श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
एक सौ बीसवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ० १२०] * दूतोंका धर्म एवं अधर्मकी मृत्युका समाचार दैत्यराज सिन्धुको देना * ५५९
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एक सौ बीसवाँ अध्याय
दूतोंका धर्म एवं अधर्मकी मृत्युका समाचार दैत्यराज सिन्धुको देना, सिन्धुद्वारा शोक प्रकट
करना, सखियोंद्वारा समाचार मिलनेपर सिन्धुपत्नी दुर्गाका राजसभामें उपस्थित हो
पुत्रोंके लिये विलाप करना, सखियोंद्वारा उसे आश्वस्त करना, क्रुद्ध दैत्यराज
सिन्धुका चतुरंगिणी सेना लेकर युद्धके लिये प्रस्थान, उसी समय
पिता चक्रपाणिका प्रकट होकर पुत्र सिन्धुको मैत्रीका उपदेश
देना, किंतु सिन्धुका उसे अस्वीकृत कर देना
ब्रह्माजी बोले—मरनेसे बचे हुए कुछ वीर
मुझे मृत्युलोकमें छोड़कर मेरे वे दोनों पुत्र स्वर्गलोक
सैनिक; जिनके शरीरसे रक्त प्रवाहित हो रहा था और
क्यों चले गये ? वे दोनों वीर देवसेनाको मार डालनेवाले
जो अत्यन्त दुखित थे, दैत्यराज सिन्धुके पास आये और
तथा यमराजका भी अन्त करनेवाले थे॥ ९ ॥
सभामें विराजमान सिन्धुसे अत्यन्त भयभीत होते हुए इस
[हे पुत्रो!] 'यदि मैं शत्रुके सिरको काटकर यहाँ
प्रकार कहने लगे— ॥ १ ॥
नहीं लाऊँगा तो मैं आपको अपना मुख नहीं दिखलाऊँगा'—
वीर बोले—हे धनुर्धर ! आप इस अत्यन्त दुःख
ऐसा तुमने युद्धके लिये प्रस्थान करते समय मुझसे कहा
प्रदान करनेवाले वचनको सुनिये। आपके दोनों पुत्रों धर्म
था, क्या तुमने उस वचनको सत्य कर दिया है ॥ १० ॥
और अधर्मने महान् युद्ध करके देवसेनाको मार-मारकर
तदनन्तर अत्यन्त दुःखके कारण रोती हुई सखियोंने
यमलोकमें पहुँचा दिया। तदनन्तर देवसेनामेंसे कोई महान्
अन्तःपुरमें स्थित धर्म और अधर्मकी माता दुर्गासे सब
वीर युद्ध करने आया, जिसके छह मुख थे॥ २-३॥
समाचार विस्तारसे बतलाया ॥ ११ ॥
उसे भी भीषण युद्धमें आपके पुत्रोंद्वारा जमीनपर
सखियोंने कहा—हे सुन्दर भौंहोंवाली ! धर्म और
पटक दिया गया, किंतु उसने उठकर उन दोनों वीरोंकी
अधर्म नामक पुत्रोंके मारे जानेसे आपके स्वामी दैत्यराज
शिखाके बालोंको पकड़ लिया और बहुत बार घुमाते
सिन्धु अत्यन्त रुदन कर रहे हैं। यह सुनकर शय्यापर
हुए जमीनपर गिरा दिया, जिस कारण उनकी देहके
स्थित वह दुर्गा उसी प्रकार भूमिपर गिर पड़ी, जैसे कि
सैकड़ों टुकड़े हो गये और वे दोनों उत्तम स्वर्गलोकको
अत्यन्त कोमल और अरुणवर्णके पल्लवयुक्त केलेके
चले गये ॥ ४-५ ॥
वृक्ष आँधीके द्वारा गिरा दिये जाते हैं ॥ १२ ॥
ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार उनकी बात सुनकर
सखियोंके अमांगलिक वचनोंसे उसका हृदय इस
दैत्यश्रेष्ठ वह सिन्धु शोकसागरमें निमग्न हो गया और
प्रकार विद्ध हो गया, मानो बाणोंसे बिंध गया हो। उसके
उसी प्रकार भूमिपर गिर पड़ा, जैसे कि वज्रके प्रहारसे
केश तथा आभूषण अस्त-व्यस्त हो गये। उस समय वह
पर्वत गिर पड़ता है। उसी समय बन्धु-बान्धवों तथा
भी बहुत रोने लगी ॥ १३ ॥
मित्रोंने दौड़ते हुए उसे शीघ्र ही बलपूर्वक उठा लिया,
उसके वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गये थे, जिसके
मुहूर्तभरके अनन्तर उसकी चेतना लौट आयी, तब वह
कारण बिल्वफलके सदृश शोभास्पद उसका वक्षःस्थल
बहुत दुखित होता हुआ शोक करने लगा॥ ६-७॥
अनावृत-सा हो गया था। आँसुओंके गिरनेसे उसके
सिन्धु बोला—जिन्होंने पूर्वकालमें युद्धमें इन्द्र
