कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
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शुकदेव कबीर सम्वाद
१०२
कबीरकृष्णगीता ।
बोले गरुड विहसिके वाणी । मम जीवन शुभ सट्टरु जानी ॥
चरणोदक ले निर्मल भयऊ । सट्टरु चरण हियभहँ धरऊं ॥
व्यासदेव सुखदेव सिर नाये । बडे भाग्य हम दर्शन पाये ॥
व्यासदेव सुनि नारद पूछा । हमहुको है भक्तिकी इच्छा ॥
पान प्रवाना हमको दीजे । सुत्कदान हमहूको कीजे ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो सब कोई । जीव दया विन मुक्त न होई ॥
जीवदया धर सट्टरु सेवे । सबसे गीत नाम चित देवे ॥
सबमें सोर मिता अब राधा । स्थिर सत्यनाम निज नामा ॥
विना भक्ति भगवंत न भेटे । सट्टरु विना ना संशय भेटे ॥
सट्टरु कहैं कबीर हम आहीं । सट्टरु अंश विष्णुके माहीं ॥
सट्टरु अंश जीव सत सबमें । राम कृष्ण मम अस कहो अवमें ॥
हमरे अंश निरंजन राधा । तीन लोक अधिकार तिन पाया ॥
तिन पुन आपन अंस उत्पाना । छल छुटम मान अभिमाना ॥
छल औ क्षुद्र विष्णु बहुरंगा । ब्रह्मा कुभत हंग रुद्रंगा ॥
रजगुण ब्रह्मा विष्णु सतोगुण । काल प्रले जन रुद्र तमोगुण ॥
अष्टंगी वटपारकी बुदिया । वटपार निरंजन सब जिव लटिया ॥
एक सै वै विष्णु सत भाषा । विष्णु नाम तब सट्टरु भाषा ॥
रजगुण तमगुण लोहु धातू । पुरुष अंस जीव सट्टरु सातू ॥
दोहा-निरंजन जीव झरकावे, सवा लक्ष नित खाय ।
कहैं कबीर जो मोही भजे, तेहि यम निकट न जाय ॥
कवीरकृष्णगीता ।
१०३
व्याससुखदेववचन ।
व्यासदेव सुखदेव मिल बोले । देहु शरण यम डर मह डोसे ॥
विलखत वदन व्यास सुनि भाषी । कवीर शरण लेहु मोही राखी ॥
कवीरवचन ।
कहैं कवीर सोइ यमसे बांचा । निज२शब्द कहा यम सांचा ॥
अब तुम होहु निहसंक यमसेती । देउ बीरा चल यमसो जीती ॥
दीन्ह प्रवाना त्रिण तोढाई । व्यासदेव सुखदेव कयाई ॥
चरणोदक महाप्रसाद तब दीन्हा । बहुरसिखापनजीवदयाकोकीन्हा
हम कहैं गुप्त हृदय महाँ राखहु । साधु गुरु हरि महिमा भाषहु ॥
साधु गुरु हरिरूप हमारा । हमरे नाम भज यमसो न्यारा ॥
बेदशास्त्र सुभत जहाँ ताई । सबपर ज्ञान सदुरुको साई ॥
कृष्ण अर्जुन गीता तुम भाषहु । ज्ञान पाठ गीता अब राखहु ॥
हम कह इच्छा देहु प्रवाना । सतकवीर कहैं सुना भगवाना ॥
हमरे भेटहु आवा गवना । लेचल निज घरबहुनअवना ॥
सुनेउ राम बसिष्ठसे रामा । कौन नाम दीन्हो गुरु रामा ॥
जो तोहि पान दे लोक पठाई । तो सतरंजबाजी उठ जाई ॥
विष्णुसयान तिहु लोक न कोई । सतनाम सभ वरत न कोई ॥
क्रितम उपज विनस दुख पायो । आद अजर घर अमर रहायो ॥
जो तुम जैहो अमरलौका । निराकार कहैं होइहै शोका ॥
हम विष्णु जो नाती आज्ञा । बाप तुरक कह कौने काजा ॥
सपूत पुत्र तेहि प्रोजन देई । विन सुचील सुत पान न लेई ॥
कृष्ण कबीर सम्वाद
१०४
कबीरकृष्णगीता ।
निरंजनके वंश यज्ञारा । एक विष्णु तेहि पुरमें सारा ॥
सांच विना बांचे नहिं कोई । भक्त बेपुस तेहि काल बिगोई ॥
तुम कहैं विष्णु चिंता कछुनाहौं । तुम्हरे पास हम सदा रहार्हौं ॥
नरक परे नहिं देहो तोहौं । जो तुम ध्यान शासिहो मोहौं ॥
कि होय सेवक या होय स्वामी । संत गाढ पहुंचे सुरत गामी ॥
जो जेहि नाम न ध्यावे प्राणी । तासु लोक पहुंचे निज गामी ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण कबीर बल मोश । करताके करता बंदी छोरा ॥
