; सत्यम् = सत्य; ज्ञानम् = ज्ञानस्वरूप; ( और ) अनन्तम् = अनन्त है; यः = जो मनुष्य; परमे व्योमन् =
परम विशुद्ध आकाशमें ( रहते हुए भी ); गुहायाम् = प्राणियोंके हृदयरूप गुफामें; निहितम् = छिपे हुए ( उस ब्रह्मको );
वेद = जानता है; सः = वह; विपश्चिता = ( उस ) विज्ञानस्वरूप; ब्रह्मणा सह = ब्रह्मके साथ; सर्वान् = समस्त; कामान्
अश्नुते = भोगोंका अनुभव करता है; इति = इस प्रकार ( यह ऋचा है )।
व्याख्या-इस मन्त्रमें परब्रह्म परमात्माके स्वरूपबोधक लक्षण बताकर उनकी प्राप्तिके स्थानका वर्णन करते हुए
उनकी प्राप्तिका फल बताया गया है । भाव यह है कि वे परब्रह्म परमात्मा सत्यस्वरूप हैं। 'सत्य' शब्द यहाँ नित्य सत्ताका
बोधक है । अर्थात् वे परब्रह्म नित्य सत् हैं, किसी भी कालमें उनका अभाव नहीं होता । तथा वे ज्ञानस्वरूप हैं, उनमें
अज्ञानका लेश भी नहीं है। और वे अनन्त हैं अर्थात् देश और कालकी सीमासे अतीत-सीमारहित हैं। वे ब्रह्म परम
विशुद्ध आकाशमें रहते हुए भी सबके हृदयकी गुफामें छिपे हुए हैं । उन परब्रह्म परमात्माको जो साधक
तत्त्वसे जान लेता है, वह भलीभाँति सबको जाननेवाले उन ब्रह्मके साथ रहता हुआ सब प्रकारके भोगोंको अलौकिक ढंगसे
अनुभव करता है* ।

  • इस कथनके रहस्यको समझ लेनेपर ईशावास्योपनिषद्के प्रथम मन्त्रमें साधकके लिये दिये हुए उपदेशका रहस्य भी स्पष्ट हो जाता
    है । वहाँ कहा है कि इस भूतलपर जो कुछ भी जड-चेतनमय जगत् है, वह ईश्वरसे परिपूर्ण है, उन्हें अपने साथ रखते हुए अर्थात् निरन्तर याद रखते
    हुए ही त्यागपूर्वक आवश्यक विषयोंका सेवन करना चाहिये । जो उपदेश वहाँ साधकके लिये दिया गया है, वही बात यहाँ सिद्ध महात्माकी स्थिति
    बतानेके लिये कही गयी है । 'वह ब्रह्मके साथ सब भोगोंका अनुभव करता है' इस कथनका अभिप्राय यही है कि वह परमात्माको प्राप्त
    सिद्ध पुरुष इन्द्रियोंद्वारा बाह्य विषयोंका सेवन करते हुए भी स्वयं सदा परमात्मामें ही स्थित रहता है । उसके मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके
    व्यवहार, उनके द्वारा होनेवाली सभी चेष्टाएँ परमात्मामें स्थित रहते हुए ही होती हैं। लोगोंके देखनेमें आवश्यकतानुसार यथायोग्य विषयोंका
    इन्द्रियोंद्वारा उपभोग करते समय भी वह परमात्मासे कभी एक क्षणके लिये भी अलग नहीं होता, अतः सदा सभी कर्मोंसे निर्लेप
    रहता है । यही भाव दिखानेके लिये 'विपश्चिता ब्रह्मणा सह सर्वान् कामान् अश्नुते' कहा गया है । इस प्रकार यह श्रुति परब्रह्मके स्वरूप
    तथा उसके ज्ञानकी महिमाको बतानेवाली है ।

३३४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
सम्बन्ध-वे परब्रह्म परमात्मा किस प्रकार कैसी गुफामें छिपे हुए हैं, उन्हें कैसे जानना चाहिये-इस जिज्ञासापर
आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है-
तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः । आकाशाद्वायुः । वायोरग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः
पृथिवी । पृथिव्या ओषधयः । ओषधीभ्योऽन्नम् । अन्नात्पुरुषः । स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः । तस्येदमेव
शिरः । अयं दक्षिणः पक्षः । अयमुत्तरः पक्षः । अयमात्मा । इदं पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ।
वै = निश्चय ही; तस्मात् = ( सर्वत्र प्रसिद्ध ) उस, एतस्मात् = इस, आत्मनः = परमात्मासे; (पहले पहल ) आकाशः =
आकाश-तत्त्व, सम्भूतः = उत्पन्न हुआ, आकाशात् = आकाशसे, वायुः = वायु, वायोः = वायुसे, अग्निः = अग्नि, अग्नेः =
अग्निसे, आपः = जल, (और) अद्भ्यः = जल-तत्त्वसे; पृथिवी = पृथ्वी-तत्त्व उत्पन्न हुआ, पृथिव्याः = पृथ्वीसे;
ओषधयः = समस्त ओषधियाँ उत्पन्न हुईं, ओषधीभ्यः = ओषधियोंसे, अन्नम् = अन्न उत्पन्न हुआ; अन्नात् = अन्नसे
ही, पुरुषः = ( यह ) मनुष्य शरीर उत्पन्न हुआ; सः = वह; एषः = यह; पुरुषः = मनुष्य शरीर, वै = निश्चय ही;
अन्नरसमयः = अन्न-रसमय है, तस्य = उसका, इदम् = यह ( प्रत्यक्ष दीखनेवाला सिर ); एव = ही; शिरः = (पक्षीकी
कल्पनामें ) सिर है, अयम् = यह ( दाहिनी भुजा ) ही, दक्षिणः पक्षः = दाहिना पर है, अयम् = यह ( बायीं
भुजा ) ही उत्तरः पक्षः = बायाँ पख है, अयम् = यह ( शरीरका मध्यभाग ) ही, आत्मा = पक्षीके अङ्गोंका मध्य-
भाग है*, इदम् = यह ( दोनों पैर ही ), पुच्छम् प्रतिष्ठा = पूँछ एव प्रतिष्ठा है; तत् अपि = उसीके विषयमें; एषः = यह
'( आगे कहा जानेवाला ), श्लोकः = श्लोक, भवति = है ।
व्याख्या--इस मन्त्रमें मनुष्यके हृदयरूप गुफाका वर्णन करनेके उद्देश्यसे पहले मनुष्य शरीरकी उत्पत्तिका प्रकार संक्षेपमें
बताकर उसके अङ्गोंकी पक्षीके अङ्गोंके रूपमें कल्पना की गयी है। भाव यह है कि सबके आत्मा अन्तर्यामी परमात्मासे पहले आकाश-
तत्त्व उत्पन्न हुआ । आकाशसे वायु तत्त्व, वायुसे अग्नि तत्त्व, अग्निसे जल तत्त्व और जलसे पृथ्वी उत्पन्न हुई । पृथ्वीसे नाना
प्रकारकी ओषधियाँ-अनाज के पौधे हुए और ओषधियोंसे मनुष्योंका आहार अन्न उत्पन्न हुआ । उस अन्नसे यह स्थूल-
मनुष्य-शरीररूप पुरुष उत्पन्न हुआ । अन्नके रससे बना हुआ यह जो मनुष्य शरीरधारी पुरुष है, इसकी पक्षीके रूपमें कल्पना की
गयी है । इसका जो यह प्रत्यक्ष सिर है, वही तो मानो पक्षीका सिर है, दाहिनी भुजा ही दाहिना पख है । बायीं भुजा ही
बायाँ पख है । शरीरका मध्यभाग ही मानो उस पक्षीके शरीरका मध्यभाग है। दोनों पैर ही पूँछ एव प्रतिष्ठा (पक्षीके
पैर ) है । अन्नकी महिमाके विषयमें यह आगे कहा जानेवाला श्लोक-मन्त्र है ।
॥ प्रथम अनुवाक समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय अनुवाक
अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते । याः काश्च पृथिवीँश्रिताः । अथो अन्नेनैव जीवन्ति । अथैनदपि
यन्त्यन्ततः । अन्नँ हि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । सर्वं वै तेऽन्नमाप्नुवन्ति येऽन्नं ब्रह्मोपासते ।
अन्नँ हि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । अन्नाद्भूतानि जायन्ते । जातान्यन्नेन वर्धन्ते । अद्यतेऽत्ति
च भूतानि । तस्मादन्नं तदुच्यत इति ।
पृथिवीम् श्रिताः = पृथ्वीलोकका आश्रय लेकर रहनेवाले, याः = जो, का = कोई; च = भी; प्रजाः = प्राणी हैं (वे सब);
अन्नात् = अन्नसे, वै = ही; प्रजायन्ते = उत्पन्न होते हैं, अथो = फिर, अन्नेन एव = अन्नसे ही, जीवन्ति = जीते हैं, अथ =
तथा पुनः, अन्तत.= अन्तमें, एनत् अपि = इस अन्नमें ही, यन्ति = विलीन हो जाते हैं, अन्नम् = ( अतः ) अन्न, हि = ही;
भूतानाम् = सब भूतोंमें, ज्येष्ठम् = श्रेष्ठ है, तस्मात् = इसलिये, ( यह ) सर्वौषधम् = सर्वौषधरूप, उच्यते = कहलाता है;

  • 'मध्य ह्येषामङ्गानामात्मा' इस श्रुतिके अनुसार शरीरका मध्यभाग सब अङ्गोंका आत्मा है ।
  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३३५
    ये = जो साधक, अन्नम् = अन्न; ब्रह्म = ब्रह्म है; [इति = इस भावसे,] उपासते = (उसकी) उपासना करते हैं, ते = वे, वै = अवश्य ही;
    सर्वम् = समस्त, अन्नम् = अन्नको, आप्नुवन्ति = प्राप्त कर लेते हैं; हि = क्योंकि, अन्नम् = अन्न ही, भूतानाम् = भूतोंमें;
    ज्येष्ठम् = श्रेष्ठ है; तस्मात् = इसलिये, सर्वौषधम् = ( यह ) सर्वौषध नामसे, उच्यते = कहा जाता है, अन्नात् = अन्नसे ही;
    भूतानि = सब प्राणी; जायन्ते = उत्पन्न होते हैं; जातानि = उत्पन्न होकर, अन्नेन = अन्नसे ही; वर्धन्ते = बढ़ते हैं, तत् = वह;
    अद्यते = ( प्राणियोंद्वारा ) खाया जाता है, च = तथा, भूतानि = ( स्वय भी ) प्राणियोंको, अत्ति = खाता है; तस्मात् =
    इसलिये, अन्नम् = 'अन्न'; इति = इस नामसे, उच्यते = कहा जाता है।
    व्याख्या - इस मन्त्रमे अन्नकी महिमाका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि इस पृथ्वीलोकमें निवास करनेवाले
    जितने भी प्राणी हैं, वे सब अन्नसे ही उत्पन्न हुए हैं - अन्नके परिणामस्वरूप रज और वीर्यसे ही उनके शरीर बने हैं, उत्पन्न
    होनेके बाद अन्नसे ही उनका पालन-पोषण होता है, अतः अन्नसे ही वे जीते हैं। फिर अन्तमे इस अन्नमे ही - अन्न उत्पन्न
    करनेवाली पृथ्वीमें ही विलीन हो जाते हैं। तात्पर्य यह कि समस्त प्राणियोंके जन्म, जीवन और मरण स्थूलशरीरके सम्बन्धसे
    ही होते हैं, और स्थूलशरीर अन्नसे ही उत्पन्न होते हैं, अन्नसे ही जीते हैं तथा अन्नके उद्गमस्थान पृथ्वीमें ही विलीन हो
    जाते हैं। उन शरीरोंमें रहनेवाले जो जीवात्मा हैं, वे अन्नमें विलीन नहीं होते, वे तो मृत्युकालमें प्राणोंके साथ इस शरीरसे
