श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
हे द्विजश्रेष्ठ! अब मैं एक प्राचीन कथा कहूँगा,
उ०ख०-अ०१२] * ब्रह्मा, विष्णु और शिवको भगवान् गणेशके दर्शन * ६५
हे द्विजश्रेष्ठ! अब मैं एक प्राचीन कथा कहूँगा,
जिसमें बताया गया है कि कैसे इस मन्त्रराजके जपसे
गजानन गणेशजी प्रसन्न हुए॥ १९१/२ ॥
किसी समय दैवयोगसे प्रलयकाल उपस्थित हो
गया। उस समय वायुवेगसे पर्वत छिन्न-भिन्न होकर
चारों दिशाओंमें गिर पड़े। बारहों सूर्य महान् जलराशिका
शोषण करके तपने लगे। ज्वालामालाओंसे युक्त महान्
अग्नि सम्पूर्ण सृष्टिको जलाने लगी। [तत्पश्चात्]
महामेघ संवर्तक चारों ओर वर्षा करने लगे। उनकी वह
वर्षा हाथीकी सूँडसे गिरती हुई जलधाराके समान थी।
समुद्र और नदियाँ भी अपनी सीमाका उल्लंघन कर रहे
थे। इस प्रकार ब्रह्मासे लेकर स्थावर आदि सभी
[पदार्थ] विनष्ट हो गये ॥ १२-१५१/२ ॥
इस प्रकार प्रकृतिकी विकाररूपा मायामय सृष्टिके
नष्ट हो जानेपर भगवान् गजानन गणेशजी अणुसे भी
अणुतर (सूक्ष्म) रूप धारण करके कहीं स्थित हो गये।
तत्पश्चात् बहुत समय बीत जानेपर [सब ओर] व्याप्त
गहन अन्धकारमेंसे उस नादयुक्त एकाक्षर ब्रह्म (गं)-
का आविर्भाव हुआ। अपने आनन्दमय स्वरूपमें स्थित
वही वैकारिक ब्रह्म अर्थात् नादविशिष्ट अक्षरब्रह्म पुनः
मायाशक्तिको स्वीकार करके गजानन स्वरूपमें प्रकट हो
गया। तदनन्तर उन (गजानन)-से ही सत्त्व, रज और
तमोगुण उत्पन्न हुए ॥ १६-१९॥
तत्पश्चात् उनसे ही विष्णु, ब्रह्मा और शिव—ये
तीनों भी उत्पन्न हुए और उन (गणेश)-की मायासे ही
स्थावर-जंगमात्मक त्रैलोक्यकी रचना हुई ॥ २० ॥
तदुपरान्त उनकी मायासे भ्रान्त वे तीनों देवता
(ब्रह्मा, विष्णु और शिव) अपने उस जन्म देनेवाले
(जनक)-को देखने और उससे यह पूछनेके लिये कि
हमें 'कौन-सा कार्य करना चाहिये', उत्सुकतापूर्वक
भटकने लगे। हे मुने! इस जिज्ञासासे उन्होंने पहले
ऊपरकी ओर जाकर इक्कीस स्वर्ग (आदि)-लोकोंको
देखा और तत्पश्चात् अन्तरिक्षमें तिरछे जाकर फिर
पातालमें गये। तब भी परमात्मा (गणेशजी)-का दर्शन
न होनेपर उन्होंने अत्यन्त घोर तपस्या की ॥ २१-२३ ॥
वे निराहार रहते हुए दिव्य सहस्र वर्षोंतक जप-
परायण रहे। [उस श्रमसे] थककर और उदास होकर
वे पुनः पृथ्वीपर आ गये ॥ २४ ॥
पृथ्वीपर [उन परमात्माकी] खोज करते हुए वे
[परमात्माके] दर्शनार्थ वनों, उपवनों, सरिताओं, सागरों,
पर्वतों, शिखरों और गृहोंमें गये ॥ २५ ॥
तदनन्तर उन्होंने अपने समक्ष एक महान् जलाशयको
देखा, जो अनेक प्रकारके जलचर प्राणियों, वृक्षों और
अनेक प्रकारके पक्षियोंसे समन्वित था ॥ २६ ॥
[वह सरोवर] कमलोंसे आच्छादित तथा कमलनाल
खाते हुए बगुलों, चक्रवाकों, हंसों और बत्तखोंके
कलरवसे निनादित था ॥ २७ ॥
हे मुने! अनेक प्रकारकी तरंगोंसे युक्त, मनुष्योंके
लिये अत्यन्त दुस्तर, मछलियों और मगरमच्छोंसे भरे हुए
उस महान् जलाशयमें स्नान करके और उसके किनारे
विश्राम करके जब वे सरोवरको पारकर आगे बढ़े तो उन्होंने
प्रलयकालीन अग्निके सदृश, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान,
अत्यन्त कठिनाईसे देखे जा सकनेवाले तेजःपुंजको अपने
समक्ष देखा। उस तेजके प्रभावसे उन्हें दिखायी देना बन्द
हो गया और वे अत्यधिक चिन्तामें पड़ गये ॥ २८-३० ॥
तब वे आकाशमार्गसे चलकर उस तेजःपुंजके
मध्यसे बाहर निकल गये। उस समय वे भूख-प्यास और
परिश्रमसे थके होनेके कारण बार-बार [गहरी] साँस ले
रहे थे। [उस समय] वे अपनी ही निन्दा कर रहे थे
और अपनेको ही कोस रहे थे तथा भयके कारण
व्याकुल थे। तब अत्यन्त करुणामय, लोकाध्यक्ष,
अखिलार्थविद् गणेशजीने उन्हें मन और नेत्रोंको आनन्दित
करनेवाले अपने रूपका दर्शन कराया। उनके पैरकी
अँगुलियोंके नखोंकी शोभाने लाल कमलके केसरकी
शोभाको जीत लिया था। उनके रक्तवर्णके वस्त्रोंकी
प्रभाने सन्ध्याकालीन सूर्यमण्डलकी आभाको जीत लिया
था। उनके कटिप्रदेशमें बँधी करधनीकी प्रभाने सुमेरुपर्वतके
शिखरोंकी प्रभाको फीका कर दिया था ॥ ३१-३४ ॥
उनके चारों सुन्दर हाथोंमें खड्ग, खेट, धनुष और
शक्ति सुशोभित हो रहे थे। उनकी नासिका अत्यन्त
६६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
सुन्दर थी और उनके मुखकमलकी कान्तिने पूर्णिमाके
चन्द्रमाकी कान्तिको जीत लिया था। कमलसदृश उनके
सुन्दर नेत्र दिन-रात प्रभासे युक्त रहते थे। अनेक सूर्योंकी
शोभाको जीत लेनेवाले मुकुटसे उनका मस्तक देदीप्यमान