दोहा-मैं कबीर कहैं चीन्हा, कबीर रूप करतार ।
करता निरंजन कितम, कहैं कृष्ण निरवार ॥
कबीरवचन ।
यह सुन कबीर कृष्णकंठलावा । सीस हांथ दे निकट बैठावा ॥
कहैं कबीर तुम हमरे अंशा । हम चीन्हे विन काल विधंसा ॥
निराकार कहैं जब उपजाया । स्वास तेज कंभी तन आया ॥
आगम तास होय यह काला । जीवन कहैं यम करे बेहाला ॥
तब पुन पुरुष दीन्ह तेहि आषा । योगजीत तेरो सिर खाषा ॥
योगजीत तब उत्पन्न दीन्ह। ताके आस निरंजन छीना ॥
चौंसठ युग सेवा लव लावा । सेवा वस्य राज तिन पावा ॥
अमरलोक ते गये निकास। जब अछूंगा कीन्हे आसा ॥
योगजीत डर काल डराई । नाम कबीर सुनत छिप जाई ॥
वस्तु जीव सब साज हमरा । निरंजन कहैं सौपाल भारा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१०५
पुरुष आज्ञा तज मन मत ठाना । निरंजन तोपे काल दिवाना ॥
जीवन कहैं तिन करे अहारा । जीव विवश हो परे बिचारा ॥
तव मोहिँ दाद जीवनकी आई । दासा तन धर भाके दहाई ॥
जो जिव भाके हमारी करि हैं । ताको काल खूंट नहिँ धरि हैं ॥
चारों युग जिवलोक पठावा । युग प्रवान नाम जिव गावा ॥
दोहा--सतयुग सत सुकृत अंचित, त्रेता नाम मुनीन्द्र ।
द्वारपर करुणामय भये, कलयुग नाम कबीर ॥
कहैं कृष्ण तोहि तबहीं चीन्हा । जब पताल राख मोहि लीन्हा ॥
औ सबके गाढे उपकरहू । प्रेमवश्य तुम ओट न धरहू ॥
अहो साहेब मैं तुम्हरे दासा । अजर मुक्त है तुम्हरे पास ॥
पिताके उर छल शुद्ध कछु करहूँ । पिता निरंजन डर हम डरहूँ ॥
बहुर भरोस तुम्हारो सोई । पुण्य धर्मके बात चलाई ॥
निरंजन जाना हमरी वाता । कबीर कृष्ण दोह एके मतराता ॥
जीव दया गुरु भक्त बखानहु । सतसंगति महिमा कथि आनहु ॥
रामनाम गुरु साधुसे नेहा । कहैं कबीर राम गुरु देहा ॥
ठाकुर कहैं मानुष जनि जानहु । राम कृष्ण करता पाहिचानहु ॥
रामकृष्णके हम लघु जेठा । जैसे फेर जन्मपितु बेटा ॥
दोहा--राम कबीरके अंश हैं, कबीर रामके दास ।
स्वामी सेवक होयके, करहिं भक्त प्रकाश ॥
तुम हो व्यास विष्णु औतारा । चौविस महीं तुम भक्त सियारा ॥
हम हरि वंश विष्णु मम अंसा । भक्त रूप हम विष्णु प्रशंसा ॥
१०६
कबीरकृष्णगीता ।
विष्णु दया जब कीन्ह पुकारा । तब जानो हमरे संचारा ॥
जवहिं निरंजन विष्णु समाई । तब कर विष्णु कपट चतुराई ॥
सबपर श्रेष्ठ जानो सतनामा । कहैं कबीर गुरुपद विश्रामा ॥
गुरुसोई जो यमसो उबारे । जन्म मरण दुख दारुण तारे ॥
कहैं कबीरसो सद्गुरु जानो । राम कृष्णको स्वयं बखानो ॥
कृष्ण वचन ।
कहैं कृष्ण हम निहचे जाना । हम सब पर कबीर प्रवाना ॥
निरंजन आद सो अजर कबीरा । स्वासरूप रमै सकल शरीरा ॥
हममहैं तुममहैं सोहंग जीऊ । स्वास रूप तन जीवके पीऊ ॥
जीव सब अंश कबीरके भाई । देह निरंजन राय बनाई ॥
जो जिव लैहो कबीरके पाना । ताके डर निराकार डेराना ॥
कोटिन केर काल मोहि खावा । निराकार अज शिवहिं नचावा
और जीव केहि लेखा माहीं । रहटके घरिया आवहिं जाहीं ॥
दोहा-रहटके घारिया सरगुण, रीते भर उत्तराय ।
भरी उरध भर खाली, निडर कूपके जाय ॥
जब नहिं धरती अकाश पताला । जब नहिं देह जगत कित काला
नाहिं निरंजन आद भवानी । वहिं तब त्रिगुण पवन औ पानी
तब नहिं दश अवतार मम भयऊ गंगा जती सती नहिं रहऊ ॥
तबकी कहैं कबीर सहिदानी । जबकी काहु मर्म न जानी ॥
कबीर बढाई हम कह दीन्हा । आप मै दास करता मोहि कीन्हा
