श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
इक्यानबेवाँ अध्याय
४८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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इक्यानबेवाँ अध्याय
बालक गुणेशद्वारा कूट तथा मत्स्य आदि रूप धारण
करनेवाले दैत्योंके वधकी लीला-कथा
ब्रह्माजी बोले—गुणेशके दूसरे वर्षकी अवस्थाकी | देखनेमात्रसे मरे हुए उस कूट नामक दैत्यको भूमिपर
बात है, बालक गुणेश असंख्य बालकोंके साथ वाटिकामें | गिरा दिया॥ ९-१०॥
क्रीड़ा कर रहे थे, वह वाटिका विविध प्रकारके वृक्षों | उस दैत्यके गिरनेसे पाँच योजन विस्तारवाली वह
तथा लताओंसे व्याप्त थी॥ १॥ | वाटिका चूर-चूर हो गयी। यह दृश्य वहाँ उपस्थित सभी
वे गुणेश खजूर तथा कटहलके फलोंको स्वयं खा | नगरवासियोंने देखा। कुछ लोग भयभीत होकर भाग गये
भी रहे थे और बलशाली होनेसे बहुत-से फलोंको | थे। बालक गुणेशने सभी जलचर जीवोंको जिला दिया
गिराकर उन बालकोंको भी दे रहे थे॥ २॥ | और उस सरोवरको विषसे रहित कर दिया। सभी
उसी समय कूट नामक एक महान् दैत्य उन | नगरनिवासी अपने-अपने बालकोंको लेकर अपने-अपने
बालकोंके पानी पीनेका समय जानकर वहाँ आया। वह | घर चले आये॥ ११-१२॥
दैत्य अत्यन्त दुष्ट, कपटी एवं मायावी था। उस दुर्बुद्धि | सभीने पार्वतीके पुत्र उन गुणेशकी प्रशंसा की,
दैत्यने उन सब बालकोंको मारनेकी इच्छासे सरोवरके | किंतु जो नास्तिक और दुष्ट थे, वे उनकी निन्दा
जलमें ऐसी विषराशिको हिलाकर मिला दिया, कि | करने लगे। कुछ दूसरे लोग कहने लगे कि इसके
जिसके स्पर्श करनेमात्रसे प्राणी क्षणभरमें मर जाते थे | साथ होनेसे सभी अरिष्ट विनष्ट हो जाते हैं। तदनन्तर
और जिन विषोंसे उठी हुई वायुसे आकाशचारी पक्षी | तीसरे वर्षकी बात है, एक दिन प्रातःकालके समय
भूमिपर गिर पड़ते थे। कुछ समय बीतनेके बाद कूट | पार्वतीपुत्र गुणेश सबकी नजरोंसे बचते हुए बाहर
नामक वह दैत्य उन बालकोंकी मृत्युको देखनेकी | चले गये, मुनियोंके बालक भी उनके पीछे-पीछे
इच्छासे वहाँ जाकर प्रतीक्षा करने लगा॥ ३-५॥ | निकल गये॥ १३-१४॥
तदनन्तर वे बालक, जिन्हें पता नहीं था कि जलमें | एक रात-दिनतक अलग-अलग रहनेके बाद जब
विष मिला हुआ है, जल पीनेके लिये वहाँ गये, वहाँ | वे पुनः परस्पर मिले तो एक-दूसरेको गले लगा लिया,
उनमेंसे किसीने चुल्लूसे तथा किसीने अंजलिमें जल | उन्होंने गुणेशसे कहा—हे देव! हम सभी सर्वदा आपको
लेकर पिया॥ ६॥ | रात्रिमें स्वप्नमें देखा करते हैं। हे प्रभो! आपको देखे
जलमें मरी हुई मछलियोंको लेकर वे बालक जब | बिना हमें एक रात्रिका समय एक युगके समान प्रतीत
बाहर आये तो विषपान करनेसे स्वयं भी मर गये। यह | होता है। इस समय आपका दर्शन करके हम सभी बहुत
देखकर रक्षकने गाँवमें जाकर बालकोंकी मृत्युका समाचार | प्रसन्न हो गये हैं॥ १५-१६॥
उच्च स्वरमें सुनाया॥ ७॥ | हे महासत्त्वसम्पन्न गुणेश! आज हम सब लोग दो
