श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
उनहत्तरवाँ अध्याय
उ०ख०-अ०६९] * देवराज इन्द्रका राजा शूरसेनसे संकटचतुर्थीव्रतकी विधिका निरूपण करना * २११
उनहत्तरवाँ अध्याय
देवराज इन्द्रका राजा शूरसेनसे संकटचतुर्थीव्रतकी विधिका निरूपण करना
[ राजा] शूरसेन बोले— [हे देवराज ! सिद्धि
प्रदान करनेवाले तथा] हितकर उत्तम संकटचतुर्थी
व्रतका ब्रह्माजीने कृतवीर्यके पिताको किस प्रकार उपदेश
किया था ? वह आप मुझसे कहिये ॥ १ ॥
इन्द्र बोले—हे राजन् ! राजा कृतवीर्यके पिताने
सत्यलोकमें जाकर सुखपूर्वक बैठे हुए सर्वज्ञ चतुर्मुख
ब्रह्माजीको प्रणाम करके पूछा ॥ २ ॥
कृतवीर्यके पिता बोले—प्रणतजनोंके कष्टोंका
निवारण करनेवाले, जगत्को धारण करनेवाले हे देवाधिदेव !
मेरे हृदयमें जो प्रश्न है, उसे मैं आपसे पूछता हूँ, आप
[कृपया] उसके विषयमें बतलाइये ॥ ३ ॥
हे प्रभो ! आपत्तियोंसे घिरे हुए, व्याकुल चित्तवाले,
चिन्तासे व्यग्र मनःस्थितिवाले, सुहृज्जनोंसे वियुक्त, दुर्लभ
लक्ष्यप्राप्तिकी कामनावाले मनुष्यको कार्यकी सिद्धि
कैसे हो ? उसे नित्य अर्थसिद्धिकी प्राप्ति कैसे हो
तथा पुत्र, सौभाग्य और सम्पत्तिकी प्राप्ति कैसे हो ?
समस्त संकटोंके नाशके लिये मनुष्यको क्या करना
चाहिये ? ॥ ४-५ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले—हे राजन् ! सुनो, मैं तुमसे सम्पूर्ण
सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले व्रतको कहता हूँ, जिसके
अनुष्ठानमात्रसे मनुष्य अपनी सभी मनोकामनाओंकी
प्राप्ति कर लेता है। व्रतके दिन औषधियों और सफेद
तिलमिश्रित जलसे स्नान करे। तत्पश्चात् [व्रतका]
संकल्प करे। भगवान् गजाननका सम्यक् प्रकारसे
ध्यानकर भक्तिपूर्वक आगमोक्त मन्त्रोंसे कृष्णपक्षकी
चतुर्थीतिथिको रात्रिमें चन्द्रमाके उदय होनेपर गणेशजीका
पूजन करे ॥ ६-८ १/२ ॥
कृतवीर्यके पिता बोले—हे ब्रह्मन् ! देवाधिदेव |
गणेशजीका पूजन कैसे करना चाहिये ? प्रेमपूर्वक पूछनेवाले
मुझसे आप विस्तारपूर्वक कहें ॥ ९ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले—नित्यकर्मका समापनकर रात्रिमें
चन्द्रमाके उदित होनेपर पवित्र स्थानमें गोबरसे लीपकर
छोटा-सा मण्डप बनाये। वहींपर गणेशजीके पूजनहेतु
पीठकी स्थापनाकर कुंकुमयुक्त अक्षतोंसे उसका पूजन
करे। तदनन्तर उसपर पंचरत्न१ समन्वित कलशकी स्थापना
करे। [और] उस कलशके ऊपर स्वर्णनिर्मित पात्र
रखे ॥ १०-१२ ॥
सुवर्णके अभावमें चाँदी, ताँबा या बाँसका बना पात्र
स्थापित करे और उसमें रेशमी या अपनी शक्तिके अनुसार
वस्त्र रखे। तत्पश्चात् उस [वस्त्र] - के ऊपर आगमोंमें
वर्णित विधानके अनुसार गणेशयन्त्रकी रचना करे और
उसपर शुभ लक्षणोंसे युक्त गणेशजीकी सोनेकी मूर्ति
प्रतिष्ठापित [ करके उन भगवान् गजानन गणेशजीका ध्यान
करते हुए इस प्रकार पूजा] करनी चाहिये - ॥ १३-१४ ॥
[उपासक सर्वप्रथम निम्नोक्त मन्त्रोंसे गजाननदेवका
ध्यान करे-] ध्यान- जिनका वर्ण प्रतप्त स्वर्णके
सदृश प्रभावाला है, जो विशाल शरीर और एक दाँतवाले
हैं; जिनका उदर विशाल है, जिनकी बड़ी-बड़ी आँखें
