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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

छियालीसवाँ अध्याय

क्री०ख०-अ०४६ ] * भगवान् शिवद्वारा ढुण्ढिराज गणेशसे काशी जानेकी प्रार्थना करना * ३७९
छियालीसवाँ अध्याय
भगवान् शिवद्वारा ढुण्ढिराज गणेशसे काशी जानेकी प्रार्थना करना, ढुण्ढिराजका एक मायावी
ज्योतिषीके रूपमें काशी जाना तथा वहाँके स्त्री-पुरुषों एवं राजा दिवोदासको
भी अपनी भविष्यवाणियोंसे मोहित करना
मुनि गृत्समद बोले—अविमुक्तक्षेत्र काशीके वियोगसे
अत्यन्त सन्तप्त भगवान् शिवने सब प्रकारके अर्थोंका
अन्वेषण करनेवाले ढुण्ढिराजको प्रणाम करके बड़े ही
कातरभावसे उनसे प्रार्थना की ॥ १ ॥
भगवान् शिव बोले—[हे ढुण्ढे!] आप पृथ्वी,
जल, तेज आदि पाँच महाभूतोंके कारणोंके भी कारण
हैं। आप चिदानन्दघन, विश्वके द्वारा ध्येय तथा वेदान्तके
द्वारा गोचर होनेवाले हैं। आप ही प्रधान (प्रकृति) भी
हैं और आप ही पुरुष भी हैं। सत्त्वादि तीनों गुणोंमें
विभाग करनेवाले आप ही हैं। आप समस्त विश्वमें
व्याप्त रहनेवाले हैं, आप ही विश्वके निधि तथा
विश्वकी रक्षा करनेमें तत्पर रहते हैं॥ २-३॥
आप नाना प्रकारके अवतार धारण करते हैं और
पृथ्वीके भारको हलका करनेके लिये उद्यत रहते हैं। आप
देवताओंकी रक्षा, दैत्योंके निधन तथा द्विजों, धर्मों, दुखिजनों
और शरणागतोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं। ब्रह्मस्वरूप आपने
अपनी इच्छासे ही मेरी पुत्रताको स्वीकार किया है। फिर
आपको छोड़कर काशीके विरहसे दुखित मैं अन्य किसकी
शरणमें जाऊँ ? ॥ ४-५ १/२ ॥
ढुण्ढिराज बोले—हे सदाशिव ! आप सर्वविद्या-
विशारद देवादिको ही वहाँ क्यों भेजते हैं? आप तो सर्वदर्शी
हैं, फिर भी आप मोहको प्राप्त हो रहे हैं! ॥ ६ १/२ ॥
शिव बोले—हे गजानन ! राजा दिवोदासके कार्योंमें
विघ्न उपस्थित करनेके लिये तथा मेरे कार्यकी सिद्धिके
लिये आप इसी समय अविमुक्तक्षेत्र काशीमें जायें और
वहाँ जाकर लोगोंको मोहित करें, जिससे राजाका पुण्य
क्षीण हो जाय ॥ ७-८ ॥
ढुण्ढि बोले—हे महादेव ! मैं शीघ्र ही जाता हूँ,
आप चिन्ता न करें। मैं आपका कार्य सिद्ध करूँगा।
काशीनिवासी जनोंके पापके भागी बने राजा दिवोदासको
मैं काशीसे बाहर करूँगा, जिससे आप शीघ्र ही अपनी
पुरीका दर्शन कर सकेंगे ॥ ९ १/२ ॥
मुनि गृत्समद बोले—इस प्रकार कह करके
सम्पूर्ण विद्याओं तथा कलाओंके निधान, विभु, ढुण्ढिराज
गजाननने भगवान् शिव, पार्वती, कार्तिकेय, देवर्षि नारद
तथा गुरुको प्रणाम करके और उनकी प्रदक्षिणा करके
काशीके लिये प्रस्थान किया ॥ १०-११ ॥
वाराणसी पहुँचकर ढुण्ढिराजने सर्वत्र दिवोदासका
पुण्य ही. देखा। तब उनका कोई भी पाप न देखकर
उन्होंने शीघ्र ही एक ज्योतिषीका रूप धारण कर लिया।
उस समय उनकी कान्ति चमकते हुए स्वर्णकी भाँति थी।
देह अत्यन्त दिव्य थी। वे मोतियोंकी मालाओंसे विभूषित
थे। उन्होंने नाभिमें महान् रत्नोंसे सुशोभित करधनी पहनी
हुई थी ॥ १२-१३ ॥
उन्होंने पीले वस्त्रोंका परिधान धारण कर रखा
था। शरीरपर दिव्य गन्धोंका अनुलेपन किया हुआ था।
उनका शरीर कामदेवसे भी अधिक सुन्दर था और वे
कामिनियोंको मोहित करनेवाले थे ॥ १४ ॥
वहाँ जो पतिव्रता स्त्रियाँ थीं, वे भी उन ज्योतिर्विद्
द्विजके प्रति आकृष्ट हो गयी थीं। ज्योतिर्विद् बने वे
ढुण्ढिराज सबके द्वारा मनमें चिन्तित बातको
