श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
बाईसवाँ अध्याय
३२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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बाईसवाँ अध्याय
काशीनगरीके निवासियों तथा शुक्ल नामक ब्राह्मणद्वारा विनायकको अपने-अपने
घर ले जानेके लिये राजासे प्रार्थना करना और स्वीकृति प्राप्तकर
विनायकके स्वागतकी तैयारी करना
ब्रह्माजी बोले—दूसरे दिनकी बात है, जब | है, वह इन्हें अपने घर ले जाकर इनकी पूजा करे और
काशीनरेश प्रातःकालीन स्नान-सन्ध्या आदि नित्यकर्मोंमें | इन्हें भोजन भी कराये ॥ ८-९१/२ ॥
लगे हुए थे, उस समय सभी नगरवासी आपसमें यह | हे नागरिको ! सत्त्व, रज तथा तम—इन तीनों
तर्क-वितर्क करने लगे कि ये विनायक न तो देवता हैं | गुणोंके आधारपर लोग सात्त्विक, राजस तथा तामस तीन
और न मनुष्य ही हैं अथवा यदि ये देवता न होते तो | प्रकारके होते हैं। जो दुष्ट लोग हैं, वे देवताओंकी परीक्षा
इन्होंने इन्द्र तथा विष्णुके द्वारा भी अजेय तथा अन्य | लेते हैं और जो पुण्यात्मा होते हैं, वे उनकी पूजा करते
देवताओंके लिये भी सर्वथा अपराजेय पाँच महान् बल- | हैं। कुछ लोग इन विनायककी निन्दा करते हैं और कुछ
शाली एवं पराक्रमी दैत्योंका वध कैसे किया ? ॥ १-२ ॥ | इनकी प्रशंसा करते हैं ॥ १०-११ ॥
यदि ये देवता ही हैं, तो [बालक बनकर] | जिस व्यक्तिका जैसा स्वभाव होता है, वह वैसा
बालकोंके मध्य क्रीडा कैसे कर रहे हैं? इस प्रकार तर्क- | ही व्यवहार करता है। जैसे घिसे जानेपर भी चन्दन
वितर्क करके वे सभी पुरवासी राजाके दर्शनके लिये | अपने सुगन्धरूपी स्वभावको नहीं छोड़ता है और
आये। राजाने भी भद्रासनमें विराजमान होकर उन सभीसे | कस्तूरीपंकसे सना होनेपर भी प्याज अपने स्वाभाविक
कहा—'आप लोगोंका जो कार्य हो, उसे बतायें, वह | गुण दुर्गन्धको नहीं छोड़ता। इन मुनिपुत्रपर यदि आपकी
निश्चित ही पूर्ण होगा ॥ ३-४ ॥ | अनन्य भक्ति हो तो अपनी प्रसन्नताके लिये तथा इन्हें
हे नगरनिवासियो ! आप लोग प्रातःकाल ही किस | भोजन करानेके लिये शीघ्र ही अपने घर ले जायें और
प्रयोजनसे यहाँ आये हैं?' इसपर वे बोले—'हमारे | इनकी पूजा करें। इन्हें शक्ति-परीक्षणके लिये अपने घर
निवेदनयोग्य अभीष्टके अतिरिक्त और अन्य कारण | न ले जायें, ये मेरे माता-पिताके समान हैं ॥ १२-१४ ॥
आनेका नहीं है। आप जिन मुनिपुत्र विनायकको यहाँ | मैं लोगोंसे कैसे कहूँ कि वे इन्हें अपने घर ले जाकर
लाये हैं, हमारे द्वारा कहीं भी, कभी भी कुछ भी उनकी | इनकी पूजा करें। इनकी दृढ़ शक्ति देखकर मेरी इनपर
सेवा-शुश्रूषा नहीं हो सकी है ॥ ५-६ ॥ | विशेष भक्ति हो गयी है। यदि इन्होंने मेरे नगरकी रक्षा न
आपने तो अपने घरमें स्थित उनकी अनेक बार | की होती तो कहाँ आप होते और कहाँ मैं ? ॥ १५१/२ ॥
पूजा की है, आपके घरमें जो कुछ भी आता है, उसे | राजाके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर नगरके
आप हमारे घर [भी] भेज देते हैं, किंतु बड़े आश्चर्यकी | लोग पुनः बोले—हे कल्याणकर्ता राजन् ! आप जैसा
बात है कि हे राजन् ! फिर आपने इन विनायकको क्यों | कह रहे हैं, वह ठीक ही है, अनुचित नहीं है। हे
नहीं हमारे पास भेजा ?' ॥ ७१/२ ॥ | राजन् ! हमारी कार्यसिद्धि जिस प्रकार हो, आप वैसा
राजा बोले—हे नागरिको ! आप लोगोंने ठीक ही | ही करें ॥ १६-१७ ॥
कहा है कि जो वस्तु आपसमें बाँटकर खायी जाती है, | हम लोग इस बालकको अपने घर ले जाकर
वह यदि विष भी हो तो अमृतके समान हो जाती है। | इसकी यथायोग्य पूजा करेंगे। इसी बीच संसारके
इसके विपरीत अकेले खानेपर अमृत भी विष हो जाता | गुरुरूप सबके साक्षीस्वरूप वे बालक विनायक उन
है। ये चाहे देवता हों या मनुष्य, इनपर जिसकी भक्ति | सबके अन्तर्भावको जानते हुए सभामें स्थित उन
क्री०ख०-अ०२२ ] * काशीवासियोंकी विनायकको अपने-अपने घर ले जानेकी राजासे प्रार्थना * ३२५
लोगोंसे बोले - ॥ १८ ॥
विनायक बोले- आप-जैसे महान् लोग मुझे ले
जानेके लिये क्यों प्रार्थना कर रहे हैं ? मैं मुनिका पुत्र एक
सामान्य बालक हूँ। मेरी पूजाके लिये बहुत-सा धन
व्यय करनेवाले आप लोगोंको मेरी पूजासे क्या फल
मिलेगा, इसे मैं नहीं जान पा रहा हूँ ॥ १९-२० ॥
जब कभी विवाह, यज्ञोपवीत, यज्ञ अथवा कोई
महोत्सव होगा या देवकार्य अथवा पितृकार्य होगा, तब
मैं आप लोगोंके घर चलूँगा ॥ २१ ॥
आप लोग असंख्य हैं और मैं अकेला हूँ, फिर मैं
आप सबके घर कैसे जा सकता हूँ? आप-जैसे लोग
दूध देनेवाली गायको छोड़कर जिस गौने दूध देना बन्द
कर दिया है, ऐसी वकेशिनी गौको क्यों दुहना चाहते हैं ?
