श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
बहत्तरवाँ अध्याय
उ०ख०-अ०७२ ] * कृतवीर्यकी पत्नीका अंगहीन पुत्रको जन्म देना * २१९
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बहत्तरवाँ अध्याय
कृतवीर्यकी पत्नीका अंगहीन पुत्रको जन्म देना, दत्तात्रेयजीका आना और कृतवीर्यपुत्रको गणेशजीके
एकाक्षरमन्त्रका उपदेश देना, कृतवीर्यका पुत्रको गणपति-आराधनाके लिये वनमें भेजना
शूरसेन बोले - हे शतयज्ञकर्ता इन्द्र! व्रतकी संपूर्ति
होनेपर राजा और रानीको किस प्रकारके पुत्रकी प्राप्ति
हुई? हे विभो! मुझ पूछनेवालेको यह सब विस्तारपूर्वक
बतलाइये ॥ १ ॥
इन्द्र बोले- हे राजन्! गजानन गणेशजीके प्रसन्न
होनेपर क्या-क्या नहीं हो सकता? उनकी कृपासे राजा
कृतवीर्यकी उस रानीने गर्भधारण किया ॥ २॥
नवम मासमें जन्म होनेपर रानीने अपने उस मंगलमय
पुत्रका दर्शन किया। उसके दो कन्धे और सुन्दर मुख था,
परंतु उसके भुजाएँ और हाथ नहीं थे। इसी प्रकार उसके
कमल-जैसे सुन्दर नेत्र और सुन्दर नासिका थी, परंतु
उसके घुटने और जंघाएँ नहीं थीं। उसे [हाथ,] जंघा
और पैरोंसे रहित देखकर माता रोते हुए बोली ॥ ३-४॥
वह (रानी) बोली - हे गजानन! मुझ अभागिनको
इस प्रकारका बालक क्यों हुआ? आपने मुझे हाथ-
पैररहित शिशु क्यों दिया ? ॥ ५ ॥
इससे तो मेरा वन्ध्या होना ही अच्छा था। इस
प्रकारके पुत्रसे पुत्रवती होनेका क्या लाभ! मेरे पूर्वजन्ममें
किये गये पापोंका नाश क्यों नहीं हुआ ? ॥ ६ ॥
हे गजानन! आपकी कृपा क्यों फलीभूत नहीं हुई ?
ब्राह्मणोंके [आशीर्वादात्मक] वचन मेरे लिये इस प्रकारसे
निष्फल क्यों हो गये? [इस प्रकार विलाप करती हुई
वह] अपने दोनों हाथोंसे अपने वक्षःस्थल और मस्तकको
बार-बार पीट रही थी। उसके रुदनके कारण वहाँ
जितनी भी स्त्रियाँ विद्यमान थीं, सब रोने लगीं ॥ ७-८॥
उन सबका कोलाहल सुनकर राजा भी वहाँ आ
गये। उनका भी रुदन सुनकर [राजाके] प्रमुख मन्त्रीगण
भी वहाँ गये। तदनन्तर उन सबका भी रुदन सुनकर
नगरके लोग भी वहाँ आकर रोने लगे ॥ ९१/२ ॥
राजा बोले - हे गजानन ! हे देव! दीनोंपर आपकी
यह कैसी कृपा है! [इस प्रकारका हाथ-पैरसे रहित पुत्र
देकर] आपने आज किस प्रकारकी मुझपर दया प्रदर्शित
की है? हे निष्पाप ! आप स्मरणमात्रसे कैसे पापोंका हरण
करते हैं? मेरा तो जप, तप, स्मरण, दान, पूजन, द्विजतर्पण,
अनुष्ठान तथा हवन सब व्यर्थ हो गया ॥ १०-१२ ॥
इसलिये दैव ही बलवान् होता है, प्रयत्न निरर्थक
है। कर्मकी गति जानी नहीं जाती कि वह कब या क्या
होगी ! जैसे पहाड़ खोदनेसे चूहा प्राप्त हो, वैसे ही मेरे
द्वारा जीवनभर किये गये प्रयत्नके फलके रूपमें यह पुत्र
