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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 308

३०६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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नगरके सभी लोगोंके उस व्याघ्रमुख असुरके | सभी लोगोंको जीवित कर दिया और दग्ध
मुखके अन्दर चले जानेपर भी उस असुरने अपना मुख | काशीनगरीको पूर्ववत् ज्यों-का-त्यों बना दिया। तदनन्तर
तबतक बन्द नहीं किया, जबतक कि अनन्त गुणोंसे | उन विनायकने शीघ्र ही सिंहके समान गर्जना की।
सम्पन्न महान् आत्मावाले वे विनायकदेव उसके मुखके | तब सभी लोगोंने तथा काशिराजने प्रसन्नतापूर्वक उनकी
अन्दर प्रविष्ट नहीं हो गये। सूर्यके उदय हो जानेपर देव | स्तुति की॥ ४४-४५॥
विनायकने व्याघ्रके समान मुखवाले उस असुरको, | हे गुणोंके अधीश्वर! आप अनन्तशक्तिसम्पन्न हैं,
ज्वालामुख असुरद्वारा दग्ध किये काशीनगरको तथा | आपको नमस्कार है, अरिष्टोंका विनाश करनेवाले!
व्याघ्रमुख नामक असुरके उस मुखको देखा, जो | आपको नमस्कार है, सृष्टिकर्ताको नमस्कार है। विश्वकी
काशीपुरीके समस्त लोगोंसे भरा हुआ था॥ ३५-३६॥ | रक्षा करनेवालेको नमस्कार है। विघ्नोंका समूल उच्छेद
अग्निकी ज्वालाको अपने समीप आते देख बालक | करनेवालेको नमस्कार है। ज्ञान प्रदान करनेवालेको
विनायक बलपूर्वक उस व्याघ्र नामक असुरके मुखमें | नमस्कार है, अज्ञानको दूर करनेवाले आपको नमस्कार
प्रविष्ट हो गये। अपने मुखमें विनायकके प्रविष्ट होते ही | है। हे जगत्के स्वामी! हे लीलावतार! हे देव! आपने
उस असुरने सभीको मार डालनेकी इच्छासे विशाल | अपनी लीलाके द्वारा असमयमें उत्पन्न प्रलयाग्निसे तथा
गुफाके समान अपने मुखको बन्द कर लिया॥ ३७१/२॥ | दैत्योंसे हमारी रक्षा की है॥ ४६-४७॥
बालक विनायकने उसके मुखको फाड़ डालनेके | इस प्रकारकी महाबलशाली अग्निका पान करनेकी
लिये तत्क्षण ही अपने आकारको बहुत बड़ा बना लिया | सामर्थ्य और किसमें है? पृथ्वीके समान मुखवाले उस
और उस असुरकी देहको फाड़ डाला। उस व्याघ्रास्य | व्याघ्रमुख नामवाले महान् राक्षसको आपके अतिरिक्त
असुरकी देहने पृथ्वी तथा आकाशको ढक लिया। उस | और कौन मार सकता है? मरे हुओंको आपके अतिरिक्त
असुरकी देहके फटनेसे चट-चटकी वैसी ही आवाज | जीवन प्रदान करनेका साहस और दूसरा कौन कर सकता
हुई, जैसे बाँसके फटनेसे होती है॥ ३८-३९॥ | है, हे देव! आप ही माता हैं, आप ही पिता हैं और आप
वह असुर दो टुकड़ोंमें बँट गया और शीघ्र ही | ही रक्षा करनेवाले हैं॥ ४८-४९॥
वह प्राणोंसे रहित हो गया। विनायकने उसकी देहके | मेरा महान् भाग्य है और यहाँके लोगोंका भी
एक टुकड़ेको आकाशमें फेंक दिया, हवाके द्वारा उड़ाया | महान् भाग्य है, जो कि आपकी सन्निधि हमें प्राप्त हुई
जाता हुआ वह टुकड़ा दूर देशमें जा गिरा। उस | है। ऐसा कहकर वे काशिराज अश्वपर तथा वे विनायक
आधे खण्डके नीचे गिरनेसे [वहाँका] घनघोर वन | सिंहके यानपर आरूढ़ होकर चल पड़े॥ ५०॥
चूर-चूर हो गया॥ ४०-४१॥ | प्रसन्नतापूर्वक अपने भवनमें पहुँचकर राजाने तथा
शरीरका दूसरा जो खण्ड वहीं रह गया, वह | विनायकने सन्ध्यावन्दन आदि नित्य कर्म सम्पन्न किया।
बालकोंके लिये आनन्ददायी क्रीडागृह बन गया। तब | सहस्रोंकी संख्यामें अन्य वे सभी वीर भी अपने-अपने
उस खण्डमें स्थित लोग जग उठे और वे दूसरोंको भी | वाहनोंमें आरूढ़ होकर अपने-अपने घर गये। सभी
जगाने लगे। तदनन्तर बालक विनायकने सम्पूर्ण अग्निको | पुरवासी अत्यन्त प्रसन्न हो गये। उस समय बाजे बजने
पी डाला और ज्वालासुरके साथ ही महाकाय विदारण | लगे और बन्दीजन राजाकी स्तुति करने लगे॥ ५१-५२॥
(दारुण) असुरको, अपने पैरके आघातसे चूर्ण-चूर्ण कर | तदनन्तर काशिराजने ब्राह्मणोंको विविध प्रकारके
डाला॥ ४२-४३॥ | दान दिये। स्वस्तिवाचन कराकर शीघ्र ही देवताओंका तथा
इस प्रकार उन दुष्ट दैत्योंका वध करनेके अनन्तर | उन विनायकका पूजन किया। लोगोंने विनायकको अनेक
बालक विनायकने अपनी योगमायाके बलसे मरे हुए | प्रकारकी भेंट प्रदान की। विनायकने भी उन उपहारोंको