जिस प्रकार माँगनेवाला कोई व्यक्ति कल्पवृक्षको छोड़कर
सामान्य वृक्षसे अपनी मनोभिलषित वस्तुको माँगे अथवा
कोई तुच्छ वस्तु माँगे, उसी प्रकार आपलोग भी उत्सुक
हो रहे हैं ॥ २२-२३॥
ब्रह्माजी बोले- विनायकके वचनोंको सुनकर
प्रधान-प्रधान नागरिक पुनः कहने लगे। राजाके पुत्रके
इस विवाहके सम्पन्न हो जानेपर आप एक क्षण भी यहाँ
नहीं रुकेंगे। राजाकी कृपासे हमें आपका दर्शन हुआ है,
अब आप हमारी भक्तिको सफल बनायें। आप सर्वथा
पूर्णकाम हैं, सृष्टि, स्थिति तथा संहार करनेवाले हैं,
सर्वान्तर्यामी हैं, सबकी मनोवृत्तिको जाननेवाले हैं, कर्तुं
(करनेमें) अकर्तुं (न करनेमें) एवं सर्वथा अन्यथाकर्तुं
(विपरीत करनेमें) समर्थ हैं, फिर आप चिदानन्दको
हमारे द्वारा की गयी पूजासे कोई प्रयोजन नहीं है। 'देव
विनायक' भक्तिप्रिय हैं, वेदोंके इस वचनको आप मिथ्या
न करें ॥ २४-२७ ॥
उन नागरिक जनोंके वचनोंको सुनकर विनायक
उनसे बोले- 'आप लोगोंकी यदि ऐसी भक्ति है, तो मैं
राजाकी आज्ञा मिलनेपर आप लोगोंके घर चलूँगा' ॥ २८ ॥
विनायककी यह बात सुनकर वे सभी नगरवासी
अपने-अपने घरको चले गये। घर पहुँचकर किसीने
विनायकके स्वागतके लिये मण्डपोंका निर्माण किया,
किसीने वस्त्रोंसे आच्छादितकर [विशेष प्रकारके] मण्डप
बनाये। उन्होंने श्रद्धा-भक्तिसे तोरणद्वार बनाये, जो
दर्पणोंसे सुशोभित तथा अद्भुत थे। अत्यन्त मूल्यवान्
पात्र, सुगन्धित द्रव्य, चन्दन-कस्तूरीसे युक्त सुगन्धित
द्रव्य, फल तथा विभिन्न प्रकारके वस्त्र एवं आभूषण और
पंचामृतसे समन्वित विविध पक्वान्न वहाँ स्थापित किये।
साथ ही विविध प्रकारकी मुक्ताकी मालाओंसे विभूषित
मूर्तियोंको भी वहाँ स्थापित किया। इस प्रकार सभी लोग
इन सामग्रियोंको अपने घरोंमें सुसज्जितकर अत्यन्त
प्रफुल्लित थे ॥ २९-३२१/२ ॥
काशीनगरीकी सीमाके पास वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता
एक ब्राह्मण निवास करते थे। उनका नाम शुक्ल था।
उनकी वृत्ति - आजीविका अत्यन्त पवित्र थी। वे शान्त
प्रकृतिके, इन्द्रियोंपर संयम रखनेवाले, क्षमाशील, श्रौत
तथा स्मार्तकर्मोंमें परायण और ब्रह्मनिष्ठ थे, अतिथियोंका
सत्कार करना उन्हें अत्यन्त प्रिय था ॥ ३३-३४ ॥
उनकी पत्नीका नाम विद्रुमा था, जो महाभाग्यशालिनी
थीं, वे सब प्रकारकी इच्छाओंसे रहित और ज्ञानसे सम्पन्न
थीं। उनके शरीरके सभी अंग बहुत ही सुन्दर थे ॥ ३५ ॥
धनसे हीन होनेपर भी वे ज्ञाननिष्ठ थीं। पतिव्रता
थीं और पतिको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय माननेवाली थीं।
उनके घरसे ऊपरकी ओर देखनेपर ताराओंसे सुशोभित
आकाशमण्डल स्पष्ट दिखलायी पड़ता था ॥ ३६ ॥
उनके गृहमें सोने, चाँदी, ताँबे तथा पीतलके पात्र
नहीं थे। विद्रुमा गौरवर्णकी थीं, वे वल्कल वस्त्रोंको
धारण करनेवाली तथा तेजकी दीप्तिसे अत्यन्त सुशोभित
रहती थीं। उनकी देहकान्तिसे व्याप्त रहनेके कारण
दृश्यमान वस्तु भी दिखलायी नहीं पड़ती थी। अपने
पतिकी सामान्य-सी आजीविकासे सन्तुष्ट वे विद्रुमा
घरकी शोभाको बढ़ानेवाली थीं ॥ ३७-३८ ॥
शुक्ल नामके वे ब्राह्मण अपनी पत्नीकी सन्तोषकी
प्रवृत्ति तथा उसके विनयी स्वभाव और सेवासे बहुत
प्रसन्न रहते थे। वे भोजनसे रहित होनेपर भी अपनी
आत्मामें स्थित तथा ज्ञाननिष्ठ रहते थे ॥ ३९ ॥
एक बार जब वे भिक्षाके लिये निकले तो
३२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
विनायकके निमित्त महोत्सवमें संलग्न रहनेके कारण
लोगोंने उन्हें अपने-अपने घरसे वापस लौटा दिया ॥ ४० ॥
उन्हें भिक्षामें जो कुछ भी मिला, उसीसे सन्तुष्ट
हुए उन्होंने अपनी भार्यासे आकर कहा—'हे धर्मपत्नी !