बतला देते थे। अतएव पतिव्रता स्त्रियाँ अपने बालकों,
पतियों, भाइयों तथा अन्य सुहृज्जनोंको छोड़कर [अकेले
ही] अपना प्रश्न पूछनेके लिये उनके समीपमें
आयीं ॥ १५-१६ ॥
वे लोगोंको अपनी मायाके प्रभावसे स्वप्न दिखलाते
थे और फिर उनका उत्तर भी बतला देते थे। वे अपनी
सेवा करनेवाले जनोंको बहुत-से उत्तम वर प्रदान कर
देते थे। उनके वरदानके प्रभावसे असाध्य कुष्ठ भी नष्ट
हो जाता था और पूर्णरूपसे वन्ध्या स्त्रियाँ भी वरकी

३८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
सामर्थ्यसे पुत्रवती होने लगीं ॥ १७-१८ ॥
हाथ देखकर वे लोगोंके भाग्य तथा उनके कर्मोंको
बता देते थे। जिस-जिसके द्वारा जो-जो भी भोजन
किया हुआ रहता था और जो-जो वह आगे खायेगा;
वह सब वे सही-सही तत्क्षण बता देते थे ॥ १९ ॥
उन्हें देखकर काशीनगरीके सभी लोग आश्चर्य-
चकित और अत्यन्त प्रसन्नतासे भरे हुए थे। वे परस्पर
यह कहते थे कि इस प्रकारका ब्राह्मण हमने नहीं
देखा, जो कि सब कुछ जाननेवाला हो और गुणोंका
खजाना हो। लोग उनके विषयमें यह कहते थे कि ऐसा
व्यक्ति न कोई पहले हुआ और न कोई भविष्यमें
होगा ॥ २० १/२ ॥
उनपर पूर्ण विश्वास करके लोग धन तथा रत्नोंद्वारा
उनकी पूजा करने लगे। मुट्ठीमें बन्द वस्तुओंके विषयमें
वे तत्क्षण ही बता देते थे। प्रश्न पूछनेके लिये आये हुए
धनहीन तथा पुरुषार्थरहित व्यक्तिके मनकी बातको वे
जान जाते थे और उससे कहते कि तुम तीन दिनके
अन्दर ही धनवान् व्यक्ति हो जाओगे और फिर सचमें
ऐसा ही होता भी था ॥ २१-२३ ॥
दूर गयी हुई तथा खोयी हुई वस्तुके विषयमें वे
जैसा कहते थे, ठीक वैसा ही होता था। विप्ररूपधारी
उन ढुण्ढिराज गजाननके इस प्रकारकी भविष्यवाणियाँ
करनेकी बातको लोगोंद्वारा कहते हुए जब दो-तीन
महीने बीत गये तो यह समाचार राजा दिवोदासके
कानोंतक भी पहुँचा ॥ २४ १/२ ॥
राजाकी रानियाँ तथा अन्य भी पतिव्रतपरायणा स्त्रियाँ,
जो कि अभीतक पतिके अतिरिक्त अन्य किसी देवताको
भी नहीं मानती थीं, वे भी अब पतिकी आज्ञा लिये बिना
ही 'हमारे पुत्र होगा या कन्या होगी' इस विचारको
जाननेके लिये उन ज्योतिर्विद् ब्राह्मणको देखनेके लिये
निकल पड़ीं। सखियोंने उन्हें यह कहकर रोका कि वे
ज्योतिषी ढुण्ढि यहीं आ जायँगे ॥ २५-२७ ॥
तदनन्तर उन रानियोंने उन ज्योतिषीको बुलवाया
और उन्हें वे एकान्त स्थानमें ले गयीं। उन्हें रमणीय
आसनपर बैठाकर राजपत्नियोंने उनका भलीभाँति पूजन
किया। उनके दर्शनसे अत्यन्त विह्वल हुई उन रानियोंने
उनके दोनों चरणोंको प्रक्षालित किया और उनके शरीरपर
कस्तूरी चन्दनका भलीभाँति विलेपन किया ॥ २८-२९ ॥
उनके समीप जाकर किसी रानीने उन्हें स्वयं अपने
हाथोंसे पानका बीड़ा दिया। उन रानियोंने उनसे बहुत-
से प्रश्न पूछे और उन्होंने उन सभी प्रश्नोंका सही-सही
उत्तर दिया। इस प्रकार उनपर विश्वास हो जानेपर वे
सभी अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गयीं। वे घरके कामोंको
करना छोड़कर तत्पर होकर प्रतिदिन उनका दर्शन-पूजन
करने लगीं ॥ ३०-३१ १/२ ॥
'इस प्रकारका भूत, वर्तमान तथा भविष्यका ज्ञाता
ज्योतिषी हमने इससे पूर्व कभी नहीं देखा।' इस प्रकार
कहती हुई वे सभी उन श्रेष्ठ ज्योतिर्विद्की प्रशंसा करने
लगीं। तदनन्तर राजा दिवोदासके उठकर वहाँ पहुँचनेसे
पहले उन सभीने क्षणभरमें शीघ्र ही उन्हें विदा कर
दिया ॥ ३२-३३ ॥
वे स्त्रियाँ पतिभावका परित्याग करके उन्हीं