तब महान् हाहाकार करते हुए सभी नागरिक वहाँ | दल बनाकर सुखपूर्वक क्रीड़ा करते हैं। तदनन्तर आधे
आये। वे अपने हाथोंसे अपनी छाती पीट रहे थे और | बालक एक ओर हो गये और शेष आधे बालक दूसरी
कुछ पत्थरोंसे अपना सिर पीट रहे थे॥ ८॥ | ओर। तब कीचड़से गोले बनाकर उनसे वे बालक पृथ्वी
उस समय पुरुषों तथा स्त्रियोंका महान् कोलाहल | और आकाशको निनादित करते हुए एक-दूसरेपर प्रहार
व्याप्त हो गया। उन सभीके क्रन्दनको सुनकर पार्वतीपुत्रने | करने लगे। वे आह्लादपूर्वक इस प्रकार युद्ध करते हुए
भी अपने दृष्टिपातके द्वारा पुरमें रहनेवाले उन सभी | परस्पर एक-दूसरेको खींचने लगे॥ १७-१८॥
बालकोंको जीवित कर दिया और अपनी क्रूर दृष्टिद्वारा | इस प्रकार आनन्दपूर्वक क्रीड़ा करते हुए दूर एक
क्री०ख०-अ०१९ ] * बालक गुणेशद्वारा दैत्योंके वधकी लीला-कथा * ४८५
[बायाँ स्तम्भ]
मुनिके आश्रममें पहुँच गये। वहाँपर विद्यमान एक योजन
विस्तारवाले एक सरोवरमें जाकर वे क्रीड़ा करने लगे।
पूर्वकी भाँति पुनः दो भागोंमें बँटकर अपने-अपने
हाथकी अंजलिमें जल लेकर एक-दूसरेपर उछालने
लगे। वे कभी जलमें गोते लगाकर, पुनः किसी दूसरेके
कन्धेपर चढ़कर उसे बलपूर्वक जलमें डुबो दे रहे
थे॥ १९-२०॥
उसी समयकी बात है, एक दैत्य मत्स्यका रूप
धारणकर उन सभीके साथ वैसी ही क्रीड़ा करने लगा।
वे बालक अपने हाथोंके आघातसे उस सरोवरके जलको
छपछपाने लगे और वह भी अपनी पूँछके द्वारा उनपर
जल छिड़कने लगा। उस सरोवरके कलुषित जलकी
लहरें बार-बार तटपर टकरा रही थीं। सरोवरके किनारेपर
स्थित पार्वतीपुत्र गुणेशको देखकर वह मत्स्य उनके
समीपमें गया॥ २१-२२॥
उसने अपना मुख फैलाया और गुणेशके दोनों
पैरोंको अपने मुखमें भर लिया और फिर 'दौड़ो-दौड़ो'
इस प्रकारसे चिल्लाते हुए उन गुणेशको वह खींचते हुए
सरोवरके गहरे जलमें ले गया॥ २३ ॥
वह मत्स्यरूपी महादैत्य उन गुणेशको लेकर बहुत
समयतक जलमें निमग्न रहा। गिरिजापुत्र गुणेशको
जलमें डूबा हुआ देखकर मुनियोंके बालक रोने लगे ॥ २४॥
वे अपने हथेलीके पृष्ठभागको अपने होठोंसे
लगाकर हाहाकार करने लगे। कुछ बालकोंने उस
सरोवरमें डुबकी भी लगायी, किंतु वहाँ उन्होंने उस
बालकको नहीं देखा। पार्वतीके द्वारा पीटे जानेके भयसे
भयभीत कुछ बालक भाग खड़े हुए। उनमेंसे कुछ
बालकोंने पार्वतीके पास जाकर उस बालकके सरोवरमें
डूबनेका समाचार उन्हें बताया कि खेल रहे हम सभी
बालकोंको छोड़कर बालक गुणेशको लेकर एक मत्स्य
जलमें चला गया॥ २५-२६१/२॥
ब्रह्माजी बोले- बालकोंका वचन सुनकर गौरी
मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ीं। एक मुहूर्तके अनन्तर
जब चेतनाको प्राप्त हुईं तो रोती हुई बाहर निकल पड़ीं।
उस समय उनके नेत्रोंसे आँसू निकल रहे थे, मस्तकपरसे
[दायाँ स्तम्भ]
आँचल गिर गया था॥ २७-२८॥
वे लड़खड़ाती तथा लम्बी श्वास लेती और भूमिपर
गिरती हुई जा रही थीं। कुछ सखियाँ अपना काम-धाम
छोड़कर शीघ्र ही उनके पीछे दौड़ पड़ीं॥ २९॥
देवी पार्वती अपनी सखियोंके साथ शीघ्र ही वहाँ
