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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

छप्पनवाँ अध्याय

४०६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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छप्पनवाँ अध्याय
नरान्तकका काशीपुरीपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थान
ब्रह्माजी बोले—तदुपरान्त वे दोनों दूत रौद्रपुर | नामक असुर बालकको मारनेके लिये खड़े थे, बालकने
नामक नगरमें स्थित नरान्तकके सभाभवनमें जा पहुँचे। | उन दोनोंको [वहाँ] भूतलपर पीस डाला॥ १०॥
वह मनोहर सभाभवन मणि-मुक्ता आदिसे विभूषित और | तदुपरान्त विशाल हाथीका रूप धारण करके
हजारों स्तम्भोंसे शोभायमान था। उसकी लम्बाई-चौड़ाई | कुण्डिन्य (कुण्ड) नामक असुर वहाँ रास्ता रोककर खड़ा
सौ-सौ योजनकी थी। उस नाना आश्चर्योंसे परिपूर्ण | हो गया तो उस बलशाली कुमारने कुण्डासुरका गण्डस्थल
रमणीक सभाभवनमें अनेक शूर-वीर बैठे थे॥ १-२॥ | विदीर्णकर उसे क्षणभरमें मार डाला॥ ११ १/२ ॥
वहाँ विविध प्रकारकी मणियोंसे जटित सुन्दर | इसके बाद [विनायकको] मारनेके लिये जृम्भिणी
आसनपर वह नरान्तक बैठा था और उसीके समीप उत्तम | (नामक राक्षसी) धर्मदत्तके घर पहुँची, वहाँ (स्थित)
आसनोंपर उसके दो मन्त्री बैठे थे। जो कि बलवानोंमें | विनायकने उसके सिरपर नारियलसे प्रहार किया, तो वह
श्रेष्ठ और [शरीरकी विशालताके कारण] गगनचुम्बी | भी मर गयी। फिर ज्वालासुर, व्याघ्रतुण्डासुर और तीसरा
मस्तकोंवाले थे। तभी वे शूर और चपल नामक दूत | विदारणासुर—ये तीनों बालकको मारनेके लिये आये।
नरान्तक [-के निकट गये और उस]-को प्रणामकर | तब पहले असुर ज्वालने उस पुरीको जलाना आरम्भ
[उसके] बहुत-से गुणोंका वर्णन करने लगे॥ ३-४॥ | किया और तीसरा असुर विदारण वायुरूप धारणकर
दूतोंने कहा—[हे महाराज!] दूतको चाहिये कि | ज्वालासुरकी सहायता करने लगा॥ १२-१४॥
वह जो कुछ भी अच्छा-बुरा विवरण हो, उसे बतलाये, | [उन तीनोंमें दूसरा जो] व्याघ्रतुण्ड था, वह सभी
ऐसा न करनेपर वह अपराधी होता है और उसे स्वामीके | प्राणियोंका भक्षण करनेको उद्यत था। तब अनन्त
दारुण कोपका भाजन बनना पड़ता है। दूतकी बातको | मायाओंवाले उस बालकने तीनोंको मार डाला॥ १५॥
सुनकर स्वामीको विचारपूर्वक अपना परम हित सिद्ध | तदुपरान्त ज्योतिषीके रूपमें मेघनाद नामक असुर
करना चाहिये॥ ५ १/२ ॥ | आया तो विनायकने उसको अंगूठीसे प्रहार करके मार
हम लोग [आपके आदेशानुसार] विनायकका | डाला। यह बड़े आश्चर्यकी बात थी। फिर कूप और
अपकार करनेके लिये उस नगरमें गये और अत्यन्त गुप्त | कन्दर नामवाले दो मायावी असुर भी बलपूर्वक मारे
रीतिसे बालक विनायक [-का वध करनेहेतु अवसर]- | गये। तत्पश्चात् बालकको मारनेके लिये अम्भ, अन्धक
