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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 362, कुल 832 में से

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पृष्ठ 362

३३६ ✣ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ✣
प्राण ही मानो उसका सिर है, क्योंकि शरीरके अङ्गोंमें जैसे मस्तक श्रेष्ठ है, उसी प्रकार पाँचों प्राणोंमे मुख्य प्राण ही सर्वश्रेष्ठ
है। व्यान दाहिना पक्ष है। अपान बायाँ पक्ष है। आकाश अर्थात् आकाशमें फैले हुए वायुकी भाँति सर्वशरीरव्यापी 'समान
वायु' आत्मा है, क्योंकि वही समस्त शरीरमें समानभावसे रस पहुँचाकर समस्त प्राणमय शरीरको पुष्ट करता है। इसका
स्थान शरीरका मध्यभाग है तथा इसीका बाह्य आकाशसे सम्बन्ध है, यह बात प्रश्नोपनिषद्के तीसरे प्रश्नोत्तरके पाँचवें और
आठवें मन्त्रोंमें कही गयी है। तथा पृथ्वी पूँछ एव आधार है अर्थात् अपानवायुको रोककर रखनेवाली पृथ्वीकी आधिदैविक
शक्ति ही इस प्राणमय पुरुषका आधार है। इसका वर्णन भी प्रश्नोपनिषद्के तीसरे प्रश्नोत्तरके आठवें मन्त्रमें ही आया है।
इस प्राणकी महिमाके विषयमें आगे कहा हुआ श्लोक—मन्त्र है।
॥ द्वितीय अनुवाक समाप्त ॥ २ ॥
⊶ॐ⊷
तृतीय अनुवाक
प्राणं देवा अनु प्राणन्ति । मनुष्याः पशवश्च ये । प्राणो हि भूतानामायुः। तस्मात्सर्वायुषमुच्यते ।
सर्वमेव त आयुर्यन्ति ये प्राणं ब्रह्मोपासते । प्राणो हि भूतानामायुः । तस्मात्सर्वायुषमुच्यत इति । तस्यैष
एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य
ये=जो-जो, देवाः=देवता, मनुष्याः=मनुष्य, च=और, पशवः=पशु आदि प्राणी हैं; [ते=वे,] प्राणम् अनु=
प्राणका अनुसरण करके ही, प्राणन्ति=चेष्टा करते अर्थात् जीवित रहते हैं, हि=क्योंकि; प्राणः=प्राण ही;
भूतानाम्=प्राणियोंकी, आयुः=आयु है; तस्मात्=इसलिये, (यह प्राण) सर्वायुषम्=सबका आयु; उच्यते=
कहलाता है; प्राणः=प्राण; हि=ही, भूतानाम्=प्राणियों की; आयुः=आयु—जीवन है; तस्मात्= इसलिये, (यह)
सर्वायुषम्=सबका आयु; उच्यते=कहलाता है; इति=यह समझकर; ये=जो कोई; प्राणम्=प्राणकी; ब्रह्म=
ब्रह्मरूपसे, उपासते=उपासना करते हैं; ते=वे, सर्वम् एव=निस्सन्देह समस्त; आयुः=आयुको; यन्ति=प्राप्त कर लेते
हैं, तस्य=उसका; एषः एव=यही; शारीरः=शरीरमें रहनेवाला; आत्मा=अन्तरात्मा है; यः=जो; पूर्वस्य=पहलेवालेका
अर्थात् अन्न-रसमय शरीरका अन्तरात्मा है।
व्याख्या—तृतीय अनुवाकके इस पहले अंशमें प्राणकी महिमाका वर्णन करनेवाली श्रुतिका उल्लेख करके फिर इस
प्राणमय शरीरके अन्तर्यामी परमेश्वरको लक्ष्य कराया गया है। भाव यह है कि जितने भी देवता, मनुष्य, पशु आदि
शरीरधारी प्राणी हैं, वे सब प्राणके सहारे ही जी रहे हैं। प्राणके बिना किसीका भी शरीर नहीं रह सकता, क्योंकि प्राण
ही सब प्राणियोंकी आयु—जीवन है, इसीलिये यह प्राण 'सर्वायुष' कहलाता है। जो साधक 'यह प्राणियोंकी आयु है,
इसलिये यह सबका आयु—जीवन कहलाता है' यों समझकर इस प्राणकी ब्रह्मरूपसे उपासना करते हैं, वे पूर्ण आयुको
प्राप्त कर लेते हैं। प्रश्नोपनिषद्में भी कहा है कि जो मनुष्य इस प्राणके तत्त्वको जान लेता है, वह स्वयं अमर हो जाता है
और उसकी प्रजा नष्ट नहीं होती ( ३। ११)। जो सर्वोत्मा परमेश्वर अन्नके रससे बने हुए स्थूलशरीरधारी
पुरुषका अन्तरात्मा है, वही उस प्राणमय पुरुषका भी शरीरान्तर्वर्ती अन्तर्यामी आत्मा है।
तस्माद्वा एतस्मात्प्राणमयादन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध
एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य यजुरेव शिरः । ऋग्दक्षिणः पक्षः । सामोत्तरः पक्षः ।
आदेश आत्मा । अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ।
वै=यह निश्चय है कि, तस्मात्=उस, एतस्मात्=इस; प्राणमयात्=प्राणमय पुरुषसे, अन्यः=भिन्न; अन्तरः=
उसके भीतर रहनेवाला, मनोमयः=मनोमय, आत्मा=आत्मा (पुरुष) है; तेन=उस मनोमय आत्मासे; एषः=यह प्राणमय
शरीर; पूर्णः=व्याप्त है; सः=वह; एषः=यह मनोमय आत्मा; वै=निश्चय ही; पुरुषविधः=पुरुषके आकारका, एव=ही