श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पन्द्रहवाँ अध्याय
३०४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
पन्द्रहवाँ अध्याय
काशीनरेशद्वारा अपनी सभामें विनायकके अद्भुत कर्मोंका वर्णन, ज्वालामुख, व्याघ्रमुख तथा
दारुण नामक राक्षसोंका काशीपुरीको दग्ध करना, बालक विनायकके द्वारा तीनों असुरोंका
वध तथा काशीपुरीको पूर्ववत् बना देना और राजाद्वारा विनायककी स्तुति
ब्रह्माजी बोले—दूसरे दिन काशीनरेश बालक
विनायकको साथ लेकर अपने मित्रों एवं मन्त्रियोंसे
समन्वित होकर लोगोंके साथ सभामण्डपमें आये ॥ १ ॥
उन्होंने गुणोंसे सुसम्पन्न महान् आशयवाले उन
सर्वश्रेष्ठ विनायकको आगे करके उन सभीसे बालकके
बहुतसे गुणोंका वर्णन किया ॥ २ ॥
राजा बोले—'मैं अपने पुत्रके विवाहको सम्पन्न
करानेके लिये महर्षि कश्यपके पास उन्हें बुलानेके लिये
गया, तब उन्होंने अपने पुत्र इन विनायकको मेरे साथ
भेज दिया। इनके साथ जब मैंने यहाँके लिये प्रस्थान
किया ही था कि अनेक अद्भुत प्रकारके राक्षस तथा
एक-पर-एक अनेक अरिष्ट उपस्थित हुए, जिन्हें न
पहले कभी देखा गया था और न जिनके विषयमें सुना
ही गया था ॥ ३-४॥
सर्वप्रथम इन्होंने राक्षसोंके अधिपति धूम्राक्षका वध
किया। तदनन्तर उसके जघन तथा मनु नामक दो पुत्रों
[-को नरान्तकके पास फेंक दिया] और फिर [उनके
सहयोगी] पाँच सौ राक्षसोंका संहार किया ॥ ५ ॥
नगरमें पहुँचनेपर इन्होंने बालकका रूप धारण
करके वहाँ आये हुए विघण्ट तथा दन्तुर नामक
राक्षसोंका वध किया। जो महाबली विधूल नामक
राक्षस आँधी-तूफानके रूपमें होकर इन्हें आकाशमें
उड़ाना चाहता था, उसे तथा पतंग नामक राक्षसका भी
इन्होंने वहाँ नगरमें संहार किया। वहाँ राजद्वारपर स्थित
तथा पाषाणरूपधारी कूट नामक राक्षसको भी इन्होंने
मार डाला। काम तथा क्रोध नामक राक्षसोंका भी
इन्होंने वध किया, ये दोनों गधेका रूप धारण करके
आये थे। इन्होंने हाथीका रूप धारणकर आये हुए
कुण्ड नामक निशाचरको मारा ॥ ६-८ ॥
अन्य भी जो अरिष्ट आयेंगे, उन्हें ये विनायक नष्ट
कर डालेंगे। इस समय आप लोग ब्राह्मणोंके साथ मन्त्रणा
करके मेरे पुत्रके विवाहके विषयमें निश्चय करें। देवताओंकी
स्थापना, हरिद्रालेपन, मण्डपकी स्थापना तथा विवाहके
लिये सामग्री एकत्र करनेके सम्बन्धमें ज्योतिषशास्त्रके
विद्वानोंसे परामर्श करना चाहिये' ॥ ९-१० ॥
ब्रह्माजी बोले—उनके इस प्रकारके वचनोंको
सुनकर मन्त्रियोंने राजासे कहा—'हे नृपश्रेष्ठ! हमको
यह निश्चित रूपसे प्रतीत होता है कि जबतक यह
बालक नगरमें रहेगा, तबतक विवाह नहीं हो सकेगा;
क्योंकि इसके यहाँ रहनेपर दिन-प्रतिदिन महान् उत्पात
होते रहेंगे ॥ ११-१२ ॥
हे राजन्! आप पन्द्रह दिनके बाद अथवा एक
मास बीत जानेपर पुत्रका विवाह करें।' राजाके द्वारा
'ठीक है' ऐसा कहे जानेपर वे सभी अपने-अपने घरको
चले गये ॥ १३ ॥
तदनन्तर काशिराज तथा विनायक दोनों ही भोजन
करनेके पश्चात् सुखपूर्वक सो गये। हे मुनि व्यासजी!