ज्योतिर्विद्का सदा चिन्तन किया करती थीं। राजा
दिवोदासने भी उन ज्योतिषीके विषयमें जानकर उनको
बुलाकर उन्हें प्रणाम किया ॥ ३४ ॥
अपने राजसिंहासनपर उन्हें विराजमानकर विष्टर
आदिसे उनकी पूजा की और बड़े ही आदरपूर्वक उन्हें
गौ, अर्घ्य, धन तथा वस्त्र समर्पित किये ॥ ३५ ॥
राजाने उनसे जो-जो भी बात पूछी, उन्होंने
प्रसन्नतापूर्वक वह सब ठीक-ठीक बता दिया। अब तो
राजा दिवोदास अपने अभीष्ट देवको भूल गये और
उनका ही स्मरण-ध्यान करने लगे ॥ ३६ ॥
राजाने एकान्तमें उनसे अनेकों प्रकारके प्रश्न पूछे।
तब विश्वास हो जानेपर उनसे आदरपूर्वक प्रार्थना की
कि [हे ब्रह्मन् !] मैं आपको अनेकों ग्राम, धन-धान्य
प्रदान करूँगा, आप मेरे समीप ही ठहरिये; क्योंकि मैंने
आपके बहुत-से चमत्कारोंको देखा है ॥ ३७-३८ ॥
तदनन्तर प्रपंचसे अर्थात् राजाद्वारा दिये गये प्रलोभनोंसे
रहित होकर ढुण्ढिने कहा - मैं स्त्री, पुत्र कन्या तथा
मकान आदिको छोड़कर वाराणसी आया हूँ। मेरी ग्राम,

क्री०ख०-अ०४७ ] * भगवान् विष्णुद्वारा बौद्धरूप धारणकर काशीवासियोंको उपदेश देना * ३८१
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धन-धान्यमें कोई रुचि नहीं है, मैं सर्वथा आसक्तिरहित | आप बिना कुछ विचार किये कर लें ॥ ४१ ॥
हूँ। मैं एक बात आपको बताता हूँ, उसे आप अपने मनमें | हे राजन् ! इससे तुम्हारा परम कल्याण होगा, इसमें
बैठा लें ॥ ३९-४० ॥ | संशय नहीं है। इस बातसे ही आप समझ लें कि मैंने
आजसे सत्रहवें दिन जो कोई भी पुरुष आपके पास | आपके द्वारा देनेयोग्य ग्रामों, धन-धान्य तथा धन-
आयेगा और वह आपसे जो कुछ भी कहे, उस बातको | सम्पत्तिको प्राप्त कर लिया ॥ ४२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'काशिराजका वशीकरण' नामक छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४६ ॥
सैंतालीसवाँ अध्याय
भगवान् विष्णुद्वारा बौद्धरूप धारणकर काशीनिवासियोँको उपदेश प्रदान करना, काशीमें
अधर्माचरणकी वृद्धि, भगवान् विष्णुका अपने चतुर्भुजरूपमें दिवोदासको दर्शन देना और
अनेक वर प्रदान करना तथा शिवके काशी-आगमनके लिये दूतद्वारा सन्देश भेजना,
दिवोदासद्वारा काशीका राज्य त्यागकर तपस्यामें निरत होना
राजा दिवोदास बोले- हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं आपके | हैं। यज्ञ-यागादिमें हवन करनेके लिये वृक्षोंका काटना
वचनका अवश्य पालन करूँगा। मैं भगवान् शिवकी | तथा यज्ञमें पशुओंकी हिंसा करना व्यर्थ ही है। दूसरेको
शपथ लेकर कहता हूँ कि जैसा आपने कहा है, मैं वैसा | दान देना अथवा दक्षिणा देना अपने धनको नष्ट करना
ही करूँगा। उससे अन्यथा कुछ नहीं करूँगा ॥ १॥ | है ॥ ६-७ ॥
गृत्समद बोले- इस प्रकार ज्योतिषीका वेश | शरीरके नष्ट हो जानेपर पृथ्वी आदि पाँचों भूत
धारण किये उन ढुंढिराजने भूत, भविष्य, वर्तमान तथा | पाँचों भूतोंमें लीन हो जाते हैं। अतः प्रसन्नताके साथ
दूरकी बातोंकी सत्य-सत्य भविष्यवाणियाँ करते हुए | घृतसहित पक्वान्न अकेले ही खाना चाहिये। नाना
काशीमें निवास करनेवाले सभी जनोंको अपने वशमें कर | प्रकारके भोगोंके द्वारा तथा विविध सुखोंका आनन्द लेते
लिया। वे लोग अपने सभी कर्मोंको छोड़कर उन्हींकी | हुए इस शरीररूपी आत्माकी ही सेवा करना चाहिये।
सेवामें लग गये। तदनन्तर काशीके पंचक्रोशीक्षेत्रसे बाहर | ऐसा उपदेश सुनकर वहाँके सभी लोग अपने-अपने