पहुँच गयीं। मुनिगण भी वह समाचार पाकर सरोवरकी
ओर चल पड़े ॥ ३०॥
उनमेंसे कुछने अगाध जलमें गोता लगाया, किंतु
वे उमापुत्र गुणेशको खोज नहीं पाये। कुछ मुनियोंने
गुणेशकी मातासे कहा- हमारे बालकोंने जलमें डुबकी
लगायी, किंतु उन्होंने मत्स्यके उदरमें प्रविष्ट आपके
बालकको नहीं देखा। उनके वचनोंको सुनकर गौरीने
पुनः रोना आरम्भ कर दिया॥ ३१-३२॥
उमा बोलीं- उस सर्वांगसुन्दर बालकको देखे
बिना मेरे प्राण निकल जायँगे। मैंने बड़े ही कष्टसे उस
अत्यन्त पराक्रमी ईश्वरको प्राप्त किया है। वह समस्त
चराचर जगत्का गुरु है, मायासे परे है, परम मायावी है,
अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंका नायक है और विश्वकी सृष्टि
करनेवाला है॥ ३३-३४॥
ऐसा कहते हुए वे अपने हाथसे बार-बार अपना
माथा और वक्षःस्थल पीटने लगीं। उस प्रकारसे विलाप
करती हुई उन पार्वतीको देखकर मुनिगण भी रोने लगे।
तदनन्तर उन दयालु देव गुणेशने उनके कारुणिक वचन
सुनकर स्वयं भी मत्स्यका रूप धारण कर लिया।
तदनन्तर मत्स्यरूपधारी गुणेश और मत्स्यरूपधारी दैत्यमें
परस्पर युद्ध होने लगा ॥ ३५-३६ ॥
उन दोनोंके परस्पर आघातसे जलचर जीव मरकर
तटपर गिर रहे थे। वे दोनों दाँतोंसे एक-दूसरेको काट
रहे थे और पूँछके आघातसे एक-दूसरेपर प्रहार कर रहे
थे॥ ३७॥
वे अपने-अपने पेटसे पेटपर तथा पीठसे पीठपर
मार रहे थे। इस प्रकार बहुत देरतक बलपूर्वक भयंकर
युद्ध करके मत्स्यरूप धारण किये गुणेशने बड़े जोरसे
अपने मुखसे उसके मुखपर आघात किया। उस प्रबल
आघातसे उसका मुख फूट गया, आँखें फूट गयीं और
४८६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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उसका घमण्ड चूर-चूर हो गया ॥ ३८-३९ ॥
तदनन्तर वह मत्स्यरूपधारी दैत्य जलके अन्दर
चला गया, मत्स्यरूपधारी उमापुत्र वे गुणेश भी उसके
पीछे-पीछे जलके अन्दर चले गये। वह दैत्य जहाँ-जहाँ
जाता, वे गुणेश भी वहीं-वहीं उसके पीछे जाते ॥ ४० ॥
उस दैत्यको कहीं छिपा हुआ जानकर मत्स्यरूपी
गुणेशने अपनी पूँछसे उसपर प्रहार किया और वे उसकी
पूँछको अपने मुखसे पकड़कर वहाँसे बाहर निकल पड़े।
तदनन्तर गुणेशने उसे अपने भारसे दबाकर चूर-चूर कर
दिया। अपने मुखसे रक्त बहाता हुआ और महान्
चीत्कार करता हुआ वह दैत्य प्राणहीन हो गया, तब
गुणेशने उसे छोड़ दिया ॥ ४१-४२ ॥
उस दैत्यके द्वारा की गयी भयंकर ध्वनिने तीनों
लोकोंको प्रकम्पित कर डाला। तदनन्तर वे गुणेश
जलसे बाहर आ गये। उस समय देवी पार्वती ने उनका
आलिंगन किया। आनन्दमें निमग्न पार्वती ने बड़ी ही
प्रसन्नतापूर्वक उन्हें स्तनपान कराया और वे कहने
लगीं—मुझसे पूछे बिना तुम बालकोंके साथ कहाँ चले
गये थे ? ॥ ४३-४४ ॥
तुम्हारे ऊपर जो-जो भी विघ्न आता है, वह
सौभाग्यवश महर्षिद्वारा किये गये रक्षा-विधानके द्वारा
और जगदीश्वर भगवान् शम्भुकी कृपासे विनष्ट हो
जाता है। तुम इतने चंचल क्यों हो गये हो, मैं तुम्हारी