था॥ ३५-३६ ॥
प्रकार] उनके एक दन्तकी शोभा भगवान् वराहकी
दंष्ट्राकी शोभाको जीत रही थी॥ ३७॥
हे मुने ! उनकी सुन्दर सूँड़ ऐरावतादि दिग्गजोंको
भी भयभीत कर रही थी। उन देव गणेशको सहसा देखते
ही उन [ब्रह्मादि] देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें प्रणाम
किया। तदनन्तर उनके कमलवत् चरणोंका स्पर्श करके
उनकी स्तुति करने लगे ॥ ३८ ॥
उनके उत्तरीयकी कान्ति अनेक नक्षत्रोंसे समन्वित
गगनमण्डलकी शोभाको भी जीत ले रही थी। [इसी
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'गजाननदर्शन' नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥
तेरहवाँ अध्याय
ब्रह्मा, विष्णु और महेशका भगवान् गणेशकी स्तुति करना तथा गणेशजीका अपने उदरमें
स्थित असंख्य ब्रह्माण्डोंका उन्हें दर्शन कराना
व्यासजीने कहा- [हे ब्रह्मन्!] पाँच मुखोंवाले
शिव, चार मुखोंवाले ब्रह्मा और सहस्र मस्तकोंवाले
विष्णु*ने उन वरदायक देव गजानन गणेशजीका स्तवन
कैसे किया था?॥ १॥
ब्रह्माजी बोले- कृपा करनेके लिये उन्मुख विघ्नराज
गणेशजीकी कृपादृष्टि पड़नेसे बुद्धिकी निर्मलताको प्राप्तकर
ब्रह्मा, विष्णु और शिवने उनकी स्तुति की ॥ २ ॥
ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर बोले- जो अजन्मा,
विकल्परहित, निराकार, अद्वितीय, निरालम्ब, अद्वैत,
आनन्दसे पूर्ण, सर्वोत्कृष्ट, निर्गुण, निर्विशेष, निरीह एवं
परब्रह्मस्वरूप हैं; उन गणेशका हम भजन करें ॥ ३ ॥
जो तीनों गुणोंसे परे हैं, आदि (सर्वप्रथम उत्पन्न
होनेवाले) हैं, जो चिदानन्दस्वरूप, चिदाभासक, सर्वव्यापी,
ज्ञानगम्य, मुनियोंके ध्येय, आकाशस्वरूप एवं परमेश्वर
हैं; उन परब्रह्मरूप गणेशका हम भजन करें ॥ ४ ॥
जो जगत्के कारण हैं, जिनका स्वरूप कारणज्ञानसे
परे है, जो देवताओं, सुखों और युगोंके आदिकारण हैं,
जो गणोंके स्वामी, विश्वव्यापी, जगद्वन्द्य तथा देवेश्वर
हैं; उन परब्रह्मस्वरूप गणेशका हम भजन करें ॥ ५ ॥
जो रजोगुणके योगसे ब्रह्माका रूप धारण करते हैं,
वेदोंके ज्ञाता हैं और सदा सृष्टिकार्यमें संलग्न रहते हैं,
जिनका पारमार्थिक रूप मनसे अचिन्त्य है, जो जगत्की
उत्पत्तिके हेतुभूत तथा समस्त विद्याओंके निधान हैं, उन
'ब्रह्मरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ ६ ॥
जो सदा सत्त्वगुणसे युक्त हैं, आनन्दसे क्रीडा करते
रहते हैं, देवशत्रुओंका नाश करते हैं और जगत्के रक्षण-
कार्यमें संलग्न रहते हैं, जो अनेक अवतार लेते रहते हैं
तथा अपने भक्तोंके अज्ञानका हरण करनेवाले हैं; उन
'विष्णुरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ ७ ॥
जो तमोगुणके सम्पर्कसे रुद्ररूप धारण करते हैं,
जिनके तीन नेत्र हैं, जो जगत्के हर्ता, तारक और ज्ञानके
हेतु हैं तथा अनेक आगमोक्त वचनोंद्वारा अपने भक्तजनोंको
सदा तत्त्वज्ञानोपदेश देते रहते हैं, उन 'शिवरूप' गणेशको
हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ ८ ॥
जो अन्धकारराशिके नाशक, भक्तजनोंके अज्ञानके
निवारक, तीनों वेदोंके सारस्वरूप, साक्षात् परब्रह्म,
मुनियोंको ज्ञान देनेवाले, विकारोंसे सदा दूर रहनेवाले हैं;
उन 'सूर्यरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ ९ ॥
जो अपने किरण-समूहसे औषधियोंको तृप्त एवं
पुष्ट करते हैं, अमृतवर्षिणी कलाओंद्वारा देवसमुदायको
तृप्त किया करते हैं, सूर्य-किरणोंसे उत्पन्न संतापको हर
लेते हैं और द्विजों (ब्राह्मणों एवं नक्षत्रों)-के राजा हैं;
- सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। (यजु० ३१।१)
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:
उ०ख०-अ०१३ ] * ब्रह्मा, विष्णु और महेशका भगवान् गणेशकी स्तुति करना * ६७
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[बायाँ स्तम्भ]
उन 'चन्द्रस्वरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ १० ॥
जो प्रकाशस्वरूप, आकाश एवं वायुरूप, विकारों आदिके हेतुभूत, कला और कालरूप हैं, अनेक क्रियाओंकी अनेकानेक शक्तियाँ जिनकी स्वरूपभूता हैं; उन 'शक्तिरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ ११ ॥
प्रधान, महत्तत्त्व, पृथ्वी, जल और दिशा-दिक्पाल आदि जिनके स्वरूप हैं; जो सत्-असत्रूप एवं जगत्के कारणरूप हैं; उन 'विश्वरूप' गणेशको हम सदा नमस्कार करते हैं ॥ १२ ॥