जब मध्यरात्रिका समय आया और सभी लोग निद्रामें सो
गये, उसी समय ज्वालामुख, व्याघ्रमुख तथा दारुण
नामक तीन असुर वहाँ आये, वे पूर्वमें मारे गये दैत्यों
और राक्षसोंके वधका बदला लेना चाहते थे ॥ १४-१५ ॥
इन तीनोंमें जो ज्वालामुख नामक पहला राक्षस था,
वह सम्पूर्ण काशीनगरीको दग्ध कर देना चाहता था।
दारुण नामक राक्षस वायुरूप होकर उसकी सहायताके
लिये तैयार था। तीसरा जो व्याघ्रास्य नामक असुर था,
वह वहाँसे भागनेवालोंको खा जानेवाला था। इस
प्रकारका पहलेसे ही निश्चय करके आये हुए वे राक्षस
बड़े ही उच्च स्वरसे चीत्कार करने लगे ॥ १६-१७ ॥
उस आवाजसे तीनों लोक काँप उठे, लोग अत्यन्त
संशयग्रस्त हो गये। वे कहने लगे—'क्या यह प्रलयकाल
क्री०ख०-अ०१५ ] * काशीनरेशद्वारा अपनी सभामें विनायकके अद्भुत कर्मोंका वर्णन * ३०५
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[बायाँ स्तम्भ]
उपस्थित हो गया है या फिर क्या शत्रुसेना आक्रमणके
लिये आ पहुँची है?'॥ १८॥
ज्वालामुख नामक महान् कायावाले उस दैत्यने
अपने नीचेके ओष्ठको पृथ्वीपर टिका लिया और ऊपरके
ओष्ठको आकाशतक फैला लिया, बीचमें नदीकी भाँति
जीभको स्थापित करके वह अपने मुखसे अग्निकी
ज्वालाओंको प्रकट करने लगा और आकाशसहित उस
काशीनगरीको दग्ध करने लगा। जिस प्रकार हनुमान्जीने
अपनी पूँछकी अग्निसे समस्त लंकानगरीको जला डाला
था, वैसे ही इस ज्वालामुख नामक दुष्ट राक्षसने अपने
मुखकी ज्वालाओंसे काशीनगरीको दग्ध कर डाला,
नगरीके वृक्ष, लताएँ, उद्यान तथा भवनोंके समूह जलकर
राख हो गये ॥ १९-२१॥
उस समय महान् कोलाहल व्याप्त हो गया। लोग
मुख तथा हाथोंको पीटते हुए क्रन्दन करने लगे। अपने-
अपने सभी कार्योंको छोड़कर लोग दसों दिशाओंमें भाग
चले। नगरसे जो भी बाहर जा रहा था, उसे व्याघ्रास्य
नामक राक्षस खाता जा रहा था। वही उसका भोजन
था, बालकोंको तो वह अचार-चटनीकी तरह चाट जा
रहा था ॥ २२-२३ ॥
कुछ लोग ढीले वस्त्रोंमें तो कुछ बिना वस्त्र पहने
[दायाँ स्तम्भ]
ही भाग रहे थे, कुछ स्त्रियाँ केवल उत्तरीय ओढ़े अथवा
कुछ अपने पतिके वस्त्रोंको पहनकर ही भाग चलीं॥ २४॥
वे सभी व्याघ्रास्य राक्षसके उस फैले हुए विशाल
मुखको कोई गुफा समझकर जान बचानेकी इच्छासे
उसमें प्रविष्ट हो जा रहे थे। वे दूसरे लोगोंको भी वहाँ
आनेके लिये बुला रहे थे। तब उस असुरने उन सबको