हुआ है। तब उन शोकाकुल राजा कृतवीर्यसे मन्त्रियोंने
इस प्रकार कहा - ॥ १३-१४१/२ ॥
मन्त्रिप्रमुखोंने कहा- हे राजन् ! शोक न करो,
भावी अन्यथा कैसे हो सकती है? राम क्या मृगके
विषयमें नहीं जानते थे [कि वह सोनेका नहीं होता],
फिर भी वे उसके पीछे गये। क्या धर्मराज युधिष्ठिरको
'द्यूतक्रीड़ा निषिद्ध है' ऐसा ज्ञान नहीं था, फिर भी वे
द्यूतक्रीड़ाके लिये गये और सब कुछ गवाँकर वनको
गये। अतः आपके इस दारुण क्रन्दनसे भी इस बालकको
सर्वांगसुन्दरता नहीं प्राप्त होगी ॥ १५-१७॥
यदि इसका अदृष्ट ठीक होगा तो यह आगे सुन्दर हो
जायगा। जिस प्रकारसे समय आनेपर वृक्ष पुष्पित और
फलयुक्त हो जाते हैं, वैसे ही समय आनेपर यह भी सम्यक्
रूपसे सुन्दर और पृथ्वीका स्वामी होगा ॥ १८१/२॥
इन्द्र बोले - मन्त्रिगणोंके इस प्रकारके वचन
सुनकर राजा सावधान हो गये और उस [शोकाकुल]
रानीसे कहा - 'उठो-उठो, अब तुम शोक न करो' और
स्वयं स्वस्थचित्त होकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको बुलवाकर
गणेशपूजन और स्वस्तिवाचन कराया। तदनन्तर
आभ्युदयिक श्राद्ध करके माला, अलंकार, वस्त्र, गाय
और बहुत-से रत्न आदि अनेक प्रकारके दान दिये।
उन्होंने अपने मित्रों, सम्बन्धियों, सेवकों, अनेक प्रकारके
वाद्योंके वादनसे जीविका चलानेवालों, वन्दीजनों, चारणों,
२२० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण-
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दीनों, अन्धों और असहायोंको भी उनके यथायोग्य
वस्त्रों आदिका दान किया॥ १९-२३॥
उसने [नगरके] प्रत्येक घरमें ताम्बूल तथा शर्करा
भिजवायी तथा ग्यारहवें दिन उस शिशुका 'कार्तवीर्य'
नाम रखा। [इस अवसरपर] राजाने महान् उत्साहपूर्वक
[सम्पूर्ण] नगरको भोजन कराया। इसके अनन्तर उस
पुत्रका बारह वर्षका समय बीत गया, तो राजा कृतवीर्यके
भवनमें दत्तात्रेयजी स्वेच्छासे आये। कृतवीर्यने उनके चरणोंमें
अपना सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया॥ २४-२६॥
[तब] उन मुनिने [चरणोंमें पड़े हुए] उस श्रेष्ठ
राजाको उठाकर उसका आलिंगन किया। [राजाने भी
उन मुनिको] एक सुन्दर आसनपर बिठाकर उनका
आदरपूर्वक पूजन किया॥ २७॥
राजाने उन्हें आसन, पाद्य, अर्घ्य, गाय, वस्त्र,
उपवीत, धूप, दीप, नैवेद्य, अनेक प्रकारके फल, उद्वर्तन
(उबटन) तथा रत्न और सुवर्णकी दक्षिणा दी। पादसंवाहन
आदिसे परम प्रसन्न और सुखपूर्वक विराजमान महामुनि
दत्तात्रेयसे राजा कृतवीर्यने कहा- 'हे मुने ! आज मेरे
जन्म-जन्मान्तरके पुण्यकर्म फलित हो गये, जो मैं अपने
चर्म-चक्षुओंसे आपका साक्षात् दर्शन कर रहा हूँ। हे
सुव्रत ! आपके कृपा-प्रसादसे मेरा भविष्य और अधिक