कहैं कृष्ण सुन आद कहानी । जाके आद वेद नहिं जानी ॥
निर्गुण आद पुरुष अविनाशी । कबीर कहाये प्रगट भये कासी ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१०७
दोहा-निर्गुण मूल सकलके, निर्गुण मता अगाध ।
कहैं कृष्ण सुन व्यास मुनी, कबीर भजे सो साध ॥
कबीर वचन ।
कहैं कबीर सुन कृष्ण सुजाना । तुम सब देवन मैं प्रधाना ॥
श्रीमुखसे तुम मोहि वखाना । तुम त्रियलोक धनी हम जाना ॥
सेवक कहैं स्वामी पत देई । स्वामी सेवे सेवक सोई ॥
दोहा-कबीर नाम हरि गावहीं, गुरुके ध्यान अधार ।
गुरु गोविंदके लेखहीं, साधराम रूप अधार ॥
कृष्णवचन ।
कृष्ण कपिल कबीर पगु गहा । सुन स्वामी तुम कैसे कहा ॥
तुम्हरे समान न देखौं काहू । हम सब कर तुम हाथ निवाहू
और सबे सरिता चौमासा । जेठ झुराय सिंधको आसा ॥
सिंधुको जल संसार बिडाई । मेघमाला छपनकोट बरसाई ॥
सरिता सिंधुको सेवक आहीं । स्वामी सरवर कबहुँ नहीं चाहीं
निरगुण वास फूल भये सरगुण । सरगुण देह बोलता निरगुण ॥
कहैं कृष्ण मोहि देहू पाना । तब डर काल मोहि नहीं जाना
जो २ जीव शिष्य सब तोरा । तुव बल जाहि लोक बल जोरा
हमहू कहैं इच्छा यह आई । तुव प्रताप लोक हम जाई ॥
कबीर वचन ।
कहैं कबीर तुम हमरे आहू । राज करहु तुव रक्षक साहू ॥
जो तुम होहु प्रगट मम चेल। निराकारको मिटि है सेला ॥
गुप्त हृदय मैं हमकहैं राखहु । प्रगट निरंजन महिमा भाषहु ॥
१०८
कबीरकृष्णगीता ।
जासो गीत हृदय बस जीवा । अंतकाल प्राप्त सोह पीवा ॥
सबसो गीत खसस सो सेजू । सत पग हिय विषै कित तेजू ॥
मुखसो गीत सबहिं प्रभु जानी । गुप्त प्रगट पिथा व्रत चित ठानी
भली छांड नहिं करिय सदाई । भली भला सुरत संतन गाई ॥
कोई मदवारे सो मदफल पावे । विजधर भे मद माद समावे ॥
दोहा-कहैं कबीर श्रीकृष्णसों, जानि छांडहु सत व्योहार ।
सत्ताहिं ते गत पाईये, झूठहिं नरकमें डार ॥
कोटिन काल निरंजन आवै । जो माहि जपै ताहि नहिं पावे ॥
युग २ नाम हमारो गावे । यम विण तोड प्रवाना पावे ॥
हर स्वांस सतनाम समावे । गगन गगन सतनाम सुहावे ॥
अघर सघर दृग दश प्रकाशा । भीतर बाहर राम निवासा ॥
यंत्र मंत्र औषध तप योगा । तीर्थ व्रत देव चंदन भोगा ॥
सबे आस तज भज गुरु साधू । कहैं कबीर सब भेर उपाधू ॥
डरे न यमसो बल कै मोरा । सुमरे नाम कबीर बंदीछोरा ॥
पूजे बोलता सब जिव राधा । मन वच कर्म सतनाम विश्रामा ॥
राधे ध्यान तो जियत तेहि भेटै । विश्वासी जियहिं अंत दुख भेटै ॥
सुन आतुर हरि साज मंगावा । नरिअर पान मिष्टान्न सुहावा ॥
सबे साज आनेउ बहुताई । घृत पकवान सुवास बसाई ॥
सकल देवतन भोजन कीन्हा । तेहि पाछे हरि वीरा लीन्हा ॥
यम विण तोर काल मुख थूँका । दीन्हो पान भेट सब चूका ॥
सतगुण देवता कोट इकादस । सनन पान लीन्हा हरि पारस ॥
रजगुण तमगुण पेल पराने । विष्णु व्यासको निंदा ठाने ॥
कबीरका अपने पन्थकी बात कृष्णसे कहना
कवीरकृष्णगीता ।
१०९
कृष्णवचन ।
यहा आनंद कृष्ण मन भयऊ । मन हम राज निकंटक पायऊ ॥
जेहि रक्षक भये सत्यकबीरा । बार न बंके तासु शरीरा ॥
कृष्णके दुरवासा ऋषि गुरु हैं । सत्य कबीर सबके सटुर हैं ॥
सत् मिले सतकबीरके हाटा । सत् विना जिव वारा बाटा ॥
तीन लोक महीं डंका परिया । सबते श्रेष्ठ कबीर ठहरिया ॥
जीव उबारन ताके सब दासा । विष्णु व्यास सतनाम प्रकाशा ॥
कहैं कृष्ण सेवक जत वाणी । हम तुम सेवक सेवक जानी ॥