खा डाला ॥ २५॥
असमयमें ही प्रलयकी जैसी स्थिति हो जानेपर
काशिराज अपने राज्य, धन, स्त्री, पुत्र आदि तथा अन्य
सभी वस्तुओंका परित्यागकर केवल उस बालक विनायकको
अपने कन्धेपर बैठाकर विभिन्न स्थानोंमें, घर-घरमें
भ्रमण करने लगे। वे अत्यन्त दुःखसे संतप्त हो उठे थे
तथा उस अग्निके तेजसे व्याकुल थे ॥ २६-२७॥
मेरे द्वारा मूर्खताके कारण यह क्यों लाया गया, यह
तो सभी अरिष्टोंका जनक है, सब कुछ हरण करनेवाला
तथा अपशकुनोंका कारण है ॥ २८ ॥
यह जीवित नहीं बचेगा तो मैं महर्षि कश्यप तथा
अदितिको क्या जवाब दूँगा ? इसने पहले तो सभी बड़े-
बड़े अरिष्टोंको दूर कर दिया था, किंतु इस समय यह
चुप क्यों बैठा है, मैं इसका कारण नहीं जान पा रहा
हूँ। इस प्रकारसे शोक करते हुए काशिराज बालक
विनायकको लेकर ऊँचे दुर्गमें चढ़ गये ॥ २९-३०॥
किंतु वहाँ भी वायुकी सहायतासे वह अग्नि आ
पहुँची। तब राजाके सेवकोंने आग बुझानेके लिये घड़ों
एवं चर्मसे बने (मशक) पात्रोंसे जल छिड़कना शुरू
किया ॥ ३१॥
राजाकी रानियाँ लोकलाज छोड़कर अपने बच्चोंको
साथ लेकर दुर्गसे बाहर निकल पड़ीं। तदनन्तर विह्वल
होकर काशिराज भी दुर्गसे नीचे उतर आये ॥ ३२ ॥
अश्व, खच्चर तथा उनमें सवार वीर सैनिक, रथ,
हाथी तथा उनमें सवार वीर सैनिक, पैदल सैनिक और
नगरके सभी लोग अपना-अपना गोधन लेकर नगरसे
बाहर चले गये। उस महाविनाशके समय सभी लोगोंके
पलायन कर जानेपर काशिराज विनायकको तथा विनायक
काशिराजको खोजने लगे ॥ ३३-३४॥
३०६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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नगरके सभी लोगोंके उस व्याघ्रमुख असुरके | सभी लोगोंको जीवित कर दिया और दग्ध
मुखके अन्दर चले जानेपर भी उस असुरने अपना मुख | काशीनगरीको पूर्ववत् ज्यों-का-त्यों बना दिया। तदनन्तर
तबतक बन्द नहीं किया, जबतक कि अनन्त गुणोंसे | उन विनायकने शीघ्र ही सिंहके समान गर्जना की।
सम्पन्न महान् आत्मावाले वे विनायकदेव उसके मुखके | तब सभी लोगोंने तथा काशिराजने प्रसन्नतापूर्वक उनकी
अन्दर प्रविष्ट नहीं हो गये। सूर्यके उदय हो जानेपर देव | स्तुति की॥ ४४-४५॥
विनायकने व्याघ्रके समान मुखवाले उस असुरको, | हे गुणोंके अधीश्वर! आप अनन्तशक्तिसम्पन्न हैं,
ज्वालामुख असुरद्वारा दग्ध किये काशीनगरको तथा | आपको नमस्कार है, अरिष्टोंका विनाश करनेवाले!
