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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

क्री०ख०-अ०५१ ] काशिराजके गणपतिधामगमनका वर्णन ३१३

क्री०ख०-अ०५१ ] * काशिराजके गणपतिधामगमनका वर्णन * ३१३
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गूँज रही थी, जिसे सुनकर अन्य लोगोंने जाना कि यह
तो विमान है। गणेशजीके द्वारा कृपापूर्वक प्रेषित,
शोभासम्पन्न वह विमान काशिराजके सभा-प्रांगणमें
उतर आया ॥ १५-१६ ॥
दिव्य वस्त्रों और दिव्य आभूषणोंसे विभूषित प्रमोद
और आमोद नामक वे दूत राजाके समीप आये। दिव्य
मालाओं और अनुलेपन आदिसे सुशोभित तथा दिव्य
कान्तिसे समन्वित वे गण कामदेवके सदृश प्रतीत हो रहे
थे। राजाने उनको गणपतिका ही स्वरूप जानकर उन्हें
प्रणाम किया और तत्काल राजासनपर बैठाकर उनकी
पूजा की। तदुपरान्त राजा उनसे जबतक कुछ पूछते,
तबतक स्वयं ही वे दूत सभी लोगोंको सुनाते हुए उनसे
कहने लगे- ॥ १७-१९ ॥
हे राजन्! हमलोग विनायकदेवकी कल्याणकारी
आज्ञा आपसे निवेदित करते हैं, उनका कथन सुनो। तीनों
लोकोंमें तुमसे श्रेष्ठ दूसरा भक्त नहीं है, जो उन्हें प्रसन्न
कर सका हो। वे अहर्निश तुम्हारा ही स्मरण करते रहते
हैं और निरन्तर तुम्हारे ही गुणोंका वर्णन किया करते हैं।
आप धन्य हैं, पुण्यवान् हैं, आपने अपना जन्म सफल
कर लिया है ॥ २०-२१ ॥
तुम्हारा अवलोकन करते ही तत्क्षण पापोंका सघन
अन्धकार विलीन हो जाता है। हम नहीं जानते कि तुमने
पिछले जन्मोंमें कौन-सा तप किया है, जिसके कारण
आपके महलमें पधारकर साक्षात् परब्रह्म इन बालरूप
विनायकने भाँति-भाँतिकी लीलाएँ दिखायी हैं। इसलिये
विनायकदेव और उनके भक्तोंकी महिमाका गोचर हो
पाना सम्भव नहीं है। विनायकदेव तो सर्वदा आपका ही
चिन्तन किया करते हैं ॥ २२-२४ ॥
उन्होंने तुम्हारे लिये एक वैभवपूर्ण दिव्य विमान
भेजा है। हम लोग उनके आज्ञानुसार तुम्हें दिव्यलोक ले
जायँगे। उन विभुने हम लोगोंसे कहा है कि काशिराजको
शीघ्र लिवा लाओ। दूतोंकी [ये] बातें उन नरेशने और
[साथ ही वहाँ उपस्थित] सभी लोगोंने सुनीं ॥ २५-२६ ॥
[यह सुनकर] बारम्बार खुशीके आँसू बहाते हुए
वे नरेश मानो अमृतसिन्धुमें निमग्न-से हो गये। [इसके
बाद धीरे-धीरे] अपनी स्वाभाविक अवस्थामें आकर
उन गणोंको प्रणाम करके वे कहने लगे ॥ २७ ॥
आज हमारा जन्म लेना, हमारे माता-पिता, हमारी
निष्ठा, भक्ति और राज्यसम्पत्ति-ये सभी धन्य हो गये,
जो कि हमने आप लोगोंके अत्यन्त दुर्लभ, मंगलमय
चरणयुगलोंका अवलोकन किया है ॥ २८ ॥
पार्थिव नेत्रोंसे जिसे देख पाना सम्भव नहीं है और
जो इक्षु [रस]-सागरके मध्यमें स्थित है, ऐसे लोकोत्तर
धाममें मुझे ले जानेके लिये मानो आप लोगोंके रूपमें
भगवान् विनायक ही यहाँ आये हैं ॥ २९ ॥
जो सनातन परब्रह्म गुणोंसे परे, इन्द्रियोंसे अगोचर,
चिदानन्दमय, विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलयका
कारण, अणुसे भी सूक्ष्म, स्थूलसे भी स्थूल, सर्वव्यापी,