कपोल श्यामल वर्णके प्रतीत हो रहे थे। शोकरूपी
आदि लोकपालोंको भी जीत लिया था, उन महाबली
अग्निसे उसकी प्रभा मलिन-सी हो गयी थी ॥ १४ ॥
धर्म और अधर्म नामक दोनों वीरोंको छः मुखवाले
वह अपने दोनों हाथोंसे मुखपर प्रहार कर रही
कार्तिकेयने कैसे मार दिया ? ॥ ८ ॥
थी, उसके दाँतोंसे निकलनेवाले रक्तसे भूमि सिक्त हो
५६० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
गयी थी, वह अपने शरीरकी भी सुध-बुध भूल गयी,
वह अत्यन्त व्याकुल हो गयी और लज्जाका भी उसे
भान नहीं रहा। वह उसी प्रकार गिरते-पड़ते राजसभाके
प्रांगणमें पहुँची, जैसे कि कोई हठ करता हुआ बालक
गिरता-पड़ता है। उसको देखकर उसके दुःखसे विवश
हुए वे सभी सभामें बैठे हुए पुरुष भी रोने लगे। अपने
नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई वह राजपत्नी दुर्गी उन सभासदोंसे
कहने लगी ॥ १५-१६ १/२ ॥
रानी बोली- सभी वीरोंके उपस्थित रहनेपर भी
मेरे उन दोनों सुकुमार पुत्रोंको बिना मुझसे पूछे ही क्यों
युद्धभूमिमें प्रेषित कर दिया गया ? यदि मैं आशीर्वाद
देकर उन्हें भेजती तो निश्चित ही उनकी मृत्यु नहीं
होती ॥ १७-१८ ॥
मेरे वचनोंको विधाता भी मिथ्या करना नहीं
चाहते। जिन मेरे पुत्रोंके द्वारा देवगणोंको भी जीत लिया
गया था, फिर वे कैसे मृत्युको प्राप्त हुए? ॥ १९॥
मैं उन दोनोंको अब कब देखूँगी, जिन्होंने कि
अपनी सुन्दरतासे कामदेवको भी जीत लिया था और जो
बुद्धिके समुद्र थे, वे दोनों मुझे छोड़कर क्यों चले गये ?
उन दोनोंकी शोकाग्निमें दग्ध होकर आज ही मैं मृत्युको
प्राप्त हो जाऊँगी। इस प्रकारसे कहकर वह दैत्यपत्नी
दुर्गी अपने हृदयको बार-बार पीटती हुई भूमिपर गिर
पड़ी ॥ २०-२१॥
तदनन्तर सखियों तथा नगरनिवासी जनोंने उसे
शीघ्र ही समझाया और कहा - हे माता ! शोक करनेसे
कोई भी जो मृत्युको प्राप्त हो गया हो, लौटकर वापस
नहीं आता है ॥ २२ ॥
इस मृत्युलोकमें चिरकालतक जीवित रहनेवाला न
कोई देखा गया है और न ऐसे किसी व्यक्तिके विषयमें
सुना ही गया है। हनुमान्, शरद्वानके पुत्र कृपाचार्य,
बलि, व्यास, परशुराम, विभीषण तथा द्रोणाचार्यके पुत्र
अश्वत्थामा- इन सात चिरजीवियोंको छोड़कर चिरकाल-
तक जीवित रहनेवाला न कोई हुआ है और न कोई आगे
होगा ही ॥ २३-२४॥
जब ब्रह्मा आदि देवताओंकी भी मृत्यु होती है, तो
फिर हमलोगोंकी क्या गणना ! रुदन तो उसीको करना
चाहिये, जो यह समझे कि मेरी मृत्यु नहीं होगी ॥ २५ ॥
यह निश्चित है कि ऋणका बन्धन छूट जानेपर
स्त्री, पुत्र, पशु भी इस संसारमें स्थिर नहीं रहते, अतः
शोक करना व्यर्थ है। जिस प्रकार जलप्रवाहमें बहते हुए
दो काष्ठ कभी जुड़ जाते हैं, तो कभी अलग हो जाते
हैं, वैसे ही [प्रारब्धके कारण] विवश हुआ प्राणी [दूसरे
प्राणीके साथ] कभी संयोग तो कभी वियोग प्राप्त करता
है। जिस प्रकार बहुत-से पक्षीगण रात्रिमें एक वृक्षका
आश्रय लेते हैं और प्रातःकाल दसों दिशाओंमें उड़ जाते
हैं, उसी प्रकार संसारमें जीवोंका संयोग और वियोग
होता रहता है, इसमें दुःख एवं विलाप करनेकी क्या
आवश्यकता ? * ॥ २६-२८ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारसे दुर्गीको [सखियों
तथा नागरिकोंने] समझाया, इसके अनन्तर [सभासद्]
जनोंसे समन्वित वह सिन्धु बलपूर्वक शोकको रोककर
अपने आसनमें बैठ गया ॥ २९ ॥
उन्होंने विचार किया कि यदि हम रोते रहेंगे तो
शत्रुजन हमारा उपहास करेंगे। उस दुर्गीको सहारा देकर
