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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

उनचासवाँ अध्याय

क्री०ख०-अ०४९] * कीर्तिके पुत्रका राज्याभिषेक * ३८७
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उनचासवाँ अध्याय
कीर्तिके पुत्रका राज्याभिषेक, ब्रह्माजीद्वारा विनायकलोकका तथा उसकी
महिमाका वर्णन, विनायकके भक्तोंको विनायकलोककी प्राप्ति
ब्रह्माजी बोले-ढुंढिविनायकसे इस प्रकार वरदान प्राप्त की हुई कीर्तिने शेष रात्रि व्यतीत करके उषाकालमें
स्नान किया और वह उन विनायककी मूर्तिकी भलीभाँति
पूजा करके अपने पुत्रके साथ अपने नगरके लिये निकल
पड़ी। यद्यपि वह बहुत हर्षित थी, किंतु विनायकदेवके
विरहसे दुखित भी थी। वह नगर नाना प्रकारकी
ध्वजाओं और पताकाओंसे अलंकृत था। जलके छिड़काव
एवं धूप आदिसे सुवासित था॥ १-२॥
राजपत्नी कीर्ति और उसका पुत्र—दोनों ही 'ढुंढि'
नामका जप कर रहे थे। राजा प्रियव्रतको जब यह ज्ञात
हुआ कि पत्नी तथा पुत्र आ रहे हैं तो वे अपनी सेना
एवं वाद्योंकी ध्वनिके साथ उन दोनोंको लानेके लिये गये
और शीघ्र ही अत्यन्त विख्यात कर्णपुर नामक नगरमें
उन्हें ले आये। उन्होंने शीघ्र ही अपने पुत्रका मस्तक
सूँघा और अत्यन्त सम्मानके साथ उसका आलिंगन
किया॥ ३-४॥
परम प्रसन्नताको प्राप्त राजाने आनन्दविभोर होकर
गद्गद वाणीमें कहा- 'हे पुत्र! क्षिप्रप्रसादन ! तुम बहुत
दिनोंसे थके हुए हो ॥ ५ ॥
तुम्हें देखकर मुझे अत्यन्त आह्लाद प्राप्त हो रहा
है। मुझे ऐसा लग रहा है कि मुझे अमृतकी प्राप्ति हो
गयी है।' तदनन्तर राजाने वहाँ उपस्थित सभी लोगोंको
वस्त्र तथा दक्षिणा देकर विदा किया॥ ६॥
इसके अनन्तर रानी कीर्ति और राजाने परस्पर
वार्तालाप किया। रानी कीर्तिने सम्पूर्ण वृत्तान्त राजाको
पूर्णरूपसे बताया ॥ ७॥
तदनन्तर उन दोनोंने परस्पर दाम्पत्योचित प्रीति
व्यवहारके साथ हास्य एवं विनोद किया। हर्षपूर्वक
एक-दूसरेको ताम्बूल खिलाया और संकोचका परित्यागकर
सहशयन सम्पन्न किया ॥ ८ ॥
तदनन्तर कुछ दिन बीत जानेके अनन्तर जब राजाने
यह जान लिया कि मेरा पुत्र सभी गुणोंसे सम्पन्न है,
विनयी है, सभी धर्मोंका ज्ञाता है और नीतिशास्त्रमें अत्यन्त
पारंगत है, तो उन्होंने राज्याभिषेकमें प्रयुक्त होनेवाली
समस्त सामग्रियोंको एकत्र कराकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको, मित्रोंको
तथा सभी राजाओंको बुलाकर शुभ मुहूर्तमें, उत्तम लग्नमें,
सातों ग्रहोंके अभीष्ट स्थानमें विद्यमान रहनेपर पुत्रका
राज्याभिषेक कर दिया॥ ९-१०१/२ ॥
राजाने स्वस्तिवाचन करानेके अनन्तर आभ्युदयिक
श्राद्ध करके विविध प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिके साथ
ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेदके मन्त्रों और विविध
प्रकारके द्रव्योंसे समन्वित जलोंके द्वारा पुत्रका अभिषेक
कराया ॥ ११-१२॥
तदनन्तर राजाने ब्राह्मणों तथा अन्य जनोंको दक्षिणा
तथा रत्न प्रदानकर सन्तुष्ट किया और उन सबसे पूछकर
वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश होनेकी दीक्षा ग्रहण की।
तत्पश्चात् सभी राजाओंको विदा करके वे अपने
अभीष्टके साधनमें संलग्न हो गये ॥ १३१/२ ॥
तदनन्तर राजकुमार परशुबाहु इस पृथ्वीपर शासन
करने लगे। धर्मशास्त्रमें प्रतिपादित नीतिके अनुसार
राज्य-संचालनसे और अपनी उदारतासे उन्होंने महान्
यश अर्जित किया। वे अपने पराक्रमके बलपर तीनों
लोकोंमें विख्यात हुए। उन्होंने मन्दारवृक्षके काष्ठकी
ढुंढि-विनायककी प्रतिमा बनवाकर उसे अपने कण्ठमें
धारण किया। वे शमी तथा दूर्वाके बिना कभी भी उनकी
पूजा नहीं करते थे ॥ १४-१६॥
उन्होंने धर्ममार्गका पालन करते हुए विविध प्रकारके
सुख-भोगोंको भोगा तथा अनेक रानियोंके साथ जीवन
बिताने लगे। अनेक पुत्रोंको उत्पन्नकर एवं विविध
प्रकारके दानोंको देकर एक हजार वर्षपर्यन्त राज्य किया,