स्थित होकर भगवान् विष्णु बौद्धका अवतार धारणकर | आचार-विचारका परित्यागकर जैसा बुद्धने कहा था,
काशीमें आकर सभी लोगोंको अपनी मायासे मोहित | उसी प्रकारका आचरण करने लगे ॥ ८-९ ॥
करने लगे। उन्होंने सनातनधर्मरूपी वृषसे द्वेष करते हुए | वे ब्राह्मणोंतकको भोजन न कराकर स्वयं ही उत्तम
श्रुति-स्मृतिके विरुद्ध मतका वहाँके निवासियोंको पाठ | भोगोंका उपभोग करने लगे। उन (बौद्ध)-की पत्नीका
पढ़ाया ॥ २-४॥ | नाम कमला था। उसने भी वाराणसीमें स्थित होकर वहाँ
उन्होंने भी अपने वचनोंके द्वारा काशीके सभी | निवास करनेवाली सभी स्त्रियोंके मनोरथोंको पूर्ण करते
बड़े-बड़े लोगोंको अपने वशमें कर लिया। उन्होंने | हुए उन सभीको व्यामोहमें डाल दिया। वह उन्हें प्रतिदिन
भगवान्के साकार भजन अर्थात् मूर्तिपूजाको सर्वांशमें | कुमार्गमें चलनेको प्रेरित करती थी ॥ १०-११ ॥
बड़े ही समारोहपूर्वक दूषित बताया ॥ ५ ॥ | इस प्रकार उन दोनोंके वचनोंसे काशीपुरी तथा
उन्होंने कहा कि सभी लोग मूर्ख बुद्धिवाले हैं; | वहाँके ग्रामोंमें निवास करनेवालोंकी बुद्धियाँ नष्ट-भ्रष्ट
क्योंकि परमात्माके हृदयमें स्थित होनेपर भी न जाने क्यों | हो गयीं। जो परमात्मा अपने शरीरमें तथा पतिके शरीरमें
वे मिट्टी तथा धातु आदिसे निर्मित मूर्तियोंकी पूजा करते | स्थित है, वही दूसरेके शरीरमें भी स्थित है ॥ १२ ॥

३८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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[बायाँ स्तम्भ]
जिस प्रकारसे व्यक्ति मुख, नाक, हाथ आदि
विभिन्न अंगोंके भिन्न होनेपर भिन्न नहीं होता। उसी
प्रकारसे यह आत्मा भी जरायुज, स्वेदज आदि चार
प्रकारके प्राणियोंमें अलग-अलग नहीं होता अर्थात् एक
समान रूपसे स्थित रहता है। इस प्रकारसे प्रलोभनमें
डाली गयी वे स्त्रियाँ परपुरुषोंके साथ भी सम्पर्क करने
लगीं। ब्राह्मणोंका अग्निहोत्र तथा अन्य यज्ञोंके प्रति
आदर शिथिल हो गया ॥ १३-१४॥
व्रतमें, दानमें, होममें, देवताओं तथा ब्राह्मणोंके
पूजनमें और यज्ञीय पशुओंके आलभनमें लोग संशय करने
लगे। [ब्राह्मणोंको न बुलाकर] लोग परस्पर एक-दूसरेके
घरोंमें जाकर श्राद्ध-सम्बन्धी तथा व्रतोपवास-सम्बन्धी
उत्तम भोजनको स्वयमेव ही करने लगे ॥ १५-१६ ॥
इस प्रकार वहाँ [वैदिक] धर्मका लोप होने लगा
और पापकी वृद्धि हो गयी। तदनन्तर बौद्धरूप विष्णु
शीघ्र ही राजा दिवोदासके भवनमें गये। राजा दिवोदासने
अपने शुभ आसनपर बैठाकर परम भक्तिभावसे उनका
पूजन किया। तदनन्तर बोलनेमें अत्यन्त कुशल बौद्धने
दिवोदाससे यह वचन कहा- ॥ १७-१८ ॥
बौद्ध बोले— हे राजन् ! सुनिये, मैं आपके हितकी
बात बताता हूँ, उसे सुनकर आप आदरपूर्वक उसका
पालन करें। इस वाराणसी नगरीका त्रिशूलधारी भगवान्
शंकरने अपने तेजसे निर्माण किया है। प्रलयकालमें भी
वे सभी प्राणियोंके साथ इस वाराणसीपुरीको अपने
त्रिशूलके अग्रभागमें धारण किये रहते हैं। इस नगरीमें
पुण्यात्माजनों तथा मरनेके अनन्तर मोक्ष चाहनेवाले
लोगोंके द्वारा ही निवास किया जाना चाहिये ॥ १९-२० ॥
पापात्मा जनोंको भैरवद्वारा इस नगरीसे बाहर कर
दिया जाता है और पुण्यात्मा जनोंकी रक्षा भगवान् शिव
तथा भैरव यहाँ करते रहते हैं। आपका पुण्य जबतक
था, तबतक तो आप काशीमें राज्य करते हुए यहाँ स्थित
रहे, किंतु अब आप वैसे पुण्यात्मा नहीं रहे। हे राजन् !