लोग बलपूर्वक अन्तःपुरमें ले गये ॥ ३० ॥
शोकसे अत्यन्त व्याकुल वह दुर्गी दीर्घ निःश्वास
लेती हुई पलंगपर गिर पड़ी। दैत्यराज सिन्धुने अत्यन्त
क्रुद्ध होते हुए शस्त्रोंके समूहोंको धारण किया ॥ ३१ ॥
- मृत्युलोके चिरं स्थाता नेक्षितो न श्रुतोऽपि च। विहाय हनुमन्तं च कृपं शारद्वतं बलिम् ॥
व्यासं परशुरामं च विभीषणमथापि च। द्रौणिं नान्यश्चिरं स्थायी न भूतो न भविष्यति ॥
ब्रह्मादीनां भवेन्मृत्युः का तत्र गणनात्मनः। रोदनं तेन कर्तव्यं न स्यान्मृत्युः कदास्य चेत् ॥
क्षीणे ऋणानुबन्धे च स्त्री पुत्रः पशुरेव च । न तिष्ठति ध्रुवं तत्र कृतः शोको वृथा भवेत् ॥
यथा काष्ठं काष्ठगतं पूरे स्याच्च वियुज्यते। तद्वज्जन्तुर्वियोगं च योगं च प्राप्नुतेऽवशः ॥
नानापक्षिगणा रात्रावेकवृक्षगता यथा। प्रातर्दशदिशो यान्ति तत्र का परिदेवना ॥ (श्रीगणेशपु०, क्रीडाखण्ड १२० । २३-२८)
क्री०ख०-अ० १२० ] * दूतोंका धर्म एवं अधर्मकी मृत्युका समाचार दैत्यराज सिन्धुको देना * ५६१
अपने दोनों पुत्रोंके वधका बदला लेनेके लिये वह
अश्वपर आरूढ़ होकर युद्ध करने चल पड़ा। उसके
प्रस्थान करते ही उसकी रणोन्मत्त विशाल चतुरंगिणी सेना
भी निकल पड़ी। सबसे आगे पैदल सैनिक उछलते-
उछलते हुए जा रहे थे। वे सभी नानावर्णके तथा समान
स्वरूपवाले थे, उन्होंने अपने हाथोंमें विविध प्रकारके
अस्त्र-शस्त्रोंको धारण किया हुआ था॥ ३२-३३ ॥
पैदल सेनाके पीछे हाथियोंके झुण्ड चल रहे थे, वे
गैरिक आदि अनेक धातुओंसे चित्रित किये गये थे, घण्टा
तथा आभूषणोंसे सुसज्जित थे। उनके गण्डस्थलसे
मदरूपी जलकी धारा प्रवाहित हो रही थी और वे चिंग्घाड़
रहे थे। वे हाथी अपनी चीत्कारसे शत्रुसेनाको भयभीत कर
रहे थे और अत्यन्त भयंकर ध्वनि कर रहे थे। हाथियोंकी
सेनाके अनन्तर घुड़सवारोंसहित घोड़े चल रहे थे। जो
युद्धमें वायुके समान वेगवाले थे॥ ३४-३५ ॥
उन घोड़ोंके खुरोंके आघातसे भूतलपरसे अग्निकी
चिनगारियाँ निकलकर गिर रही थीं। उन घोड़ोंके ऊपर
हाथोंमें ढाल, भाले तथा खड्ग लिये हुए अश्वारोही
सैनिक सुशोभित हो रहे थे। वे सैनिक शरीरमें चन्दन
तथा अगरुका अनुलेप किये हुए थे। विविध प्रकारकी
मालाओंसे विभूषित थे। सभीने शरीरकी रक्षा करनेवाले
कवचको धारण कर रखा था और मस्तकपर मुकुट
धारण करनेसे वे बहुत सुशोभित हो रहे थे॥ ३६-३७॥
वे मानो आकाशको निगलते हुए और दसों
दिशाओंको निनादित करते हुए चल रहे थे। उस
अश्वसेनाके पीछे रथ चल रहे थे, जिनपर महान् वीर
योद्धा बैठे हुए थे॥ ३८ ॥
वे रथ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थे
और उनमें धनुष एवं तरकस रखे हुए थे। उस सेनाके
मध्यमें दैत्यराज सिन्धु सुशोभित हो रहा था, जो विशाल
मुकुट तथा कुण्डलोंको धारण किये हुए था॥ ३९ ॥
वह अपने हाथोंमें अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र
तथा धनुषको लिये हुए था और कन्धेमें धारण किये
तरकससे सुशोभित हो रहा था। वह युद्धोचित उत्तम
कंकणोंकी शोभासे समन्वित तथा करधनी और बाजूबन्दसे
शोभायमान था ॥ ४० ॥
क्रुद्ध होनेसे उसके नेत्र ऐसे लाल-लाल हो रहे थे
मानो वह तीनों लोकोंको खा जाना चाहता हो। उस
समय सभी प्रकारके वाद्योंके बजते हुए और बन्दीजनोंद्वारा
स्तुतिगान होते हुए जब राजा सिन्धु बड़े वेगसे चल रहा
था, तभी एक दूत वहाँ आकर दैत्यराजसे बोला- हे
दैत्यराज ! हे सुव्रत ! आपके पिता आ रहे हैं, आप उनकी
प्रतीक्षा करें ॥ ४१-४२॥
जब सिन्धुने पीछे मुड़कर देखा तो उसने अपने