    निकलकर दूसरे शरीरोंमें चले जाते हैं।
    इस प्रकार यह अन्न समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति आदिका कारण है, इसीपर सब कुछ निर्भर करता है; इसलिये यही
    सबसे श्रेष्ठ है और इसीलिये यह सर्वौषधरूप कहलाता है - क्योंकि इसीसे प्राणियोंका क्षुधर्ाजन्य संताप दूर होता है। सारे
    संतापोंका मूल क्षुधा है, इसलिये उसके शान्त होनेपर सारे संताप दूर हो जाते हैं। जो साधक इस अन्नकी ब्रह्मरूपमें उपासना
    करते हैं अर्थात् 'यह अन्न ही सर्वश्रेष्ठ है, सबने बड़ा है' यह समझकर इसकी उपासना करते हैं, वे समस्त अन्नको प्राप्त
    कर लेते हैं। उन्हें यथेष्ट अन्न प्राप्त हो जाता है, अन्नका अभाव नहीं रहता। यह सर्वथा सत्य है कि यह अन्न ही सब
    भूतोंमे श्रेष्ठ है, इसलिये यह सर्वौषधमय कहलाता है। तथा सब प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न होनेके बाद अन्नसे
    ही बढ़ते हैं - उनके अङ्गोंकी पुष्टि भी अन्नसे ही होती है। सब प्राणी इसको खाते हैं, तथा यह भी सब प्राणियोंको खा
    जाता - अपनेमें विलीन कर लेता है। इसीलिये 'अद्यते, अत्ति च इति अन्नम्' इस व्युत्पत्तिके अनुसार इसका नाम अन्न है।
    तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव ।
    तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्राण एव शिरः । व्यानो दक्षिणः पक्षः । अपान उत्तरः पक्षः ।
    आकाश आत्मा । पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ।
    वै = निश्चय ही, तस्मात् = उस, एतस्मात् = इस, अन्नरसमयात् = अन्न-रसमय मनुष्यशरीरसे, अन्यः = भिन्न;
    अन्तरः = उसके भीतर रहनेवाला, प्राणमयः आत्मा = प्राणमय पुरुष है; तेन = उससे, एषः = यह ( अन्न-रसमय पुरुष );
    पूर्णः = व्याप्त है, सः = वह, एषः = यह प्राणमय आत्मा, वै = निश्चय ही, पुरुषविधः एव = पुरुषके आकारका ही है, तस्य = उस
    ( अन्न-रसमय ) आत्माकी, पुरुषविधताम् = पुरुषतुल्य आकृतिमें, अनु = अनुगत ( व्याप्त ) होनेसे ही, अयम् = यह;
    पुरुषविधः = पुरुषके आकारका है, तस्य = उस ( प्राणमय आत्मा ) का, प्राणः = प्राण, एव = ही, शिरः = ( मानो )
    शिर है; व्यानः = व्यान, दक्षिणः = दाहिना, पक्षः = पख है, अपानः = अपान, उत्तरः = बायाँ, पक्षः = पख है, आकाशः =
    आकाश, आत्मा = शरीरका मध्यभाग है, ( और ) पृथिवी = पृथ्वी, पुच्छम् = पूँछ, ( एवम् ) प्रतिष्ठा = आधार है;
    तत् = उस प्राण ( की महिमा ) के विषयमें, अपि = भी, एषः = यह आगे बताया जानेवाला, श्लोकः = श्लोक; भवति = है ।
    व्याख्या - द्वितीय अनुवाकके इस दूसरे अशंमें प्राणमय शरीरका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि पूर्वोक्त
    अन्नके रससे बने हुए स्थूलशरीरसे भिन्न उस स्थूलशरीरके भीतर रहनेवाला एक और शरीर है, उसका नाम