दहकती हुई अग्निके समान हैं, जो मूषक [-रूपी
वाहन]-के पृष्ठदेशपर सम्यक् रूपसे आरूढ़ हैं तथा
[अपने] गणोंद्वारा चँवर डुलाये जा रहे हैं, शेषनागको
यज्ञोपवीतके रूपमें धारण किये हुए-ऐसे गजानन
गणेशजीका ध्यान करना चाहिये ॥ १५-१६ ॥
आवाहन२—हे देवाधिदेव ! आप आइये और मुझे
संकटसे उबारिये। जबतक मेरा व्रत सम्पूर्ण न हो जाय,
तबतक आप [इस मूर्तिमें] विराजमान रहें ॥ १७ ॥ [इस
१-कनकं कुलिशं मुक्ता पद्মরাगं च नीलकम् । एतानि पञ्चरत्नानि सर्वकार्येषु योजयेत् ॥
अर्थात् सोना, हीरा, मोती, पद्মরাग और नीलम-ये पंचरत्न कहे जाते हैं।
२-कतिपय विद्वान् इन आवाहनादि सभी उपचारोंका समर्पण 'ॐ नमो हेरम्ब मदमोदित मम संकटं निवारय हुं फट् स्वाहा' -इस मन्त्रके
द्वारा करनेका निर्देश करते हैं।
२१२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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[बायाँ स्तम्भ]
पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'सहस्रशीर्षा० १'—इस वैदिक ऋचासे आवाहन करे।
आसन— हे गणाधिपति ! हे सर्वसिद्धिप्रदायक ! आपको नमस्कार है। हे देव! आप आसन ग्रहण करें और मुझे संकटसे उबारें ॥ १८ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'पुरुष एव० २' इस वैदिक ऋचासे आसन प्रदान करे।
पाद्य— हे उमापुत्र ! आपको नमस्कार है। हे मोदकप्रिय ! नमस्कार है। हे देवेश्वर ! [इस] पाद-प्रक्षालनहेतु दिये गये जलको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ १९ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'एतावानस्य ० ३' इस वैदिक ऋचासे पाद्य-समर्पण करे।
अर्घ्य— हे लम्बोदर ! आपको नमस्कार है, हे देवेश्वर ! रत्नसे युक्त और फलसे समन्वित इस अर्घ्यको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २० ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'त्रिपादूर्ध्व० ४' इस वैदिक ऋचासे अर्घ्य-समर्पण करे।
आचमन— [हे प्रभो !] गंगा आदि सभी तीर्थोंसे लाये गये उत्तम जलको आचमनहेतु ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २१ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'ततो विराड० ५' इस वैदिक ऋचासे आचमनके लिये जल प्रदान करे।
पंचामृतस्नान— [हे प्रभो !] दूध, दही, घी, शर्करा और शहदसे युक्त इस पंचामृतको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २२ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'पञ्च नद्यः० ६' आदि वैदिक मन्त्रोंसे पंचामृतस्नान कराये।
[दायाँ स्तम्भ]
स्नान— [हे देव !] नर्मदा, चन्द्रभागा [आदि पुण्यदायिनी नदियों] तथा गंगा-संगमके जलसे आप मेरे द्वारा भक्तिपूर्वक स्नान कराये गये हैं, आप मेरे संकटका निवारण करें ॥ २३ ॥ 'यत्पुरुषेण ० ७' इस वैदिक ऋचासे [शुद्धोदक] स्नान कराये।
वस्त्र— हे गजानन ! आपको नमस्कार है। हे परमात्मन् ! इस वस्त्रयुगल (धोती और उत्तरीय)-को ग्रहण कीजिये। हे गणाध्यक्ष ! मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २४ ॥ 'तं यज्ञम् ० ८' इस वैदिक ऋचासे वस्त्र समर्पित करे।