पिताको समीपमें आया देखा। वे अश्वपर आरूढ़ थे।
सिन्धुने अपने पिताको प्रणाम किया और पिताने भी उसे
आशीर्वाद प्रदान किया ॥ ४३ ॥
तदनन्तर [वात्सल्यवश] सेनाके मध्यमें पुत्रको सुरक्षित
करके उसके पिताने उसे इस लोक तथा परलोकमें सुख
प्राप्त करनेके लिये उपदेश प्रदान किया ॥ ४४ ॥
चक्रपाणि बोले- हे पुत्र ! तुम अभिमानके वशीभूत
हो बर्ताव कर रहे हो, ऐश्वर्यके मदमें उन्मत्त होकर तुम
भला-बुरा कुछ भी जान नहीं पा रहे हो। जो अपने
कल्याणकी कामना रखता हो, उसे अपने कार्यकी
सिद्धिके लिये वृद्धजनोंसे पूछना चाहिये। जो भविष्यमें
अपने कल्याणकी कामना रखता हो, उसे चाहिये कि
वह वर्तमानमें अशुभ कर्म न करे। थोड़ेसे भी अशुभ
कर्मके द्वारा महान् पुण्य विनष्ट हो जाता है ॥ ४५-४६॥
हे पुत्र ! जिस प्रकार अग्निकी एक चिनगारीमात्र
सब कुछ जला डालती है, उसी प्रकार थोड़ा-सा भी
दोष सम्पूर्ण संचित पुण्यको विनष्ट कर डालता है। हे
पुत्र ! देवताओंको बन्दी बनाये रखनेमें तुम्हारा कहीं भी
कोई भी लाभ दिखायी नहीं देता है ॥ ४७ ॥
वही पुत्र सत्पुत्र कहलाता है, जो सदा ही माता-
पिताकी आज्ञाका पालन करता है, उनकी आज्ञाका
उल्लंघन करनेपर पुण्य विनष्ट हो जाता है और हे पुत्र !
वह अनेकों नरकोंको प्रदान करनेवाले पापसमूहों तथा
मोहके पाशमें ग्रस्त हो जाता है। अतः हे पुत्र ! तुम मेरा
यह कल्याणकारी वचन सुनो-तुम शीघ्र ही देवताओंको
मुक्त कर दो ॥ ४८-४९॥
५६२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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देवताओंके बन्धनमुक्त हो जानेपर वह मयूरेश | हे तात! आप मूर्खोंकी भाँति बोल रहे हैं, अब
तुम्हारा मित्र हो जायगा, वह सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण | आप अपना मुख काला करके यहाँसे चले जायें। हे
करनेवाला है। इस पृथ्वीपर द्वेष रखते हुए कोई भी | पिता! जिसने मेरी परार्ध संख्यावाली सेनाको मार डाला
किसी प्रकार सुख नहीं प्राप्त कर सकता*। द्वेष रखनेके | है, उसके साथ अब मैं कैसे अपयश प्रदान करनेवाली
कारण ही देवताओंके द्वारा हिरण्याक्ष आदि असुरोंका | सन्धि कर सकता हूँ? हाथमें कुश एवं अक्षमालाको
विनाश हुआ॥ ५०१/२॥ | धारण करना क्षत्रियधर्ममें शोभित नहीं होता ॥ ५३-५४ ॥
ब्रह्माजी बोले-पिताके इस प्रकारके वचनोंको | इसी कारण राजाको चाहिये कि वह शत्रुओंके साथ
सुनकर पुत्र सिन्धु अत्यधिक कुपित हो उठा और वह | दयाका बर्ताव न करे। नीतिमें बताया गया है कि युद्ध-
अपने पिताको धिक्कारते हुए उनसे कहने लगा-मुझे | स्थलमें शत्रुके प्रति निर्दयतापूर्ण व्यवहार ही करना चाहिये।
अभीतक यह भ्रम बना हुआ था कि मेरे पिता आप बहुत | ऐसा कहनेके अनन्तर दैत्यराज सिन्धुने पिताको प्रणाम
चतुर हैं, किंतु इस समय आपका वह सब चातुर्य | किया और उन्हें बलपूर्वक वापस लौटाकर वह युद्धकी
भलीभाँति प्रकट हो गया है ॥ ५१-५२ ॥ | अभिलाषासे युद्धके लिये निकल पड़ा ॥ ५५-५६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'पिताके साथ सिन्धुदैत्यके संवादका वर्णन' नामक
एक सौ बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२० ॥
एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय
राक्षसराज सिन्धुकी सेनाके साथ कार्तिकेय, वीरभद्र आदि देववीरोंकी सेनाओंका भयंकर
संग्राम, सिन्धुसेनाकी पराजय, दैत्यराज सिन्धुका स्वयं युद्धके लिये प्रस्थान,