की प्रतीक्षा करते हुए रहने लगे॥ ६ १/२ ॥ | तथा तुंग नामक असुर आ पहुँचे। एक (अन्धक)-ने
तब सर्वप्रथम विघण्ट और दन्तुर, जो बालकके | अँधेरा फैला दिया, दूसरा (अम्भ) मूसलाधार वर्षा करने
रूपमें थे तथा विनायकको मारना चाह रहे थे; उन्होंने | लगा और तीसरा (तुंग) ऊँची चोटीवाला पहाड़ बनकर
विनायकका आलिंगन किया तो उसने दोनोंको भस्म कर | बालकके ऊपर कूद पड़ा॥ १६-१८॥
दिया। तदुपरान्त बालकको उड़ाकर मारनेके उद्देश्यसे | तब विशाल पक्षीका रूप धारण करके [उस
पतंग और विधूल वायुरूप धारणकर जा पहुँचे, तो | विनायकने] तीनोंको ही बहुत दूर फेंक दिया। फिर उन
विनायकने उनका मस्तक फोड़कर वध कर दिया। तब | असुरोंका बदला लेनेके लिये भ्रमरा नामकी एक राक्षसी
शिलाके रूपमें प्रबलासुर आया तो विनायकने उसके | सुन्दर युवतीके रूपमें आयी। वह बालकको खाना
सैकड़ों टुकड़े कर डाले॥ ७-९॥ | चाहती थी। तब उस विघ्नराजने राक्षसीके वक्षपर आरूढ़
मार्गमें गधेका रूप धारणकर काम और क्रोध | होकर उसके प्राण हर लिये॥ १९-२०॥

क्री०ख०-अ०५६ ] * नरान्तकका काशीपुरीपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थान * ४०७
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[बायाँ स्तम्भ]
तत्पश्चात् विद्युत्-रूप धारणकर हम दोनों बालकको
मारनेकी इच्छासे उसके पास गये तो उस बलिष्ठने अपने
हाथोंसे हमें पकड़ लिया। फिर सारी कार्ययोजनाको
पूछकर उस दयालुने हमें छोड़ दिया। उसको सारा
वृत्तान्त बताकर हमलोग स्वामी (आप)-के समीप
उपस्थित हुए हैं॥ २१-२२॥
एक बार उस नगरमें सभी लोगोंने अकेले विनायकको
भोजनके लिये [एक ही साथ] निमन्त्रित किया और
उसी समय निर्धन शुक्लने भी निमन्त्रण दिया। तब
सर्वप्रथम उन विभुने द्रवीभूत वह भात तेल मिलाकर खा
लिया और फिर वे अनन्त स्वरूप बनाकर सबके घरोंमें
भोजन करने गये ॥ २३-२४॥
वे प्रत्येक घरमें काशिराजके साथ भोजन करते रहे,
परंतु मोहवश काशिराज उनकी लीलाको समझ नहीं
सके। हे स्वामिन्! इस प्रकारकी सामर्थ्य तो न कहीं
देखी गयी है और न सुनी ही गयी है। अतः इस समय
जो आपके लिये हितकर हो, उसीको भलीभाँति सम्पन्न
किया जाय। हमको तो यही जान पड़ता है कि
विनायकको जीतनेवाला [कोई] पुरुष तीनों लोकोंमें है
ही नहीं ॥ २५-२६ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले—उन दोनोंकी ऐसी बातें सुनकर
नरान्तक [क्रोधके कारण] जलने लगा। संसारको मानो
खा जानेके लिये फैलाये हुए अपने मुखसे वह आग
उगलने लगा और भयानक भृकुटिको टेढ़ी करके
नरान्तक बोला—बन्दर कितना ही उछल-कूद करता हो,
पर वह सिंहका कभी अनिष्ट नहीं कर पाता। अजगरमें
निगलनेकी शक्ति तो होती है, परंतु वह भूमिको नहीं
निगल सकता ॥ २७-२९॥
हमें तो आपकी बातें सुनकर मनमें आश्चर्य-सा हो
रहा है। जुगनू तभीतक चमकता है, जबतक कि चन्द्रमा