आपके राज्यमें नरकको प्राप्त करानेवाला पाप प्रवृत्त हो
चुका है ॥ २१-२२१/२॥
राजा दिवोदास बोले— आपने मुझसे ठीक ही

[दायाँ स्तम्भ]
कहा है, मैं आपके वचनोंका पालन करूँगा। ज्योतिर्विद्
ढुंढिराजने पहले जो कहा, वह सत्य ही हो रहा है।
हे पुरुषोत्तम ! यदि मैं आपके यथार्थ स्वरूपको जान सकूँ
तो आप मुझे बतायें कि आप कौन हैं? जो मेरा हित
करनेके लिये यहाँ आये हैं ॥ २३-२४१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले— तदनन्तर दयाके वशीभूत होकर
उन्होंने राजा दिवोदासको अपना शंख, चक्र एवं गदाधारी
चतुर्भुजरूप दिखाया। उन्होंने अपना विराट् एवं
व्यष्टिरूपात्मक चित्स्वरूप उन्हें दिखलाया ॥ २५-२६ ॥
तदनन्तर राजा दिवोदासने अत्यन्त हर्षपूर्वक उन्हें
नमस्कार करके उनका पूजन किया। उनके दर्शनोंसे
आह्लादित हुए राजा परम भक्तिपूर्वक नृत्य करने लगे ॥ २७ ॥
वे उनसे बोले—हे अनघ ! आज मैं अपने पितरोंसहित
धन्य हो गया। पहले मैंने राज्यका त्यागकर बहुत-सा
तप किया था। ब्रह्माजीने जबरदस्ती यह काशीका उत्तम
राज्य मुझे सौंपा था। आज आपका दर्शन कर लेनेसे मेरे
जन्म तथा मरण—दोनोंका बन्धन छूट गया है, इसमें
कोई संशय नहीं है। मैं आपके शरणागत हूँ और आपसे
यही वरदान माँगता हूँ ॥ २८-२९१/२ ॥
मुनि (गृत्समद) बोले— ऐसा कहे जानेपर वे
परमात्मा उन नृपश्रेष्ठ दिवोदाससे बोले—हे श्रेष्ठ राजन् !
भगवान् विश्वेश्वरकी कृपासे आपको भी परम मुक्ति
प्राप्त होगी, इस समय आप काशीके राज्यका परित्यागकर
सुखी हो जायँ ॥ ३०-३१ ॥
यदि आप ऐसा नहीं करेंगे, तो भैरव और दण्डपाणि
आपको काशीसे बाहर कर देंगे। उनका इस प्रकारका
वचन सुनकर राजा दिवोदास अत्यन्त चिन्तित हो उठे।
तदनन्तर उनके कथनके कारणपर ध्यान लगाकर तथा
विचार करके राजाने वह सब कुछ जान लिया कि ज्योतिषीके
रूपमें वे ढुंढिराज गणेश थे। बौद्ध बनकर ये मायावी
विष्णु ही यहाँ आये हुए हैं ॥ ३२-३३ ॥
तदनन्तर उन्होंने सिर झुकाकर भक्तिपूर्वक उन्हें
प्रणाम किया और उनसे कहा—आप कौन हैं? तब वे
महाविष्णु भी उनकी भावनाको समझ करके अपने
वास्तविक रूपमें [पुनः] प्रकट हो गये। उस समय वे

क्री०ख०-अ०४८ ] * ढुण्ढिराजका शिवको काशीमें आनेके लिये सन्देश भेजना * ३८३
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प्रभु चतुर्भुजरूपमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण
किये थे। उन्होंने पीताम्बर धारण कर रखा था और वे
सभी लोकोंके परम आश्रयस्वरूप थे॥ ३४-३५॥
तब राजा दिवोदास उनसे बोले—हे पूज्य! आज
मैं धन्य हो गया तथा मेरे पूर्वज भी धन्य हो गये, जो
कि मैंने अपने पुण्यके प्रभावसे मोक्ष प्रदान करनेवाले
आपके चरणयुगलका दर्शन किया है। आप मुझे परम
मोक्ष प्रदान करें और इस मुद्राको ग्रहण करें, जिसे कि
ब्रह्माजीने मुझे हठात् प्रदान किया था। अब आजसे यहाँ
भगवान् शिव अपना राज्य शासन करें। तब भगवान्
विष्णुने उनसे कहा—भगवान् शिव आपको मुक्ति प्रदान
करेंगे॥ ३६-३७१/२॥
ब्रह्माजी बोले—राजा दिवोदाससे ऐसा कहकर
महायोगेश्वर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये और पुनः
बौद्धरूप धारणकर अपने आश्रमको चले गये। तत्पश्चात्
उन्होंने भगवान् शिवके वहाँ आगमनके लिये दूतको