सुनो, आज नगरीके प्रत्येक घरमें मैं भिक्षा दिये बिना ही
लौटा दिया गया ॥ ४१ ॥
पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये उद्यत जो
विनायक मुनि कश्यपके घरमें अवतरित हुए हैं,
वे ही आज पूजा ग्रहण करनेके लिये प्रत्येक घरमें
आयेंगे ॥ ४२ ॥
यदि वे पूजा ग्रहण करनेके लिये हमारे घर भी
आयेंगे तो तुम उनकी पूजाकी व्यवस्था करो।' इसपर
विद्रुमा बोली—'दूसरे घरोंमें महान् पूजाको छोड़कर
वे आपके घरमें अन्न ग्रहण करने कैसे आयेंगे ? ॥ ४३ ॥
अथवा आप-जैसे नितान्त निर्धनोंके घरमें वे कैसे
आयेंगे, हे मुने ! गन्ध, पुष्प, बासी पक्वान्न, कन्दमूल,
फल आदि जो कुछ भी अल्प मात्रामें उचित-अनुचित
होगा, उसीसे उनका सत्कार किया जायगा अथवा हे
प्रभो ! उनका आपके घरमें आनेका क्या प्रयोजन हो
सकता है ?' ॥ ४४-४५ ॥
अपनी प्रिय पत्नी विद्रुमाके इस प्रकारके वचनोंको
सुनकर वे मुनि पुनः अपनी पत्नीसे बोले—'दीनों तथा
अनाथोंके स्वामी वे प्रभु विनायक मुझे अपना भक्त
समझते हैं। वे देव विनायक भक्तिप्रिय हैं, वे प्रभु तनिक
भी लोभके वशीभूत नहीं होते। वे जल, पत्र-पुष्पसे ही
प्रसन्न हो जाते हैं ॥ ४६-४७ ॥
दम्भपूर्वक समर्पित की गयी सुवर्णकी अकूत
धनराशिसे भी वे प्रसन्न नहीं होते।' पतिके ऐसे वचन
सुनकर विद्रुमाने पुनः कहा— ॥ ४८ ॥
यदि ऐसी बात है तो जो कुछ पकाया गया अन्न
है, वही उन्हें निवेदित करें। तब विद्रुमाने अठारह
प्रकारके धान्योंको पीसकर उसे पकाया ॥ ४९ ॥
पुराने चावलोंका अधिक जलवाला भात बनाया।
वे प्रतिदिन एक मुट्ठीभर आटेको दोनेमें रखकर शेषका
भोजन बनाकर उसे ग्रहण करती थीं ॥ ५० ॥
प्रतिदिन मुट्ठीभर बचाये गये उस आटेको बेचकर
प्राप्त धनसे वे वस्त्र खरीदकर लायीं। गन्ध, अक्षत, पुष्प,
धूप, दीप, महाआरती, वन्य फल तथा वल्कल वस्त्रोंको
उन्होंने एक स्थानपर स्थापित किया। भोजनके अनन्तर
मुखको सुगन्धित करनेके लिये उन्होंने सूखे आँवलेके
टुकड़ोंको भी रखा ॥ ५१-५२ ॥
जलसे अच्छी प्रकार सींचे गये अपने आँगनमें
उन्होंने कुशोंको फैलाकर ध्वजकी स्थापना की और
आसनको बिछाया। तदनन्तर वे मुनि सर्वप्रथम नैवेद्यको
स्थापित करके बलिवैश्वदेव करनेके अनन्तर ध्याननिष्ठ
हो गये ॥ ५३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २२ ॥
तेईसवाँ अध्याय
कुमार सनक तथा सनन्दनका बालक विनायकके दर्शनके लिये काशीनरेशकी सभामें आना,
बालक विनायकका शुक्ल नामक ब्राह्मणके घरमें उसका आतिथ्य स्वीकार
करने जाना तथा शुक्ल-दम्पतीको विविध वरोंकी प्राप्ति
ब्रह्माजी बोले—वे बालक विनायक बालकोंके
साथ बड़े ही कौतूहलके साथ खेल खेलने लगे। राजा
भद्रासनपर आसीन होकर सभी जनोंके साथ वारांगनाओंका
नृत्य देखने लगे। उसी समय देवलोकसे सनक तथा सनन्दन
दो कुमार राजाकी उस रमणीय सभामें आये ॥ १-२ ॥
उन दोनोंकी सूर्य एवं अग्निके समान दीप्तिसे वह
सम्पूर्ण सभा दीप्तिमान् हो उठी। अकस्मात् उन दोनों
कुमारोंको आया हुआ देखकर वे राजा अपने आसनसे
उठ खड़े हुए ॥ ३ ॥
उन दोनोंके चरणकमलोंमें अपना सिर रखकर
राजाने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और वे दोनों हाथ
जोड़कर कहने लगे—आज मेरा कुल धन्य हो गया।
क्री०ख०-अ०२३ ] * कुमार सनक तथा सनन्दनका विनायक-दर्शनहेतु काशीनरेशके पास आना * ३२७
मेरा राज्य, ज्ञान, देह, पत्नी तथा पुत्र आदि जो कुछ भी
है, वह सब धन्य हो गया। ऐसा कहकर राजाने हाथ
पकड़कर उन दोनोंको अपने आसनपर बैठाया ॥ ४-५ ॥
तदनन्तर राजाने सोलह उपचारोंके द्वारा भक्तिपूर्वक
उनका पूजन किया और उनके चरणोंको दबाना आदि
सेवाओंके द्वारा उन्हें विश्राम कराया। वे बार-बार उन्हें