नहीं दीखता और चन्द्रमा भी तभीतक प्रकाशित होता है,
जबतक सूर्य नहीं दृष्टिगत होता। सूर्यका तेज भी तभीतक
ही है, जबतक कि राहु नहीं दीख पड़ता ॥ ३०-३१॥
[वैसे ही] यह बालक भी तभीतक महान् है,
जबतक कालरूप मुझको वह नहीं देख लेता। अब तुम

[दायाँ स्तम्भ]
लोग काशिराजके साथ उस बालकको मरा हुआ ही
जानो। वह वहीं जानेवाला है, जहाँ उसके द्वारा मारे गये
दैत्य गये हैं॥ ३२ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर वह उठ खड़ा
हुआ और दिशाओंको गुँजाते हुए गरजने लगा॥ ३३॥
नरान्तकके गर्जनकी ध्वनिसे पूरित सारी पृथ्वी काँप
उठी। इसके बाद उसने सभी वीरोंको आज्ञा दी कि
'तैयार हो जाओ। कवच धारण करके [मैं स्वयं भी]
काशिराजकी नगरी जा रहा हूँ।' उसके इस प्रकार कहते
ही [लड़नेके लिये] तैयार सेना आ गयी ॥ ३४-३५॥
वह चतुरंगिणी सेना अत्यन्त भीषण, ध्वजोंसे
समन्वित तथा [शत्रुओंका] सर्वविध [पराक्रम] शमन
करनेवाली थी। उस समय सेनाके [प्रयाणसे उठी हुई]
धूलसे सारा दिग्-दिगन्त आच्छादित-सा हो गया ॥ ३६॥
सूर्यके [धूलसे] ढँक जानेके कारण कुछ भी
दिखायी नहीं दे रहा था। सिन्दूर लगानेसे रक्ताभ
ललाटवाले, संख्यातीत पैदल सैनिक उछल-उछलकर
दौड़ते हुए युद्धाभ्यास कर रहे थे। खुले हुए बालोंवाले
कुछ दूसरे सैनिक हाथोंमें खड्ग तथा भुशुण्डी लिये हुए
थे। [विनायकके हाथों] मारे गये दैत्योंका प्रिय करनेकी
इच्छावाले कुछ दैत्य हाथोंमें भिन्दिपाल तथा मुसल लिये
थे। कुछ सैनिक हाथोंमें ढाल, शिलाखण्ड, वृक्ष,
खट्वांग, शक्ति तथा पाश लिये हुए [चल रहे]
थे॥ ३७-३९ १/२ ॥
[पैदल सैनिकोंके पीछे-पीछे] उस समय घण्टा-
ध्वनिसे शोभायमान गजसेना चल रही थी। [हाथियोंका
वह समूह] सिन्दूरसे अरुणिम गण्डस्थलवाला तथा दाँतों
और झूल आदिके आवरणसे युक्त होनेके कारण शोभायमान
था। वह चलता हुआ ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो
भाँति-भाँतिकी धातुओं (गेरू, शिलाजतु आदि)-से समन्वित
पर्वतोंका समूह जा रहा हो ॥ ४०-४१॥
चिंग्घाड़ते और अपने दाँतोंको बजाते हुए वे हाथी
मानो पहाड़ोंको छिन्न-भिन्न-सा करना चाह रहे थे।
यदि [उनको नियन्त्रित करनेवाले] महावत न रहते तो
वे सबका विध्वंस ही कर डालते। उस समय

४०८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण-
गण्डस्थलसे बहते हुए] मदजलने [दिशाओंको ढक | बाणोंसे समन्वित, छोटी-छोटी घण्टियोंसे सज्जित और
लेनेवाली] धूलको शान्त कर दिया ॥ ४२१/२ ॥ | सुवर्णनिर्मित धुरी, ध्वज तथा विशाल पहियोंसे युक्त
तदुपरान्त [नरान्तककी सेनाके] घुड़सवार निकले। | था ॥ ४७-४८ ॥
उनके सिर मुकुटकी भाँति शोभायमान शिरस्त्राणोंसे युक्त | वह नरान्तक स्वर्णभूषण, मौक्तिकमालिका, अँगूठी,
थे और उनके हाथोंमें चाकू, ढाल, कृपाण, धनुष तथा | तथा खड्गादिसे विभूषित था। उसकी विशाल काया
