श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
ग्यारहवाँ अध्याय
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उ०ख०-अ०११ ] * ब्रह्माजीका व्यासजीको गणेशजीके मन्त्रके अनुष्ठानकी विधि बताना * ६३
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ग्यारहवाँ अध्याय
ब्रह्माजीका व्यासजीको गणेशजीके मन्त्रके अनुष्ठानकी विधि बताना
भृगुजी बोले— [हे राजन्!] चतुर्मुख ब्रह्माजी
इसके अनन्तर [व्यासजीद्वारा] किये गये प्रश्नका समाधान
करनेकी इच्छासे बोले— [हे व्यासजी!] मैं गणेशजीके
मन्त्रोंका अनेक प्रकारसे विचारकर तुमसे सब कुछ
क्रमसे बता रहा हूँ॥ १॥
ब्रह्माजी बोले— हे मुने! शीघ्र सिद्धि प्रदान
करनेवाले महात्मा गणेशजीके अनन्त मन्त्र हैं, मैं उनकी
उपासना-विधि तुमसे कहता हूँ॥ २॥
हे मुने! आगमशास्त्रमें गणेशजीके सात करोड़
महामन्त्र विद्यमान हैं, उनका रहस्य तो शिवजी ही
जानते हैं और कुछ-कुछ मैं जानता हूँ॥ ३ ॥
उनमें-से षडक्षर¹ और एकाक्षर²—ये दोनों मन्त्र
श्रेष्ठ हैं, जिनके स्मरणमात्रसे सभी सिद्धियाँ करगत हो
जाती हैं॥४॥
हे मुने! जिन [गणेशजी]-की उपासनासे [मनुष्य]
जीवन्मुक्त, धन्य, पूज्य और देवताओंसे भी नमस्कार
करनेयोग्य हो जाते हैं। जिन [गणेशजी]-की उपासनासे
सिद्धियाँ उन [उपासकों]-का दास्य करती हैं, जो
[मनुष्य] गणेशजीकी श्रद्धाभावसे समन्वित हो भक्ति
करते हैं, वे लोग सर्वज्ञ, अनेक प्रकारके रूप धारण कर
सकनेवाले और इच्छानुसार विहार करनेवाले हो जाते
हैं। जिन लोगोंमें लेशमात्र भी [गणेशजीकी] भक्ति नहीं
है, उनका तो जन्म ही निरर्थक है॥ ५-७॥
जो लोग गणेशजीकी भक्तिसे विमुख हैं, उनका तो
मुख भी नहीं देखना चाहिये। उनके दर्शनमात्रसे पग-
पगपर विघ्न उपस्थित होते हैं॥ ८ ॥
उनके उपासकके दर्शनसे विघ्न शान्त हो जाते हैं,
स्थावर-जंगम-सभी प्राणी उसे नमस्कार करते हैं॥ ९॥
जिनपर गजाननदेव सन्तुष्ट होते हैं, वे अवश्य ही
मोक्ष प्राप्त करते हैं और जिनपर वे गजवदन रुष्ट होते
हैं, वे केवल दुःखोंके ही भागी होते हैं॥ १०॥
अतः मैं तुम्हें [गणेशजीका] शुभ एकाक्षर मन्त्र
बताता हूँ, उसके अनुष्ठानमात्रसे अपना वांछित सम्यक्
रूपसे प्राप्त करोगे ॥ ११ ॥
भगवान् शंकरने जिस प्रकार मुझसे कहा था, उस
अनुष्ठानको मैं [वैसे ही] तुमसे कहता हूँ। [सर्वप्रथम
अनुष्ठानकर्ता] मनुष्य स्नान करके पवित्र होकर धुले
हुए वस्त्र धारण करे ॥ १२ ॥
[तदनन्तर] बुद्धिमान् साधक अपने कुशके आसनपर
मृगचर्म बिछाकर और उसपर वस्त्र बिछाकर, उसके
ऊपर स्थित हो भूतशुद्धि और प्राणप्रतिष्ठा करे ॥ १३॥
उसके बाद सावधानीपूर्वक अन्तर्मातृकान्यास और
बहिर्मातृकान्यास करके हृदयमें मूलमन्त्रका जप करते
हुए प्राणायाम करे, तदुपरान्त आगममें कहे गये मन्त्रोंसे
यथाविधि सन्ध्या-उपासना करे और स्थिर मनसे आपाद-
मस्तक देवता [गणेशजी]-का ध्यान करके समाहित चित्तसे
मानसिक उपचारोंसे उनका पूजन करे। तदनन्तर पुरश्चरण
पद्धतिसे यथाशक्ति उनके मन्त्रका जप करे॥ १४-१६॥
जबतक गजानन गणेशजी वर देनेके लिये अनुकूल
नहीं हो जाते और अपने स्वरूपका दर्शन नहीं कराते,
तबतक जप-परायण ही रहे ॥ १७ ॥
भृगुजी बोले— मुनि व्याससे ऐसा कहकर ब्रह्माजीने
शुभ दिन देखकर भ्रमितचित्त मुनिश्रेष्ठ (व्यास)-को
गणेशजीके एकाक्षर मन्त्रका उपदेश दिया॥ १८१/२॥
ब्रह्माजी बोले— जब तुम करोड़ों सूर्योंके समान
प्रकाशमान उन भगवान् गणेशजीको वर देनेके लिये
आया हुआ देखो तो अपने चित्तको स्थिर करके
कहना—हे गजानन (गणेशजी) ! आप मेरे हृदयमें स्थिर
होकर नित्य निवास करें ॥ १९-२० ॥
तब वे तुमसे 'वर माँगो'—ऐसा कहेंगे और तुमको
वरदान देंगे, इसमें सन्देह नहीं है। उन देव गणेशके
हृदयमें स्थित हो जानेपर तुम दिव्य ज्ञानकी प्राप्ति
१. वक्रतुण्डाय हुं। २. गं।