व्याघ्रमुख नामक असुरके उस मुखको देखा, जो | आपको नमस्कार है, सृष्टिकर्ताको नमस्कार है। विश्वकी
काशीपुरीके समस्त लोगोंसे भरा हुआ था॥ ३५-३६॥ | रक्षा करनेवालेको नमस्कार है। विघ्नोंका समूल उच्छेद
अग्निकी ज्वालाको अपने समीप आते देख बालक | करनेवालेको नमस्कार है। ज्ञान प्रदान करनेवालेको
विनायक बलपूर्वक उस व्याघ्र नामक असुरके मुखमें | नमस्कार है, अज्ञानको दूर करनेवाले आपको नमस्कार
प्रविष्ट हो गये। अपने मुखमें विनायकके प्रविष्ट होते ही | है। हे जगत्के स्वामी! हे लीलावतार! हे देव! आपने
उस असुरने सभीको मार डालनेकी इच्छासे विशाल | अपनी लीलाके द्वारा असमयमें उत्पन्न प्रलयाग्निसे तथा
गुफाके समान अपने मुखको बन्द कर लिया॥ ३७१/२॥ | दैत्योंसे हमारी रक्षा की है॥ ४६-४७॥
बालक विनायकने उसके मुखको फाड़ डालनेके | इस प्रकारकी महाबलशाली अग्निका पान करनेकी
लिये तत्क्षण ही अपने आकारको बहुत बड़ा बना लिया | सामर्थ्य और किसमें है? पृथ्वीके समान मुखवाले उस
और उस असुरकी देहको फाड़ डाला। उस व्याघ्रास्य | व्याघ्रमुख नामवाले महान् राक्षसको आपके अतिरिक्त
असुरकी देहने पृथ्वी तथा आकाशको ढक लिया। उस | और कौन मार सकता है? मरे हुओंको आपके अतिरिक्त
असुरकी देहके फटनेसे चट-चटकी वैसी ही आवाज | जीवन प्रदान करनेका साहस और दूसरा कौन कर सकता
हुई, जैसे बाँसके फटनेसे होती है॥ ३८-३९॥ | है, हे देव! आप ही माता हैं, आप ही पिता हैं और आप
वह असुर दो टुकड़ोंमें बँट गया और शीघ्र ही | ही रक्षा करनेवाले हैं॥ ४८-४९॥
वह प्राणोंसे रहित हो गया। विनायकने उसकी देहके | मेरा महान् भाग्य है और यहाँके लोगोंका भी
एक टुकड़ेको आकाशमें फेंक दिया, हवाके द्वारा उड़ाया | महान् भाग्य है, जो कि आपकी सन्निधि हमें प्राप्त हुई
जाता हुआ वह टुकड़ा दूर देशमें जा गिरा। उस | है। ऐसा कहकर वे काशिराज अश्वपर तथा वे विनायक
आधे खण्डके नीचे गिरनेसे [वहाँका] घनघोर वन | सिंहके यानपर आरूढ़ होकर चल पड़े॥ ५०॥
चूर-चूर हो गया॥ ४०-४१॥ | प्रसन्नतापूर्वक अपने भवनमें पहुँचकर राजाने तथा
शरीरका दूसरा जो खण्ड वहीं रह गया, वह | विनायकने सन्ध्यावन्दन आदि नित्य कर्म सम्पन्न किया।
बालकोंके लिये आनन्ददायी क्रीडागृह बन गया। तब | सहस्रोंकी संख्यामें अन्य वे सभी वीर भी अपने-अपने
उस खण्डमें स्थित लोग जग उठे और वे दूसरोंको भी | वाहनोंमें आरूढ़ होकर अपने-अपने घर गये। सभी
जगाने लगे। तदनन्तर बालक विनायकने सम्पूर्ण अग्निको | पुरवासी अत्यन्त प्रसन्न हो गये। उस समय बाजे बजने
पी डाला और ज्वालासुरके साथ ही महाकाय विदारण | लगे और बन्दीजन राजाकी स्तुति करने लगे॥ ५१-५२॥
(दारुण) असुरको, अपने पैरके आघातसे चूर्ण-चूर्ण कर | तदनन्तर काशिराजने ब्राह्मणोंको विविध प्रकारके
डाला॥ ४२-४३॥ | दान दिये। स्वस्तिवाचन कराकर शीघ्र ही देवताओंका तथा