यज्ञोपवीत— हे विनायक ! आपको नमस्कार है। हे परशुधारिन् ! आपको नमस्कार है, इस उपवीतको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २५ ॥ 'तस्माद् यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतम् ० ९' इस वैदिक ऋचासे यज्ञोपवीत समर्पित करे।
आभूषण— [हे गजानन !] केयूर, कटक, मुद्रिका, अंगद आदि इन अलंकारोंको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २६ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'स हि रत्नानि' इस वैदिक ऋचासे अलंकार अर्पण करे।
गन्ध— हे ईशपुत्र ! आपको नमस्कार है। हे मूषकवाहन ! आपको नमस्कार है। हे देव! [इस] चन्दनको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २७ ॥ 'तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः ० १०' इस वैदिक ऋचासे चन्दन समर्पित करे।
अक्षत— हे देव! घृत और कुंकुमसे युक्त सुन्दर मनोहर चावलोंको अक्षतके रूपमें आपको समर्पित किया है, [इन्हें ग्रहण कीजिये और] मेरे संकटका निवारण
पाद-टिप्पणी (वैदिक मन्त्र):
१. सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिग्ंसर्वत स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ (यजु० ३१ । १)
२. पुरुष एवेदग्ं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ (यजु० ३१ । २)
३. एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः । पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ (यजु० ३१ । ३)
४. त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः । ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि ॥ (यजु० ३१ । ४)
५. ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः । स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥ (यजु० ३१ । ५)
६. पञ्च नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्रोतसः । सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेऽभवत्सरित् ॥ (यजु० ३४ । ११)
७. यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत । वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥ (यजु० ३१ । १४)
८. तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः । तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥ (यजु० ३१ । ९)
९. तस्माद् यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् । पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ॥ (यजु० ३१ । ६)
१०. तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत ॥ (यजु० ३१ । ७)
उ०ख०-अ०६९] * देवराज इन्द्रका राजा शूरसेनसे संकटचतुर्थीव्रतकी विधिका निरूपण करना * २१३
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कीजिये—ऐसा कहकर अक्षत समर्पित करे ॥ २८ ॥
पुष्प—हे गणाध्यक्ष ! चम्पा, मालती, दूर्वा और
अनेक जातिके पुष्प मैं आपके लिये लाया हूँ, इन्हें ग्रहण
कीजिये और मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ २९ ॥
'तस्मादश्वा० १' इस वैदिक ऋचासे पुष्प चढ़ाये।
धूप—हे लम्बोदर ! हे महाकाय ! हे धूम्रकेतु !