भेजा। [दूतने भगवान् शिवसे कहा—] 'ज्योतिर्विद्
ढुण्ढिराज गणेशने और मैंने राजा दिवोदासके राज्यमें
बहुत प्रकारसे अधर्मकी वृद्धि की है और राजा दिवोदासने
आपके लिये काशीके राज्यका परित्याग कर दिया है।
अतः हे विश्वेश्वर! आप शीघ्र ही अपनी वाराणसीपुरीमें
आयें'॥ ३८-४०१/२॥

इधर राजा दिवोदासने राजाके चिह्नोंका परित्याग
करके महान् तप किया। उन्होंने एक अत्यन्त सुन्दर
मन्दिरमें अपने नामसे एक अत्यन्त विख्यात शिवलिंग
(दिवोदासेश्वर)-की स्थापना की, वह लिंग सकाम
उपासना करनेवालोंकी समस्त अभिलाषाओंको पूर्ण
करनेवाला है और मोक्षार्थियोंको मोक्ष प्रदान करनेवाला
है। वे राजा दिवोदास सभी प्रकारके पुरुषार्थों (धर्म-
अर्थ-काम तथा मोक्ष)-को प्रदान करनेवाले भगवान्
शंकरके दर्शनकी प्रतीक्षा करने लगे॥ ४१-४२॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें '[दिवोदासके] राज्य-त्यागका वर्णन'
नामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४७॥

अड़तालीसवाँ अध्याय
ढुण्ढिराजका शिवको काशीमें आनेके लिये सन्देश भेजना, भगवान् शिवका काशीमें आकर
ढुण्ढिराजकी स्तुति करना तथा ढुण्ढिराजकी महिमाका प्रतिपादन करना, रानी कीर्तिका
काशी आकर ढुण्ढिराजकी भक्ति करना, ढुण्ढिराजका प्रत्यक्ष दर्शन देकर उसे तथा
उसके पुत्रको अनेक वर प्रदानकर कीर्तिपुत्रका 'पर्शुबाहु' नामकरण करना

मुनि गृत्समद बोले—राजा दिवोदासने काशीका
राज्य छोड़ दिया है—ऐसा जानकर ढुण्ढिराज गणेश
ज्योतिषीका रूप छोड़कर पुनः अपने वास्तविक स्वरूपमें
आ गये और सभी लोगोंको सब प्रकारका अभिलषित
पदार्थ देनेवाले बनकर ढुण्ढिविनायक नामसे काशीमें
स्थित हो गये॥ १॥
तदनन्तर आनन्दमें निमग्न हुए महाबुद्धिमान्
ढुण्ढिराजने भगवान् शिवके पास यह सन्देश कहकर दूत

३८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
भेजा कि आप शीघ्र ही काशीमें चले आयें ॥ २ ॥
भगवान् शिव वृषभपर आरूढ़ होकर दिव्य वाद्योंके
घोषके साथ अपने गणोंसे घिरे हुए रहकर वाराणसीकी
ओर चल पड़े। वहाँ निराहार रहकर महर्षि जैगीषव्य,
जो तपस्या करते-करते दीमककी बाँबीके समान हो गये
थे, उनपर कृपा करके भगवान् शिव ढुण्ढिविनायकको
प्रणाम करके उनसे बोले- ॥ ३-४॥
भगवान् शिव बोले- हे विश्वेश्वर! आप ही
विश्वरूप हैं, हे देव! आप ही इस विश्वकी सृष्टि करते
हैं। आप ही इसकी रक्षा करते हैं और आप ही इसका
संहार करते हैं। हे गणेश! आप जीवोंके शुभ एवं अशुभ
कर्मोंके द्रष्टा हैं और उन्हें तदनुरूप विविध प्रकारका
सुख-भोग प्रदान करनेवाले हैं ॥ ५ ॥
इस चराचर जीव-जगत्का आप संहार करनेवाले
हैं और आप ही सत्त्वादि तीन गुणोंमें विभेद करनेवाले
हैं। आपके ही कृपाप्रसादसे भगवान् विष्णु, पद्मयोनि
ब्रह्मा और भगवान् शिव अपने-अपने कर्मोंको करनेमें
समर्थ होते हैं। आपके बिना वेदोंका विधि-विधान व्यर्थ
हो जाता है और आपकी ही कृपाशक्तिसे देवताओंके
शत्रु असुरोंका विनाश होता है ॥ ६-७॥
पूर्वकालमें अनन्तशक्तिसम्पन्न प्रकृतिस्वरूपा
महिषासुरमर्दिनी दुर्गाने आपका ही पूजन करके महिषासुरका
वध किया था और उस समय महिषासुरके द्वारा छोड़ी
गयी श्वासवायुके द्वारा उड़ाये गये पर्वतोंके गिरनेके भयसे