इस प्रकार उन दुष्ट दैत्योंका वध करनेके अनन्तर | उन विनायकका पूजन किया। लोगोंने विनायकको अनेक
बालक विनायकने अपनी योगमायाके बलसे मरे हुए | प्रकारकी भेंट प्रदान की। विनायकने भी उन उपहारोंको
क्री०ख०-अ०१६ ] * काशिराजका दण्डकारण्यमें महर्षि भृशुण्डीके आश्रममें गमन * ३०७
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[ऊपरी भाग - बायाँ स्तम्भ]
स्वेच्छानुसार ब्राह्मणोंमें वितरित कर दिया ॥ ५३-५४ ॥
राजाने अमात्योंको तथा वीरोंको वस्त्र प्रदान किये।
राजाने उन सभीको विदा करके विनायकके साथ भोजन
करनेके अनन्तर सुखपूर्वक शयन किया ॥ ५५ ॥
[ऊपरी भाग - दायाँ स्तम्भ]
जो व्यक्ति विनायकद्वारा करायी गयी काशीपुरीकी
मुक्तिके वर्णनको श्रद्धाभक्तिसे श्रवण करता है, वह
अपनी सभी अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और
कहीं भी अरिष्टोंसे बाधित नहीं होता ॥ ५६ ॥
[अध्याय समाप्ति पुष्पिका]
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'ज्वालास्य आदि राक्षसोंका वध करके नगरीको मुक्त
करानेका वर्णन' नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥
सोलहवाँ अध्याय
काशिराजका दण्डकारण्यमें महर्षि भृशुण्डीके आश्रममें गमन, काशिराज तथा
गजाननके अनन्य भक्त भृशुण्डीका वार्तालाप
[मुख्य भाग - बायाँ स्तम्भ]
ब्रह्माजी बोले—हे व्यासजी ! अब मैं आश्चर्यजनक
कथाको सुनाता हूँ, आप श्रवण करें। इसका भक्तिपूर्वक
श्रवण करनेसे मनुष्य अत्यन्त सुख प्राप्त करता है ॥ १ ॥
वे काशिराज प्रातःकाल उठकर नित्य कर्मोंका सम्पादन
करनेके अनन्तर महलसे बाहर निकले। उन्होंने बालक
विनायकके भवनमें जाकर उन्हें प्रणाम किया और उनकी
पूजा की, तदनन्तर उन्होंने बालक विनायकसे भोजन करनेहेतु
प्रार्थना की। विनायकने विविध प्रकारके पकवानोंसे तृप्ति
प्राप्त होनेके अनन्तर होनेवाली डकार ली ॥ २-३ ॥
राजाने वहाँपर बचे हुए लड्डुओं, पायस आदि
पदार्थों, पुओं, बड़ों, सूपमिश्रित पवित्र भात, दधि, दुग्ध,
मधु, घृत तथा क्वथिका अर्थात् कढ़ीसे युक्त पात्रोंको
देखा। साथ ही उन विनायकके शरीरपर विद्यमान मणि
तथा मुक्तासे बनी माला, अत्यन्त मूल्यवान् तथा नवीन
विविध अलंकारोंको देखा। तब काशिराजने उन विनायकको
पुनः नमस्कार करके उनसे पूछा— ॥ ४-६ ॥
हे जगदीश्वर ! किस भक्तके द्वारा आपकी यह पूजा
की गयी है ? आपकी कृपासे मैं उन्हें जानना चाहता हूँ
और उनका दर्शन करना चाहता हूँ ॥ ७ ॥
इस प्रकारसे कहनेवाले अपने भक्त काशिराजसे
विनायकदेवने अपने भक्तद्वारा की गयी पूजाके विषयमें
इस प्रकार बताया ॥ ८ ॥
विनायकदेव बोले—हे राजन् ! इस समय आपने
जो मुझसे पूछा है, उसे मैं बताता हूँ, आप सुनें। हे
नृपात्मज ! उसे मैं आपको संक्षेपमें ही बताता हूँ ॥ ९ ॥
[मुख्य भाग - दायाँ स्तम्भ]
दण्डकारण्य देशके नामल नामक नगरमें भृशुण्डी