[इस] सुगन्धित धूपको ग्रहण कीजिये। हे देवेश ! मेरे
संकटका निवारण कीजिये ॥ ३० ॥ 'यत्पुरुषं० २' इस
वैदिक ऋचासे धूप आघ्रापित करे।
दीप—विघ्नरूपी अन्धकारका संहार करनेवाले हे
देवाधिदेव ! [इस] दीपको ग्रहण कीजिये अर्थात् मेरे
द्वारा इस दीप दिखानेकी सेवा स्वीकार कीजिये। हे
देवेश ! मेरे संकटका निवारण कीजिये ॥ ३१ ॥ 'ब्राह्मणो० ३'
इस वैदिक ऋचासे दीप दिखाये।
नैवेद्य—हे देव ! मोदक, पुआ, लड्डू, शर्करायुक्त
खीर तथा घृतमें पके हुए विविध प्रकारके पकवानोंको
नैवेद्यके रूपमें ग्रहण कीजिये ॥ ३२ ॥ 'चन्द्रमा मनसो० ४'
इस वैदिक ऋचासे नैवेद्य समर्पित करे।
फल—हे देवेश ! नारियल, अंगूर, आम, अनारके
[इन] सुन्दर फलोंको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटोंका
निवारण कीजिये ॥ ३३ ॥ [इस पौराणिक मन्त्रका
उच्चारणकर नाभ्या आसीद्० ५ इस वैदिक मन्त्रसे
ऋतुफल समर्पण करे।
ताम्बूल—सुपारी, इलायची, लौंग और ताम्बूल-
पत्रसे युक्त ताम्बूलको ग्रहण कीजिये और मेरे संकटोंका
निवारण कीजिये ॥ ३४ ॥ 'सप्तास्या० ६' इस मन्त्रसे
ताम्बूल समर्पित करे।
दक्षिणा—हे देव ! सुवर्ण सबके लिये प्रीतिकर
और सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला होता है, अतः इसे
आप दक्षिणाके रूपमें ग्रहण कीजिये और मेरे संकटोंका
निवारण कीजिये ॥ ३५ ॥ 'यज्ञेन यज्ञम्० ७' इस मन्त्रसे
दक्षिणा चढ़ाये।
तदनन्तर इक्कीस दूर्वांकुरोंको लेकर भक्तिपूर्वक
सावधानचित्त होकर इन नाम-मन्त्रोंसे भगवान् गणेशजीका
अर्चन करे—
(१) गणाधिपाय नमः—गणोंके अधिपतिके
लिये नमस्कार है। (२) उमापुत्राय नमः—[भगवती]
उमाके पुत्रके लिये नमस्कार है। (३) अघनाशनाय
नमः—पापोंका नाश करनेवालेके लिये नमस्कार है।
(४) एकदन्ताय नमः—एकदन्तको नमस्कार है।
(५) इभवक्त्राय नमः—गजमुखके लिये नमस्कार
है। (६) मूषकवाहनाय नमः—मूषकवाहनके लिये
नमस्कार है। (७) विनायकाय नमः—विनायकके
लिये नमस्कार है। (८) ईशपुत्राय नमः—ईशपुत्रके
लिये नमस्कार है। (९) सर्वसिद्धिप्रदाय नमः—
सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करनेवालेके लिये नमस्कार है।
(१०) लम्बोदराय नमः—जिनका उदरप्रदेश लम्बा
है, ऐसे गणेशजीके लिये नमस्कार है। (११) वक्रतुण्डाय
नमः—टेढ़ी सूँड़वालेके लिये नमस्कार है। (१२)
मोदकप्रियाय नमः—जिन्हें मोदक प्रिय है, ऐसे
गणेशजीके लिये नमस्कार है। (१३) विघ्नविध्वंसकत्रे
नमः—विघ्नोंका विध्वंस करनेवालेको नमस्कार है।
(१४) विश्ववन्द्याय नमः—विश्ववन्द्यके लिये नमस्कार
है। (१५) अमरेशाय नमः—अमरेश अर्थात् देवताओंके
स्वामीके लिये नमस्कार है। (१६) गजकर्णाय नमः—
हाथीके कानके सदृश कानवालेके लिये नमस्कार है।
(१७) नागयज्ञोपवीतिने नमः—नागको यज्ञोपवीतके
रूपमें धारण करनेवालेको नमस्कार है। (१८)
भालचन्द्राय नमः—जिन्होंने चन्द्रमाको अपने मस्तकपर
धारण कर रखा है, ऐसे गणेशजीके लिये नमस्कार है।
१. तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात् तस्माज्जाता अजावयः॥ (यजु० ३१।८)
२. यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्। मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किमूरू पादा उच्येते॥ (यजु० ३१।१०)
३. ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः। ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥ (यजु० ३१।११)
४. चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत। श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत॥ (यजु० ३१।१२)
५. नाभ्या आसीदन्तरिक्षः शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत। पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँर अकल्पयन्॥ (यजु० ३१।१३)
६. सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्॥ (यजु० ३१।१५)
७. यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥ (यजु० ३१।१६)
२९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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[बायाँ स्तम्भ]
(१९) परशुधारिणे नमः—परशु धारण करनेवालेको
नमस्कार है। (२०) विघ्नाधिपाय नमः—विघ्नोंके
अधिपतिके लिये नमस्कार है। (२१) विद्याप्रदाय
नमः—विद्या प्रदान करनेवालेके लिये नमस्कार है॥ ३६॥
नीराजन—हे ईश! कर्पूर और अग्निके संयोजनसे
तैयार की गयी, सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाली आरतीको
स्वीकार करें और मुझे संकटोंसे छुटकारा दें॥ ३७॥
[इस पौराणिक मन्त्रका उच्चारणकर] 'सप्तास्यासन्० १'
इस वैदिक मन्त्रसे आरती दिखलाये।
पुष्पाञ्जलि—[हे देव!] चम्पा, अशोक, मौलसिरी,
पारिजातके सुन्दर पुष्पोंसे युक्त इस पुष्पाञ्जलिको स्वीकार
करें और मुझे संकटोंसे मुक्त करें॥ ३८॥ 'यज्ञेन० २' इस
वैदिक ऋचासे पुष्पाञ्जलि प्रदान करें।
स्तुति—हे गजानन! आप ही विश्वका सृजन
करते हैं। हे देव! आप ही विश्वका परिपालन करते हैं।
हे अखिलेश्वर! आप ही विश्वका संहार करते हैं। हे
विश्वात्मन्! आप ही सम्पूर्ण विश्वमें भासित हो रहे
हैं॥ ३९॥ इस मन्त्रसे स्तुति करे।
नमस्कार—गणाधिपति भगवान् गणेशजीको मैं
प्रणाम करता हूँ, जो भक्तोंके कष्टोंको दूर करनेवाले,
भक्तोंको मुक्ति प्रदान करनेमें निपुण, विद्या प्रदान करनेवाले,
वेदोंका सर्वप्रथम विधान करनेवाले, विघ्नोंके स्वामी और
विघ्नोंका विनाश करनेमें दक्ष हैं॥ ४०॥ इस मन्त्रसे
नमस्कार करे।
प्रदक्षिणा—इस प्रकार स्तुति करके बारम्बार
विधिवत् प्रणाम करे और तदनन्तर यथाशक्ति [या
न्यूनतम] इक्कीस बार परिक्रमा करे॥ ४१॥
प्रार्थना—हे गणेशजी! जो मूढ़जन आपका पूजन
न करके अपने मनोरथकी सिद्धि करना चाहते हैं, वे इस
संसारमें निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं, मुझे आपका सम्पूर्ण
प्रभाव ज्ञात है॥ ४२॥ इस मन्त्रसे प्रार्थना करे।
[दायाँ स्तम्भ]
वायनदान—हे आचार्य! हे द्विजाध्यक्ष! हे