भयभीत इस समस्त विश्वकी रक्षा भी की थी ॥ ८ ॥
आप अप्रमेय हैं, सम्पूर्ण लोकके साक्षीस्वरूप हैं,
आप अविनाशी हैं, आप कारणोंके भी कारण हैं, सम्पूर्ण
वेदराशि आपका वर्णन करनेमें कुण्ठित हो जाती है।
आपकी उपासनाके बलपर ही शेषनाग इस पृथ्वीको
धारण करनेमें समर्थ होते हैं ॥ ९ ॥
सन्त-महात्माजन आपको ही प्रणाम करके आपकी
भलीभाँति पूजा करते हैं और मनसे आपका ही स्मरण
करते हुए यजन करते हैं। निष्कामीजन भी आपकी ही
भक्ति करते हुए आवागमनसे रहित मुक्तिपदको प्राप्त
करते हैं ॥ १० ॥
आप अनेक स्वरूपवाले हैं, आप अनेकों पैर,
अनेकों नेत्र, अनेकों सिर, अनेकों कान, अनेकों बाहु और
अनेकों जिह्वावाले हैं। आप अनन्तविज्ञानघन हैं, अनेकों
ब्रह्माण्डोंके कारणरूप हैं और परम प्रकाशमान हैं। हे
अखिलेश्वर! आपकी कृपाके फलस्वरूप ही चिरकालतक
प्रयत्न करनेके पश्चात् मैं इस अविमुक्तक्षेत्र काशीका
दर्शन कर पाया हूँ ॥ ११ ॥
मुनि गृत्समद बोले- इस प्रकार उन ढुण्ढि-
विनायककी स्तुति करके और उनकी पूजा करके भगवान्
शंकर उनसे प्रार्थना करते हुए बोले- [हे प्रभो!]
काशीपुरीको पाकर अब काशीकी विरहजन्य मेरी पीड़ा
दूर हो गयी है। अब आप मेरे भक्तों तथा इस काशीपुरीकी
सदा रक्षा करते रहें, बिना आपकी कृपाके काशीमें निवास
करना किसी प्रकार सम्भव न हो ॥ १२-१३॥
दण्डपाणि भैरव और आप ढुण्ढिविनायककी जिसपर
कृपा होगी, उसीको मैं उसके मृत्युकालमें तारक ब्रह्मका
उपदेश दूँगा, इसके अतिरिक्त और किसीको भी नहीं
दूँगा। माघमासकी [कृष्णपक्षकी] चतुर्थी तिथिमें मंगलवारके
दिन चन्द्रोदय होनेपर जो व्यक्ति पुओं, मोदकों तथा अन्य
उपचारोंद्वारा आपका पूजन करेगा और जो इस स्तोत्रके
पाठसे आपका स्तवन करेगा, उसके भी कष्टोंको दूर
करके आप उसके समस्त मनोरथोंको पूर्ण करें और
अनेक प्रकारकी धन-सम्पत्ति उसे प्रदान करें ॥ १४-
१६ ॥
प्रातःकाल उठकर जो तीनों कालोंमें अथवा एक
समय भक्तिपूर्वक इस स्तोत्रका पाठ करेगा, उसे भोग तथा
मोक्ष प्राप्त होगा। यहाँ आप अन्वेषण करके मनुष्योंको
सभी पदार्थोंको प्रदान करते हैं, अतः आप 'ढुण्ढि' इस
नामसे तीनों लोकोंमें विख्यात होंगे ॥ १७-१८ ॥
आपका 'ढुण्ढि' यह नाम मोक्ष प्रदान करनेवाला
तथा सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला है। साथ ही इस
नामका स्मरण करनेसे यह सभी कार्योंमें सिद्धि प्रदान
करनेवाला होगा ॥ १९ ॥

क्री०ख०-अ०४८ ] * ढुण्ढिराजका शिवको काशीमें आनेके लिये सन्देश भेजना * ३८५
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**मुनि बोले—**ऐसा कहकर महादेव भगवान् शंकरने
अत्यन्त रमणीय बने हुए मन्दिरमें गण्डकी नदीसे प्राप्त
(शालग्राम) शिलासे निर्मित ढुण्ढिविनायककी मूर्तिको
स्थापित किया॥ २०॥
तदनन्तर भगवान् शिव अपने भवनमें तथा अन्य
सभी देवता भी अपने-अपने स्थानोंको गये। उन भगवान्
शंकरने अपने भक्त दिवोदासको मुक्ति प्रदान की॥ २१॥
**गृत्समद बोले—**इस प्रकार उन ढुण्ढिविनायक
तथा बौद्धरूपी विष्णुने अपनी मायाद्वारा राजा दिवोदासको
मोहित किया और परिणाममें उनका कल्याण किया। हे
देवि कीर्ते ! इस प्रकार मैंने ढुण्ढिराजद्वारा किये गये कार्यों
तथा उनके सामर्थ्यको तुमसे पूर्ण रूपसे कहा, इस