    'प्राणमय' है, उस प्राणमयसे यह अन्नमय शरीर पूर्ण है। अन्नमय स्थूलशरीरकी अपेक्षा सूक्ष्म होनेके कारण प्राणमय शरीर
    इसके अङ्ग-प्रत्यङ्गमें व्याप्त है। वह यह प्राणमय शरीर भी पुरुषके आकारका ही है। अन्नमय शरीरकी पुरुषाकारता प्रसिद्ध
    है, उसमें अनुगत होनेसे ही यह प्राणमय कोश भी पुरुषाकार कहा जाता है। उसकी पक्षीके रूपमें कल्पना इस प्रकार हैं-

३३६ ✣ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ✣
प्राण ही मानो उसका सिर है, क्योंकि शरीरके अङ्गोंमें जैसे मस्तक श्रेष्ठ है, उसी प्रकार पाँचों प्राणोंमे मुख्य प्राण ही सर्वश्रेष्ठ
है। व्यान दाहिना पक्ष है। अपान बायाँ पक्ष है। आकाश अर्थात् आकाशमें फैले हुए वायुकी भाँति सर्वशरीरव्यापी 'समान
वायु' आत्मा है, क्योंकि वही समस्त शरीरमें समानभावसे रस पहुँचाकर समस्त प्राणमय शरीरको पुष्ट करता है। इसका
स्थान शरीरका मध्यभाग है तथा इसीका बाह्य आकाशसे सम्बन्ध है, यह बात प्रश्नोपनिषद्के तीसरे प्रश्नोत्तरके पाँचवें और
आठवें मन्त्रोंमें कही गयी है। तथा पृथ्वी पूँछ एव आधार है अर्थात् अपानवायुको रोककर रखनेवाली पृथ्वीकी आधिदैविक
शक्ति ही इस प्राणमय पुरुषका आधार है। इसका वर्णन भी प्रश्नोपनिषद्के तीसरे प्रश्नोत्तरके आठवें मन्त्रमें ही आया है।
इस प्राणकी महिमाके विषयमें आगे कहा हुआ श्लोक—मन्त्र है।
॥ द्वितीय अनुवाक समाप्त ॥ २ ॥
⊶ॐ⊷
तृतीय अनुवाक
प्राणं देवा अनु प्राणन्ति । मनुष्याः पशवश्च ये । प्राणो हि भूतानामायुः। तस्मात्सर्वायुषमुच्यते ।
सर्वमेव त आयुर्यन्ति ये प्राणं ब्रह्मोपासते । प्राणो हि भूतानामायुः । तस्मात्सर्वायुषमुच्यत इति । तस्यैष
एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य
ये=जो-जो, देवाः=देवता, मनुष्याः=मनुष्य, च=और, पशवः=पशु आदि प्राणी हैं; [ते=वे,] प्राणम् अनु=
प्राणका अनुसरण करके ही, प्राणन्ति=चेष्टा करते अर्थात् जीवित रहते हैं, हि=क्योंकि; प्राणः=प्राण ही;
भूतानाम्=प्राणियोंकी, आयुः=आयु है; तस्मात्=इसलिये, (यह प्राण) सर्वायुषम्=सबका आयु; उच्यते=
कहलाता है; प्राणः=प्राण; हि=ही, भूतानाम्=प्राणियों की; आयुः=आयु—जीवन है; तस्मात्= इसलिये, (यह)
सर्वायुषम्=सबका आयु; उच्यते=कहलाता है; इति=यह समझकर; ये=जो कोई; प्राणम्=प्राणकी; ब्रह्म=
ब्रह्मरूपसे, उपासते=उपासना करते हैं; ते=वे, सर्वम् एव=निस्सन्देह समस्त; आयुः=आयुको; यन्ति=प्राप्त कर लेते
हैं, तस्य=उसका; एषः एव=यही; शारीरः=शरीरमें रहनेवाला; आत्मा=अन्तरात्मा है; यः=जो; पूर्वस्य=पहलेवालेका
अर्थात् अन्न-रसमय शरीरका अन्तरात्मा है।
व्याख्या—तृतीय अनुवाकके इस पहले अंशमें प्राणकी महिमाका वर्णन करनेवाली श्रुतिका उल्लेख करके फिर इस
प्राणमय शरीरके अन्तर्यामी परमेश्वरको लक्ष्य कराया गया है। भाव यह है कि जितने भी देवता, मनुष्य, पशु आदि