सर्वसिद्धिप्रदायक! वायन ग्रहण कीजिये। हे ब्रह्मन्! मेरे
संकटोंका निवारण कीजिये॥ ४३॥
विशेषार्घ्य—[हे प्रभो!] फल, पुष्प, अक्षत और
जलसे युक्त विशेषार्घ्यको मैंने दक्षिणासहित [आपके
हेतु] प्रदान किया। [आप] मेरे संकटोंका निवारण
कीजिये। इस प्रकार सोलह उपचारोंके द्वारा 'ॐ नमो
हेरम्ब मदमोदित मम संकटं निवारय स्वाहा' इस
मन्त्रसे [गणेशजीका] पूजन करे। साथ ही विद्वान् पुरुष
उनके चारों ओर इन्द्रादि लोकपालों ३ का भी पूजन
करें॥ ४४-४५॥
[गो-] घृतमें पकाकर बनाये गये तिल और मूँगके
मोदक तथा अन्य भोज्य पदार्थोंको यथाशक्ति [गणेशजीके
सम्मुख] रखे तथा [लौंग-इलायची-कर्पूर आदिसे
समन्वित] ताम्बूल भी निवेदित करे॥ ४६॥
तदनन्तर इक्कीस दूर्वांकुरोंको लेकर भक्तिपूर्वक
सावधान-चित्त होकर इन नामोंसे भगवान् गणेशका
अर्चन करे—
दूर्वांकुरार्चन—
(१) गणाधिपाय नमः—गणोंके अधिपतिके
लिये नमस्कार है। (२) उमापुत्राय नमः—[भगवती]
उमाके पुत्रके लिये नमस्कार है। (३) अभयप्रदाय नमः—
अभय प्रदान करनेवालेको नमस्कार है। (४) एकदन्ताय
नमः—एकदन्तको नमस्कार है। (५) इभवक्त्राय
नमः—गजमुखके लिये नमस्कार है। (६) मूषक-
वाहनाय नमः—मूषकवाहनके लिये नमस्कार है।
(७) विनायककाय नमः—विनायकके लिये नमस्कार
है। (८) ईशपुत्राय नमः—ईशपुत्रके लिये नमस्कार
है। (९) सर्वसिद्धिप्रदायकाय नमः—सम्पूर्ण सिद्धियाँ
प्रदान करनेवालेके लिये नमस्कार है। (१०) लम्बोदराय
नमः—लम्बोदरको नमस्कार है। (११) वक्रतुण्डाय
[पाद-टिप्पणी]
१. सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्॥ (यजु० ३१।१५)
२. यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥ (यजु० ३१।१६)
३. वस्तुतः 'इन्द्रादि लोकपालानां' शब्दसे यहाँ 'इन्द्रादि दस दिक्पालों' का अर्थ लेना चाहिये। पूर्वमें इन्द्र, अग्निकोणमें अग्नि, दक्षिणमें
यम, नैर्ऋत्यकोणमें निर्ऋति, पश्चिममें वरुण, वायव्यकोणमें वायु, उत्तरमें कुबेर, ईशानकोणमें ईशान, ईशान और पूर्वके मध्यमें ब्रह्मा, नैर्ऋत्य-
पश्चिमके मध्यमें अनन्तका आवाहन, स्थापन और पूजन करना चाहिये।
उ०ख०-अ०६९ ] * देवराज इन्द्रका राजा शूरसेनसे संकष्टचतुर्थीव्रतकी विधिका निरूपण करना * २१५
नमः—वक्रतुण्डको नमस्कार है। (१२) अघनाशनाय
नमः—पापोंका नाश करनेवालेको नमस्कार है। (१३)
विघ्नविध्वंसकर्त्रे नमः—विघ्नविध्वंसकर्ताको नमस्कार है।
(१४) विश्ववन्द्याय नमः—विश्ववन्द्यको नमस्कार
है। (१५) अमरेश्वराय नमः—अमरेश्वरको नमस्कार
है। (१६) गजवक्त्राय नमः—गजाननको नमस्कार
है। (१७) नागयज्ञोपवीतिने नमः—नागको यज्ञोपवीतके
रूपमें धारण करनेवालेको नमस्कार है। (१८)
भालचन्द्राय नमः—मस्तकपर चन्द्रमाको धारण
करनेवालेको नमस्कार है। (१९) परशुधारिणे नमः—
परशुधारीको नमस्कार है। (२०) विघ्नाधिपाय नमः—
विघ्नोंके अधिपतिको नमस्कार है। (२१) सर्वविद्या-
प्रदायकाय नमः—सभी विद्याएँ प्रदान करनेवालेको