जगमहैं कौतुक पंथ चलाई । निज पंथ इस ताहि बलताई ॥
दूत हमार तासु रह दासा । जो कोई होय कबीर गुरु आसा ॥
सबीर नाम प्रति स्वास जप प्राणी । कबीर नाम भज लहे सुखधामी
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुन कृष्ण सुजाना । तुम हमरे महीं सकल समाना ॥
जब तुम चाहो दरस मम किया । नाम सरूप प्रेम चित दिया ॥
जाके नाम सरूप चितलावे । गुप्त प्रगट ते दर्शन पावे ॥
अब तुम इच्छा हमरे हांथा । हमरे दास कहैं देहौ साथा ॥
धर्मदास मम अंस औतारा । थापेउं ताहि जम्बूद्वीप कडिहारा ॥
दोहा—धर्मदासके अगुवा, जाग्रित च्छ्रामनदास ।
हम जग होय जगाइब, करव पंथ प्रकाश ॥
जा गुरु नांद पुत्र धर्मदासा । व्यालिस वंश धर्म दास प्रकाशा ॥
पुन एक सुरत गोपाललेव नाऊ । तुम्हरो प्रीत गोपाल सुन भाऊ ॥
तुम्हरी सुरत रहे मम अंगा । हम तुम व्यापक सकलो संगा ॥
११०
कबीरकृष्णगीता ।
राम कबीर कबीर सोइ रामा । अविनाशी सेज संत विश्रामा॥
सब पर दाय़ा करहु गोविन्द । एक भजुरी भक्त अनंद ॥
निरंजनके सुख टेके रहे । सत्यनामके रहनी गहे ॥
सती पतिव्रता सतपंथ सुरा । आपा भेटि मिल सर्व हजुरा ॥
राजयोग छवि गृह विश्रामा । तनसे उद्यम मनसे नामा ॥
जो जिव जपे कबीर धर्मदासा । औ जो सुरतवंश व्यालिस आसा
हमरे पंथके टीका इत जागू । धर्मदासके मिल मोहे लागू ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण जंबूद्वीप धर्मदासा । जागूदास वंश सुरत पास ॥
औरो कौनो दीप तुम सेवा । सो कंडहारा नाम कह देवा ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर कृष्ण सहिदानी । करनाटक वंकेज बखानी ॥
दरभंगा दक्षिण चत्रभुज राऊ । सीलदेश सहने जी सुभाऊ ॥
हम सब ठौर भक्त तुव गाऊं । तुम हमरी महिमा परचारऊं ॥
अपनी महिमा आपहि लाजा । कोइ कहे हम मिथ्या काजा ॥
आपहि आप बडा किये होय पापा । गुरुकी महिमा कहि मिल आपा
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण अब पायऊं जानी । एको जीव तुव गहिं अवखानी ॥
सांचे भाजिहैं सत्यकबीरा । भज कबीर ठेरे भौ पीरा ॥
दोहा-कहे कृष्ण सुन व्यास सुख, औ गऊरस सबकोय ।
सत्यकबीर मुक्तके दाता, सब जीवहिं गत देय ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१११
काल निरंजन बड सुख देई । जार झरकाय पापा खोय लेई ॥
धन्य विष्णु जो कछु सुखदाता । तुम सब कृष्ण कबीर विधाता ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सबहिं जिव तारों । कालहिं बांध रसातल डारों ॥
अषपत सो राजा कंहैं भावे । जो परजाहिं सुख देय न सतावे ॥
कहा करें। निज शब्द हितार्की । नातो छिनयहैं भेट देवे पापी ॥
अब याहि भला बुरा नहिं लेखा । कपुत सपूत भात पितु एका ॥
सब सुत पर पितु करे जो छोहा । निकट अबुध भक्ष देय तोहा ॥
ऐसे निरंजन हमरे वंसा । महाकाल जग घालक संसा ॥
ताते विष्णु तुम मम सिख लीन्हो । प्रगट निरंजन मम चित दीन्हो ॥
हम डर यम थरहर अब कांपे । जो मोहि मजे ताहि लख आपे ॥
कबीरके भक्त विहून जो प्राणी । ताहि काल झरकावे आनी ॥
विष्णुकी भाक्ति संपूर्ण करई । एक रोम तब यमके डरई ॥
और देवनको भक्षे काला । एकहि सत्तकबीर रसवाला ॥
सब मिल भक्ति कबीरके मानी । सत्यनाम महिमा विध आनी ॥
कहैं कृष्णसे सत्यकबीरा । मम वचन सुनहु यदुवीरा ॥
अब हम पंथ जगत विस्तारा । धर्मदास कहैं थापव कंडहारा ॥