प्रणाम करके इस प्रकार कहने लगे ॥ ६ १/२ ॥
राजा बोले—दण्डका त्याग किये हुए तथा नित्य
निष्काम मुनियोंको कभी भी कोई कामना नहीं होती, तथापि
मैं अपने तप, राज्य, कुल तथा शीलको सार्थक बनानेके
लिये आप लोगोंकी सेवाकी इच्छा करता हूँ ॥ ७-८ ॥
वे दोनों बोले—महर्षि कश्यपके पुत्र विनायक
जो आप्तकाम, परब्रह्मस्वरूप, लीलावतारी भगवान् आपके
घरमें स्थित हैं, वे अद्भुत पराक्रमशाली हैं और नाना
प्रकारके कौतुक करनेवाले हैं। उनके अद्भुत कर्मोंके
विषयमें सुनकर हम दोनों उनका दर्शन करनेके लिये
यहाँ आये हैं ॥ ९-१० ॥
इसके अतिरिक्त इन्द्रभवनसे यहाँ आनेका हमारा
दूसरा कोई प्रयोजन नहीं है। जिसके घरमें ही कल्पवृक्ष
है, वह दूसरोंसे क्या याचना करेगा ? ॥ ११ ॥
हे राजन् ! उनके चरणकमलोंमें प्रणाम करके हम
अपने स्थानको चले जायँगे। उनके वहाँ आकर इस
प्रकारके कहे गये वचनोंको सुनकर बालक विनायक खेल
छोड़कर हाथमें मोदक लेकर वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने
अपने हाथमें पाँच खाद्य पदार्थोंसे बना हुआ भक्षणीय
मोदक लीलापूर्वक धारण किया हुआ था ॥ १२-१३ ॥
राजाने उन दोनोंको मधुर हास्य करते हुए बालक
विनायकको दिखाया और कहा—वे ये देव विनायक आ
गये हैं, जिनके दर्शनोंके लिये आप लोग उत्सुक हैं। वे
आ गये हैं, अब आप लोगोंका जो अभीष्ट करणीय है,
उसे सम्पन्न करें। उनका दर्शन करके वे दोनों मुनि सनक
तथा सनन्दन आपसमें कहने लगे ॥ १४-१५ ॥
इसने निश्चित ही मुनिश्रेष्ठ कश्यपजीको भी दूषित
कर डाला है; क्योंकि उनका पुत्र होते हुए भी इसने
अपने सदाचारका परित्याग कर दिया है ॥ १६ ॥
स्पृश्य तथा अस्पृश्यके विषयमें इसका कोई विचार
नहीं है और न इसे भक्ष्याभक्ष्यकी विधि ही ज्ञात है।
इसके दर्शन करने तथा इसका स्पर्श करनेमें भी निश्चित
ही महान् दोष है ॥ १७ ॥
यह अपने ब्राह्मणवर्णोचित नियमोंका परित्यागकर
क्षत्रियके घरमें किसलिये रह रहा है ? स्वधर्ममें स्थित
हम लोगोंका इसके दर्शनसे क्या फल है ? ॥ १८ ॥
उस समय राजाके समीप स्थित उन विनायकदेवने
उन दोनोंके वचनोंको सुना। तब वाक्यार्थको जाननेवाले
साक्षात् दूसरे बृहस्पतिके समान वे विनायक बोल पड़े।
हे मुनियो ! व्यर्थ ही श्रम करनेवाले आप लोगोंका ज्ञान
कहाँ चला गया ? आप लोग स्वर्गलोकका परित्यागकर एक
सामान्य व्यक्तिकी भाँति यहाँ कैसे आये हैं ? ॥ १९-२० ॥
तदनन्तर मायामय देव विनायककी मायासे अत्यन्त
मोहित वे दोनों कुमार विनायकका इस प्रकारका वचन
सुनकर राजासे कहने लगे— ॥ २१ ॥
हमें अनुज्ञा प्रदान कीजिये, हम अपने आश्रम-
मण्डलको जाते हैं। तब नृपश्रेष्ठ काशीनरेश उन दोनोंके
प्रति दृढ़ भक्तिसे प्रेरित होकर उन दोनोंसे बोले—आप
मेरी बात सुनें और कुछ देरके लिये ठहर जायँ। पुनः
उन्होंने भक्तिपूर्वक प्रार्थना की कि आपलोग स्नान करके
भोजन करें, तदनन्तर ही जायँ ॥ २२-२३ ॥
राजाकी प्रार्थना सुनकर वे दोनों मुनिश्रेष्ठ बोले—
राजाका अन्न भक्षण करना वर्जित है, अतः हम दोनों
यहाँसे जा रहे हैं ॥ २४ ॥
तदनन्तर राजाकी अनुमति प्राप्तकर वे दोनों
मणिकर्णिकातीर्थमें गये। इधर बालक विनायक अपने
साथ आ रहे सभी बालकोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक क्रीडा
करते हुए स्नान करनेके अनन्तर उन शुक्ल नामक
ब्राह्मणकी भक्तिका आदर करके उनके घरमें उसी प्रकार
प्रविष्ट हुए, जैसे कि कोई गौ अपने बछड़ेके पीछे दौड़ती
है, जैसे माता रोते हुए शिशुके समीप जाती है और जैसे
कौरवोंकी सभाके मध्यमें स्थित शरणागत द्रौपदीके पास
भगवान् कृष्ण गये थे ॥ २५-२६ १/२ ॥
उन विनायकदेवका दर्शन करके वे दम्पती उनके