शरीरधारी प्राणी हैं, वे सब प्राणके सहारे ही जी रहे हैं। प्राणके बिना किसीका भी शरीर नहीं रह सकता, क्योंकि प्राण
ही सब प्राणियोंकी आयु—जीवन है, इसीलिये यह प्राण 'सर्वायुष' कहलाता है। जो साधक 'यह प्राणियोंकी आयु है,
इसलिये यह सबका आयु—जीवन कहलाता है' यों समझकर इस प्राणकी ब्रह्मरूपसे उपासना करते हैं, वे पूर्ण आयुको
प्राप्त कर लेते हैं। प्रश्नोपनिषद्में भी कहा है कि जो मनुष्य इस प्राणके तत्त्वको जान लेता है, वह स्वयं अमर हो जाता है
और उसकी प्रजा नष्ट नहीं होती ( ३। ११)। जो सर्वोत्मा परमेश्वर अन्नके रससे बने हुए स्थूलशरीरधारी
पुरुषका अन्तरात्मा है, वही उस प्राणमय पुरुषका भी शरीरान्तर्वर्ती अन्तर्यामी आत्मा है।
तस्माद्वा एतस्मात्प्राणमयादन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध
एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य यजुरेव शिरः । ऋग्दक्षिणः पक्षः । सामोत्तरः पक्षः ।
आदेश आत्मा । अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ।
वै=यह निश्चय है कि, तस्मात्=उस, एतस्मात्=इस; प्राणमयात्=प्राणमय पुरुषसे, अन्यः=भिन्न; अन्तरः=
उसके भीतर रहनेवाला, मनोमयः=मनोमय, आत्मा=आत्मा (पुरुष) है; तेन=उस मनोमय आत्मासे; एषः=यह प्राणमय
शरीर; पूर्णः=व्याप्त है; सः=वह; एषः=यह मनोमय आत्मा; वै=निश्चय ही; पुरुषविधः=पुरुषके आकारका, एव=ही

  • तैत्तिरीयोपनिषद् * ३३७
    है; तस्य = उसकी; पुरुषविधताम् अनु = पुरुष-तुल्य आकृतिमें अनुगत (व्याप्त) होनेसे ही, अयम् = यह मनोमय
    आत्मा; पुरुषविधः = पुरुषके आकारका है, तस्य = उस (मनोमय पुरुष) का, यजुः = यजुर्वेद; एव = ही; शिरः =
    (मानो) सिर है; ऋक् = ऋग्वेद; दक्षिणः = दाहिना, पक्षः = पंख है, साम = सामवेद, उत्तरः = बायाँ, पक्षः = पख है;
    आदेशः = आदेश (विधिवाक्य); आत्मा = शरीरका मध्यभाग है, अथर्वाङ्गिरसः = अथर्वा और अङ्गिरा ऋषिद्वारा देखे
    गये अथर्ववेदके मन्त्र ही, पुच्छम् = पूँछ; (एवं) प्रतिष्ठा = आधार है, तत् = उसकी महिमाके विषयमें; अपि = भी;
    एषः = यह आगे कहा जानेवाला, श्लोकः = श्लोक, भवति = है।
    व्याख्या-इस तृतीय अनुवाकके दूसरे अंशमें मनोमय पुरुषका वर्णन किया गया है। भाव यह है कि पहले
    बताये हुए प्राणमय पुरुषसे भिन्न, उससे भी सूक्ष्म होनेके कारण उसके भीतर रहनेवाला दूसरा पुरुष है; उसका नाम है
    मनोमय । उस मनोमयसे यह प्राणमय शरीर पूर्ण है अर्थात् वह इस प्राणमय शरीरमें सर्वत्र व्याप्त हो रहा है। वह यह मनोमय
    शरीर भी पुरुषके ही आकारका है। प्राणमय पुरुषमें अनुगत होनेसे ही यह मनोमय आत्मा पुरुषके समान आकारवाला है।
    उसकी पक्षीके रूपमें इस प्रकार कल्पना की गयी है-उस मनोमय पुरुषका मानो यजुर्वेद ही सिर है; ऋग्वेद दाहिना पंख