नामक मेरा एक भक्त निवास करता है; वह भूत, भविष्य
तथा वर्तमान तीनों कालोंको जानता है। वह शीघ्र ही
तीनों लोकोंकी सृष्टि करने, उसकी रक्षा करने तथा
उसके संहार करनेकी सामर्थ्य रखता है। ब्रह्मा, विष्णु
तथा शिव उसके दर्शनकी नित्य अभिलाषा रखते
हैं ॥ १०-११ ॥
सभी समयोंमें मेरा ध्यान-स्मरण करते रहनेसे
उनके समस्त पाप विनष्ट हो गये हैं और उन्होंने अपनी
इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली है। प्राचीन समयकी बात
है, जब वे तपस्यामें लीन थे, उसी समय उनकी दोनों
भौंहोंके मध्य एक शुण्ड प्रकट हो गया था, तभीसे वे
तीनों लोकोंमें भृशुण्डी इस नामसे प्रसिद्ध हो गये। मुझपर
अनन्य भक्तिभाव रखनेके कारण मृत्युलोकमें होनेपर भी
उन्होंने मेरा सादृश्य प्राप्त कर लिया है ॥ १२-१३ ॥
आज शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथि है, उन्होंने
प्रसन्नतापूर्वक मेरा पूजन किया है। हे राजन् ! मेरे शरीरसे
टपकते हुए घृत, दुग्ध, दधि तथा मधुको आप देख लें।
हे नृपश्रेष्ठ ! मेरे द्वारा भोजन करनेसे जो अन्न बच गया
है, उसे तो आपने देख ही लिया है ॥ १४१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर काशिराजने कहा—'हे
देवाधिदेव ! हे जगत्के स्वामी ! मैं उनका दर्शन करना
चाहता हूँ, वे कैसे यहाँ आयेंगे ?' ॥ १५१/२ ॥
विनायक बोले—हे राजन् ! आप आज ही उनके
आश्रम-स्थलको जाइये। उनकी पूजा करके तथा उन्हें
Here is the complete transcription of the text from the image:
३०८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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प्रणाम करके अपने पुत्रके विवाहमें आनेके लिये प्रयत्नपूर्वक
प्रार्थनाकर उन्हें यहाँ बुला ले आइये तथा मेरा इस
प्रकारका वचन भी उनसे कहियेगा ॥ १६-१७ ॥
हे मुने ! क्योंकि विनायकदेव मेरे घरमें आये हैं, वे
आपके द्वारा भक्तिपूर्वक की गयी पूजासे अत्यन्त सन्तुष्ट
हैं। हे मुने ! वे भी आपका दर्शन करना चाहते हैं, मुझे
उन्होंने ही आपके पास भेजा है। मुझे भी आपके
दर्शनकी तथा पूजाकी महान् अभिलाषा है। अतः आप
मेरे घर पधारकर मेरे घर तथा मेरी सम्पदाको सफल
बनायें। हे राजन् ! इस प्रकार आपके द्वारा कहे जानेपर
तथा मेरा नाम लेनेसे वे मेरे भक्त भृशुण्डी उसी क्षण आ
जायेंगे ॥ १८-२० १/२॥
ब्रह्माजी बोले-विनायकके द्वारा इस प्रकारसे
कहे गये उन काशिराजने उनकी पूजा करके प्रस्थान
किया। तूणीर और धनुष धारण करके शीघ्रगामी
अश्वपर आरूढ़ होकर नदियों, पर्वतों तथा वनोंको पार
करके धीरे-धीरे राजा चल पड़े ॥ २१-२२ ॥
भृशुण्डीजीके आश्रममें पहुँचकर राजा घोड़ेसे उतर
पड़े। भृशुण्डीमुनिका दर्शनकर राजाने उन्हें दण्डवत्
प्रणाम किया ॥ २३ ॥
मुनिने राजाका स्वागत-सत्कार किया और काशिराजने