संगहीन, साकार होकर गुणोंमें बरतनेवाला, [नाम-]
रूपातीत होकर भी नानाविध [नाम-] रूपोंवाला और
पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये उद्यत है, उसने मुझ
अकिंचनपर यह महान् अनुग्रह किया है ॥ ३०-३२ ॥
इतना कहकर उन काशिराजने [विनायकदेवको]
नमस्कार किया और [वहाँ उपस्थित] सभी (मन्त्री, प्रजाजन,
स्वजन आदि)-को [यथायोग्य] अवलोकन, आलिंगन
आदिसे परितुष्ट करके दूतोंको प्रणामकर कहा कि मनुष्योंके
लिये दुर्लभ इस विमानपर पहले आप लोग आरोहण
कीजिये, इसके बाद ही मैं आरूढ़ होऊँगा ॥ ३३१/२ ॥
राजाने मन्त्रियोंको नमस्कार किया और उनके
हाथमें अपने पुत्रको सौंपकर कहा- 'राजधर्मके अनुसार
प्रजाओंको अनुशासित करते हुए उनका पालन करना
चाहिये। महर्षि मुद्गलने जो कुछ बतलाया था, उसका
मैंने आज यह प्रत्यक्ष अनुभव कर लिया है' ॥ ३४-३५ ॥
ऐसा कहकर वे नरेश बारम्बार सम्मानित हुए उन
दूतोंसे अधिष्ठित उस उत्तम विमानमें चर्म (पार्थिव)-
देहसे ही आरूढ़ हुए ॥ ३६ ॥
विमानपर आरूढ़ होते ही उनकी देह सूर्यके समान
तेजोमय हो गयी। तदुपरान्त उन दूतोंने काशिराजको
दिव्य वस्त्राभूषणों और उत्तम गन्धानुलेपनसे अलंकृत
किया ॥ ३७ ॥

३९४ * पुराणां हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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वे दूत राजाको लेकर वायुवेगसे चल पड़े और | पीठमें नेत्र थे। कुछ पापियोंका कण्ठ बड़ा ही दुबला-
[उन्होंने सर्वप्रथम निकटवर्ती] पापकर्मा भूत-प्रेत- | पतला था और कुछ विशाल उदरवाले थे। विविध
पिशाचादिकी आवासभूमिका राजाको दर्शन कराया ॥ ३८ ॥ | रूपोंवाले वे प्रेत अन्तरिक्षवर्ती लोकमें बड़े कष्टके साथ
वहाँपर विकृत आकारवाले कुछ प्राणी तो ऊपरकी | वैसे ही भटक रहे थे, जैसे खिड़की आदिसे आती हुई
ओर पैर किये तथा नीचेकी ओर मुँह लटकाये स्थित थे। | सूर्यकिरणोंमें परमाणु भ्रमण-सा करते हुए प्रतीत होते हैं।
कुछ प्रेतोंके पृष्ठभागमें मुख थे। कुछ प्रेतोंके नेत्र उनके | यह देखकर राजाने पूछा कि हे श्रेष्ठ दूतो! मुझे
सिरपर लगे हुए थे और कुछके हृदयमें तथा कुछकी | बतलाइये कि यह कौन-सा लोक है ? ॥ ३९-४१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'विमानके आगमनका वर्णन'
नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५१ ॥
बावनवाँ अध्याय
काशिराजका विभिन्न लोकोंका दर्शन करते हुए गणपतिधाममें पहुँचना
दूत बोले-हे नृपश्रेष्ठ! यह लोक भूत, प्रेत, | किन लोगोंका [निवासस्थान] है, यह बतलाइये' ॥ ७॥
पिशाच [आदि पापयोनियों]-का [निवास-स्थल] है। | वे दोनों बोले-[राजन् !] यह गन्धर्वनगर है।
हे भूपते! जो लोग निन्दा, चुगलखोरी, तस्करी आदि पाप | जो लोग देवमन्दिरोंमें गायन [वादन, नृत्य आदि] करते
करते हैं, वे यहाँ आते हैं ॥ १ ॥ | हैं, महान् पुण्यके कारण वे ही इस उत्तम नगरको प्राप्त
[ब्रह्माजीने कहा-हे व्यासजी!] इसके पश्चात् | करते हैं। यह उत्तम नगर सिद्ध, चारण तथा गुह्यक