३२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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चरणोंपर गिर पड़े। आनन्दके कारण अपने नेत्रोंसे आँसू
गिराते हुए उन दोनोंने गद्गद वाणीमें बोलते हुए बड़ी
ही प्रसन्नताके साथ उनका आलिंगन किया और
हर्षनिर्भर होकर वे दोनों नाचने लगे ॥ २७-२८ ॥
उन्हें अपनी देहकी सुध-बुध नहीं रही, इस समय
क्या करना चाहिये—इसे वे जान न सके। उन दोनोंके
शरीरमें रोमांच हो आया और वे अपने नेत्रोंसे आँसुओंकी
धारा बहाने लगे ॥ २९ ॥
मुहूर्तमात्र बीत जानेपर जब उन्हें होश आया तो
उन्होंने उन जगदीश्वरको प्रणाम किया। तदनन्तर मुनि
शुक्ल उन देव विनायकसे कहने लगे—आपका 'दीनानाथ'
यह जो अत्यन्त कल्याणकारी तथा पापोंका हरण करनेवाला
नाम तीनों लोकोंमें विख्यात है, उसे आज आपने सार्थक
कर दिया है और अपने चरणोंका दर्शन कराकर हमारा
जन्म लेना भी सार्थक कर दिया है ॥ ३०-३१ ॥
आप बड़े-बड़े गगनचुम्बी भवनोंको छोड़कर हमारी
इस पर्णकुटीमें आये हैं। आज मेरा वंश धन्य हो गया। मेरा
जीवन धन्य हो गया। मेरा ज्ञान धन्य हो गया। मेरी तपस्या
धन्य हो गयी और मेरी आयु धन्य हो गयी। तदनन्तर उन
मुनिने उन विनायकदेवको कुशासनमें विराजमान कराकर
उनकी पूजा की। उनके युगलचरणोंका प्रक्षालन करके
उस जलको अपने सिरमें धारण किया ॥ ३२-३३ ॥
तदनन्तर गन्ध, अक्षत, पुष्पमाला, धूप, दीप,
दूर्वांकुर, शमीपत्र, सुगन्धित तेल तथा शुभ केतकी पुष्प
अर्पित किया। इसके अनन्तर उनके सामने अल्पमात्रामें
खाद्य नैवेद्य तथा वन्य फलोंको निवेदित किया। तदनन्तर
मन्त्रोंसे पवित्र की गयी पुष्पांजलि देकर और उन्हें प्रणाम
करके वे मुनि लज्जित हो उठे। यह सोचकर कि किस
प्रकार इन्हें हम निकृष्ट अन्न भोजनके लिये प्रदान
करें! ॥ ३४-३५१/२ ॥
उनके अभिप्रायको जानकर देवाधिदेव विनायकने
उन ब्राह्मणकी पत्नीसे भोजनकी याचना करते हुए
कहा—हे मातः! आपके घरमें कौन-सा भोजन बना है।
उसे मुझे प्रदान करें। भक्तिपूर्वक दिया गया क्षुद्र अन्न
भी मुझे अमृतसे बढ़कर प्रिय लगता है और जो भोजन
श्रद्धारहित होकर दम्भपूर्वक दिया जाता है, वह विषके
समान हो जाता है ॥ ३६-३७१/२ ॥
तदनन्तर मुनिपत्नीने अत्यन्त लज्जाके साथ पात्रमें
फैला हुआ भात और बहुतसे अन्नोंके मिश्रणसे बनायी
गयी सूखी पीठीको विनायकके आगे स्थापित किया।
भोजनके लिये उपस्थित उस तेल (-के समान तरल
पदार्थ)-को देखकर अन्य सभी बालक विनायकपर हँस
पड़े ॥ ३८-३९ ॥
विनायकदेवने वह निवेदित भोजन स्वादिष्ट
पक्वान्नकी भाँति बड़े ही आदरभावसे ग्रहण किया। वे
प्रत्येक ग्रासके अनन्तर जल पीकर बलपूर्वक उसे निगल
रहे थे। तदनन्तर मुनिने सारा गीला भात उनके भोजनपात्रमें
डाल दिया। तब वह गीला भात पात्रकी चारों दिशाओंमें
फैलकर बहने लगा और वे बालक विनायक उसे
रोकनेमें असमर्थ हो गये ॥ ४०-४१ ॥
तब बालक विनायकने दस भुजाओंवाला बनकर
उन हाथोंसे वह सारा भात ग्रहण किया। लोगोंने
आश्चर्यपूर्वक उन्हें देखा और वे हँसते हुए हाथसे ताली
पीटने लगे ॥ ४२ ॥
घुटनेतक पानीमें पकाया गया यह अभूतपूर्व
क्री०ख०-अ०२४] * काशीमें विनायकद्वारा एक ही समयमें अनेक घरोंमें भोजन करना * ३२९
भोजन है—ऐसा कहते हुए वे बालक बड़ी ही रुचिसे
उस भोजनको खीरके समान समझते हुए खाने
लगे॥ ४३ ॥
जिन बालकोंने उन विनायकके साथ वह भोजन
किया, वे देवोंके समान (तेजोमय) हो गये थे और
दूसरे जिन्होंने भोजन नहीं किया और जो दाँत खोलकर
उन विनायककी हँसी उड़ा रहे थे, वे बादमें पश्चात्ताप
करने लगे। उस समय काशीनगरीमें यह कोलाहल
होने लगा कि 'बालक विनायक कहाँ चला गया?'