बाण शोभा पा रहे थे। [नरान्तककी सेनाके हाथियोंकी] | कृष्णवर्णकी थी और उसके हाथमें वीरोचित विजयकंकण
चिंघाड़ और [घोड़ोंकी] हिनहिनाहटने आकाशको | बँधा हुआ था। विशाल मुकुटसे शोभायमान नरान्तकके
अतिशय गुणयुक्त कर दिया अर्थात् आकाश उन शब्दोंसे | कानोंमें कुण्डल झिलमिला रहे थे और उसने अपने
भर-सा गया ॥ ४३-४४ ॥ | शरीरमें केसर, अगुरु, कस्तूरी तथा कर्पूरसे युक्त सुगन्धित
वे सैनिक कवच, शिरस्त्राण, त्रिशूल [आदि | लेप लगा रखा था ॥ ४९-५० ॥
युद्धोपकरणों]-से समन्वित थे और उन्होंने अपने हाथोंमें | उसने पवित्र होकर उन अस्त्रोंका स्मरण किया, जिनका
गदा, मुद्गर, पट्टिश, विशाल फरसा आदि आयुधोंको | कहीं भी प्रयोग नहीं किया गया था। वीरोचित आवेशके
धारण कर रखा था। कुछ सैनिक हाथोंमें चक्र, तोमर, | कारण उसका शरीर वैसे ही फूल गया, जैसे [वातप्रकोप
भाला, तलवार, पाश, अंकुश आदि लिये हुए थे। उनके | आदि] रोगके कारण रोगीका शरीर फूल जाता है। नाना
घोड़े नानाविध अलंकारों और चामरोंसे अलंकृत थे। उन | प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे दिशाओं और दिक्कोणोंको
अश्वोंमें वायुकी-सी तीव्रता और मनके समान गतिशीलता | गुंजित करते हुए अनेकों वीर सैनिक विनायकको जीतनेके
थी, उनकी चेष्टाओंसे जान पड़ता था कि वे मानों | लिये गरजते हुए दीख रहे थे ॥ ५१-५२ ॥
आकाशको ही आक्रान्त कर लेंगे ॥ ४५-४६१/२ ॥ | हाथियोंके चिंघाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, सैनिकोंकी
इसके पश्चात् अपने मन्त्रियोंको साथ लेकर रथारूढ़ | ललकार और रथोंके पार्श्वभागकी घर्घरहाटसे बड़ा
महारथी नरान्तकने प्रस्थान किया। उसका रथ स्वर्ण, | भीषण नाद हुआ, उसे सुनकर भयभीत देवगण पर्वत-
रजत तथा मुक्तामणियोंसे जटिल, अनेकों अलंकृत घोड़ोंसे | कन्दराओंमें प्रविष्ट हो गये। इस प्रकारसे वह नरान्तक
युक्त, नानाविध आयुधोंसे पूर्ण, सैकड़ों धनुषों और | काशिराजके नगरमें जा पहुँचा ॥ ५३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'नरान्तकका निर्गमन' नामक छप्पनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५६ ॥
सत्तावनवाँ अध्याय
काशिराजकी पराजय और नरान्तकका उन्हें बन्दी बना लेना
ब्रह्माजी बोले-जब उस दैत्यराजने युद्धहेतु | बचानेके लिये दसों दिशाओंमें भागते जा रहे थे ॥ ३ ॥
प्रयाण किया तो प्राग्गुल्मों (राज्यकी सीमावर्ती चौकियों)- | [यह दशा देखकर] राजाने भोजन त्याग दिया
में स्थित लोग भागकर राजाके समीप आये और भोजन | और वायुके समान (वेगपूर्वक) उठ खड़े हुए। सर्वप्रथम
करते हुए राजासे कहने लगे कि चतुरंगिणी सेनाके साथ | उन्होंने युद्धोचित वेषभूषा धारण की और फिर लोगों
वह दैत्यराज नरान्तक आ गया है। इधर नगरनिवासी भी | (सैनिकों)-को आदेश दिया कि 'युद्धके लिये तैयार हो