मयूरेशके परशुसे उत्पन्न कालपुरुषद्वारा दैत्य सैनिकोंका भक्षण किया
जाना, चिन्तित होकर दैत्य सिन्धुका घरमें आकर छिपकर रहना
ब्रह्माजी बोले-जब वीरभद्र आदि वीरोंके साथ | उठे और [युद्धहेतु] तैयार होकर उन्होंने उस सेनाको
गणेश्वर सुखपूर्वक आसनपर बैठे हुए थे, उसी समय | देखा। तब उन्होंने उस सिन्धुको अपनेको मारनेके लिये
भयभीत देवता हाँफते हुए बड़े वेगपूर्वक वहाँ आये ॥ १॥ | आया हुआ साक्षात् काल ही समझा ॥ २-३ ॥
उन्होंने गुणेश्वरको समाचार दिया कि युद्ध करनेके | तदनन्तर मयूरेशने अपने चारों हाथोंमें चार आयुधोंको
लिये वह दैत्यराज सिन्धु अब स्वयं ही आ गया है। | धारण किया और वे बड़े ही आनन्दित होते हुए अपने
सिन्धु (सागर)-के समान अपार सैन्य होनेके कारण | वाहन मयूरपर आरूढ़ हुए, उस समय उन्होंने भीषण
उस दैत्यका 'सिन्धु' यह नाम [वास्तविक अर्थोंमें] | गर्जना की ॥ ४ ॥
प्रसिद्ध हुआ है। तब (यह समाचार पाकर) वे सभी वीर | वे मयूरेश भगवान् शिवको प्रणाम करके दसों
- चक्रपाणिरुवाच
गर्वेण वर्तसे पुत्र श्रिया मत्तो न बुध्यसे। अर्थज्ञाने महावृद्धाः प्रष्टव्या भूतिमिच्छता ॥
अग्रे शुभेच्छया पूर्वमशुभं न समाचरेत्। अल्पेन कर्मणा नाशं पुण्यमेत्यशुभेन ह ॥
अगुरग्निर्दहेत्सर्वं पुण्यं दोषस्तथा सुत। न लाभो दृश्यते पुत्र बद्धेषु तेषु ते क्वचित् ॥
स एव पुत्रो यो मातृपितृवाक्यकरोऽनिशम्। तस्य चोल्लङ्घने पुण्यं नाशमेति च जायते ॥
दोषजालं मोहजालं नाना निरयदं सुत। अतः शृणु हितं वाक्यं मोचयाशु सुरान् सुत ॥
मुक्तेषु तु भवेन्मित्रं मयूरेशोऽखिलार्थदः। न चेह द्वेषतः कश्चित्सुखं प्राप्तो धरातले ॥
(श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड १२०। ४५-५०)
क्री०ख०-अ०१२१] * राक्षसराज सिन्धुकी सेनाके साथ कार्तिकेय आदिका भयंकर संग्राम * ५६३
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दिशाओंको प्रकाशित करते हुए बड़े ही वेगपूर्वक निकल
पड़े। उन्हें भगवान् शिवका आशीर्वादरूपी कवच प्राप्त
था। वे वीरोंको साथ लेकर सेनासहित चल रहे थे ॥ ५ ॥
जब वे दैत्यराज सिन्धुको मारनेके लिये आगे जाने
लगे तो उसी समय षडानन कार्तिकेयने उपस्थित होकर
उनसे कहा—हे विघ्नराज! उस सिन्धुसे युद्ध करनेके
लिये मैं जाता हूँ। बहुतसे वीरोंके रहते हुए आप क्यों
युद्धके लिये जाते हैं ? पहले हम सभीका बल-पराक्रम
देख लीजिये, फिर यदि हमारा पौरुष नष्ट हो जाय, तब
आप युद्ध करें। ऐसा कहकर और उन मयूरेशको प्रणाम
करके कार्तिकेय चतुरंगिणी सेना साथ लेकर युद्धके लिये
निकल पड़े। फिर उन्होंने राक्षसराज सिन्धुकी सेनाका
वध आरम्भ किया ॥ ६-८ ॥
उस सिन्धुने भी नाना प्रकारके शस्त्रों तथा बाणोंके
जालसे उस देवसेनापर प्रहार किया। 'अरे ! आज सहन
करो, मुझपर प्रहार करो, मैं तुम्हें मारता हूँ, आओ मेरे
सम्मुख आओ' इस प्रकारसे उस युद्धमें युद्ध करनेवाले
वीरोंका कोलाहल हो रहा था। कई वीर शस्त्रोंके द्वारा
आहत हो गये थे, तो कई वीर बाणोंके समूहोंके प्रहारसे
प्राणशून्य हो गये थे ॥ ९-१० ॥
तलवारों, भिन्दिपालों, भालों तथा मुद्गरोंके प्रहारसे
कुछ वीरोंके अंग कट गये थे, कईके पैर कट गये थे, और
किसी-किसीके बाहु, जाँघें और मस्तक कट चुके थे।
शत्रुपक्षके युद्धोन्मत्त सैनिकोंको मारते हुए वे वीर उन्हीं
सैनिकोंके समूहमें मिल जा रहे थे। उस समय वीरोंकी
सिंहगर्जना, घोड़ोंकी हिनहिनाहटकी ध्वनि, हाथियोंके