[हे गणनाथ!] जो आपके युगल चरणोंमें मन लगायेगा, वह विघ्नसमुहजनित पीड़ा नहीं प्राप्त कर सकता। शोभाशाली, विशाल सूर्यमण्डलके प्रकाशमें खड़ा हुआ मानव भला अन्धकारजनित क्लेश कैसे प्राप्त कर सकता है? ॥ १३ ॥
हे विश्वम्भर ! हम अज्ञानके वशवर्ती होकर बहुत वर्षोंतक आपके चरणकमलोंको न प्राप्त कर सकनेके कारण सर्वथा भटकते रहे हैं। अब आपकी ही कृपासे आपके चरणोंकी शरणमें आ गये हैं। अतः हे आदिदेव! आप सदा हमारी रक्षा करें* ॥ १४ ॥
ब्रह्माजी बोले— हे महामुने ! [त्रिदेवोंके द्वारा] इस प्रकार स्तुति किये जानेपर गणेशजी सन्तुष्ट हो गये और परम कृपायुक्त होकर उन्होंने उन (देवताओं)- से कहना प्रारम्भ किया— ॥ १५ ॥
[दायाँ स्तम्भ]
भगवान् श्रीगणेशजीने कहा— [हे देवताओ!] जिसके लिये आप लोगोंने इतना क्लेश सहा है और जिसके लिये आप लोग यहाँ आये हैं, आप लोग उस वरको मुझसे माँगें; आप लोगोंकी इस स्तुतिसे मैं प्रसन्न हूँ ॥ १६ ॥
आप सब उदार आत्मावालोंके द्वारा जो मेरी इस स्तोत्रद्वारा यह स्तुति की गयी, मेरी आज्ञासे यह स्तोत्र 'स्तोत्रराज' नामसे प्रसिद्ध होगा ॥ १७ ॥
जो बुद्धिमान् मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर भक्तियुक्त हो विशुद्ध भावसे सदा तीनों सन्ध्याओंके समय इस स्तोत्रका पाठ करता है; वह उत्तम पुत्र, लक्ष्मी तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है और अन्तकालमें परब्रह्मरूप हो जाता है ॥ १८ ॥
ब्रह्माजी बोले— उन गणेशजीके ऐसे वचनोंको सुनकर उन्हींकी इच्छासे रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणसे उत्पन्न वे [तीनों देवता— ब्रह्मा, विष्णु और शिव] प्रसन्नतापूर्वक उनसे बोले— ॥ १९ ॥
तीनों [त्रिदेवों]-ने कहा— सृष्टि और संहार करनेवाले हे देवाधिदेव ! यदि आप प्रसन्न हैं तो आपके चरणकमलोंमें हमारी अनन्य भक्ति हो ॥ २० ॥
[इसके अतिरिक्त] हमें क्या करना चाहिये, इस विषयमें भी आप हमें आज्ञा करें। हे गजानन! हमें यही वर अभीष्ट है ॥ २१ ॥
उनके ऐसे वचन सुनकर भगवान् गजाननने पुनः
[पाद-टिप्पणी / मूल संस्कृत श्लोक]
- अजं निर्विकल्पं निराकारमेकं निरालम्बमद्वैतमानन्दपूर्णम् । परं निर्गुणं निर्विशेषं निरीहं परं ब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥
गुणातीतमाद्यं चिदानन्दरूपं चिदाभासकं सर्वगं ज्ञानगम्यम् । मुनिध्येयमाकाशरूपं परेशं परं ब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥
जगत्कारणं कारणज्ञानहीनं सुरादिं सुखादिं युगादिं गणेशम् । जगद्व्यापिनं विश्ववन्द्यं सुरेशं परं ब्रह्मरूपं गणेशं भजेम ॥
रजोगुणतो ब्रह्मरूपं श्रुतिज्ञं सदा कार्यसक्तं हृदाचिन्त्यरूपम् । जगत्कारकं सर्वविद्यानिधानं सदा ब्रह्मरूपं गणेशं नताः स्मः ॥
सदा सत्त्वयोगं मुदा क्रीडमानं सुरारीन् हरन्तं जगत्पालयन्तम् । अनेकावतारं निजाज्ञानहारं सदा विष्णुरूपं गणेशं नताः स्मः ॥
तमोगयोगिनं रुद्ररूपं त्रिनेत्रं जगद्धारकं तारकं ज्ञानहेतुम् । अनेकागमैः स्वं जनं बोधयन्तं सदा शर्वरूपं गणेशं नताः स्मः ॥
तमस्तोमहादं जनाज्ञानहारं त्रयीवेदसारं परब्रह्मसारम् । मुनिज्ञानकारं विदूरे विकारं सदा ब्रह्मरूपं गणेशं नताः स्मः ॥
निजैरोषधीस्तर्पयन्तं करौधैः सुरौघान् कलाभिः सुधास्राविणीभिः । दिनेशांशुसन्तापहारं द्विजेशं शशाङ्कस्वरूपं गणेशं नताः स्मः ॥
प्रकाशस्वरूपं नभोवायुरूपं विकारादिहेतुं कलाकालभूतम् । अनेकक्रियानेकशक्तिस्वरूपं सदा शक्तिरूपं गणेशं नताः स्मः ॥
प्रधानस्वरूपं महत्तत्त्वरूपं धरावारिरूपं दिगीशादिरूपम् । असत्सत्स्वरूपं जगद्धेतुभूतं सदा विश्वरूपं गणेशं नताः स्मः ॥
त्वदीये मनः स्थापयेदङ्घ्रियुग्मे जनो विघ्नसंधान्न पीडां लभेत । लसत्सूर्यबिम्बे विशाले स्थितोऽयं जनो ध्वान्तबाधां कथं वा लभेत ॥
वयं भ्रामिताः सर्वथाज्ञानयोगादलब्ध्वा तवाङ्घ्रीं बहून् वर्षपूगान् । इदानीमवाप्तास्तवैव प्रसादात् प्रपन्नान् सदा पाहि विश्वम्भराद्य ॥
(श्रीगणेशपुराण, उपासनाखण्ड १३। ३-१४)
६८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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कहा, 'हे महाभाग्यवान् [देवताओ]! आप लोगोंकी
मुझमें दृढ़ भक्ति होगी, जिससे आप लोग महान् संकटोंको
भी पार कर लेंगे। आप लोगोंकी प्रसिद्धिके लिये मैं आप
लोगोंको पृथक्-पृथक् कार्य बतलाता हूँ॥ २२-२३ ॥
[गणेशजीने कहा-] हे ब्रह्मन्! आप रजोगुणसे
समुद्भूत हुए हैं, अतः आप सृष्टिकर्ता होवें। हे विष्णो!