रक्षा कैसे करूँ ? हे प्रिय पुत्र ! तुम्हारे वियोगमें तो मेरे
प्राण ही निकल जायँगे ॥ ४५-४६ ॥
ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर मुनिगणोंने कहा—हे
प्रभो ! आपके बिना हम बड़े ही दुखी थे, अब इस समय
आपका दर्शन प्राप्तकर हमें पहले-जैसा ही आनन्द प्राप्त
हो रहा है। तदनन्तर सभी मुनियों, देवी पार्वतीकी
सखियों तथा अन्य स्त्रियोंने भी अनेक प्रकारके द्रव्योंसे
उनका पूजन किया, फिर गुणेशको प्रणाम करके वे सभी
उनकी प्रार्थना करने लगे ॥ ४७-४८ ॥
हे देवेश्वर ! हम सब आपके शरणागत हैं, आप
हमारा परित्याग न करें। इसके बाद देवी उमा बालक
गुणेशको लेकर अपने श्रेष्ठ स्थानपर चली गयीं ॥ ४९ ॥
इसके साथ ही सभी गण, सखियाँ तथा मुनिजन
हर्षसे निमग्न हो अपने स्थानोंको चल पड़े। उसी समय
मार्गमें एक शैल नामक महाबली दूसरा दैत्य आ पहुँचा।
वह दैत्य सभी शत्रुओंका विनाश करनेवाला, मगरमच्छके
समान कठोर शरीरवाला और वज्रको भी विनष्ट कर
देनेवाला था। उसकी शब्दध्वनिसे क्षणभरमें ही पर्वत
विदीर्ण हो जाते थे ॥ ५०-५१ ॥
आकाशको छूता हुआ वह रास्ता रोककर सहसा
खड़ा हो गया। उसका मस्तक दो योजन विस्तृत था और
वह नीचेकी ओर बारह योजन लम्बा था ॥ ५२ ॥
उस दैत्य शैलके विस्तृत शरीरमें सरोवर, वृक्ष तथा
लताएँ सुशोभित थीं और वहाँ सिंह, शार्दूल, हाथी, यक्ष
तथा राक्षस विचरण किया करते थे ॥ ५३ ॥
इस प्रकारके उस शैल दैत्यको देखकर वे सभी
मुनिगण, स्त्रियाँ आदि विह्वल हो गये और कहने लगे
कि यह कौन-सा विघ्न आ खड़ा हुआ। उस समय देवी
पार्वती भी उनके पास खड़ी हो गयीं और तब वे सब
मुनिगण भी वहीं खड़े हो गये ॥ ५४ ॥
तदनन्तर वे मुनिगण बोले—हम अपनी स्त्रियोंको
तथा सन्तानोंको कब देखेंगे? देव गुणेश अब कब यहाँ
पराक्रम दिखलायेंगे ? ॥ ५५ ॥
हम लोगोंका होम तथा तर्पण-श्राद्ध आदि करनेका
यह समय व्यर्थ ही चला जायगा। तब देवी गौरी उन
सबसे बोलीं—आपलोग दुःख न करें। इस समय मुझे
भी शंकरकी चिन्ता हो रही है ॥ ५६१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले—उन सभीके वचनोंको सुनकर
अत्यन्त बुद्धिमान् गुणेशने तत्क्षण विराट्रूप धारण
किया और अपने श्वासकी फूँकमात्रसे उस दैत्य शैलको
दूर पछाड़ दिया, वे मुनिगण भ्रमित हो जानेके कारण
गुणेशके [विराट्] स्वरूपको देख न सके ॥ ५७-५८ ॥
उस समय गुणेशके श्वासके संयोगसे वह दैत्य
शैल आकाशमण्डलमें चक्कर काटने लगा। यह सब
देखकर वे सभी मुनिगण आश्चर्यचकित हो गये और
गुणेशकी प्रशंसा करने लगे ॥ ५९ ॥
जिस प्रकार आँधी किसी पत्तेको उड़ा डालती है,
क्री०ख०-अ०९२] * चार वर्षकी अवस्थावाले बालक गुणेशके द्वारा दैत्य कर्दमासुरका वध * ४८७
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वैसे ही वह दैत्य आकाशमें उड़कर भूमिपर गिर पड़ा।
उस दैत्य शैलके हजारों टुकड़े हो गये, उसने गिरते समय
अनेकों वृक्षोंको चूर-चूर कर डाला ॥ ६० ॥
तदनन्तर वे मुनिगण कहने लगे- हे गुणेश्वर !