कुछ लोगोंने बताया कि वे विनायक शुक्ल नामक
ब्राह्मणके घरमें शीर्ण भात खा रहे हैं॥ ४४-४५ ॥
उन्होंने उस गीले भातको बहनेसे रोकनेके लिये
अपने दस हाथ बना लिये और उन्हीं हाथोंसे वे भोजन
कर रहे हैं। बालक विनायकद्वारा भोजन कर लिये
जानेके अनन्तर मुखशुद्धिके लिये ब्राह्मण शुक्लने उन्हें
सूखे आँवलेके टुकड़े दिये॥ ४६॥
तब जगदात्मा विनायकने उनके द्वारा मुखशुद्धि
की। तदनन्तर प्रसन्न होकर उन्होंने ब्राह्मण शुक्लसे
कहा—हे अनघ! मैं आपके प्रीतिभावसे अत्यन्त प्रसन्न
हुआ हूँ। हे महाभाग! आप जो भी वर चाहते हैं, वह
मुझसे माँग लें॥ ४७१/२ ॥
शुक्ल बोले—आप सभी नगरनिवासियोंको छोड़कर
मेरे यहाँ रूखा-सूखा भोजन करनेके लिये आये। मेरे लिये
यही वरदान है, जो कि मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ है।
तथापि आपके कथनानुसार मैं आपकी अखण्ड भक्तिकी
अभिलाषा करता हूँ॥ ४८-४९॥
हे विनायक! अन्तमें मुझे मोक्ष प्राप्त हो, जिससे
कि पुनः इस संसारमें मुझे आना न पड़े। मेरा मन
सांसारिक सुखोंमें नहीं लगता है॥ ५०॥
ब्रह्माजी बोले—'ऐसा ही होगा' कहकर वे
विनायक पहलेकी भाँति दो हाथोंवाले बालक बन
गये। उन्होंने उनके घरको इन्द्रके भवनसे भी सुन्दर,
उत्तम रत्नोंसे युक्त तथा सुवर्णमय बना दिया। उन्हें
उत्तमोत्तम स्वरूप, ज्ञान तथा धन-वैभव प्रदान किया।
तदनन्तर उन ब्राह्मण-दम्पतीसे अनुमति लेकर बालकोंसे
घिरे हुए वे विनायक अन्यत्र चले गये॥ ५१-५२॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालचरित्रके अन्तर्गत शुक्ल ब्राह्मणको वर प्रदान करनेका वर्णन'
नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २३॥
चौबीसवाँ अध्याय
काशीनगरीमें विनायकके द्वारा एक ही समयमें अनेक घरोंमें भोजनादि सम्पन्न करना तथा
सनक-सनन्दनको अपने विविध स्वरूपोंका दर्शन कराकर विवेकज्ञानकी प्राप्ति कराना
ब्रह्माजी बोले—काशीनगरीके समस्त लोग पूजाकी
सामग्री तथा अनेक प्रकारकी भोजन-सामग्रीको एकत्रित
करके उन विनायककी प्रतीक्षा करने लगे॥ १॥
वे लोग उस समय प्रत्येक घरमें, राजभवनमें तथा
सभी अमात्योंके घरोंमें भी कश्यपनन्दन उन विनायकको
ढूँढ़ने लगे॥ २॥
वे सभी लोग यही पूछ रहे थे कि क्या विनायकको
कहीं देखा है? जिनके विषयमें वेद भी 'नेति-नेति'
कहते हैं, क्या किसीने उन्हें देखा है? वहाँ उपस्थित
सभी लोग कहने लगे कि हमने उन्हें नहीं देखा है। उस
काशीनगरीकी सीमामें स्थित लोगोंने जब यह बात सुनी
तो उन्होंने बताया कि वे विनायक शुक्ल नामक
ब्राह्मणके घरमें आये हुए हैं। तदनन्तर सब लोग उनके
घर गये। जब उन्होंने वहाँ भी विनायकको नहीं देखा
तो उन्होंने उन ब्राह्मणसे पूछा, तो उन्होंने बताया कि वे
यहाँसे चले गये हैं॥ ३-५॥
वे मायामय विनायक वहाँके लोगोंको वंचित
करनेके लिये उत्सुक होकर साथके बालकोंको छोड़कर
पीछेके दरवाजेसे आकर घरमें सो गये॥ ६॥
किसीने उन्हें गुफामें सिंहकी भाँति सोया हुआ
३३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
देखा। कुछने क्रोधित होकर उनकी निन्दा करते हुए
कहा-यह तुच्छ बालक पिशाचके समान उस दरिद्र
ब्राह्मणके घरमें क्यों गया? यदि यह ईश्वर है और
सभीके मनोभावोंको जाननेवाला है, तो इसे सभीका प्रिय
करना चाहिये। तदनन्तर उन (विनायक)-को उठाकर
हाथमें पकड़कर उन्होंने कहा- हमारे शुभ भवनमें चलें
और हमने आपके लिये जो सामग्री एकत्रित की है, उसे
सफल करें ॥ ७-९॥
आपके चरणकमलोंका दर्शन करके हमें जो
आपको ढूँढ़नेमें कष्ट हुआ था, वह दूर हो गया है। अब
आप बालकोंके साथ भोजन करनेके लिये हमारे घरोंको
चलें। उन्होंने कहा-इस समय तो मैंने भोजन कर लिया