आप सत्त्वगुणके आश्रय और व्यापक हैं, अतः आप
[सृष्टिका] पालन करें। हे हर! आप तमोगुणसे समुद्भूत
हैं, अतः आप संहारकार्य करें॥ २४१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले-[हे व्यासजी!] तदनन्तर गणेशजीने
मुझ ब्रह्माको आदरपूर्वक वेद, शास्त्र, पुराण, सृष्टि
करनेकी सामर्थ्य तथा अन्य विद्याएँ प्रदान कीं। उन
भगवान् गणेशने विष्णुको योगबलसे स्वेच्छानुसार रूप
धारण करनेकी सामर्थ्य प्रदान की॥ २५-२६ ॥
[इसी प्रकार] भगवान् गणेशने शिवको एकाक्षर
मन्त्र, षडक्षर मन्त्र तथा सभी आगम* और संहार
करनेकी शक्ति प्रदान की॥ २७॥
तब मैंने उन त्रैलोक्यके स्वामी, जगद्गुरु, वरदाता
भगवान् गजानन (गणेशजी)-से दीन भावसे हाथ
जोड़कर कहा- ॥ २८ ॥
ब्रह्माजी बोले- [हे प्रभो!] जिसने शब्दशक्तिको
ग्रहण न किया हो अर्थात् जिसे शब्दशक्तिका ज्ञान न हो,
वह कथनीय-अकथनीय-कुछ भी नहीं कह सकता;
उसी प्रकार नानाविध (अनेक प्रकारकी) सृष्टिको कभी-
कहीं देखा न हो, ऐसा मैं आप विभुकी आज्ञाका पालन
करनेमें कैसे उत्साहित हो सकता हूँ अथवा आपकी
आज्ञाका उल्लंघन भी कैसे कर सकता हूँ? [इस प्रकार हे
प्रभो!] मेरे लिये एक ओर कूप और दूसरी ओर बावलीकी
स्थिति कैसे हो गयी है? ॥ २९-३० ॥
तब भगवान् गजाननने उस प्रकारसे व्याकुल वेद-
शास्त्रज्ञ ब्रह्माजीको दिव्य नेत्र प्रदान करके कहा- ॥ ३१ ॥
गजानन (गणेशजी)-ने कहा-हे कमलोद्भव
ब्रह्माजी! मेरे शरीरके बाहर और अन्दर असंख्य ब्रह्माण्डोंको
भ्रमण करते हुए तुम आज देखो ॥ ३२ ॥
ब्रह्माजी बोले-[हे व्यासजी!] तदनन्तर भगवान्
गजाननके द्वारा अपनी श्वासवायुके द्वारा अपने उदरमें ले
जाये गये मुझ विधाताने भी अनेक ब्रह्माण्डोंको वैसे ही
देखा, जैसे गूलरके वृक्षमें लगे फलोंमें मशकसदृश कीट
हों। तब मैंने अपने परम तेजसे उनमेंसे एकका भेदन
किया और उसमें अन्तःस्थित सम्पूर्ण सृष्टिका
[आश्चर्यपूर्वक] पुनः-पुनः अवलोकन किया। वहाँ मैंने
दूसरे ही ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, प्रजापति, शिव, सूर्य,
वायुदेव, वनों, सरिताओं, जलके स्वामी वरुण, समुद्रों,
यक्षों, गन्धर्वों, अप्सराओं, किन्नरों, सर्पों, ऋषियों,
गुह्यकों, साध्यों, मनुष्यों, पर्वतों, वृक्षों, उद्भिज्ज (अंकुरके
रूपमें निकलनेवाले पौधे)-जरायुज (गर्भशयकी झिल्लीमें
लिपटकर जन्म लेनेवाले)-स्वेदज (पसीनेसे उत्पन्न
होनेवाले)-अण्डज (अण्डेसे उत्पन्न होनेवाले) प्राणियों,
पृथ्वी, सप्त पातालों, अन्य इक्कीस अव्यय लोकों,
भावाभाव और स्थावर-जंगमात्मक सम्पूर्ण विश्वको
देखा ॥ ३३-३८ ॥
[इसी प्रकार] जिस-जिस ब्रह्माण्डका मैंने भेदन
किया, उस-उसमें मैंने सब कुछ उसी प्रकार देखा। यह
देखकर मैं पहलेकी ही भाँति भ्रमित हो गया; क्योंकि
उन ब्रह्माण्डोंका अन्त मुझे कहीं नहीं मिल पाया ॥ ३९ ॥
हे ब्रह्मन्! [उस समय आश्चर्यचकित होनेके
कारण] मैं न स्थिर रहनेमें सक्षम था, न ही कहीं जानेमें;
तब मैंने पद्मासनमें स्थित होकर भगवान् गजाननका
स्तवन किया ॥ ४० ॥
ब्रह्माजी बोले- जिनके श्रीविग्रहमें स्थित ब्रह्माण्डोंकी
गणना करना सम्भव नहीं है, ऐसे देवाधिदेव भगवान्
गणेशकी मैं वन्दना करता हूँ; भला, आकाशस्थित
नक्षत्रों, सागरस्थित जलचरों और उसके किनारेके बालुका-
कणोंकी गणना करनेवाला कौन हो सकता है! ॥ ४१ ॥
हे देवराजवन्दित [गणेशजी]! आपके चरणकमलोंका
दर्शनकर जो मैं भ्रममें पड़ गया था, उसके लिये मुझे
लज्जा नहीं है; क्योंकि आप-जैसे ज्ञाननिधिके प्रसन्न हो
जानेपर मोक्ष भी तुच्छ प्रतीत होता है, फिर अन्यकी तो
- आगतं शिववक्त्रेभ्यो गतं च गिरजाश्रुतौ। मतं श्रीवासुदेवस्य तस्मादागम उच्यते ॥
उ०ख०-अ०१४ ] * सृष्टि करते समय विघ्नोंद्वारा बाधित ब्रह्माजीका भगवान् गणेशकी प्रार्थना करना * ६९
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बात ही क्या है!॥ ४२ ॥ | जानेपर अनन्त ऐश्वर्यसम्पन्न गजानन [श्रीगणेशजी]-ने