जीवलोक कंहैं जाय हमारा । ताहि न पकड़े काल लबारा ॥
भजव जीव सकल कल लोका । सब जीवन कर मेव सोका ॥
ठीका पुन्य सती औ गंगा । सबके सत्त करे निरंजन भंगा ॥
यसि है सकल जीव धर काला । तब हम प्रगटे रूप दयाला ॥
११२
कबीरकृष्णगीता ।
गुरु सद्गुरु साधु दुखभंजन । कबीरनाम ठर डरे निरंजन ॥
कालहिं येट सकल जग तारों । आवागवन दुख सुख निवारों ॥
कृष्णव्याससुखदेवगुरुडवचन ।
कृष्ण व्यास सुखदेव खगराया । चरणटेक सब विनती लाया ॥
हम सेवकपर दाय़ा करिये । पल २ छोह हमारो धरिये ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर हम निकट प्रेमत । नाम भजे भौ तरे क्षमाते ॥
प्रेम बैन कहि गावे वीरा । संग सबनके स्वास शरीरा ॥
बहुर ध्यान विनति प्रकाशा । वरणहु कृष्ण चाल हरिदासा ॥
संसारी जिव कैसे तरि हैं । सत्यनाम विन भौजल परि हैं ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण जिवको निरतारा । विन कबीरको जीवहि तारा ॥
पूर्ण पुण्य जब जीवहि होय पूरा । तबसों नाम कबीर भज सूरा ॥
कबीर नाम प्रताप बड भागी । मुक्त होय सो संत सोहागी ॥
कबीर शरण तब प्राप्त होई । परम पुनीत कबीर भज सोई ॥
कोट जन्म पुण्य प्रकासा । पूरण पुण्य होय सद्गुरु दासा ॥
सत्यकबीरको सद्गुरु जाना । सद्गुरु अंश मोहिं पहिंचाना ॥
हमहू सत्यनामकी आसा । वांचहि काल निरंजन फांसा ॥
जिम जगकी इसलता नहि सेवा । खातिर चटै न पाइक देवा ॥
तैसे शरण कबीर प्रतापा । होय निश्चित छूटे तिहु तापा ॥
जो लागि बनि जीवको निरतारा । विन कबीरको जीवहि तारा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
११३
पूर्ण पुण्य होय जिव पूरा । तब जिन नाम कबीर भज सुरा ॥
कबीर नाम प्राप्त बड भागी । संत सोहागिल सो अतुरागी ॥
कबीर शरण तब प्राप्त होई । परम पुनीत कबीर भज सोई ॥
कोटिन जन्म पुण्य प्रकाश । पूरण पुण्य होय सदुरु दासा ॥
सत्यकबीरको सदुरु जाना । सदुरु अंश मोहिं पहिचाना ॥
हमहुं सत्यनामकी आसा । बांचहि काल निरंजन फांसा ॥
जौलग बनिज न हीरालाला । तौलग संग्रह धोधी रिसाला ॥
जौलग पारस हांथ न आवे । रती हेम दुलैभ कहैं पावे ॥
जौलग अमी वृक्ष सुध नहीं । तौलग ताड खजुरहिं खांही ॥
अस कबीर बिना सब धर्मा । कबीर बिना जिव मिटे न भर्मा ॥
गरुडवचन ।
कहैं गरुड सुन त्रिभुवन राई । तुम अंतर करेहु गोसाई ॥
तुम कबीर मिल जीव बचाहू । समय परे कस जीव नचाहू ॥
तुम यम दिशि होय बोलत अहहु । दुर्वल जीव लस दष्ट न खोलहु ॥
श्रीकृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन गरुड सज्जानी । बातकी जड तुमहु नहीं जानी ॥
हम हैं निराकारके बेटा । पितु आज्ञा जाय नहीं मेटा ॥
कहा निरंजन मोहि बुझाई । चित्र गोपित्र औ जहां रिसाई ॥
कहिन केहैं निरगुण दासा । दूतन जायहु तिनके पास ॥
तिनके दास छुयेहु जिन कोई । निरगुण भक्त कबीर निज सोई ॥
कबीर प्रताप राज हम करहीं । कबीरके श्रोह किये जरि माहीं ॥
सत्यकबीर सो अलगहि जीऊ । तेहि तर लावहु कर हद धीऊ ॥
अवतारोंमें सर्वश्रेष्ठ अवतारका नाम
११४
कबीरकृष्णगीता ।
निरंजनवचन ।
दोहा—कहैं निरंजन कृष्ण सुन, निर्गुण भक्तहिं छांड ।
निर्गुण भक्त विहून जो, ताहि नरक ले डार ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन पत्तग आसी । यह विध जीव भयें चौरासी ॥
उत्तम भक्त कबीरको आहीं । महिमा जीव विरल लखताहीं ॥