मंगलमय होगा; क्योंकि आप-जैसे महापुरुषोंका दर्शन
पापकर्मियोंको नहीं होता' ॥ २८-३११/२॥
कृतवीर्यके वचन सुनकर दत्तात्रेयने उनसे कहा-
'[हे राजन् !] मैं आपके अद्भुत पुत्रको देखनेकी
इच्छासे यहाँ आया हूँ।' [मुनिके आगमनसे] हर्षित
राजाने तब [अपने पुत्रकी दुरवस्थासे खिन्न होकर] उन
मुनिसे पुनः कहा- ॥ ३२-३३॥
राजा बोले- [हे मुने !] मेरे द्वारा देवाराधन-
सम्बन्धी किये गये अनुष्ठान, तप, दान और व्रत आदि सब
व्यर्थ गये। जगदीश्वरने यह जो पुत्र मुझे दिया है, वह मेरे
लिये हृदयमें काँटेके समान हो गया है। उसके अदर्शनीय
होनेसे मैं भी अदर्शनीय हो गया हूँ॥ ३४१/२॥
इन्द्र बोले- [हे राजन् !] तदनन्तर राजा कृतवीर्यने
उस बालकको लाकर मुनि दत्तात्रेयको दिखाया ॥ ३५ ॥
उन श्रेष्ठ मुनिने उस राजपुत्रको देखकर अपने
कमलसदृश नेत्रोंको बन्द कर लिया और ध्यानके द्वारा
राजाके कर्मको जानकर पुनः उनसे बोले- '[हे राजन्!]
तुम्हारा यह पुत्र समस्त राजाओंको जीतकर [चक्रवर्ती
होकर] राज्य करेगा। तुमने संकष्टचतुर्थीव्रतके जागरणमें
जँभाई लेनेके बाद आचमन नहीं किया, इससे सम्पूर्ण
संकटोंका नाश करनेवाले व्रतराजका अपमान हुआ।
इसीलिये यह पुत्र अंगहीन हुआ है, उपाय करनेसे यह
सर्वांगपूर्ण हो जायगा ॥ ३६-३८ ॥
राजा बोले- हे स्वामिन् ! आपने सत्य कहा है।
अब आप कृपा करके मुझसे उस उपायको कहिये,
जिससे मेरा पुत्र आपकी कृपासे सर्वांगपूर्ण हो जाय ॥ ३९ ॥
इन्द्र बोले-तब उन मुनिने दया करके उसके
पुत्रको अंगोंसहित [गणेशजीके] एकाक्षर मन्त्रका उपदेश
दिया और उससे पुनः कहा कि इस मन्त्रसे भक्तिपूर्वक
गणेशजीकी आराधना करो। हे सुव्रत ! तुम उपवास और
एकभुक्ति (दिन-रात्रिके बीच मध्याह्नके बाद केवल एकबार
भोजन करना)-के नियमोंका पालन करो ॥ ४०-४१ ॥
बारह वर्षतक इस प्रकार आराधन करनेपर वे तुम्हें
दर्शन देंगे; उनके दृष्टिपातमात्रसे तुम दिव्य देहवाले हो
जाओगे। ऐसा कहकर और राजासे अनुमति लेकर वे
मुनिश्रेष्ठ अन्तर्धान हो गये। तब मुनिके चले जानेपर पैरोंसे
रहित उस महामनस्वी पुत्रने [अपने पिता] कृतवीर्यसे
कहा कि मुझे गहन वनमें पहुँचा दीजिए। गणेशजीकी
कृपाप्राप्तिहेतु मैं अनुष्ठान करूँगा ॥ ४२-४४॥
उसके माता-पिता उसके वचनोंको सुनकर रुदन
करने लगे। तदनन्तर पिता (राजा कृतवीर्य)-ने एक
सुन्दर पालकीद्वारा उसे वनको भेज दिया ॥ ४५ ॥
राजाके सेवकगण उसे पर्णकुटीमें बैठाकर वापस
नगरको लौट आये। उस राजपुत्रने भी वहीं रहकर
तपस्या करनेका निर्णय किया ॥ ४६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कृतवीर्यको पुत्रकी प्राप्तिका वर्णन'
नामक बहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७२ ॥