प्रकारके प्रभाववाले उन ढुण्ढिके वरदानसे ही तुम्हारा
पुत्र जीवित हुआ है॥ २२-२३॥
**ब्रह्माजी बोले—**इस प्रकार प्रियव्रतकी रानी कीर्तिसे
उन ढुण्ढिराजके समस्त कार्योंका वर्णन करके मुनि
गृत्समद उनसे विदा लेकर शीघ्र ही अपने आश्रम-
स्थलको चले गये॥ २४॥
तदनन्तर उसी समय रानी कीर्ति अपने पुत्रको लेकर
उस पुण्यदायिनी वाराणसीपुरीको गयी, जो कि वहाँ मृत्यु
होनेपर मुक्ति प्रदान करनेवाली है॥ २५॥
वहाँ पहुँचकर वह ढुण्ढिके मन्दिरमें गयी, और
वहाँ नर-नारियोंद्वारा किये जा रहे महोत्सवको देखकर
अत्यन्त हर्षित होकर रानी कीर्तिने ढुण्ढिविनायकको
प्रणाम किया। उस दिन माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी
तिथि और मंगलवारका दिन था॥ २६ १/२ ॥
वहाँ नृत्य एवं गीतमें पारंगत भक्तजनोंद्वारा अनेक
स्वर्णपात्रोंमें रखे गये पक्वान्नों तथा खीरके नैवेद्य
आदिके द्वारा ढुण्ढिका पूजन किया गया था। उन्हें
विविध प्रकारके अलंकारोंद्वारा सुसज्जित किया गया
था। दिव्य माला तथा वस्त्र उन्हें पहनाये गये थे। वे
नाना प्रकारकी मणियोंसे समन्वित थे। विविध प्रकारकी
मोतियोंकी मालाओंसे विभूषित थे और भक्तोंद्वारा
दक्षिणाके रूपमें सुवर्ण तथा रत्न उन्हें निवेदित किये
गये थे॥ २७-२९॥
वह निष्पाप कीर्ति देव ढुण्ढिके मुखका दर्शन न
हो पानेसे अत्यन्त चिन्तित हो उठी। वह यह भी सोच
रही थी—कि मुझ अकिंचनके द्वारा इन्हें क्या निवेदित
किया जाय ? ॥ ३०॥
उसने मार्गमें चलते समय एकत्र किये गये दूर्वांकुरों,
शमीपत्रों तथा मन्दारके पुष्पोंसे अत्यन्त श्रद्धाभक्तिपूर्वक
उन ढुण्ढिविनायकका पूजन किया और उनसे पुत्रके
अभ्युदयकी प्रार्थना की॥ ३१॥
वे ढुण्ढि उसके तथा उसके पुत्रद्वारा शमीपत्र,
मन्दार पुष्प एवं दूर्वांकुरोंसे की गयी पूजासे जितने प्रसन्न
हुए, उतने प्रसन्न तो अन्य भक्तोंद्वारा की गयी सुवर्णादि
विभिन्न उपचारोंकी पूजासे भी नहीं हुए॥ ३२॥
तदनन्तर वे सभी भक्तजन अत्यन्त उल्लसित होकर
अपने-अपने घरोंको चले गये और माता तथा पुत्र वे
दोनों उन ढुण्ढिराजकी सन्निधिमें स्थित रह गये॥ ३३॥
उन दोनोंके उपवाससे और श्रद्धा-भक्तिभावसे
अत्यन्त प्रसन्न भगवान् महोत्कट ढुण्ढिराज उस मूर्तिमेंसे
उनके समक्ष प्रत्यक्ष प्रकट हो गये॥ ३४॥
वे दोनों बोले— [हे भगवन् ! ] मुनि गृत्समदने
महेश्वर ढुण्ढिराजका जो स्वरूप बतलाया था, वही
अत्यन्त प्रकाशमान स्वरूप आज हमें बड़े ही पुण्य-
संचयोंके फलस्वरूप साक्षात् दिखायी दिया है, जो कि
सभी प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत है, मस्तकपर मुकुटसे
सुशोभित है, दस भुजाओंवाला है, अत्यन्त सुन्दर
नेत्रकमलोंसे शोभायमान है, अत्यन्त मूल्यवान् रत्नों एवं
मोतियोंसे बनी श्रेष्ठतम मालाको धारण किये हुए है,
उसने पीताम्बर धारण कर रखा है, और अत्युत्तम दाँतसे
सुशोभित है॥ ३५-३७॥
इस प्रकारके परम स्वरूपका दर्शनकर वे दोनों
माता-पुत्र आनन्दके सागरमें इतना निमग्न हो गये
कि उनका पूजन करना तथा उन्हें नमस्कार करना भी
वे भूल गये॥ ३८॥
तदनन्तर भगवान् ढुण्ढि बोले—हे सुव्रते ! वर

३८६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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