    है, सामवेद बायाँ पंख है, आदेश (विधिवाक्य) मानो शरीरका मध्यभाग है तथा अथर्वा और अङ्गिरा ऋषियोंद्वारा
    देखे हुए अथर्ववेदके मन्त्र ही पूँछ और आधार हैं।
    यज्ञ आदि कर्मोंमें यजुर्वेदके मन्त्रकी ही प्रधानता है। इसके सिवा जिनके अक्षरोंकी कोई नियत संख्या न हो तथा
    जिसकी पाद-पूर्तिका कोई नियत नियम न हो, ऐसे मन्त्रोंको 'यजु''छन्दके अन्तर्गत समझा जाता है। इस नियमके अनुसार
    जिस किसी वैदिकवाक्य या मन्त्रके अन्तमें 'स्वाहा' पद जोड़कर अग्निमें आहुति दी जाती है, वह वाक्य या मन्त्र भी 'यजुः'
    ही कहलायेगा। इस प्रकार यजुर्मन्त्रोंके द्वारा ही अग्निको हविष्य अर्पित किया जाता है, इसलिये वहाँ यजुः प्रधान है। अङ्गोंमें
    भी सिर प्रधान है, अतः यजुर्वेदको सिर बतलाना उचित ही है। वेद-मन्त्रोंके वर्ण, पद और वाक्य आदिके उच्चारणके लिये
    पहले मनमें ही संकल्प उठता है; अतः संकल्पात्मक वृत्तिका द्वारा मनोमय आत्माके साथ वेद-मन्त्रोंका घनिष्ठ सम्बन्ध है।
    इसीलिये इन्हें मनोमय पुरुषके ही अङ्गोंमें स्थान दिया गया है। शरीरमें जो स्थान दोनों भुजाओंका है, वही स्थान मनोमय
    पुरुषके अङ्गोंमें ऋग्वेद और सामवेदका है। यज्ञ-यागादिमें इनके मन्त्रोंद्वारा स्तवन और गायन होता है, अतः यजुर्मन्त्रोंकी
    अपेक्षा ये अप्रधान हैं; फिर भी भुजाओंकी भाँति यज्ञमें विशेष सहायक हैं, अतएव इनको भुजाओंका रूप दिया गया है।
    आदेश (विधि)-वाक्य वेदोंके भीतर हैं, अतः उन्हें ही मनोमय पुरुषके अङ्गोंका मध्यभाग बताया गया है। अथर्ववेदमें
    शान्तिक-पौष्टिक आदि कर्मोंके साधक मन्त्र हैं, जो प्रतिष्ठाके हेतु हैं, अतः उनको पुच्छ एव प्रतिष्ठा कहना सर्वथा युक्तिसगत
    ही है। संकल्पात्मक वृत्तिका द्वारा मनोमय पुरुषका इन सबके साथ नित्य सम्बन्ध है, इसीलिये वेदमन्त्रोंको उसका अङ्ग
    बताया गया है-यह बात सदा स्मरण रखनी चाहिये।
    इस मनोमय पुरुषकी महिमाके विषयमे भी यह आगे चतुर्थ अनुवाकमें कहा जानेवाला श्लोक अर्थात् मन्त्र है।
    ॥ तृतीय अनुवाक समाप्त ॥ ३ ॥
    चतुर्थ अनुवाक
    यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कदाचनेति ।
    तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य ।
    यतः = जहाँसे, मनसा सह = मनके सहित, वाचः = वाणी आदि इन्द्रियाँ, अप्राप्य = उसे न पाकर;
    निवर्तन्ते = लौट आती हैं, [ तस्य ] ब्रह्मणः = उस ब्रह्मके, आनन्दम् = आनन्दको, विद्वान् = जाननेवाला पुरुष;
    कदाचन = कभी; न बिभेति = भय नहीं करता, इति = इस प्रकार यह श्लोक है, तस्य = उस मनोमय पुरुषका भी;
    एषः एव = यही परमात्मा, शारीरः = शरीरान्तर्वर्ती, आत्मा = आत्मा है, यः = जो; पूर्वस्य = पहले बताये हुए अन्नरसमय
    शरीर या प्राणमय शरीरका है।
    उ० अं० ४३-