हे देवेश्वर! मैंने आपके उदरमें नाना प्रकारके | खिन्न मनःस्थितिवाले मुझ [ब्रह्मा]-को अपने नासिका-
प्राणियों और पदार्थोंसे समन्वित ब्रह्माण्डसमूहोंको देखा। | छिद्रके मार्गसे बाहर निकाल दिया। मेरे अनुयायी श्रीहरि
मैं यहाँ स्थिर रहनेमें या यहाँसे अन्यत्र बहिर्गमन करनेमें | और उनके साथ स्थित तमोगुणवाले भगवान् हर
भी समर्थ नहीं हूँ; अतः मैं आपके अतिरिक्त किसी अन्य | (शिव)-इन दोनोंको प्रभु गजाननने अपने कर्णछिद्रोंसे
देवताकी शरणमें नहीं जाता हूँ॥ ४३ ॥ | बाहर निकाला। वे दोनों—हरि और हर उनके शरीरमें
[हे व्यासजी!] मेरे द्वारा इस प्रकार स्तुति किये | सुखपूर्वक शयन कर रहे थे॥ ४४-४६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'ब्रह्मस्तुति-वर्णन' नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥
चौदहवाँ अध्याय
सृष्टि करते समय विघ्नोंद्वारा बाधित ब्रह्माजीका भगवान् गणेशकी प्रार्थना करना
राजा [सोमकान्त] बोले-[हे मुनिश्रेष्ठ!] | सुनकर ब्रह्माजी काँपने लगे ॥ ६-८ ॥
तब सहस्रों ब्रह्माण्डोंको देखनेके बाद ब्रह्माजीने क्या | उनमेंसे कुछने उनपर मुक्कोंसे प्रहार किया, कुछने
किया ? उन्होंने गजानन (गणेशजी)-से आज्ञा प्राप्तकर | झुककर उन्हें प्रणाम किया, कुछने उनकी स्तुति की और
किस प्रकार सृष्टि की ? ॥ १ ॥ | कुछने आदरपूर्वक उनकी चारों शिखाओंको हिलाया।
भृगुजी बोले-[हे राजन्! सृष्टिकी रचनाके | कुछ उनके चार मुखोंकी हँसी उड़ा रहे थे। कुछ उनकी
लिये उद्यत] ब्रह्माजी अपने विषयमें ऐसा विचार करते | निन्दा, तो कुछ प्रशंसा और कुछ उनकी सेवा कर रहे
हुए गर्वसे भर गये कि मैं वेदों, पुराणों, शास्त्रों और | थे। कुछने उन्हें बाँध दिया, तो कुछने उन्हें खोल दिया।
आगमोंका भी ज्ञाता हूँ। मैं ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न और | तत्पश्चात् कुछ उन्हें इधर-उधर खींचने लगे। उनमेंसे
शाप देने अथवा अनुग्रह करनेमें समर्थ हूँ। मैंने अनेक ब्रह्माण्डों | कुछने उनका आलिंगन किया, तो कुछ अन्यने उन्हें
और सृष्टिकी रचनाओंको देखा है। इस समय मैं सृष्टि | शिशुकी भाँति चूम लिया। एक आठ हाथवाले [विघ्न]-
करनेमें किसी भी प्रकार असमर्थ नहीं हूँ॥ २-३ १/२ ॥ | ने उनकी आठों मूछोंको पकड़ लिया और नाचने
हे राजन्! इस प्रकार जब सृष्टि करनेमें पूर्णतया | लगा ॥ ९-१२ ॥
समर्थ कमलोद्भव ब्रह्माजी सृष्टि करने लगे तो वहाँ | इस प्रकार परवश हुए ब्रह्माजी चिन्ता और शोकसे
अनेक प्रकारके सहस्रों विघ्न उत्पन्न हो गये ॥ ४ १/२ ॥ | युक्त हो गये। उन्होंने स्वयंके सृष्टिकर्ता होनेका जो
उन अत्यन्त भयंकर विघ्नोंने ब्रह्माजीको उसी | हृदयमें स्थित महान् गर्व था, उसे त्याग दिया। वे अपने
प्रकार घेर लिया, जैसे पुष्परसका पानकर मत्त हुए भ्रमर | जीवनके प्रति निराश होकर महान् मूर्च्छाको प्राप्त हो
मधुके छत्तेको घेर लेते हैं ॥ ५ १/२ ॥ | गये। तत्पश्चात् एक मुहूर्त बीतनेपर सचेत होकर उन्होंने
वे विघ्न तीन नेत्रोंवाले, पाँच हाथोंवाले, कुएँ-जैसे | सर्वत्र व्यापक गणेशजीका मानसिक स्मरण किया और
मुखवाले, सात हाथोंवाले, तीन पैरोंवाले, पाँच थूथूनोंवाले, | करुण स्वरसे रोते हुएके सदृश ब्रह्माने गजानन गणेशजीकी
सात थूथूनोंवाले, छः पैरोंवाले, दस मुखोंवाले, पाँच | प्रार्थना की ॥ १३-१४ ॥
पैरोंवाले, ताड़-सदृश बड़े दाँतोंवाले, भेड़ियोंके-से पेटवाले, | ब्रह्माजी बोले-[हे प्रभो!] अनेक प्रकारके
अनेक रूपोंवाले और महान् बलशाली थे; उनकी गणना | प्राणियोंकी सृष्टि करनेमें संलग्न मनवाले मुझ ब्रह्माकी
नहीं की जा सकती थी। उनके अनेक प्रकारके कोलाहलको | आयु स्वल्प नहीं है, अर्थात् मैं बड़ी आयुवाला हो चुका
७० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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हूँ, फिर भी भवसागरसे पार करानेवाले अत्यन्त निर्मल
तत्त्वज्ञानकी मुझे प्राप्ति नहीं हुई है। हे अखिलगुरो !