आद अनाद निरगुण कबीरा । स्वासरूप रम सकल शरीरा ॥
जब कबीर तब और न कोई । कबीरके किये सृष्टि सब होई ॥
सवते उत्तम सत्य कबीरा । तिनके निकट विष्णु धर धीरा ॥
विष्णु निकट ब्रह्मा ठहरायै । ब्रह्मा निकट रुद्र चल आयै ॥
देवी निरंजन ऊपर नीचे । सत्यकबीर न्यारा सब बीचे ॥
सत्यकबीर प्रसंग सतोगुण । सद्गुण विष्णु देव सो निरगुण ॥
निरंजन अंश ब्रह्मा मन रूपी । अर्धंगी अंस रुद्र अंधकृपी ॥
एक भाव जग बरते कैसे । ताते पृथक् २ भौ ऐसे ॥
सद्गुण बसो रजतमके माहीं । ताते विष्णु सत्य विरथाहीं ॥
दोहा—सत्यकबीरके शिष्य सुत, ताते सद्गुण विष्णु ॥
दस चौबिस विष्णु तन तामो, सृष्टि राम विष्णु ।
रजगुण तमगुण देह बनाई । सतोगुण अंस जिव आन समाई ।
रजमता अर्धंगी भवानी । तमगुण पिता निरंजन जानी ॥
सत्यकबीरके अंस सतोगुण जीऊ कहैं कृष्ण जिव सब जग पीऊ ॥
दोहा—जीव जगमें पीउ है, जीव कबीरके आहिं ।
कबीरसो आप सत्पुरुष हैं, अमरलोक रहाहिं ॥
कबीरकृष्णगीता ।
११५
जव जिव डेह निरंजन राई । तवै जीव रोवे चिल्लाई ॥
जाकर जीव ताहि दुख न्यापे । कबोर कहाय प्रगट प्रभु आपे ॥
जीव जरत उबारैउ कबीरा । करे भक्त जब धरे शरीरा ॥
जीवहिं धोखे परे खुलाई । सार असार चीन्ह नहिं पाई ॥
देह धरे विसरे सब ज्ञाना । देहसे न्यारा भये सब जाना ॥
जगको वेद शास्त्र अरुझावे । कबीरके भक्त नहिं विप्र हटावे ॥
कुसहा ब्राह्मण अगुवा काला । कर्मवश्य जिवपरे बिहाला ॥
दे विश्वास जो पुण्य करावे । मृतक आस जो पूर्व फल पावे ॥
जियत कर्मफल नेक न दृष्टा । पूर्वल आस मरे सो मिष्टा ॥
सौदा सोई जो दीखे दृष्टा । फल औ फूल दृष्टि सुख चिष्टा ॥
दोहा--उपजन विनसनको मता, ब्राह्मण काजी भाष ।
स्थिर घर जो पहुँचे जो, सत्यकबीर व्रत राख ॥
षोडश रवि शशि भाल छवि, अग्र अमी रस चाख
अस सुख सत्य पुर मई, शब्द भेद मत भाष ॥
रजगुण तमगुण जोत सतंगी । सतगुण विष्णु कबीर प्रसंगी ॥
सत्य कबीरके पारस सेती । सतोषुण राम कृष्ण विष्णु केती ।
फिर २ जीव भ्रमें चौरासी । निरगुणको निंदक त्रिगुण उपासी
धन्य एक जासो भय तीनी । माय बाप गुरुते सब चीन्ही ॥
दोहा--माय बाप गुरु सद्गुरु, साध संत द्विज एक ।
पवन एक बाजा बहुत, कहैं कृष्ण सत देक ।
११६
कबीरकृष्णगीता ।
विनय विष्णु जो परम सुहाई । आज्ञा करहिं कबीर गोसाईं ॥
आज्ञा सब जिव दियोसुत्काई । ऐसी करब हमसों किम भाई ॥
तात मातते गुरु अधिकार्ई । सद्गुरु शरण बिना जिव खाई ॥
बिना कबीर न वांचे भाई । कबीर साहेब सद्गुरु साईं ॥
कोटि माहिं कोई जीवमुनीता । संत साध संग पाठ कृत गीता ॥
गीतामाहिं बहु संघ कबीरा । मिले ताहि जो मथे अर्थ क्षीरा ॥
मथे क्षीर ले याखन तावे । तब घृत वास सुवास बसावे ॥
तिम कबीर सतघृत कुल वासा । और पंथ विन आसतिक आसा ॥
दोहा-वेद मथके गीता कीन्हा, गीता मथके सार ।
सार सो सार कबीर बखानहि, भाषे कृष्ण सुरार ॥
जिमि सब तनमें चक्षु नाका । तस तनमें स्वासा जिव ताका ॥
सबे कबीर कहि २ गोहरावा । तत्क्षण सत्यकबीर चलि आवा ॥
सबे कबीर घ्राणमें होतहि पहुँचै । परे सवनमें दृष्टि कबीरके ॥
थरहर उठे सबे भहराई । चरण परवार सिंघासन बैठाई ॥
चरणोदक ले विनती कीन्हा । कहँ गयउ साहेब दरश विन दीन्हा ॥
कबीरवचन ।
कहँ कबीर गये जिवके खोजा । दयावंत मिले सुनीई इन सोझा ॥
दया सत् जहाँ वास हमारा । राम कबीर एक चटसारा ॥