है, तब उन लोगोंने पुनः उनसे कहा- उस भिक्षा
माँगनेवाले ब्राह्मणके घरमें आपने क्या खाया होगा? हे
विभो! ऐसे व्यक्तिके घरमें तो जलतक नहीं पिया जाता,
फिर आपने वहाँ भोजन क्यों किया? ॥ १०-१११/२॥
गणेशजी बोले- मेरा पेट बहुत भरा हुआ है,
इस समय मुझमें चलनेकी भी शक्ति नहीं है ॥ १२ ॥
ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर यह जानकर कि इन्होंने
शुक्ल ब्राह्मणके घरमें भोजन किया है, वे सभी निराश, भग्न-
मनोरथ, रुष्ट, अनाथ तथा चेतनाहीन-से हो गये ॥ १३ ॥
हमारे द्वारा बड़े कष्टपूर्वक तथा धन व्यय करके
संग्रह की गयी सब सामग्री व्यर्थ चली गयी। ऐसा कहते
हुए उन दुष्टजनोंने; जो कि दाम्भिक थे और भक्तिसे
रहित थे, सब सामग्री स्वयं खा ली ॥ १४ ॥
जो लोग विनायकके वास्तविक भक्त थे, वे निराहार
रहकर और उनके ध्यानमें निरत हो गये। इस प्रकार सभी
लोगोंको ध्यानपरायण जानकर वे विनायक एक होते हुए
भी उसी प्रकार नाना स्वरूपवाले हो गये, जैसे कि एक
ही आकाश विभिन्न घटोंमें विभिन्न स्वरूपोंवाला हो
जाता है और जैसे एक ही सूर्य जलसे भरे अनेक कलशोंमें
अनेकविध दिखायी देता है ॥ १५-१६ ॥
वे विनायक कहीं पलंगपर सो रहे थे, कहीं जपमें
तल्लीन थे, कहीं दान देनेमें निरत दिखायी दे रहे थे, तो
कहीं भोजन करनेके लिये उत्सुक दिखायी दे रहे थे।
कहीं वे शिष्योंको शिक्षा, कल्प आदि वेदांगोंके सहित
वेदोंके अर्थको पढ़ा रहे थे, कहीं शास्त्रकी व्याख्या करते
दिखायी दे रहे थे, तो कहीं स्वयं अध्ययनमें निरत
दिखायी दे रहे थे ॥ १७-१८॥
इस प्रकार वे विविध स्वरूपोंके द्वारा विभिन्न घरोंमें
स्थित हुए। सभी लोग यही समझ रहे थे कि ये विनायक
सबसे पहले हमारे ही घर आये ॥ १९ ॥
उन्होंने उन विनायकको तेल, उबटन, स्नानकी
सामग्री तथा भोजन प्रदान किया। इस प्रकार काशिराज-
सहित समस्त नगरवासी अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ २० ॥
उन विनायकदेवका दर्शनकर लोगोंने परम प्रसन्नताके
साथ उनका पूजन किया। उन्हें भोजन कराया, साथ ही
ब्राह्मणों तथा बन्धु-बान्धवोंको भी भोजन कराया ॥ २१ ॥
सभी लोगोंने अपनी-अपनी रुचिके अनुसार पंचामृत,
पक्वान्न, विविध व्यंजन, खीर और ओदन तथा जो-जो
भी अच्छा लगा, उसका भोजन किया। इस प्रकार ब्राह्मणों,
देवताओं, काशिराज तथा मित्रगणोंके भी भोजन कर चुकनेपर
सभामें विराजमान काशिराज अनेक स्वरूप धारण करनेवाले
मुनि कश्यपके पुत्र उन विनायककी मायासे मोहित होकर
इस प्रकार पूछने लगे - ॥ २२- २३१/२ ॥
राजा बोले- वे विनायकदेव भोजन करनेके लिये
अनेक घरोंमें गये हैं - यह तो स्पष्ट है, किंतु ये तो मेरे
समीपमें ही स्थित हैं। फिर घर-घरमें जाकर कौन भोजन
कर रहा है? कहीं ये विनायक डोलीमें चढ़कर भोजन
करनेके लिये जा रहे हैं, तो कहीं हाथीमें आरूढ़ होकर
जा रहे हैं और कहीं घोड़ेपर सवार होकर जा रहे हैं।
इस प्रकारसे जब [काशिराज ऊहापोहमें पड़े थे और]
सभी लोग बालक विनायककी पूजामें संलग्न थे, उसी
समय दोनों कुमार सनक और सनन्दन स्नान करनेके
अनन्तर सम्पूर्ण नित्यकर्म सम्पन्न करके भिक्षाके लिये
उस काशीनगरीमें भ्रमण करने लगे ॥ २४-२७ ॥
वे दोनों सनक तथा सनन्दन जिस-जिस घरमें
भिक्षा माँगने गये, वहाँ-वहाँ उन्होंने विनायकको भोजन
क्री०ख०-अ०२४ ] * काशीमें विनायकद्वारा एक ही समयमें अनेक घरोंमें भोजन करना * ३३१
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[बायाँ स्तम्भ]
करते हुए देखा ॥ २८ ॥
किसी घरमें वे आसनपर शयन करते हुए दिखायी
पड़े। कहीं फलोंका भक्षण करते हुए दिखायी दिये।
कहीं ताम्बूलका सेवन करते हुए तो कहीं गन्ध आदि
द्रव्योंसे अनुलेपित दिखायी दिये ॥ २९ ॥