चिंघाड़ तथा रथोंके पहियोंकी धुरियों और वाद्योंकी
ध्वनि-प्रतिध्वनियोंसे महान् कोलाहल हो रहा था। दोनों
सेनाओंके बीच अनियन्त्रित युद्ध होने लगा ॥ ११-१३ ॥
वे वीर सैनिक अपनी-अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार
दूसरे पक्षके वीरोंके मस्तक, मुख, नेत्रों, बाहुओं, उदर,
नाभि, दोनों पैरों, दोनों गुल्फों तथा जानुओंपर आघात
करने लगे। कोई वीर अपने हाथ, कोई पैरसे और कोई
तलवारसे दूसरेको मार रहे थे। घनघोर अन्धकार छा
जानेपर भी कोई-कोई वीर अपने शत्रुओंको तलवारके
प्रहारसे मार रहे थे ॥ १४-१५ ॥
सूर्यके अस्त हो जानेपर वे वीर सैनिक एक-
दूसरेको देखकर उससे भलीभाँति पूछकर, यदि वह
शत्रुपक्षका होता तो उसे मार डाल रहे थे। असुर लोग
जब यह जान ले रहे थे कि ये देवपक्षके हैं, तो उन्हें
मार रहे थे और जब देवता लोग पहचान ले रहे थे कि
ये असुरपक्षके हैं, तो उन्हें मार डाल रहे थे ॥ १६ ॥
उस भयंकर संग्राममें रक्तकी नदियाँ प्रवाहित होने
लगीं, उनमें मृत सैनिक बह रहे थे। जिनमें कुछ प्राण
शेष था, उनको दूसरे वीरोंने हुंकार करते हुए बलपूर्वक
उस नदीसे बाहर निकाला और उनके शरीरोंमें लगे हुए
बाणोंको निकाला। युद्धसन्नद्ध उन दोनों पक्षोंकी सेनाके
सैनिकोंने पाँच दिनतक युद्ध करते हुए चिर विश्राम नहीं
लिया ॥ १७-१८॥
इस प्रकारके उस युद्धमें देवताओंने दैत्यराज सिन्धुके
करोड़ों पैदल सैनिकोंको मार डाला। इसके बाद उस
दैत्य सिन्धुकी असंख्य मात्रामें शस्त्रोंसे सुसज्जित गजारोही
सेना आयी। उन हाथियोंके ऊपर नाना प्रकारके युद्धकी
कलाओंमें कुशल गजारोही वीर बैठे हुए थे। तब वीरभद्र
आदि देवोंने कठिनाईसे जीती जा सकनेवाली दैत्य
सिन्धुकी उस गजसेनाका संहार किया ॥ १९-२० ॥
उन वीरोंमेंसे किसीके मस्तक फट गये थे, तो
किसीके हाथ और दाँत टूट गये थे। अग्निसम्बन्धी
शस्त्रोंको धारण किये हुए कुछ देवोंने हाथियोंपर सवार
वीरोंको गिरा डाला था ॥ २१ ॥
वीरभद्रने अत्यन्त बलपूर्वक एक हाथीको दूसरे
हाथीसे टकरा डाला, उस आघातके कारण वे दोनों
हाथी आठ टुकड़ोंमें होकर गिर पड़े ॥ २२ ॥
षडानन कार्तिकेय हाथियोंकी उस सेनाको मारते
हुए अत्यन्त शोभा पा रहे थे। उन्होंने अपने छह धनुषोंसे
छोड़े गये अनेकों बाणोंके द्वारा शक्तिपूर्वक दैत्य सिन्धुके
वीर सैनिकोंसहित असंख्य मदोन्मत्त हाथियोंके समूहोंको
मार गिराया। हिरण्यगर्भने भी अनेक वीरोंसे समन्वित उन
हाथियोंको मार गिराया ॥ २३-२४ ॥
भूतराजने नाराचकी मारसे जीवित बचे हुए विविध
५६४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
प्रकारके उन हाथियोंको, जिनमें वीर दैत्य सैनिक बैठे
हुए थे, अपने शस्त्रोंसे युद्धमें मार डाला ॥ २५ ॥
पुष्पदन्तने सिंहका रूप धारण करके उन हाथियोंको
विदीर्ण कर डाला। नन्दीने तो स्वयं हाथीका रूप धारण
करके उन बहुतसे हाथियोंको भग्न कर डाला ॥ २६ ॥
दूसरे देवगणोंने अपने बाणसमूहोंसे उन सभी
हाथियोंको गिरा दिया। किसीने एक हाथीकी पूँछ
पकड़कर घुमानेके अनन्तर दूसरे हाथीके ऊपर उसे फेंक
दिया तो अत्यन्त सुदृढ़ आघातके कारण दोनों हाथी
टकराकर चूर-चूर हो गये ॥ २७१/२ ॥
इस प्रकार हाथियोंकी सेनाके समाप्त हो जानेपर
वे दैत्य वीर अश्वोंपर आरूढ़ होकर युद्ध करने लगे।
उन्होंने उस युद्धमें उन असंख्य देवताओंको अपने
आयुधोंके द्वारा मार गिराया, किंतु मूर्च्छित हुए वे देवता
फिर सचेत हो गये ॥ २८-२९ ॥
तदनन्तर उन देवताओंने अत्यन्त क्रुद्ध होकर