आपको साधुवाद है, साधुवाद है। आपने हमारा अरिष्ट
दूर कर दिया है, आपकी कृपासे अब हम अपने-अपने
आश्रममें सुखपूर्वक रह सकेंगे और अपने-अपने
नित्यकर्मोंको पूर्ववत् पुनः कर सकेंगे ॥ ६१ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार कहकर उन्हें प्रणाम
करके और उनसे अनुमति लेकर तथा उनका पूजन करके
वे सभी मुनिगण चले गये ॥ ६२ ॥
देवी पार्वतीने उन गुणेशको लेकर अपने भवनमें
प्रवेश किया, उनकी सखियाँ तथा मुनिपत्नियां भी उनकी
आज्ञा लेकर अपने घरोंको गयीं। जो मनुष्य इस आख्यानका
श्रवण करता है, वह सर्वत्र सुख, दीर्घ आयु, आरोग्य,
ऐश्वर्य तथा सर्वत्र विजय प्राप्त करता है ॥ ६३-६४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'कूटासुर, मत्स्यासुर तथा शैलासुरके
वधका वर्णन' नामक इक्यानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९१ ॥
बानबेवाँ अध्याय
चार वर्षकी अवस्थावाले बालक गुणेशके द्वारा दैत्य कर्दमासुरका वध,
गुणेशद्वारा माता पार्वतीको अपने मुखके भीतर समस्त विश्वका
दर्शन कराना, माताद्वारा गुणेशकी स्तुति
ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी!] तदनन्तर किसी
दिनकी बात है, जिस समय प्रातःकाल चार वर्षकी
अवस्थावाले बालक गुणेश सोये हुए थे और देवी पार्वती
शीघ्रतापूर्वक स्नान करके शिवलिंग-पूजा कर रही
थीं ॥ १ ॥
वे अपने बायें हाथमें भगवान् शिवका पार्थिव लिंग
रखकर उस श्रेष्ठ लिंगकी दाहिने हाथसे पूजा कर रही
थीं। उसी समय बालक गुणेश जग गये और रोने लगे
तथा स्तनपान करानेका हठ करने लगे ॥ २ ॥
तब माताने 'क्षणभर रुक जाओ-क्षणभर रुक
जाओ'- इस प्रकार कहते हुए उन्हें रोका तो रुष्ट होकर
बालक गुणेशने अपने हाथके प्रहारसे माताके हाथमें रखे
पार्थिव लिंगको नीचे गिरा दिया ॥ ३ ॥
माताने भी अत्यन्त रुष्ट होकर बालकको हाथसे
मारा। तब बालक गुणेशने भी क्रुद्ध होते हुए पुनः
समीपमें आकर माताकी अंगुलिमें जोरसे दाँतसे काट
लिया ॥ ४ ॥
'मुझे छोड़ो-मुझे छोड़ो'- यह कहते हुए वे
बोलीं- 'मेरे प्राण निकल जायँगे।' तब दाँत काटी हुई
अंगुलिको छोड़कर बालक गुणेश दूर भाग गये ॥ ५ ॥
माता पार्वतीकी अँगुलीसे बहुत-सा रक्त भूमिपर
उसी प्रकार गिर पड़ा, जैसे कि जोरसे चोट करनेपर
मदारके वृक्षसे दूध निकलकर गिरने लगता है ॥ ६ ॥
तब माता पार्वती एक छड़ी लेकर पुत्र गुणेशको
मारनेके लिये दौड़ीं। उन्होंने दौड़कर बालकको पकड़
लिया। उस समय उन्होंने बालकको भगवान् शिवके
स्वरूपवाला देखा ॥ ७ ॥
उनके पाँच मुख थे, दस भुजाएँ थीं, तीन नेत्र थे,
वे शेषनागसे सुशोभित थे। उन्होंने त्रिशूल, डमरु, भस्म
तथा रुण्डोंकी माला धारण की हुई थी ॥ ८ ॥
वे हस्तिचर्म तथा व्याघ्रचर्म पहने हुए थे और
उनके मस्तकपर चन्द्रमा सुशोभित था। यह देखकर