सामने ही काशिराजने असुरों तथा राक्षसोंके लोकोंको | [आदि देवयोनियों]-की आवासभूमि है और यहाँ
देखा, जहाँ विविध आकारवाले, ऊपरकी ओर उठे केशोंसे | नानाविध व्रत-दानादिरूप पुण्यराशिके प्रभावसे ही आना
युक्त, भयावह, विकराल-मुख और बादलोंकी-सी गर्जना | सम्भव है ॥ ८-९ ॥
करते हुए पर्वताकार वे [असुर-राक्षस आदि] विद्यमान | इसके उपरान्त उन दूतोंने राजाको इन्द्रकी
थे। अग्निकुण्डके सदृश देदीप्यमान उन (असुर-राक्षसादि)- | महिमाशालिनी, रमणीय नगरी (अमरावती) दिखलायी,
को देखकर राजाने दूतोंसे फिर पूछा- हे दूतो! मैं पूछता हूँ | जो सौ अश्वमेधयज्ञ करनेपर ही सुलभ होती है ॥ १० ॥
कि यह नगर किन लोगोंका है, यह बतलाइये। तब वे दूत | उस नगरीमें सुवर्ण, रत्न, गौ, रथ, अश्व, गज
बोले- '[राजन् !] यह लोक दुष्ट दानवों और राक्षसोंका | आदिके दानसे तथा तीर्थस्नान आदि नानाविध पुण्यकर्मोंके
[निवास-स्थान] है। वैदिक तथा स्मार्त आचारसे | फलस्वरूप ही जाया जाता है ॥ ११ ॥
परिभ्रष्ट पापकर्मा लोग यहाँ रहते हैं' ॥ २-४ १/२ ॥ | उन दूतोंने वहाँ राजाको रमणीक इन्द्रभवन दिखलाया,
तदुपरान्त राजाने उस [नगर]-के आगे गन्धर्वोंसे | उसे देखकर राजाने दूतोंसे कहा कि मैंने जैसा सुन रखा
सेवित लोकको देखा। उस लोकमें चाँदी और सोनेसे | था, यह वैसा ही दीख रहा है ॥ १२ ॥
निर्मित भवन थे, वहाँकी भूमि सुवर्ण तथा रत्नोंसे मण्डित | दूतोंने वहाँसे आगे चलकर राजाको शोभाशाली
थी। उस लोकके पुरुष तथा स्त्रियाँ नृत्य-गान आदिमें | अग्निलोकका दर्शन कराया। जहाँपर अग्निके समान
निपुण और इच्छानुरूप विषयभोगोंसे युक्त थे ॥ ५-६ ॥ | तेजस्वी अनेकों अग्निहोत्री (द्विज) शोभित हो रहे थे।
अत्यन्त सुख देनेवाले उस लोकको देखकर राजाने | वहाँसे आगे जाकर दूतोंने राजाको शुभ और अशुभ
दूतोंसे फिर पूछा- 'हे दूतो! मैं पूछता हूँ कि यह नगर | परिणामोंवाले यमलोकका दर्शन कराया, जहाँ

क्री०ख०-अ०५२ ] * काशिराजका विभिन्न लोकोंका दर्शन करते हुए गणपतिधाममें पहुँचना * ३९५
अपने कर्मोंके अनुसार] पुण्यात्मा और पापात्मा लोग
जाया करते हैं॥ १३-१४॥
वहाँपर [भगवान् यमदेव] सदाचारियोंको धर्मराजके
[सौम्य] रूपमें और दुराचारियोंको [यमराजके] क्रूर
रूपमें दृष्टिगोचर होते हैं। [उस लोकमें] अपने-अपने
कर्मोंके अनुरूप सदाचारी जन सब प्रकारके [सुखप्रद]
भोगोंको और पापकमी प्राणी अनेक प्रकारकी नारकीय
यातनाओंको भोगते हैं ॥ १५१/२ ॥
[वहाँ राजाने देखा कि कहीं पापात्मा जन]
कुम्भीपाक नामक नरकमें पकाये जा रहे हैं, कहीं
असिपत्रवन नामक नरकमें उनके अंग छिन्न-भिन्न हो
रहे हैं। कहीं लोहेके घनोंसे पापी पीटे जा रहे हैं, तो
कहीं काँटोंसे बेधे जा रहे हैं। कुछ पापीजन तामिस्र,
अन्धतामिस्र और मवादसे भरे कृमिकुण्ड आदि भयानक
नरकोंमें गिराये जा रहे हैं। राजाने [नारकीय यातना भोग
रहे] उन प्राणियोंको देखकर 'चलो-चलो' ऐसा कहते
हुए आँखें बन्द कर लीं ॥ १६-१८ ॥
यमलोकसे आगे जाकर दूतोंने राजाको कुबेरके उत्तम
