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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 347, कुल 832 में से

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पृष्ठ 347

धातः = हे विधाता; एवम् = इसी प्रकार; माम् = मेरे पास; सर्वतः = सब ओरसे; ब्रह्मचारिणः = ब्रह्मचारीलोग; आयन्तु =
आयें; स्वाहा = स्वाहा ( इस उद्देश्यसे यह आहुति है); प्रतिवेशः = (तू) सबका विश्राम-स्थान; असि = है; मा = मेरे लिये;
प्रभाहि = अपनेको प्रकाशित कर; मा = मुझे; प्रपद्यस्व = प्राप्त हो जा।
व्याख्या - 'जिस प्रकार समस्त जल-प्रवाह नीचेकी ओर बहते हुए समुद्रमें मिल जाते हैं, तथा जिस प्रकार महीने
दिनोंका अन्त करनेवाले संवत्सररूप कालमें जा रहे हैं, हे विधाता ! उसी प्रकार मेरे पास सब ओरसे ब्रह्मचारीलोग आयें और मैं
उनको विद्याभ्यास कराकर तथा कल्याणका उपदेश देकर अपने कर्तव्यका एवं आपकी आज्ञाका पालन करता रहूँ।' इस
उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारण करके 'स्वाहा' शब्दके साथ छठी आहुति अग्निमें डालनी चाहिये । 'हे परमात्मन् ! आप सबके विश्राम-
स्थान हैं, अब मेरे लिये अपने दिव्य स्वरूपको प्रकाशित कर दीजिये और मुझे प्राप्त हो जाइये' इस उद्देश्यसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक
'स्वाहा' शब्दके साथ सातवीं आहुति अग्निमें डाले।
इस प्रकार इस चौथे अनुवाकमें इस लोक और परलोककी उन्नतिका उपाय परमात्माकी प्रार्थना और उसके
साथ-साथ हवनको बताया गया है। प्रकरण बड़ा ही सुन्दर और श्रेयस्कर है। अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको इसमें
बताये हुए प्रकारसे अपने लिये जिस अंशकी आवश्यकता प्रतीत हो, उस अंशके अनुसार अनुष्ठान आरम्भ कर देना चाहिये ।
॥ चतुर्थ अनुवाक ॥ ४ ॥
पञ्चम अनुवाक
भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्रो व्याहृतयः । तासामु ह स्मैतां चतुर्थीं माहाचमस्यः प्रवेदयते ।
मह इति । तद्ब्रह्म । स आत्मा । अङ्गान्यन्या देवताः । भूरिति वा अयं लोकः । भुव इत्यन्तरिक्षम् ।
सुवरित्यसौ लोकः । मह इत्यादित्यः । आदित्येन वाव सर्वे लोका महीयन्ते ।
भूः = भूः; भुवः = भुवः; सुवः = स्वः; इति = इस प्रकार; एताः = ये; वै = प्रसिद्ध; तिस्रः = तीन; व्याहृतयः = व्याहृतियाँ
हैं; तासाम् उ = उन तीनोंकी अपेक्षासे; चतुर्थीम् = जो चौथी व्याहृति; महः इति = 'मह' इस नामसे, ह = प्रसिद्ध है; एताम् =
इसको; माहाचमस्यः = महाचमसके पुत्रने, प्रवेदयते स्म = सबसे पहले जाना था, तत् = वह चौथी व्याहृति ही;
ब्रह्म = ब्रह्म है; सः = वह; आत्मा = ऊपर कही हुई व्याहृतियोंकी आत्मा है; अन्याः = अन्य; देवताः = सब
देवता; अङ्गानि = उसके अङ्ग हैं, भूः = 'भूः'; इति = यह व्याहृति; वै = ही; अयम् लोकः = यह पृथ्वी-लोक है, भुवः =
'भुवः'; इति = यह; अन्तरिक्षम् = अन्तरिक्ष-लोक है; सुवः = 'स्वः'; इति = यह, असौ लोकः = वह प्रसिद्ध स्वर्गलोक है;
महः = 'महः'; इति = यह, आदित्यः = आदित्य-सूर्य है; आदित्येन = (क्योंकि) आदित्यसे; वाव = ही; सर्वे = समस्त;
लोकाः = लोक, महीयन्ते = महिमान्वित होते हैं।
व्याख्या - इस पञ्चम अनुवाकमें भूः, भुवः, स्वः और महः - इन चारों व्याहृतियोंकी उपासनाका रहस्य बताकर
उसके फलका वर्णन किया गया है। पहले तो इसमें यह बात कही गयी है कि भूः, भुवः और स्वः - ये तीन व्याहृतियाँ तो
प्रसिद्ध हैं; परंतु इनके अतिरिक्त जो चौथी व्याहृति 'महः' है, इसकी उपासनाका रहस्य सबसे पहले महाचमसके पुत्रने
जाना था । भाव यह है कि इन चारों व्याहृतियोंको चार प्रकारसे प्रयोग करके उपासना करनेकी विधि, जो आगे
बतायी गयी है, तभीसे प्रचलित हुई है। इसके बाद उन चार व्याहृतियोंमें किस प्रकारकी भावना करके उपासना करनी
चाहिये, यह समझाया गया है। इन चारों व्याहृतियोंमें 'महः' यह चौथी व्याहृति सर्वप्रधान है। अतः उपास्य देवोंमें 'महः'
व्याहृतिको ब्रह्मका स्वरूप समझना चाहिये - यह भाव समझानेके लिये कहा गया है कि वह चौथी व्याहृति 'महः' ब्रह्मका नाम होनेसे
ब्रह्म ही है; क्योंकि ब्रह्म सबके आत्मा हैं, सर्वरूप हैं और अन्य सब देवता उनके अङ्ग हैं, अतः जिस किसी भी देवताकी
इन व्याहृतियोंके द्वारा उपासना की जाय, उसमें इस बातको नहीं भूलना चाहिये कि यह सर्वरूप परमेश्वरकी ही उपासना है।
उ० अं० ४१-४२-