भी प्रसन्नतापूर्वक उन ऋषिका पूजन किया। मुनिकी
आज्ञा पाकर राजा बैठ गये। तदनन्तर उन्होंने वहाँके
महान् वनमें, सरोवरों, वृक्षों, लताओं, पुष्पों तथा फलोंसे
समन्वित उस सुन्दर आश्रमको देखा। भगवान् शिवका
निवासस्थान कैलास, विष्णुलोक अथवा सत्यलोक भी
उस आश्रमके समान न था ॥ २४-२५ ॥
उस आश्रममें वेदमन्त्रोंका उच्चारण हो रहा था।
शास्त्रोंका पाठ हो रहा था तथा गीत एवं नृत्य आदिसे
वह आश्रम सुशोभित हो रहा था। वहाँ अग्निहोत्र हो
रहा था, विविध प्रकारके जलाशयों, पक्षियों तथा जलचर
प्राणियोंसे वह समन्वित था ॥ २६ ॥
उस आश्रमका दर्शनकर प्रसन्नचित्त राजाको परम
आनन्दका अनुभव हुआ। उन्होंने मुनि भृशुण्डीको
दण्डवत् प्रणाम किया और उन्हें अपने पुत्रके विवाहका
समाचार, भृशुण्डीद्वारा की गयी विनायककी पूजा और
विनायकद्वारा प्राप्त आज्ञाका सम्पूर्ण वृत्तान्त भी बतलाया।
तदनन्तर राजाने यह भी प्रार्थना की कि आप मेरे भवनमें
चलनेका कष्ट करें ॥ २७-२८ ॥
ऋषि बोले-हे महाराज ! यह बतायें कि आप
कौन हैं और आपके वे विनायक कौन हैं? ॥ २८ १/२ ॥
राजा बोले-मुझे आप सूर्यवंशमें उत्पन्न जानें
और मैं काशिराज इस नामसे विख्यात हूँ। आपके वे
अभीष्टदेव विनायक महर्षि कश्यपके पुत्र हैं। उन्हें
भोजन करानेके लिये जब मैं उनके पास निमन्त्रण देने
गया, तब मैंने उनके द्वारा आपके महान् यशका वर्णन
सुना। आपने चतुर्थी तिथिको विविध उपहार-सामग्रियोंसे
जो उन विनायकका पूजन किया था, उन्होंने मेरे नगरमें
भोजन आदिसे तृप्त हो जानेपर उन अवशिष्ट सामग्रियोंको
मुझे दिखलाया था ॥ २९-३१॥
उन्होंने मुझसे कहा है कि हे राजन् ! मेरा नाममात्र
लेनेसे वे मुनि स्वयं यहाँ आ जायेंगे। अतः हे महामुने ! मैं
आपको अपने नगरमें ले जानेके लिये आपसे प्रार्थना
करनेहेतु यहाँ आया हूँ। आपका दर्शन भी इन चक्षुओंसे करना
अत्यन्त दुर्लभ है, इसलिये मैं यहाँ आया हूँ ॥ ३२१/२॥
ब्रह्माजी बोले-काशिराजके द्वारा इस प्रकार कहे
जानेपर वे मुनि भृशुण्डी अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गये
और बोले-'क्या यह सत्य है अथवा असत्य है? जो
विनायकदेव वेदोंके जाननेवालोंके लिये भी अगोचर हैं,
वेदान्तशास्त्रके मर्मज्ञोंके मनसे भी परे हैं, वे ही परमात्मा
गणेश आपके भवनमें कैसे स्थित हैं? इस विषयमें मेरे
मनमें सन्देह हो रहा है। तैंतीस करोड़ देवता जिसके
दर्शनके लिये आये हों, वह मैं आपके वचनको मानकर
अपने आश्रमको छोड़कर कैसे आपके साथ जा सकता
हूँ? हे राजन् ! यदि वे देव विनायक आपके भवनमें स्थित
हैं तो आप उनके यथार्थ स्वरूपका वर्णन कीजिये, तभी
मैं आपके घर चल सकता हूँ' ॥ ३३-३६ १/२॥
राजा बोले-उनके अनन्त स्वरूप हैं, जिनकी
गणना करनेमें ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं और न सहस्र
मुखवाले शेष ही समर्थ हैं। इसलिये हे द्विज ! तब उनके