नमस्कार है॥४७-५१॥
इस प्रकार [इन इक्कीस नाम-मन्त्रोंसे] पृथक्-
पृथक् [एक-एक] दूर्वासे भगवान् गणेशका अर्चन
करे। [तदनन्तर इस प्रकार कहे—हे देव!] जिस
उद्देश्यसे मैंने यथाशक्ति सम्यक् रूपसे [आपका] पूजन
किया है, उससे आप शीघ्र प्रसन्न हों और मेरी
मनोकामनाओंको पूर्ण करें तथा मेरे सभी विघ्नों और
उपस्थित दुष्टोंका नाश करें॥ ५२-५३॥
मैं आपके कृपाप्रसादसे ही सारे कार्य कर रहा हूँ,
आप मेरे शत्रुओंकी बुद्धिका नाश और मित्रोंका अभ्युदय
कीजिये ॥ ५४ ॥
इस प्रकार निवेदनकर देवाधिदेव गणेशजीको बारम्बार
प्रणामकर व्रती एक सौ आठ आहुतियोंसे हवन करे॥ ५५॥
वायनदान—[तदनन्तर] व्रतकी सम्यक् रूपसे
सम्पूर्णताके लिये इक्कीस मोदकों अथवा इक्कीस
लड्डुओं या इक्कीस बड़ोंको इक्कीस फलोंके साथ
लाल कपड़ेमें लपेटकर वायनके रूपमें अपने आचार्यको
निवेदित करे ॥ ५६ १/२ ॥
वायनदान मन्त्र—वायनदानका मन्त्र इस प्रकार
है—'सम्पूर्ण संकल्पोंमें सिद्धि प्रदान करनेवाले हे
गणाधिपति! आपको नमस्कार है। इस वायनदानसे मेरे
संकटोंका निवारण कीजिये।'
तदनन्तर पुण्यमयी कथाका श्रवणकर समाहित
चित्तवाला होकर अर्घ्य प्रदान करे ॥ ५७-५८ ॥
तिथ्यर्थदान—तिथियोंमें उत्तम हे देवि! गणेशजीकी
हे प्रिय वल्लभा! [इस] अर्घ्यको ग्रहण कीजिये और
मेरे संकटोंका निवारण कीजिये। हे देवि! आपको
नमस्कार है ॥ ५९ ॥ ऐसा कहकर तिथ्यर्थ दे।
देवार्थ अर्घ्यदान—हे मोदकप्रिय लम्बोदर गणेशजी!
आपको निरन्तर नमस्कार है। हे देव! [इस] अर्घ्यको
ग्रहण कीजिये और मेरे संकटोंका निवारण कीजिये,
आपको नमस्कार है। हे गजानन! आपको नमस्कार है, हे
गजकर्ण! हे महाबल! मेरे द्वारा प्रदत्त अर्घ्यको ग्रहण
कीजिये और संकटोंसे मुझे दूर कीजिये। हे गणराज! हे
महाकाय! हे विघ्नराज! हे गजानन! हे सभी कार्योंमें
अभीष्ट फल देनेवाले! अर्घ्य ग्रहण कीजिये। आपको
नमस्कार है। हे प्रभो! हे देवेश! मेरे जो-जो संकट तथा
विघ्न हों, उन सबका शीघ्र ही ध्वंस कीजिये और अर्घ्य
ग्रहण कीजिये। आपको नमस्कार है ॥ ६०-६३॥ ऐसा
कहकर भगवान् गणेशके लिये अर्घ्य दे।
चन्द्रार्थ अर्घ्यदान—[देवराज इन्द्र राजा शूरसेनसे
कहते हैं—] हे राजन्! इस मन्त्रसे चन्द्रमाको सात बार
अर्घ्य दे—
'क्षीरसागर [-का मन्थन होने]-से प्रकट हुए,
अत्रिगोत्रमें उत्पन्न हे चन्द्रदेव! मेरे द्वारा दिये गये
अर्घ्यको रोहिणीसहित ग्रहण करें'॥ ६४ ॥ यह चन्द्रमाको
अर्घ्य देनेका मन्त्र है।
तदनन्तर भगवान्से क्षमा-याचना करे, उसके बाद
ब्राह्मणोंको भोजन कराये। फिर ब्राह्मणोंको अर्पित करनेके
बाद जो शेष बचा हो, उसका स्वयं भोजन करे ॥ ६५ ॥
मौन रहते हुए यथाशक्ति, यथारुचि सात ग्रास
भोजन करे। इस प्रकार चार महीनेतक विधानपूर्वक
[संकष्टचतुर्थी] व्रत करे ॥ ६६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकष्टचतुर्थीव्रतविधिवर्णन' नामक
उनहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६९ ॥