६४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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करोगे ॥ २१ ॥ | इन जैसोंको इस मन्त्रराजका उपदेश नहीं करना; परंतु
हे वत्स ! तब तुम भूत, भविष्य और वर्तमानका | शरणागत, दृढ़ भक्तिवाले, श्रद्धावान्, विनयशील, वेदवादी,
अशेष (सम्पूर्ण) ज्ञान प्राप्त कर लोगे और इस दृढ़ | [मन्त्रप्राप्तिकी] आकांक्षावाले, दयालु और शास्त्रज्ञके
भ्रान्तिको दूरकर अनेक ग्रन्थोंकी रचना करोगे ॥ २२ ॥ | समक्ष इसे प्रकट करना। मन्त्रराजका वक्ता यदि इसे
व्यासजी बोले—हे पिता ! आपके द्वारा किये गये | अनधिकारीके सम्मुख प्रकाशित करता है तो वह [अपने
उपदेशसे मेरी भ्रान्ति चली गयी। हे पितामह ! [अब] | साथ-साथ] अपनी दस पहलेकी और दस बादकी
मैं आपकी आज्ञाके अनुसार अनुष्ठान करूँगा ॥ २३ ॥ | पीढ़ियोंको भी नरककी प्राप्ति कराता हैं ॥ २५-२७ ॥
ब्रह्माजी बोले—हे विभो ! अब तुम गजानन | जो इसका भक्तिपूर्वक जप करता है, वह इच्छित
गणेशजीका स्मरण करके व्यग्रताके कारणोंसे रहित, | फलकी प्राप्ति करता है और पुत्र-पौत्र तथा धन-धान्यसे
एकान्त निर्जन देशमें अनुष्ठान करो ॥ २४ ॥ | सम्पन्न हो जाता है। वह एकदन्त (गणेशजी)-के प्रभावसे
नास्तिक (अनीश्वरवादी), [ईश्वर और वेदकी] | निर्मल ज्ञानकी प्राप्ति करके इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंको
निन्दा करनेवाले, निर्दयी, अनाचारी, दुष्ट और मूर्ख— | भोगकर अन्तमें मोक्षकी प्राप्ति करता है ॥ २८-२९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'मन्त्रकथन' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११ ॥
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बारहवाँ अध्याय
ब्रह्मा, विष्णु और शिवको भगवान् गणेशके दर्शन
सूतजी बोले—[हे शौनकजी !] ब्रह्माजीके मुखसे | इस उपासनामार्गका मैं तुम्हें भलीभाँति बोध कराता
निकले हुए इन वचनोंको सुनकर महान् हर्षसे युक्त मुनि | हूँ; क्योंकि स्नेहपात्र और अत्यन्त प्रज्ञावान् शिष्यसे कुछ
व्यासजीने उनसे पुनः पूछा ॥ १ ॥ | भी गोप्य नहीं रखना चाहिये ॥ ६ ॥
व्यासजीने कहा—[हे ब्रह्मन् !] आपकी अमृतमयी | मैंने तुमसे कहा था कि ये गणनायक गणेशजी
वाणीका पान करके मैंने बोध प्राप्त कर लिया है अर्थात् | ओंकारस्वरूप हैं, इसीलिये इन विनायककी सम्पूर्ण
मेरा भ्रम दूर हो गया है। हे पिता! अब मैं इस | कार्योंमें [प्रथम] पूजा होती है ॥ ७ ॥
मन्त्रराजको सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥ | निर्विघ्नताकी कामना करनेवालोंको इनका पूजन
इस मन्त्रका किसने जप किया था और उसे | अवश्य करना चाहिये, अन्यथा वे कार्यमें विघ्न कर देते
गजानन गणेशजीसे कैसे सिद्धि प्राप्त हुई थी? मेरे इस | हैं। समस्त आगम-ग्रन्थोंमें इनके ओंकारबीजसे युक्त
संशयका उन्मूलन कीजिये, आपके अतिरिक्त मेरा कोई | और ओंकार-पल्लवसे समन्वित मन्त्र कहे गये हैं। इनसे
गुरु नहीं है ॥ ३ ॥ | (ओंकारबीजसे) अतिरिक्त जो मन्त्र हैं, वे निष्फल होते
भृगुजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! मुनिके द्वारा इस | हैं। इस प्रकार सत्-असत्, व्यक्त-अव्यक्तके रूपमें सब
प्रकार पूछे जानेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजीने कृपापूर्वक | कुछ गणनायक गणेशजी ही हैं ॥ ८-९ ॥
उन विनीत व्यासजीसे इस प्रकार कहा— ॥ ४ ॥ | इस प्रकार सभी देवता, सिद्ध, मुनि, राक्षस, किन्नर,
ब्रह्माजी बोले—हे ब्रह्मन्! तुम्हें साधुवाद है, | गन्धर्व, चारण, नाग, यक्ष, गुह्यक (यक्ष-जैसी अर्धदेवोंकी
साधुवाद है, जो कि तुमने इस समय यह प्रश्न पूछा है। | श्रेणी) और मनुष्य तथा सम्पूर्ण जड़-चेतन प्राणी
तुम पुण्यवान् हो; क्योंकि पुण्यहीन मनुष्योंमें कथा- | गणेशजीके उपासक हैं; अतएव गणेशजीसे श्रेष्ठ कोई
श्रवणके प्रति प्रेम ही नहीं होता ॥ ५ ॥ | नहीं है ॥ १० १/२ ॥