का हिंदूका तुरक सब जाती । तारों नाम भक्त मिल पाती ॥
जात पात है त्रिगुण पसारा । विष्णु अवरण चौथे निसतारा ॥
चौथे कबीर तिनते श्रेष्ठा । सद्गुरु भक्त बिना जिव नष्टा ॥
व्यास और कृष्ण सम्वाद
कबीरकृष्णगीता ।
११७
दोहा- विष्णु देह धर खेले, अलख निरंजन कृष्ण ।
सब लहुरे हैं कबीरते, राम कृष्ण शिव विष्णु ॥
गुप्त प्रगट निरगुण वो सरगुण ।
व्यास उक्ति मति श्रेष्ठ सो निरगुण ॥
कहैं कबीर व्यासकी बाणी । गीता मता सार सब ठानी ॥
करहु प्रकाश भागवत गीता । सुने ज्ञान जिव मिटे मन चीता ॥
हम कबीर जिव दाया ददावे । जहां सत् ताके हिं अावे ॥
सत्यकबीर हमारो नाऊं । दया सत्यके निकट रहाऊं ॥
तुम पूछेहु कव गवनेहु स्वामी । मक्का पहुँचेउ सुन नभगाभी ॥
रायअमोलिक कहैंशिष्यकीन्हा । नाम पानदे सुक कर लीन्हा ॥
जम्बुदीप धर्मदास कंडहारा । ताके अगुवा जीवन कंडहारा ॥
जागु प्रगटके जगत जगैहैं । कबीर धर्मदासके भक्त दैहैं ॥
जागू कहायब सत्यकबीरा । लहुरा कबीर जागु गंभीरा ॥
कहैं कबीर हम जगमें नासक । दासातन धर दास हो दासक ॥
सो सुनिये त्रिभुवनपति राई । कबीरधर्मदासजीवजीवतरजाई ॥
व्यासबचन ।
कहैं कृष्णसों व्यास सुजाना । जब भगवान कहो कछु ज्ञाना ॥
अगले जीवन शब्द सहाई । परख शब्द पंथ ज्ञान चलाई ॥
ऊंच नीच तन सब जिव तरई । बहुरिन योनी संकट पाई ॥
बेर अनंत पूछहु मोहिं भाई । सुकदाता कबीर ठहराई ॥
कबीरके भक्त बडे तप पावे । त्रिगुण कर्म भर्म अरुझावे ॥
साधुके लक्षण - रमता और बैठाका भाव
११८
कबीरकृष्णगीता ।
जहँ कबीर समर्थ गुरु आपे । सुखपे पान नाक किम थापे ॥
पूछहु सत्यकबीरसे जाई । कबीर कहै सोइ बीज ठहराई ॥
कहै व्यास तुम करता स्वाधी । कबीर समर्थ करता सुखखानी ॥
कृष्णवचन ।
कहै कृष्ण व्यास निज दासा । गुरुके एक रोम प्रति आसा ॥
करता हरता दाता भुगता । गूह बैरागी योगी जुगता ॥
कौनहु पंथ गुरु सम नहीं कोई । सबपर श्रेष्ठ कबीर गुरु सोई ॥
सुन सतनाम कबीर गोसाई । गूही विरक्त गत देहैं चिन्हाई ॥
गरुडव्यासवचन ।
गरुड व्यास हरि चरण लपटाने । कबीर चरण गहि विनती ठाने ॥
कबीरसे पूछहिं व्यास निरुवारा । रमता बैठे भाव विचारा ॥
स्थिर रमता भेद बताऊं । ग्रेही औ बैराग सुनाऊं ॥
तुम कहैं प्रिय रमताकी बैठे । बैरागी प्रिय औ गूह गूढा ॥
धर्मदास तुम्हरे कंडहारा । नाम बोहित तुव नाम अधारा ॥
और सबके तुम हो सुखदाई । सुक्त पंथ मोहि कहो समुझाई ॥
कबीरवचन ।
कहै कबीर गरुड सुख व्यासा । कृष्ण सभेत सुनहु सब दासा ॥
कहै कबीर सुनो सुनि व्यासा । भो मोहि प्रीत भजे मोहि दासा ॥
ग्रेही भक्त सो उत्तम आहि । बैरागी उत्तम गूह माही ॥
ग्रेही भक्त आपन कुल तारे । बैरागी औरन निस्तारे ॥
ग्रेही भक्तसो ना कर भाऊ । बैरागी पारस निरभाऊं ॥
साकट आमिष अहारी प्रेता । खोवे हीरा जन्म अचेता ॥
धन्य भाग जो राधेव नामा । नाम भक्त प्रीत सुखधामा ॥
कवीरकृष्णगीता ।
११९
बिन सतनाम तरे नहिं कोई । क्रीतम नाम ते काज न होई ॥
सत्यनाम सदुरु लख पावे । यम फंद काट सुकतावे ॥
अगरलोक ले राखें हंसा । छूटे जन्म मरणकी संसा ॥
सदुरुकी आसा चित राखे । सोई करे शिष्य जो गुरु भाषे ॥
केते शिष्य गुरुको तज भागे । तीर्थ व्रतकी आसा लागे ॥
तीर्थ व्रत कोइ तारे नाही । सबे सुकत गुरुसेवा भाहीं ॥
एक लाभ दिसंतर होई । साध दरश गुरु लाभ है सोई ॥