पार्वती लज्जित हो गयीं। उन्होंने छड़ीको फेंक दिया और
वे शिवा मुख नीचेकर खड़ी हो गयीं ॥ ९ ॥
उस समय वे न तो आगे बढ़ सकीं और न वापस
भवनको जानेमें ही समर्थ हो पा रही थीं। उनकी
चिन्ताको समझकर भगवान् गुणेश [शिवरूपको त्यागकर]
पुनः बालकके स्वरूपमें हो गये ॥ १० ॥
४८८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
वे मुनिबालकका रूप बनाकर मुनिबालकोंके साथ
खेल खेलने लगे। जब देवी पार्वती उन्हें देखने उनके
पीछे गयीं तो उनके बीच उन्होंने अपने पुत्रको नहीं
देखा। उन्होंने उन मुनिबालकोंसे पूछा- मेरा बालक
कहाँ चला गया ? मेरी अँगुलीमें दाँत काटकर वह चंचल
बालक भाग रहा है ॥ ११-१२ ॥
वे मुनिपुत्र उनसे बोले- आपका पुत्र यहाँसे चला
गया है। तब उन्हें खोजने पार्वती आगे-आगे बढ़ने
लगीं। उनके बालोंकी चोटी खुल गयी थी, खोजनेके
परिश्रमसे वे पसीनेसे लथपथ हो गयी थीं, इधर-उधर
दौड़ती हुई उन पार्वतीके वस्त्र तथा आँचल अपने
स्थानसे खिसक गये थे। माताका इस प्रकारका परिश्रम
देखकर वे गुणेश अपना पहलेवाला बालकरूप धारणकर
माताके पास आये, तब देवी गिरिजाने अपने हाथोंसे उन्हें
दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया ॥ १३-१५ ॥
अपने आँचलसे उन्हें बाँधकर वे प्रसन्नचित्त हो
अपने भवनको गयीं। वे उनसे गुस्सेसे बोलीं- अब तुम
ठीकसे मेरे हाथमें आ गये हो। हे अपस्मारसे आक्रान्त
व्यक्तिसे भी अधिक अस्थिर बालक ! मैं इस समय तुम्हें
बहुत अधिक मारूँगी, अथवा भगवान् शंकरसे तुम्हारी
शिकायत करूँगी, वे ही तुम्हें मारेंगे ॥ १६-१७ ॥
माताके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर बालक
गुणेश भूमिपर लोट गये और फिर अपनेको बन्धनसे मुक्त
देखकर पुनः तेजीसे भाग चले ॥ १८ ॥
तब पार्वती अत्यन्त विह्वल तथा दुःखित होकर
उनके पीछे फिर दौड़ पड़ीं। इसी समय कर्दमासुर नामक
एक दुष्ट दानव वहाँ आया। वह ब्राह्मणका रूप धारण
किये हुए था, उसने माला पहनी हुई थी, वह अपने
दाहिने हाथमें जलसे भरा हुआ कमण्डलु लिये हुए था।
उसका सारा शरीर भस्मसे पुता हुआ था ॥ १९-२० ॥
वह अरुणोदयकालीन सूर्यकी अरुणिम आभाके
समान वस्त्र पहने हुए था। वह अत्यन्त मायावी था। वह
बालकसे इस प्रकार का वचन कहने लगा- तुम किस
कारणसे भाग रहे हो, मैं शीघ्र ही तुम्हारे भयका निवारण
कर दूँगा, इसमें कोई संशय नहीं है। मैं तुम्हें ऐसे
स्थानपर ले जाऊँगा, जहाँ तुम्हारी माता तुम्हें किसी
प्रकार भी जान नहीं पायेंगी। वहाँ न तो कालका
कोई भय होगा और न अणुमात्र भी अन्य कोई भय
होगा ॥ २१-२२ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले- तब भयभीत बालक गुणेश उससे
बोले- आप वैसा ही करें, जिससे कि मेरे माता-पिता मुझे
न देख सकें। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। इस प्रकार