पृथ्वीपर जन्म लेकर आपका भजन करते हुए मैं कब
परम भोग, अनुपम सुख और मोक्षको प्राप्त करूँगा ? हे
विभो ! आपके [कृपा]-कटाक्षरूपी अमृतसे अभिसिंचित
होने कारण मुझ चिरायुकी मृत्यु तो नहीं होगी, परंतु यह
आपके लिये ही लज्जाकी बात होगी कि आपका भक्त
कष्ट पा रहा है ॥ १५-१६ ॥
भृगुजी बोले- [हे राजन् !] ब्रह्माजीके इस
प्रकार प्रार्थना करते ही 'तप करो' - इस प्रकारकी
आकाशवाणी सुनायी दी। तब उन्होंने पुनः उन (गजानन)-
से प्रार्थना की ॥ १७ ॥
[उधर] आकाशवाणी सुनते ही वे अनेकरूपधारी
महान् बलशाली विघ्नसमूह उन कमलासन ब्रह्माजीको
मुक्त करके अन्तर्धान हो गये ॥ १८ ॥
महान् यशस्वी कमलोद्भव ब्रह्माजी उन विघ्नोंसे
मुक्त होकर विचार करने लगे कि 'बिना मन्त्र और बिना
स्थानके मैं महान् तपस्या कैसे करूँ?' ॥ १९ ॥
इस प्रकार व्याकुल चित्तवाले ब्रह्माजी जलके मध्य
भ्रमण करते रहे, तदनन्तर वे अनन्य भावसे मन-ही-मन
अनामय (विघ्नरहित)-स्वरूपवाले गजानन गणेशजीका
[इस प्रकारका] ध्यान करने लगे-जो मोतियों और
रत्नोंसे जटित सुन्दर मुकुटवाले, लाल चन्दनसे आलिप्त
शरीरवाले, सिन्दूरयुक्त अरुणित मस्तकवाले, मोतियोंकी
मालासे सुशोभित सुन्दर कण्ठवाले, सर्पका यज्ञोपवीत
धारण करनेवाले, बहुमूल्य रत्नोंसे निर्मित बाजूबन्दसे
भूषित, देदीप्यमान पन्ना मणिकी अँगूठियोंसे सुशोभित
अँगुलियोंवाले, विशाल नाभिसे शोभित और महासर्पोंसे
वेष्टित महान् उदरवाले, विचित्र रत्नजटित करधनीसे
सुशोभित कटिप्रदेशवाले, सुवर्णके धागोंसे निर्मित रक्तवस्त्रसे
आवृत, मस्तकपर विराजमान चन्द्रमावाले और देदीप्यमान
दाँतसे सुशोभित सूँडवाले हैं- ऐसे भगवान् गणेशके
स्वरूपका ध्यान करते हुए पुनः यह आकाशवाणी हुई
कि 'वटवृक्षको देखो, सुन्दर वटवृक्षको देखो।' तब इस
प्रकारका वचन सुनकर ब्रह्माजी पुनः चिन्ताको प्राप्त हो
गये ॥ २०-२६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'ब्रह्माजीकी चिन्ताका वर्णन'
नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४ ॥
पन्द्रहवाँ अध्याय
ब्रह्माजीद्वारा भगवान् गणेशकी आराधना
भृगुजी बोले-हे सोमकान्त ! लोकपितामह ब्रह्माजीने
व्यासजीसे आगे जो कहा, उसे मैं कहता हूँ; तुम
आदरपूर्वक श्रवण करो ॥ १ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुनिवर ! तत्पश्चात् मैंने एक
बड़ा सुन्दर स्वप्न देखा कि मैं आकाशमें भ्रमण कर रहा
हूँ और भ्रमण करते हुए मैंने जलमें एक महान्
वटवृक्षको देखा ॥ २॥
प्रचण्ड वायु, धूप एवं जलसे [प्रलयकालमें]
सम्पूर्ण चराचर जगत्के नष्ट हो जानेपर यह एकमात्र
महान् वटवृक्ष कैसे अवशिष्ट रह गया - इस प्रकार
आश्चर्यमें पड़े मुझ ब्रह्माको उस महान् वटवृक्षके पत्तेपर
एक छोटा-सा बालक दिखायी दिया, जिसके चार
भुजाएँ थीं और वह मुकुट-कुण्डलसे सुशोभित था।
उसके कण्ठदेशमें मणियों और मोतियोंसे निर्मित माला
सुशोभित हो रही थी। उसने मस्तकपर अर्धचन्द्र,
शरीरपर रक्तवर्णके वस्त्र और कटिप्रदेशमें करधनी धारण
कर रखी थी। तेजसे जाज्वल्यमान उसके श्रीविग्रहमें
सम्पूर्ण शरीर मनुष्यके जैसा, परंतु मुख हाथीका था,
जिसमें एक दाँत था ॥ ३-५ १/२ ॥
उसे देखकर मैंने विचार किया कि यह बालक
कहाँसे यहाँ आ गया? तब उस बालकने सूँडसे मेरे
मस्तकपर जलका प्रक्षेप किया तो मैं चिन्ता और
उ०ख०-अ०१५ ] * ब्रह्माजीद्वारा भगवान् गणेशकी आराधना * ७९