कहीं अपने गणोंके साथ गणिकाओंका नृत्य देखते
हुए दिखायी दिये। कहीं अपने बुद्धि-कौशलसे अक्षक्रीडा
करते हुए दिखायी दिये ॥ ३० ॥
कहींपर वे विविध प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत
तो कहीं दिव्य वस्त्रोंको धारण किये हुए दिखायी दिये।
कहींपर वे स्वयं अध्ययन करते हुए, कहींपर जप करते
हुए तो कहींपर ध्यानपरायण दिखायी दिये ॥ ३१ ॥
कहींपर भक्तोंद्वारा उनकी स्तुति की जा रही थी।
कहींपर वे विनायक जगदीश्वरकी स्तुति कर रहे थे।
कहींपर अपने भक्तोंको अपनी विविध विभूतियोंका दर्शन
कराते हुए वे दिखलायी पड़े ॥ ३२ ॥
उन सनक-सनन्दनाने कहींपर अपनी मनोरम पत्नियोंके
साथ रमण करते हुए युवा पुरुषके रूपमें उनको देखा।
कहींपर वे वृद्धजनोंकी चिकित्सा करते हुए चिकित्सकके
रूपमें तो कहीं-कहीं उत्तम रसायनोंका सेवन करते हुए
उन्होंने विनायकको देखा ॥ ३३ ॥
कहींपर वे विनायक आँगनमें रेंगते हुए मिट्टी
खाते हुए दिखायी दिये, तो कहीं वे गेंद आदिकी
क्रीड़ासे थककर जल पीते हुए दिखायी दिये ॥ ३४ ॥
इस प्रकार वे दोनों कुमार सनक और सनन्दन घर-
घर घूमते हुए अत्यन्त थकित तथा भूखे हो गये थे। सभी
घरोंमें उन विनायकको देखकर वे आपसमें ही इस प्रकार
कहने लगे— ॥ ३५ ॥
इस काशीनगरीमें शुक्ल नामक ब्राह्मण अत्यन्त
पवित्र तथा निर्मल हैं, अतः हम लोग भोजनके लिये वहाँ
चलें, ऐसा कहकर वे दोनों उनके घर गये ॥ ३६ ॥
वहाँ भी उन दोनोंने उनके आँगनमें स्थित उन
[दायाँ स्तम्भ]
विनायकको देखा, यहाँ विनायकके बिना कोई घर बचा
नहीं है, अतः इस नगरमें भोजन नहीं करना चाहिये ॥ ३७ ॥
ऐसा कहकर जब वे बाहर आये तो अपने सामने
विनायकको स्थित देखकर वे दोनों तिरछे चलने लगे,
वहाँ भी उन्होंने अपने सामने उन विनायकको देखा ॥ ३८ ॥
उन्होंने पूर्व, पश्चिम आदि चारों दिशाओंमें तथा
ऊपर और नीचे सर्वत्र विनायकको ही व्याप्त देखा ॥ ३९ ॥
तदनन्तर उन्होंने विनायकके विश्वरूपको देखा।
उन्होंने जगत्की समस्त वस्तुओंको विनायकमय देखा ॥ ४० ॥
अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर जब उन्होंने विष्णु
तथा शंकरका ध्यान किया तो अपने हृदयमें भी उस
समय उन विनायकको ही स्थित देखा ॥ ४१ ॥
फिर उन मुनिश्रेष्ठोंने जब अपने नेत्रोंको बन्द किया
तो अपने हृदयमें वे ही विनायक स्थित दिखायी दिये और
नेत्रोंको खोलनेपर भी अपने हृदयके भीतर उन विनायकको
ही स्थित देखा ॥ ४२ ॥
उस समय वे विनायक मुकुट, कुण्डल तथा
मोतियोंकी मालाको धारण किये हुए थे। श्रेष्ठ बाजूबन्द,
सुवर्णमय कटिसूत्र तथा मुद्रिकाओंसे वे विभूषित थे।
वे सिंहपर विराजमान थे। उनकी दस भुजाएँ थीं। वे
सिद्धि तथा बुद्धि नामक पत्नियोंसे समन्वित थे। उनका
स्वरूप अत्यन्त मंगलमय था। उन्होंने अपने मस्तकपर
चन्द्रमाको धारण कर रखा था और कस्तूरीका तिलक
लगाया हुआ था। उन विनायकने सर्पको आभूषणके
रूपमें धारण किया हुआ था। करोड़ों सूर्योंके समान
उनकी आभा थी। वे सृष्टि, स्थिति तथा संहारके
कारणरूप थे ॥ ४३-४४१/२ ॥
उन्हींकी कृपासे उन दोनों मुनीश्वरों सनक तथा
सनन्दनने विवेक-ज्ञान प्राप्त किया। तदनन्तर उन दोनों
तत्त्वज्ञानियोंने भेददृष्टिका परित्यागकर उन विनायकदेवके
चरण-कमलोंमें प्रणाम किया और अत्यन्त भक्तिभावसे
उन देवदेव विनायककी स्तुति की ॥ ४५-४६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'काशीमें विनायकके [द्वारा एक ही समयमें अनेक गृहोंमें] भोजनादि
[क्रियाओंको सम्पन्न करना तथा सनक-सनन्दनको बोधकी प्राप्ति]-का वर्णन' नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥
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