कहते हुए वे गुणेश बालस्वभाववश ज्यों ही उसके समीप
में गये, त्यों ही वह दुष्ट कर्दमासुर उस कोमल बालकको
उसी प्रकार निगल गया, जिस प्रकार कि पके हुए केलेके
टुकड़ेको निगल लिया जाता है ॥ २३-२५ ॥
इधर पार्वती भूमिपर बालक गुणेशके चरणकमलोंके
चिह्न देखती हुई आगे बढ़ती गयीं। उन्होंने सामने एक
ब्राह्मणको देखा तो उससे उन्होंने अपने बालकके
विषयमें पूछा- हे स्वामिन् ! क्या आपने मेरे पुत्रको
यहाँसे जाते हुए देखा है? हे विप्र ! ये देखिये, भूमिपर
पड़े हुए ये चरणकमलोंके चिह्न उसीके हैं ॥ २६-२७ ॥
हे द्विज ! यहाँसे दौड़ता हुआ वह न जाने कहाँ
गायब हो गया ? तब बालकके वियोगसे दुखी उन
पार्वतीसे वह ब्राह्मण कहने लगा ॥ २८ ॥
द्विज बोला- हे अनघे ! हे माता ! आपके बालकसे
हमारा क्या प्रयोजन है? हे माता ! हम तो सब प्रकारसे
उदासीन रहनेवाले और ईश्वरके ध्यानमें दत्तचित्त रहनेवाले
हैं। फिर भी आप पूछ रही हैं तो हम कहते हैं कि हे
शैलपुत्री ! हमने आपके पुत्रको कहीं भी नहीं देखा है,
हे देवि ! क्या आपने अपने बालकको हमारे अधीन किया
हुआ था ? ॥ २९-३० ॥
ब्रह्माजी बोले- उसके इस प्रकारसे कहनेपर उन
शैलपुत्रीको अत्यन्त दुःखित देखकर निर्विकार गुणेश्वर
उस कर्दमासुरके मुखसे बाहर प्रकट हो गये ॥ ३१ ॥
तब देवी पार्वती अपने पुत्रको पाकर उस विप्रदेहधारी
कर्दमासुरसे बोलीं- आप झूठ क्यों बोलते हैं? आपके
निकट ही यह पुत्र देखा गया है, निश्चित ही आपने ही
इसे गायब किया है। सन्तोंका यह स्वभाव होता है कि
वे प्राणोंपर संकट आ जानेपर भी कभी भी मिथ्या वचन
क्री०ख०-अ० ९२] * चार वर्षकी अवस्थावाले बालक गुणेशके द्वारा दैत्य कर्दमासुरका वध * ४८९
नहीं बोलते॥ ३२१/२॥
ब्रह्माजी बोले—पार्वतीके इन वचनोंको सुनकर
वह दैत्य विशाल शरीरवाला हो गया, उसका मस्तक
आकाशको छू रहा था। उसी समय वह दैत्य बालक
गुणेशको लेकर वहाँसे निकल गया। तब विलाप करती
हुई वे शिवा पुत्रके पीछे-पीछे चल दीं॥ ३३-३४॥
तब बार-बार शोक करती हुई माताके दुःखको
देखकर गुणेशने उस दैत्यसे भी बड़ा अपना शरीर बना
लिया। उन्होंने अपने चरणोंके प्रहारसे उसके शरीरको
सौ टुकड़ोंमें विदीर्ण कर डाला। गिरते हुए भी उस
दैत्यके विशाल शरीरने अनेकों वृक्षोंको चूर-चूर कर
दिया॥ ३५-३६॥
इस प्रकारसे उस दानवका वध करनेके अनन्तर
बालक गुणेश माताके आगे खड़े हो गये। उसी समय
मुनिगण, देवता तथा उन मुनियोंकी पत्नियाँ भी वहाँ आ
पहुँचीं। वे सब देवी पार्वतीसे बोले—इस बालकपर कितने
ही विघ्न आ रहे हैं, परंतु हे सुरेश्वरि! आपके पुण्यप्रतापके
कारण वे सभी विनष्ट हो जा रहे हैं॥ ३७-३८॥
तदनन्तर उन सभीके द्वारा पूजित उस बालक
गुणेशको अपनी गोदमें लेकर देवी पार्वती उन मुनिजनों
और मुनिपत्नियोंके साथ मनमें अत्यन्त हर्षित होते हुए