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[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
आनन्दसे युक्त होकर उच्च स्वरसे हँस पड़ा ॥ ६-७॥
मेरे हँसनेपर वह बालक वटवृक्षसे नीचे उतर आया
और मेरी गोदमें आकर वह मधुर वाणीमें बोला— ॥ ८ ॥
बालकने कहा— हे चतुरानन ! मूढ़ बुद्धिवाले तुम
व्यर्थ ही वृद्ध हुए हो, तुम अल्पसे भी अल्प बुद्धिवाले
हो। तुम विघ्नोंसे पीड़ित और सृष्टि करनेकी चिन्तासे
युक्त हो। 'तप कहाँ करूँ'—इस चिन्तासे तुम निरन्तर
जलके मध्य भ्रमण कर रहे हो। मैं तुम्हें सम्पूर्ण
चिन्ताओंका हरण करनेवाले अपने एकाक्षरमन्त्ररूपी
उपायका उपदेश करता हूँ; पुरश्चरणविधिसे तुम इसका
दस लाख जप करो। तब मैं तुम्हारे समक्ष प्रत्यक्ष होकर
तुम्हें [सृष्टि-रचनासम्बन्धी] उत्तम सामर्थ्य प्रदान
करूँगा ॥ ९—११ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले— हे व्यासजी ! ऐसा आश्चर्यकारक
स्वप्न देखकर सहसा मैं जग गया और सोचने लगा कि
मुझे परमेश्वर (गणेशजी)-के दर्शन कब होंगे ? इस
प्रकार मैं देखे गये स्वप्नके कारण आनन्दरूपी सागरमें
निमग्न हो गया ॥ १२-१३ ॥
तदनन्तर स्नान करके कमलपर एक पैरसे खड़े
होकर भगवान् गजाननका ध्यान करते हुए मैंने बहुत
दिनोंतक [उनके] परम मन्त्रका जप किया ॥ १४ ॥
जितेन्द्रिय और जिताहार रहते हुए मैंने काष्ठ और
पाषाणकी भाँति स्थिर होकर दिव्य सहस्र वर्षोंतक परम
महान् तप किया ॥ १५ ॥
तब मेरे मुखसे भयंकर ज्वालाएँ प्रकट हो गयीं,
जिनसे समस्त प्राणी अत्यन्त दारुण कष्ट पाने लगे ॥ १६ ॥
तब भगवान् गजानन गणेशजी मेरी उस सुदृढ़
निष्ठाको देखकर और मेरी परम भक्तिसे सन्तुष्ट होकर
मेरे समक्ष प्रकट हो गये ॥ १७ ॥
उनकी कान्ति करोड़ों सूर्योंके समान थी, वे
ज्वालामालाओंसे व्याप्त अग्निकी भाँति तीनों लोकोंका
दहन करते हुए-से प्रतीत हो रहे थे और ऐसा लगता
था कि वे आकाशसे लेकर पृथ्वीतकका संहार कर
देनेवाले हैं ॥ १८ ॥
वे भगवान् गजानन दिव्य मालाओंसे विभूषित थे।
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
उन्होंने अपने हाथोंमें परशु और कमल धारण कर रखे
थे। वे सम्पूर्ण पापोंका हरण करनेवाले और सम्पूर्ण
सौन्दर्यराशिके कोशस्वरूप थे। श्रेष्ठ गजराजके मुखके
सदृश उनके मुखकी शोभा थी। वे भक्तजनोंकी
मनोकामनाओंको पूर्ण करनेवाले तथा देवताओं, मनुष्यों
और मुनियोंकी विघ्न-बाधाओंका एकमात्र नाश करनेवाले
थे ॥ १९ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ व्यासजी ! उस तेजसमूहको देखकर मैं
काँप उठा था, मेरा जप छूट गया और मैं व्याकुलचित्त
होकर महान् चिन्तामें पड़ गया ॥ २० ॥
[उस समय] मेरी आँखें मुँद गयीं, स्मृति विलीन
हो गयी। [तब] मेरी ऐसी अवस्थाको देखकर विघ्नराज
गणेशजीने शीघ्र ही कहा— ॥ २१ ॥
गणेशजी बोले—हे लोकपितामह ! भय न करो;
जिसने तुम्हें स्वप्नमें मंगलमय एकाक्षर मन्त्रका उपदेश
दिया था, वही मैं तुम्हारे समक्ष उपस्थित हूँ ॥ २२ ॥
उस मन्त्रके प्रभावसे तुम्हें सिद्धिकी प्राप्ति हो गयी
है, अतः मैं तुम्हें वर देनेके लिये यहाँ आया हूँ। सम्प्रति
मैं सौम्य भावको प्राप्त हुआ हूँ, अतः हे सुव्रत ! तुम वर
माँगो ॥ २३ ॥
मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तुम्हारे हृदयमें जो भी इच्छा
वर्तमान है, वह सब मैं तुम्हें दूँगा। मेरे प्रसन्न होनेसे वे
सब [कामनाएँ] पूर्ण हो जायेंगी, इसमें कोई सन्देह नहीं
है ॥ २४ ॥
[भृगु] मुनि बोले—[हे राजा सोमकान्त !]