औ तन मन दृढ रहे गुरुसेवा । ते फल सब घर बैठे लेवा ॥
अथवा जो मन होय उदासा । देखिय संतनकेर विलासा ॥
तो गुरु सेवा महँ कोइ राखी। करहु दिसंतर दानेहं साखी ॥
गुरुकहैं अकेला तजे न भाई । कल्पे गुरु तेहि दोष बहु भाई ॥
गुरु आज्ञा जो करे दिसंतर । नाम सुरत गुरु ध्यान निरंतर ॥
दोहा—सात पांच संमत भरी, गुरु सेवा चित राख ।
तब गुरु आज्ञा लेयके, करे दिसंतर जाय ॥
करे दिसंतर देखे देश । देखे राजा रंक नरेशा ॥
ज्ञानीके दशा विचारे लेखे । काम क्रोधका सुरचा पेखे ॥
मनकी दशा चीन्हु विसरावे । मन मायाका रंग न भावे ॥
जहँलग कुपंथ धोखा भ्रमा । तहँलग आय मन माया कर्मा ॥
नागिन नारका चौंट बचावे । नाम ध्यानसो दशा जुगावे ॥
आपा त्यागे रहे दीनता । शब्द प्रकाशे नाम लीनता ॥
१२०
कबीरकृष्णगीता ।
सत्यनामकी यहिमा भाषे । तृष्णा लोभ न मनयें राखे ॥
रहे असोच सो आपन कामा । पल २ निशि दिन आठहु याभा ॥
पर पोषण भिक्षा नहीं लाजा । निच पिच करहि बल सभाजा ॥
बेगमी रहे भरोसे साहेब । सोई संत सब माहि सुसाहेब ॥
आवे सहज विचार सो पावे । परिहरि आश्रिष अंकुर फल पावे
सत्यपुरुष कहैं भोग लगाने । महाप्रसाद संत मिल पावे ॥
कोइ जीव वचन नहीं पावे । सबर्म राम कबीर कहावे ॥
कोई फकीर होय पाले देहा । मकरा तजि गोहसो नेहा ॥
जो साहेब भेजे सो पावे । रुखा सूखा नहीं विलगावे ॥
क्या पाटम्बर क्या टाटम्बर । क्या चिंतामणि क्या पीतांबर ॥
जो साहेब भेजे सो सही । कलपत भिक्षा लेना नहीं ॥
विन मांगे कोइ कोट चढावे । सो लीजे कछु दोष न आवे ॥
सहज अजाची भिक्षा आवे । आप चुगे औ सबहि चुगावे ॥
गुरु पूजा संतन सेवकाई । सबसो भीत सुमत सुचिताई ॥
वह माया कहु कौने काजा । जो नहीं परमारथ पथ साजा ॥
एक जो माया जोगवहि भाई । विलसहि आप औरन डहकाई ।
यह माया है यमकी फांसी । नाम विना भरणें चौरासी ॥
दोहा-माया है दो भांतिकी, जो कोइ जाने खाय ।
एक मिलोवे नामको, एक नरक ले जाय ॥
आसुरी माया आपाहि पोवे, गाढे परे न हट ।
सातकी सो परमारथ, संतन घाले मूठ ॥
माया जुगवे कौन गुण, अंत न आवे काज ।
कबीरकृष्णगीता ।
१२१
सत्यनाम जुगावहु, माया परमारथ साज ।
संखपछन ले माया, भक्तिहीन जो होय ॥
ता तेहि यम ले आसे, नरक परे पुन रोय ॥
रंक जीव जो सोई, सोई माहि धनवंता ।
धनवंता तो हरि भजे, तो हरष मिले भगवंता ॥
रंक धनीको नहिं चाहे, चाहे प्रेम प्रतीत ।
गुरुभक्ता मोहि भावे, कहैं कबीर अतीत ॥
गुरुभक्ता मम भक्ता, साथ भक्त मम दास ।
हरिभक्ता सोऊ हम, कहैं कबीर हरि व्यास ॥
आत्मपूजा जिव दया, परआत्मको सेव ।
कहैं कबीर सत्यनाम भज, सहज परम पद लेव ॥
पांचहुको लखे परंपंचा । नाम भजे जिव पावे संचा ॥
पांचों परंपंची तन सुगता । पांच तीन साथे अवधूता ॥
सुर नर अज हरि हर सुनि जेतै । तन घर पांच तीन घर तेतै ॥
विरला गुरु गम परखि भये न्यारा । सो वांचे जिन शब्द विचारा ॥
जो राजामहैं थाको माना । शब्द महंत महातम जाना ॥
शब्द विना जग बाउर अंधा । शब्द विना जग परे यमफंदा ॥
सहुर शब्द परख पंथ चाला । जो जीते जग बरवस काला ॥
मन काल निरंजन अंसा । अज्ञानीको करे विधंसा ॥
ज्ञान प्रवेश होय मन सांचा । नाम बचे जिव यमसों वांचा ॥
भजे नाम जो मन चितलाई । पांच पचीस तीन थक जाई ॥
गगट होय कला सतनामा । शब्द परख चले तेहि शुभ कामा ॥
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