३८८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
तदनन्तर पुत्रको राज्य सौंपकर वे स्वर्गलोकको गये।
भगवान् ढुंढिविनायकका सारूप्य प्राप्तकर वे अनेक
कल्पोंतक स्वर्गलोकमें स्थित रहे ॥ १७-१८ ॥
[ ब्रह्माजी बोले— ] हे मुने! इस प्रकारसे मैंने
शमीके प्रभावका, उसके द्वारा विनायकके पूजनसे प्राप्त
होनेवाले पुण्यका तथा मन्दारकी महिमाका भी वर्णन
संक्षेपमें आपसे निरूपित किया। इसलिये आपके द्वारा भी
शमी एवं मन्दारके द्वारा विनायकका पूजन किया जाना
चाहिये, भक्तिभावपूर्वक उन इष्टदेवके लिये समर्पित
किया गया पत्र-पुष्प उन्हें अमृततुल्य प्रिय प्रतीत होता
है ॥ १९-२० ॥
तत्तद् देवताके लिये निषिद्ध पत्र-पुष्प अर्पित करनेवाला
नरक प्राप्त करता है। जिसका जो मुख्य आराध्य देवता
होता है, उसके लिये विहित पत्र-पुष्पादि अर्पण करनेवाला
अथवा अन्य देवोंको अपने अभीष्ट देवकी बुद्धिसे पत्र-
पुष्पोंको अर्पित करनेवाला भक्त दोषको प्राप्त नहीं होता
है, इस प्रकार गणेश, दुर्गा, शिव, विष्णु एवं सूर्य—इन
पंचदेवोंकी आराधनासे व्यक्ति अपने अभीष्ट देवको प्राप्त
होता है ॥ २१-२२ ॥
सात्त्विक पूजा करनेवाला सात्त्विक भक्त अपने
अभीष्ट देवका तादात्म्य प्राप्त करता है, राजस पूजा
करनेवाला देवताका सारूप्य प्राप्त करता है, सतोगुणी
उपासना एवं रजोगुणी उपासना—इन दोनों भावोंसे
[मिश्रित] उपासना करनेवाला भक्त देवताके सामीप्यको
प्राप्त करता है और तामसी स्वभाववाला तामसी उपासनाके
द्वारा देवताके लोकको प्राप्त करता है। इस प्रकार
सात्त्विक, राजस एवं तामस—तीनों प्रकारकी भक्ति
निष्फल नहीं होती ॥ २३ १/२ ॥
व्यासजी बोले—हे ब्रह्मन्! विनायकका लोक
किस लोकमें स्थित है, मेरे इस संशयको आप इस समय
दूर करें, हे प्रभो! सब कुछ जाननेवाले आपको छोड़कर
मैं अन्य किससे पूछूँ? ॥ २४-२५ ॥
ब्रह्माजी बोले— [हे व्यासजी!] इस विषयमें मैंने
देवर्षि नारदजीको बतलाया था, उन्होंने महर्षि मुद्गलको
बताया, महर्षि मुद्गलने विनायकके उस मांगलिक
लोकके विषयमें काशिराजको बतलाया ॥ २६ ॥
प्राचीन समयमें उन विनायकने अपनी कामदायिनी
शक्तिसे स्वयं ही उस लोकका निर्माण किया और उन्होंने
'निजलोक' यह उसका नाम रखा ॥ २७ ॥
काशिराजने अपने चर्मचक्षुओंसे उस विनायकलोकका
विमानमें स्थित रहकर दर्शन किया था, जिसे प्राप्त करके
स्त्री अथवा पुरुष—कोई भी हो, वह न तो दुःख प्राप्त
करता है और न काम-क्रोधादि द्वन्द्वोंसे बाधित होता
है ॥ २८ ॥
उस निजलोकमें व्यक्ति ज्योतिर्मय स्वरूपको प्राप्तकर
ब्रह्माजीके कल्पपर्यन्त निवास करता है और [अमृतोपम
रससे पूर्ण] उस इक्षुसागरका आनन्द लेता है, जो कि
वहींपर अवस्थित है ॥ २९ ॥
वह विनायकलोक महाप्रलयकी वेलामें भी विद्यमान
रहता है, वह अविनाशी लोक है और उन विनायकदेवका
सनातन पीठ एवं निद्रास्थान है ॥ ३० ॥
वहाँ सिद्धि तथा बुद्धि नामकी उनकी दो पत्नियाँ
उनकी सेवा करती रहती हैं, सामवेद अपनी सामध्वनियोंके
द्वारा उनकी महिमाका गान करते रहते हैं। मनुष्यके द्वारा
जिस-जिस भी वस्तुकी कामना की जाती है, वहाँ स्थित
कल्पवृक्ष वह सब उन्हें प्रदान करता है ॥ ३१ ॥
उस कल्पवृक्षके प्रभावसे वहाँ अकल्पनीय वस्तुएँ
भी प्राप्त हो जाती हैं। मैंने कई बार सभी लोकोंका
विविध प्रकारसे वर्णन किया है, किंतु गणेशजीके
निजलोकका वर्णन करनेकी शक्ति मुझमें नहीं है।
इसलिये मैंने संक्षेपमें वर्णन किया है, अब आप आगे
क्या सुनना चाहते हैं? ॥ ३२-३३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'शमीपत्र एवं मन्दारपुष्पसमर्पणके फलका वर्णन'
नामक उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४९ ॥