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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 350, कुल 832 में से

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पृष्ठ 350

३२४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
स्थित है; (वहाँ) शीर्षकपाले = सिरके दोनो कपालोंको; व्यपोह्य = भेदन करके, [ विनिःसृता या = निकली हुई जो सुषुम्णा
नाड़ी है; ] सा = वह, इन्द्रयोनिः = इन्द्रयोनि (परमात्माकी प्राप्तिका द्वार) है; (अन्तकालमें साधक) भूः इति = 'भूः'
इस व्याहृतिके अर्थरूप, अग्नौ = अग्निमें, प्रतितिष्ठति = प्रतिष्ठित होता है; भुवः इति = 'भुवः' इस व्याहृतिके अर्थरूप;
वायौ = वायुदेवतामें स्थित होता है, (फिर) सुवः इति = 'स्वः' इस व्याहृतिके अर्थरूप; आदित्ये = सूर्यमे स्थित होता है;
(उसके बाद) महः इति = 'महः' इस व्याहृतिके अर्थस्वरूप; ब्रह्मणि = ब्रह्ममें स्थित होता है।
व्याख्या - उन परब्रह्म परमेश्वरको अपने हृदयमें प्रत्यक्ष देखनेवाला महापुरुष इस शरीरका त्याग करके जब
जाता है, तब किस प्रकार किस मार्गसे बाहर निकलकर किस क्रमसे भूः, भुवः और स्वःरूप समस्त लोकोंमें परिपूर्ण सबके
आत्मरूप परमेश्वरमें स्थित होता है—यह बात इस अनुवाकके दूसरे अर्धमें समझायी गयी है। भाव यह है कि मनुष्योंके
मुखमें तालुओंके बीचो-बीच जो एक थनके आकारका मास पिण्ड लटकता है जिसे बोलचालकी भाषामें 'घाँटी' कहते हैं,
उसके आगे केशोंका मूलस्थान ब्रह्मरन्ध्र है, वहाँ हृदय-देशसे निकलकर घाँटीके भीतरसे होती हुई दोनों कपालोंको भेद-
कर गयी हुई जो सुषुम्णा नामसे प्रसिद्ध नाड़ी है; वही उन इन्द्र नामसे कहे जानेवाले परमेश्वरकी प्राप्तिका द्वार है।
अन्तकालमें वह महापुरुष उस मार्गसे शरीरके बाहर निकलकर 'भूः' इस नामसे अभिहित अग्निमें स्थित होता है। गीतामें
भी यही बात कही गयी है कि ब्रह्मवेत्ता जब ब्रह्मलोकमें जाता है, तब वह सर्वप्रथम ज्योतिर्मय अग्निके अभिमानी देवताके
अधिकारमें आता है (गीता ८।२४)। उसके बाद वायुमें स्थित होता है। अर्थात् पृथ्वीसे लेकर सूर्यलोकतक समस्त
आकाशमें जिसका अधिकार है, जो सर्वत्र विचरनेवाली वायुका अभिमानी देवता है, और जो 'भुवः' नामसे पञ्चम अनुवाकमें
कहा गया है, उसीके अधिकारमे वह आता है। वह देवता उसे 'स्वः' इस नामसे कहे हुए सूर्यलोकमें पहुँचा देता है, वहाँसे
फिर वह 'महः' इस नामसे कहे हुए 'ब्रह्म' मे स्थित हो जाता है।

  • आप्नोति स्वाराज्यम् । आप्नोति मनसस्पतिम् । वाक्पतिश्चक्षुष्पतिः । श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिः ।
    एतत्ततो भवति ।
    स्वाराज्यम् = (वह) स्वराज्यको, आप्नोति = प्राप्त कर लेता है, मनसस्पतिम् = मनके स्वामीको, आप्नोति =
    पा लेता है, वाक्पतिः भवति ] = वाणीका स्वामी हो जाता है, चक्षुष्पतिः = नेत्रोंका स्वामी, श्रोत्रपतिः = कानोंका
    स्वामी; (और) विज्ञानपतिः = विज्ञानका स्वामी हो जाता है; ततः = उस पहले बताये हुए साधनसे, एतत् =
    यह फल, भवति = होता है।
    व्याख्या—वह ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित महापुरुष कैसा हो जाता है—यह बात इस अनुवाकके तीसरे अंशमे बतलायी
    गयी है। अनुवाकके इस अंशका अभिप्राय यह है कि वह स्वराट् बन जाता है। अर्थात् उसपर प्रकृतिका अधिकार नहीं
    रहता, अपितु वह स्वयं ही प्रकृतिका अधिष्ठाता बन जाता है, क्योंकि वह मनके अर्थात् समस्त अन्तःकरणसमुदायके स्वामी
    परमात्माको प्राप्त कर लेता है, इसलिये वह वाणी, चक्षु, श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियो और उनके देवताओंका तथा विज्ञान-
    स्वरूप बुद्धिका भी स्वामी हो जाता है। अर्थात् ये सब उसके अधीन हो जाते हैं। उस पहले बताये हुए साधनसे यह उपर्युक्त
    फल मिलता है।
    आकाशशरीरं ब्रह्म । सत्यात्म प्राणारामं मनआनन्दम् । शान्तिसमृद्धममृतम् । इति प्राचीन-
    योग्योपास्स्व ।
    ब्रह्म = वह ब्रह्म, आकाशशरीरम् = आकाशके सदृश शरीरवाला; सत्यात्म = सत्तारूप; प्राणारामम् = इन्द्रियादि
    समस्त प्राणोंको विश्राम देनेवाला, मनआनन्दम् = मनको आनन्द देनेवाला, शान्तिसमृद्धम् = शान्तिसे सम्पन्न; (तथा)
    अमृतम् = अविनाशी है, इति = यों मानकर, प्राचीनयोग्य = हे प्राचीनयोग्य; उपास्स्व = तू उसकी उपासना कर ।
    व्याख्या—वे प्राप्तव्य ब्रह्म कैसे है, उनका किस प्रकार चिन्तन और ध्यान करना चाहिये—यह बात इस
    अनुवाकके चौथे अशमें बतायी गयी है। अभिप्राय यह है कि वे ब्रह्म आकाशके सदृश निराकार, सर्वव्यापी और अतिशय