युद्ध-वाद्योंकी ध्वनि सुनकर जोर-जोरसे चिल्लाने | जाओ।' ऐसा कहकर राजाने रणभेरी बजवायी ॥ ४१/२ ॥
लगे ॥ १-२ ॥ | बलवान् नरेशने खड्ग, ढाल, तरकस, धनुष,
नगरमें लोगों (-के चीखने-चिल्लाने)-के कारण | कवच तथा शिरस्त्राण धारण किया और उन विनायककी
अत्यधिक कोलाहल हो रहा था। लोग अपने प्राण | पूजा की, 'विनायक! आपकी जय हो'-ऐसा कहकर

क्री०ख०-अ०५७ ] * काशिराजकी पराजय और नरान्तकका उन्हें बन्दी बना लेना * ४०९


[बायाँ स्तम्भ]
प्रणाम किया और उनका स्मरण करते हुए अश्वपर
आरूढ हुए ॥ ५-६ ॥
उनके भेरीरवको सुनकर सभी सैनिक [युद्धके
लिये] तैयार हो गये और अत्यन्त उत्साहमें भरकर
शीघ्रतापूर्वक पैदल तथा अश्व, गज, रथादिमें आरूढ़ हो
चल पड़े। वे योद्धागण त्रिलोकीको निगलनेकी सामर्थ्यवाले
थे। [इन सभी सैनिक वीरोंके साथ] वे नरेश नगरके
पूर्वभागमें विद्यमान एक वेदीमें स्थित हो गये ॥ ७-८॥
राजाने मन्त्रियों तथा सभी सैनिकोंको धन-वस्त्रादिसे
सन्तुष्ट किया और कहा कि आपलोग पराक्रम दिखलाइये,
आज उसका अवसर आया है ॥ ९ ॥
यद्यपि विनायककी अनुकम्पासे हमें कहीं भी भय
नहीं है, तथापि दैत्य बड़ा ही बलवान् है, इसने अपने
पराक्रमसे सारी पृथ्वीको जीत लिया है ॥ १० ॥
विजयमें कोई नियम नहीं होता (कि इसकी ही
विजय होगी) और मनुष्य प्रारब्धके अधीन होते हैं। मैं
यह बात इसीलिये कह रहा हूँ, कि अपनी सेना
शत्रुसेनाके लाखवें भागके भी बराबर नहीं है ॥ ११ ॥
कहाँ सागर और कहाँ घड़ाभर पानी, कहाँ सूर्य
और कहाँ जुगुन्यू! सामनीतिका आश्रय लेनेवाले हम लोग
तो राजलक्ष्मीके साथ उन (विनायक)-के द्वारा ही
सुरक्षित रहे हैं। उन विनायकने कितने ही दैत्योंका वध
किया था, जिसका अपराध अब बादमें हम लोगोंके
सिरपर आया है। आज वह (नरान्तक) सामनीतिको
त्यागकर युद्ध करने आया है, अतः जिससे हित हो, वैसा
विचार करना चाहिये ॥ १२-१३ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले-तब वहाँ स्थित महामन्त्रीने
भयविह्वल राजासे कहा—'हे राजन्! बुद्धिशील चार
लोगोंके साथ आप दैत्यराज नरान्तककी शरणमें चले
जाइये; क्योंकि अपना काम बनानेके लिये नीचोंका
आश्रय लेना भी कल्याणकारी है। हे राजेन्द्र ! आपको मैं
बृहस्पतिका मत बता रहा हूँ, उसे सुनिये और सुनकर वैसा
ही कीजिये, तो अवश्य ही कल्याण होगा' ॥ १४-१६ ॥
बृहस्पति कहते हैं— [आपत्तिग्रस्त पुरुषको चाहिये
कि] वह कन्यादान, सहभोजन, वस्त्रादिका उपहार,


[दायाँ स्तम्भ]
मधुर बातें, प्रणिपात, प्रीतिभाव, सहयात्रा, यशोगान,
शत्रुके विश्वासपात्र जनोंका समर्थन आदि मुख्य उपायोंसे
शत्रुओंका संहार कर दे ॥ १७ ॥
महामात्य बोला—[राजन् !] यदि वह [बदलेमें]
विनायकको माँग ले तो उसे विनायकको भी सौंपकर
राज्यकी रक्षा कर लेनी चाहिये। मुझे तो यही उचित