अपने भवनको गयीं। देवी शिवाने अपनी गोदसे उतारकर
बालक गुणेशको आँगनमें उसी प्रकार रखा, जिस प्रकार
कि प्राचीनकालमें देवताओंपर विजय प्राप्तकर गरुड़ने
[कुशोंके ऊपर] अमृतको रखा था॥ ३९-४०॥
[तदनन्तर सहसा किंचित्] मूर्च्छाको प्राप्तकर वे
बालक गुणेश धरतीपर बार-बार लोट लगाने लगे और
अपने मुखकमलको फैलाकर बार-बार जँभाई लेने लगे।
अभी-अभी इसे क्या हो गया है—ऐसा कहते हुए
पार्वती दौड़कर उनके समीप गयीं तो उन्होंने उन
विश्वरूपी गुणेशके मुखके भीतर सम्पूर्ण विश्वको
देखा॥ ४१-४२॥
उन्होंने वहाँ सात द्वीपोंवाली पृथ्वी, नगरों, ग्रामों,
वनों, खानों, पर्वतों, समुद्रों, ब्रह्मा, सूर्य, शेषनाग, विष्णु,
गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, मुनिजन, पक्षीसमूह, नदी, वापी,
तड़ाग, चौदह मनुओं, आठ वसुओं, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि,
तारासमूह, चेतन तथा अचेतन सभी प्राणियों, सात
पातालों तथा इक्कीस स्वर्गोंको भी देखा॥ ४३-४५॥
इस प्रकार तीनों लोकोंका मुखके अन्दर दर्शनकर
उस समय देवी पार्वतीको मूर्च्छा आ गयी। वे अपनी
दोनों आँखोंको बन्दकर दो मुहूर्ततक भ्रमित-सी होती
रहीं॥ ४६॥
उन्होंने मन-ही-मन भगवान् शिवका स्मरण किया,
इससे वे सचेत हो गयीं, तब उन्होंने पहलेकी भाँति ही
अपने सामने स्थित हुए बालक गुणेशको देखा। उन
गुणेशके कृपाप्रसादसे प्रसन्न मनवाली वे देवी पार्वती
गुणेशकी स्तुति करने लगीं॥ ४७१/२॥
पार्वती बोलीं—[हे प्रभो!] आप ही परमात्मा हैं
और आप ही चराचर जगत्के गुरु हैं। आप चिदात्मा,
आनन्दघन, शाश्वत, नित्य तथा अनित्य स्वरूपवाले हैं।
मैंने आपकी कुक्षिमें चौदहों भुवनोंको देखा है। इसके
साथ ही सभी देवताओं, यक्षों, राक्षसों, सभी नदियों,
वृक्षसमूहों—इस प्रकारसे सम्पूर्ण चराचर जगत्का दर्शन
किया है, जिसका वर्णन करना मेरे लिये सम्भव नहीं है।
यह देखकर मैं उस समय भ्रान्त होकर भूमिपर गिर पड़ी,
फिर जब मैंने भगवान् शिवका स्मरण किया, तभी मैं
सचेत हो पायी, तब मैंने एक सामान्य बालककी भाँति
ही बालकरूपमें आपको देखा॥ ४८-५१॥
ब्रह्माजी बोले—वे इस प्रकार स्तुति कर ही रही
थीं कि उसी समय उन्होंने अपनी माया प्रकट कर दी।
तब देवी पार्वतींने प्यारसे पुचकारते हुए उन्हें अपनी
गोदमें ले लिया और स्तनपान कराया॥ ५२॥
तदुपरान्त भवनमें प्रवेशकर गिरिजा अपने घरके
कार्योंमें संलग्न हो गयीं। सभी मुनिगण तथा मुनिपत्नियों
भी अपने-अपने घरोंको चले गये। इस आख्यानका
श्रवणकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ५३॥
'विश्वरूपदर्शन' नामक बानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९२॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विश्वरूपदर्शन' नामक बानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९२॥