लोकका दर्शन कराया। वह उत्कृष्ट लोक अति अद्भुत
और इन्द्रलोकसे भी श्रेष्ठ था। उस लोकमें चमचमाते हुए
सुवर्णमय भवन थे। रत्नदान, सुवर्णदान तथा कोटि-कोटि
तुलादान करके परमभाग्यवान् लोग कुबेरके उस उत्तम
लोकको प्राप्त करते हैं॥ १९-२०१/२ ॥
वहाँसे आगे चलकर दूतोंने राजाको वरुणदेवताके
उत्तम लोकका दर्शन कराया, जिसकी प्राप्ति तीर्थसेवन
तथा अन्नदान करनेपर होती है। वह लोक कुबेरलोकसे
भी उत्कृष्ट है। वहाँके निवासी जलमें रहकर बिना भीगे
सुखलाभ करते हैं। जो लोग बावली, कुआँ, तालाब
आदिका निर्माण कराते हैं और [प्यासे प्राणियोंको] जल
देते हैं, वे ही यहाँ देखे जाते हैं॥ २१-२२१/२॥
इसके उपरान्त दूतोंने राजाको सुखमय वायुलोकका
दर्शन कराया। जो लोग मनमाना आचरण नहीं करते
तथा ग्रीष्मकालमें कपूर-खससे सुवासित जल और
व्यजन (पंखे)-का दान करते हैं, उनको वायुलोकमें
निवास प्राप्त होता है ॥ २३-२४ ॥
[वायुलोकसे] आगे चलकर दूतोंने राजाको दुर्गम
सूर्यलोकका दर्शन कराया, जहाँपर पंचाग्नितपका अनुष्ठान
करनेवाले तथा सूर्यदेवकी उपासनामें तन्मय मनुष्य और
सूर्यतुल्य तेजस्वी पूर्णकाम मुनिगण निर्बाधरूपसे ब्रह्माजीके
सौ कल्पपर्यन्त निवास करते हैं ॥ २५-२६ ॥
तदुपरान्त दूतोंने राजाको तारागणोंसे परिपूर्ण
चन्द्रलोकका दर्शन कराया। मौक्तिक एवं सुवर्णका दान
और सोमयागका अनुष्ठान-इन उत्तम पुण्यकृत्योंके
फलस्वरूप महात्मागण इस लोकको प्राप्त करते हैं।
तदनन्तर आगे जाकर दूतोंने राजाको गोलोक दिखलाया।
जो लोग ब्राह्मणोंको विधि-विधानसे हजारों गायें दान
करते हैं, वे गायोंकी रोमसंख्याके तुल्य कल्पोंतक
गोलोकमें निवास करते हैं ॥ २७-२९ ॥
वहाँसे आगे चलकर दूतोंने राजाको शाश्वत
सत्यलोकका दर्शन कराया। जो लोग सत्यव्रती, वेदाध्ययनमें
तत्पर, सदाचारी, वेदवेत्ता, शास्त्रज्ञ तथा यज्ञानुष्ठान
करनेवाले हैं, एवं जो अन्नदानमें निरत, तीर्थसेवी और
पुराणादिके पारायणमें तत्पर रहते हैं। जो ब्राह्मण दान
लेनेमें रुचि नहीं रखते, परोपकारी, दानशील और तपोनिष्ठ
हैं, ऐसे लोग सत्यलोकको प्राप्त करते हैं ॥ ३०-३२ ॥
वह सत्यलोक आठ हजार गव्यूति (सोलह हजार
कोस)-के परिमाणमें फैला है और उतनी ही उसकी लम्बाई
भी है। वहाँपर मुनि (ब्रह्मर्षि)-गण, राजर्षिगण, देवर्षिगण,
दानव, गन्धर्व तथा अप्सराएँ ब्रह्माजीका स्तवन करते हुए
भक्तिपूर्वक उनकी अहर्निश सेवा करते हैं ॥ ३३-३४ ॥
उस लोकमें चारों ओर 'इन्द्रभवन' के समान
(ऐश्वर्यमय) भवन शोभित होते हैं। सत्यलोक (के उस
दिव्य वैभव)-को देखकर आश्चर्यचकित हुए राजाने
उन दूतोंसे पूछा- ॥ ३५॥
राजाने कहा-मैं धन्य हूँ। मुझपर दयालु गणपतिने
और आप दोनोंने बड़ा अनुग्रह किया है, जो कि मैं
अत्यन्त दुर्लभ इन स्वर्गादि लोकोंको देख सका हूँ ॥ ३६ ॥
ब्रह्माजी बोले-तदुपरान्त दूतोंने राजाको त्रिलोकीमें
विख्यात वैकुण्ठलोकका दर्शन कराया। भक्तितत्पर वैष्णवजन
उस लोकको प्राप्त करते हैं। वह सभी लोकोंमें श्रेष्ठतम
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