जान पड़ता है, जिसमें आपका हित हो, उसीका निश्चय
कीजिये ॥ १८ ॥
ब्रह्माजी बोले—तब सभी लोग राजासे बोले—
'हे नृप! वैरशान्तिके लिये महामात्यने सर्वथा उचित बात
कही है, वही ठीक है, वही समर्थनीय है' ॥ १९ ॥
वे लोग इस प्रकार विचार ही कर रहे थे कि तभी
उन अत्यन्त बलशाली सभी दैत्योंने टिड्डियोंके समान
सेनाओंके द्वारा नगरको घेर लिया ॥ २० ॥
जब नगरवासी लोग [छिपनेके लिये] नगरके
बीचमें गये तो उन पापियोंने उस नगरको ही जलाना
आरम्भ किया। दसों दिशाओंमें प्रचण्ड अग्नि धधक
उठी। धुएँके कारण सूर्यमण्डल आच्छादित हो गया,
जिससे कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। उस समय
ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो संसारमें अति भयानक
प्रलय ही आ गया हो ॥ २१-२२ ॥
जो लोग आगसे घबराकर बाहर निकल रहे थे,
उनको शत्रु पकड़ लेते थे। [वे पापी नगरमें रहनेवाली]
कुमारियों और युवतियोंको कुत्सित चेष्टाओंके द्वारा
शीलभ्रष्ट कर रहे थे। [इस घृणित व्यवहारसे] अत्यधिक
लज्जित कुछ स्त्रियाँ तत्काल प्राण त्याग दे रही थीं।
कुछने नगरद्वारसे गिरकर आत्महत्या कर ली ॥ २३-२४ ॥
कुछ अन्य महिलाओंने विषभक्षण, शस्त्रघात तथा
फाँसी लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली।
[दैत्यराजके] अनुचरोंने [बहुत-सी] सुन्दर स्त्रियोंको
पकड़कर उन्हें अपने स्वामीके समीप पहुँचा दिया ॥ २५ ॥
नरान्तकने उन स्त्रियोंके साथ दुराचार करके उन्हें
अपनी राजधानी भिजवा दिया। इस प्रकारकी विनाशलीलाको
देखकर राजाने अपने मन्त्रियोंसे कहा- ॥ २६ ॥
यदि हम लोगोंके देखते-देखते स्त्रियोंको ये दुरात्मा

४१० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
पापी ले जा रहे हैं, तो यह हमारे लिये बड़ी बदनामीकी
बात होगी, अतः हम असुरोंसे युद्ध करेंगे। ऐसा कहकर
उत्साहपूर्वक युद्ध करनेवाले उन नरेशने अपने अश्वको
चलनेका संकेत किया और तत्काल धनुषपर प्रत्यंचा
चढ़ाकर बाणवर्षा करने लगे ॥ २७-२८ ॥
काशिराजने धनुषसे वैसे ही बाण बरसाना आरम्भ
किया, जैसे बादल जल बरसाते हैं। [उस बाणवर्षासे]
सूर्य आच्छादित हो गया और दैत्य किंकर्तव्यविमूढ हो
गये। उन बाणोंसे दैत्यवृन्द विनष्ट होने लगा। कुछ दैत्य
मर गये, कुछ खण्ड-खण्ड हो गये और कुछ दैत्योंके
चरण छिन्न-भिन्न हो गये ॥ २९-३० ॥
कुछ दैत्योंके पेट फट गये, कुछकी भुजाएँ कट
गयीं, कुछकी आँखें फूट गयीं और कुछ दैत्योंकी
जंघाएँ विदीर्ण हो गयीं। सेनाके साथ मन्त्रिगण
काशिराजका अनुगमन कर रहे थे। उन सभीने मिलकर
खड्ग, परशु आदि आयुधोंसे उन शत्रुसैनिकोंका संहार
कर डाला ॥ ३१-३२ ॥
युद्धभूमिमें उनके प्रहारोंसे कुछ दैत्य मर गये और
कुछ भूतलपर गिर पड़े। इधर वे दैत्य भी [राजाके
पक्षके] सैनिकोंका महान् शस्त्रोंके द्वारा संहार करने