गणनायक गणेशजीके इस प्रकारके परम विशुद्ध वचनोंको
सुनकर और उन्हें अपने सम्मुख देखकर ब्रह्माजी अत्यन्त
हर्षित हुए और उन चराचरके गुरु गणेशजीको अपने
सभी (चारों) सिरोंको झुकाते हुए प्रणामकर प्रसन्न हृदयसे
कहा कि 'आज मेरा जन्म सफल हो गया है' ॥ २५ ॥
ब्रह्माजी बोले—[हे प्रभो !] जो वेदों, शास्त्रों,
ज्ञानियों, योगियों और समस्त उपनिषदोंको भी कभी
दृष्टिगोचर नहीं होते; जो अनादिनिधन (जन्म-मृत्युसे
परे), अनन्त, अप्रमेय (प्रमेयों और प्रमाणोंसे परे) और
निर्गुण हैं, वे भगवान् गणेश मेरे [न जाने किन] पुण्यसमूहोंके
७२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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कारण मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दे रहे हैं॥ २६-२७॥
हे देवेश ! हे विघ्नेश ! हे करुणाकर ! यदि आप
मुझपर प्रसन्न हैं, तो अपनी दृढ़ भक्ति मुझे प्रदान करें,
जिससे दुःख हमारा स्पर्श भी न कर सकें ॥ २८ ॥
हे प्रभो ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, तो मुझे
विविध प्रकारकी सृष्टि कर सकनेकी सामर्थ्य प्रदान करें
और [मेरे इस कार्यमें आनेवाली] विघ्न-बाधाएँ शान्त
हो जायँ ॥ २९ ॥
मेरे स्मरण करनेमात्रसे आप सदा मेरे कार्योंको
सम्पन्न कर दें, मुझे विमल ज्ञान प्रदान करें और
अन्तकालमें मुझे स्थिर मुक्ति प्राप्त हो ॥ ३० ॥
श्रीगजानन (गणेशजी) बोले- [हे ब्रह्मन् !]
'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) तुम विविध प्रकारकी विपुल
सृष्टि करोगे। मेरा स्मरण करनेसे तुम्हारी सारी विघ्न-
बाधाएँ सर्वथा नष्ट हो जायेंगी ॥ ३१ ॥
मेरी कृपासे तुम्हें दृढ़ भक्ति और शुभ ज्ञान प्राप्त
होगा। हे चतुर्मुख ब्रह्माजी! तुम शंकारहित होकर सारे
कार्योंको करो ॥ ३२ ॥
[भृगु] मुनि बोले- [हे राजन्!] इस प्रकार
उन प्रभुसे वर प्राप्तकर ब्रह्माजीने उनका पूजन किया।
देवाधिदेव गणेशजीकी कृपासे उनके पूजनार्थ ब्रह्माजीने
मनमें जिन-जिन वस्तुओंका चिन्तन किया, वे-वे वस्तुएँ
उनके सम्मुख उपस्थित हो गयीं। दक्षिणाके अवसरपर
[सिद्धि-बुद्धि नामक] दो कन्याएँ उनके सामने
उपस्थित हो गयीं। वे दोनों सुन्दर नेत्रों और प्रसन्नतापूर्ण
सुन्दर मुखसे सुशोभित थीं। उनका श्रीविग्रह अनेक
रत्नोंसे जटिल नानाविध अलंकारोंसे शोभायमान
था॥ ३३-३५॥
दिव्य गन्धसे युक्त तथा दिव्य वस्त्र और मालाओंसे
विभूषित उन कन्याओंको गणेशजीके लिये दक्षिणाके
रूपमें कमलयोनि ब्रह्माजीने प्रस्तुत किया ॥ ३६ ॥
कदलीगर्भसम्भूत कर्पूरसे [ब्रह्माजीने] गणेशजीका
नीराजनकर उनको दिव्य पुष्पोंसे पुष्पांजलि दी और
सहस्र नामोंसे उनका स्तवनकर उनकी परिक्रमा की ॥ ३७ ॥
तब ब्रह्माजीने प्रार्थना की कि हे वन्दनीय ! आप
दीनोंका कल्याण करनेवाले हों। इस प्रकार उन परमेष्ठी
ब्रह्माजीसे सम्यक् रूपसे पूजित हुए विघ्नहर्ता भगवान्
गजानन गणेशजी सिद्धि-बुद्धिको लेकर अन्तर्धान हो
गये ॥ ३८-३९ ॥
तदनन्तर परमेश्वरकी कृपा और आज्ञासे प्रसन्न
(निर्मल) बुद्धिवाले ब्रह्माजीने पूर्वकी भाँति सृष्टिका
विस्तार किया ॥ ४० ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें गजाननकी आराधनाका वर्णन'
नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥
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सोलहवाँ अध्याय
सृष्टि-वर्णन, मधु-कैटभकी उत्पत्ति और ब्रह्माजीद्वारा उनके वधहेतु
योगनिद्रा देवीकी प्रार्थना करना
राजा [सोमकान्त ] बोले- हे ब्रह्मर्षि ! भगवान्
गणेशकी कथा सुनकर मनमें हर्ष हो रहा है। इस
कथारूपी अमृतसे मैं तृप्त नहीं हो रहा हूँ, अतः आप
इसे पुनः कहें ॥ १॥
हे प्रभो ! परमात्मा भगवान् गणेशके अन्तर्धान हो
जानेपर ब्रह्माजीने किस प्रकार सृष्टि की, इसका आप
वर्णन करें ॥ २ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ ! आगे ब्रह्माजीने व्यासजीके प्रति जो
आख्यान कहा, उसे मैं विस्तारसे सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥
भृगुजी बोले- [हे राजन्!] प्रभु ब्रह्माजीने
व्यासजीके प्रति जो सिद्धक्षेत्रका माहात्म्य कहा तथा जो
सृष्टिकी रचना की, उसे मैं तुमसे क्रमशः कहूँगा ॥ ४ ॥
उन ब्रह्माजीने सर्वप्रथम सात मानस पुत्रोंको उत्पन्न
किया और उनसे कहा कि सृष्टिकार्यमें सहायता करते