घोड़ोंपर आरूढ़ दैत्यवीरों तथा घोड़ोंको बाणोंसे विद्ध
कर दिया। उधर घोड़ोंपर आरूढ़ उन महान् असुरोंने
क्रोध करते हुए देवताओंपर प्रहार किया ॥ ३० ॥
उन्होंने अपने शस्त्रों, अस्त्रों तथा बाणोंकी वर्षासे
उन देवताओंका अन्त कर डाला। तदनन्तर युद्धमें
देवताओंके मारे जानेका समाचार सुनकर मयूरेशकी
सेनाके छः वीर युद्धके लिये पुनः आये ॥ ३१ ॥
तब उन वीरोंने अश्वोंपर सवार उन दैत्योंपर पुनः
प्रहार किया। उनमेंसे चार वीर चारों दिशाओंमें बड़ा
भयंकर युद्ध करने लगे ॥ ३२ ॥
शेष बचे दो वीर देवगणोंसे समन्वित अपनी
देवसेनाकी रक्षा करने लगे। देवसेनाके उन चारों वीरोंने
अश्वों तथा अश्वोंपर सवार दैत्य वीरोंको मार गिराया ॥ ३३ ॥
उन्होंने पैदल चलकर ही शत्रुपक्षके बहुतसे वीरोंको
मार डाला। बाणोंकी मारसे घायल करोड़ों करोड़की
संख्यामें उस युद्धस्थलमें दैत्य सैनिक गिर पड़े ॥ ३४ ॥
नन्दी और भृंगीके द्वारा अश्वोंको मरा हुआ तथा
घुड़सवार सैनिकोंको गिरा हुआ देखकर पुनः नन्दिकेश्वरने
अपने पैरोंके आघातसे उनपर प्रहार किया ॥ ३५ ॥
वीरभद्रने भी असंख्य संख्यावाले उन अश्वारोही
योद्धाओंको गिरा डाला। कार्तिकेय आदि चार वीरोंके
द्वारा दैत्य सेनाके प्रधान-प्रधान योद्धाओंके मार दिये
जानेपर अवशिष्ट असुरगण सभी दिशाओं-विदिशाओंमें
भाग चले। तब वे कार्तिकेयादि चारों वीर असुरोंका
पीछा करते हुए उनका संहार करने लगे। उस रणस्थलमें
युद्धनिरत दैत्योंकी कल्पान्तकालीन प्रलय-जैसी स्थिति
हो गयी। तदनन्तर कुछ दैत्य देवगणोंकी शरणमें चले
गये ॥ ३६-३७ ॥
दैत्यसेनाके घुड़सवार सैनिकोंका वहाँ महान् कोलाहल
होने लगा। इस प्रकारसे सम्पूर्ण दैत्यसेनाका वध करके
कार्तिकेय आदि वे छः वीर अत्यन्त प्रसन्नताको प्राप्त
हुए। उस समय सभी प्रकारके वाद्य बजने लगे। सभी
वीर विजय-गर्जना करते हुए उन प्रभु मयूरेशकी स्तुति
करने लगे। वे कहने लगे-मयूरेशके प्रभावसे, उनका
स्मरण करनेसे तथा उनको प्रणाम करनेसे हमें विजय
प्राप्त हुई है ॥ ३८-३९ ॥
तदनन्तर दैत्यराज सिन्धुने अपनी शरणमें आये हुए
सैनिकोंके मुखसे अपनी सेनाके वधका वृत्तान्त जानकर
गजारोही, अश्वारोही तथा रथारोही वीरों, अमात्यों और
अन्य सभी वीरोंसे अपनी युद्धकी लालसाको प्रकट करते
हुए कहा ॥ ४०१/२ ॥
सिन्धु बोला-जो-जो भी योद्धा युद्धके लिये जाते
हैं, उन्हें शत्रुपक्षके द्वारा मारे जानेका ही समाचार मैं
अभीतक सुनता आया हूँ, अब इस समय मैं स्वयं ही
बलपूर्वक उस गुणेशको मारनेके लिये जाता हूँ ॥ ४११/२ ॥
ब्रह्माजी बोले-ऐसा कहकर उसने अपनी गर्जनासे
आकाश, दसों दिशाओं और तीनों लोकोंको इस प्रकार
निनादित कर डाला, जैसे कि वह पृथ्वी तथा स्वर्ग-
मण्डलको ग्रसनेके लिये जा रहा हो। तदनन्तर उसने
धनुषमें बाणका संधान करके और कानतक उस धनुषकी
प्रत्यंचा खींचकर बड़े ही वेगसे उस बाणको महान्
बलशाली वीरभद्र आदि देवोंद्वारा संरक्षित देवसेनामें
फेंका ॥ ४२-४३१/२ ॥
उस दैत्यराज सिन्धुने अस्त्रमन्त्रका सौ बार जप
क्री०ख०-अ०१२१ ] * राक्षसराज सिन्धुकी सेनाके साथ कार्तिकेय आदिका भयंकर संग्राम * ५६५
करके समस्त वीरोंका निरीक्षणकर बाणका एकाएक
धनुषपर सन्धान किया॥४४१/२॥
उस अस्त्रसे सहसा उत्पन्न अग्नि देवसेनाको और
साथ-ही-साथ वनों एवं पर्वतोंसहित समग्र पृथिवीको
दग्ध करने लगी ॥ ४५१/२॥
उस अग्निके द्वारा जलाये जाते हुए उन देवसैनिकोंने
उस अग्निसे उत्पन्न एक पुरुषको देखा, जो जटाएँ
धारण किये हुए था, उसका तेज प्रदीप्त हो रहा था,