लगे। सेनाके चक्र्रमणके कारण उठी हुई धूलसे भीषण
अन्धकार छा गया, जिसके कारण वे सैनिक बिना
पहचानके, अपने और पराये पक्षके योद्धाओंको शस्त्रोंसे
मारने लगे तथा एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे मल्लयुद्ध
करने लगे ॥ ३३-३४१/२ ॥
[उस समय] अश्वारोही अश्वारोहियोंसे, गजारोही
गजारोहियोंसे, पैदल सैनिक पैदल सैनिकोंसे तथा रथारोही
रथारोहियोंसे [भाँति-भाँतिके] शस्त्रों, बाणों आदिके
द्वारा युद्ध कर रहे थे। इस रीतिसे सैनिकवीरोंका वह
भीषण संग्राम हो रहा था ॥ ३५-३६ ॥
[राजासे पराभूत हुई] दैत्यसेना तितर-बितर हो गयी
और भागने लगी। तब विजयी काशिराजने उच्च स्वरसे
सिंहके समान गर्जना की। तदुपरान्त युद्धोत्सुक हाथीके
समान उत्साहपूर्वक वे विभिन्न सैन्य-समूहोंमें जा-जाकर,
प्रमुख-प्रमुख योद्धाओंको मारते रहे, तथा उस महाभीषण
सेनाको तितर-बितर करते हुए उन्होंने दैत्यसेनाके एक
लाख वीरोंका संहार कर डाला ॥ ३७-३८१/२ ॥
इस प्रकारसे [सेनाका] विनाश करनेमें लगे उन
नरेशको देखकर शत्रुसैनिकोंने [यत्नपूर्वक] रोका और
'यही काशिराज हैं' ऐसा निश्चय करके उन्हें सबने घेर
लिया तथा राजाकी प्रबल बाणवर्षाको [किसी प्रकार]
सहन करते हुए उनको शत्रुओंने बलपूर्वक बन्दी बना
लिया ॥ ३९-४० ॥
मन्त्रिपुत्रोंके साथ राजाके बन्दी बना लिये जानेपर
राजसैनिक उच्च स्वरसे 'राजा पकड़ लिये गये हैं' ऐसा
कहते हुए चीत्कार करने लगे ॥ ४१ ॥
तदुपरान्त दैत्योंने कुछ राजसैनिकोंको पकड़ लिया,
कुछ भाग निकले, कुछ मर गये, कुछ घायल हो गये
और कुछ सैनिक दैत्योंके शरणापन्न हो गये। जैसे घनघोर
जंगलमें बलशाली भेड़िये हृष्ट-पुष्ट बैलको पकड़ लेते
हैं, वैसे ही नरान्तकके दूत मन्त्रिपुत्रोंके साथ राजाको
[पकड़कर उन्हें] नरान्तकके समीप ले गये ॥ ४२-४३ ॥
अवरुद्ध न होनेयोग्य दैत्यसैनिकोंके द्वारा वह पूरा
नगर जला दिया गया, तदुपरान्त नरान्तकने अपने शूर-
वीर योद्धाओंसे कहा— हे वीरो ! जिस कार्यके लिये हम
लोग आये थे, वह सम्पन्न हो चुका है। इस समय वह
मुनिपुत्र विनायक मेरे लिये नगण्य ही है। जब राजा ही
जीत लिया गया तो सेना भी पराजित है, किलेपर
अधिकार हो जानेपर नगरको भी विजित ही मानना
चाहिये। काशिराजके पराजित हो जानेसे निश्चय ही
बालक विनायक भी पराजित हो चुका है ॥ ४४-४६ ॥
यह राजा विवश होकर अभी बालकको ले
आयेगा—ऐसा कहकर [विजयसूचक] बाजे बजवाता
हुआ नरान्तक अपनी राजधानीकी ओर चल पड़ा ॥ ४७ ॥
उस समय यशोगान करनेवाले बन्दीजन नरान्तकका
स्तवन कर रहे थे, काशिराजको उसने अपने आगे कर
रखा था और वह यशोगायक बन्दीजनोंको [वांछित] वस्तुएँ
तथा ब्राह्मणोंको [दान] देता हुआ जा रहा था ॥ ४८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'राजनिग्रह' नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५७ ॥