उसकी जिह्वा विद्युत्के समान थी, उसका मुख बड़ा ही
भयंकर था और वह देवसैनिकोंको निगलता जा रहा था।
उसे देखकर कार्तिकेय आदि भयभीत हो गये और दसों
दिशाओंमें भाग गये। युद्धमें वह जिस-जिसका भक्षण
कर लेता था, वह-वह मयूरेशका स्मरण करता हुआ
प्रसन्नतापूर्वक उन मयूरेशके निज धामको प्राप्त कर लेता
था। इस प्रकारसे उस पुरुषने सम्पूर्ण देवसेनाका भक्षण
कर लिया ॥ ४६-४८१/२ ॥
वह देवसेना जिधर-जिधर जाती थी, वहाँ-वहाँ उस
पुरुषके मुखसे उत्पन्न अग्नि प्रलयाग्निके समान जलते
हुए उस सेनाको दग्ध कर देती थी, इस प्रकार मयूरेशकी
वह सेना अग्निके द्वारा दग्ध हो गयी ॥४९-५०॥
उस समय धुएँका महान् अन्धकार छा गया था,
उस अन्धकारमें कुछ भी दिखायी नहीं पड़ता था।
तदनन्तर सभी देववीर मयूरेशके पीछे छिप गये ॥ ५१ ॥
उस अग्निसे जलाये जाते हुए वे देवगण त्राहि-
त्राहि इस प्रकारसे करुण पुकार करने लगे। उस
निवारित किये न जा सकनेवाले महान् अस्त्रको देखकर
देव मयूरेश तेजहीन-से हो गये और लोकमें अपमानित
होनेके भयसे वे विचार करने लगे कि यदि इस
समय भगवान् शिव कृपा करें, तभी यहाँ हमारी
विजय हो सकती है ॥ ५२-५३॥
ऐसा कहनेके अनन्तर मयूरेशने हाथमें परशु धारण
किया और उसे मन्त्रोंसे अभिमन्त्रितकर बलपूर्वक
शत्रुसेनापर फेंका, अपने तेजसे सूर्यके तेजको भी
जीत लेनेवाला वह अभिमन्त्रित परशु आकाश तथा
दिशाओंको निनादित करते हुए तथा शत्रुसेनाको दग्ध
करते हुए ऐसे जा रहा था, मानो कल्पान्तके समयकी
प्रलयाग्नि जा रही हो ॥ ५४१/२ ॥
उस प्रज्वलित अग्निसदृश परशुसे भी एक महान्
पुरुष प्रकट हुआ, जिसके मुखमें आकाशसहित सम्पूर्ण
भूमण्डल भी प्रवेश करते हुए आकारमें छोटा पड़ जाय।
तदनन्तर उस उत्पन्न पुरुषका सिन्धुदैत्यके पुरुष योद्धाके
साथ और उस अस्त्र परशुका [सिन्धुके द्वारा प्रयुक्त]
अस्त्रके साथ युद्ध होने लगा। तब उस युद्धको देखनेके
लिये देवर्षिगण वहाँ उपस्थित हो गये। मयूरेशके उस
यमराजतुल्य अस्त्र परशुने शीघ्र ही दैत्य सिन्धुके
अस्त्रका भक्षण कर डाला ॥ ५५-५७॥
तदनन्तर ज्वालाओंकी मालासे युक्त अग्निदेवके
सदृश वह आग्नेयास्त्र दैत्यकी सेनाको जलानेके लिये
चल पड़ा। दैत्यराज सिन्धुने भी उस अस्त्रको आता हुआ
देखकर बाणोंकी वृष्टि करनी शुरू कर दी ॥ ५८ ॥
उस सिन्धुके अभिमन्त्रित एक बाणसे अनन्त
संख्यामें बाण प्रकट होने लगे। देवसेनाके अत्यन्त तीव्र
गतिवाले योद्धा उस दैत्यकी बाणवृष्टिसे आच्छादित हो
गये। तब क्रुद्ध होकर मयूरेशने उस समय नाना प्रकारके
अस्त्रोंकी सृष्टि की। उन अस्त्रोंने दैत्यराज सिन्धुके सभी
अस्त्रोंको निरस्त कर डाला ॥ ५९-६० ॥
तदनन्तर अस्त्र (परशु)-से उत्पन्न उस कालपुरुषने
दैत्यसेनाका पुनः भक्षण कर डाला। वे दैत्य सैनिक
भाग-भागकर जहाँ-जहाँ जाते थे, वहाँ-वहाँ वह
कालपुरुष पहुँच जाता था ॥ ६१ ॥
तब चिन्ताग्रस्त हुआ वह दैत्य सिन्धु उस समय
अब क्या करना चाहिये, यह निश्चित नहीं कर सका।
क्या करणीय है, कहाँ जाना चाहिये और कहाँ ठहरना
चाहिये-इस प्रकारसे वह चिन्ता करने लगा ॥ ६२ ॥
सूर्यके अस्त हो जानेपर वह अपने घरकी ओर
लौट चला। उसके कुण्डल तथा अन्य आभूषण नष्ट हो
चुके थे। वह भूमिपर गिरते-पड़ते हुए जा रहा था ॥ ६३ ॥
उसने अपने नगरमें प्रवेश किया, उस समय वह
औघड़ शिवके समान अस्त-व्यस्त प्रतीत हो रहा था।
वह वहाँ किसी गुप्त स्थानमें स्त्रियों तथा अनुचरोंकी
५६६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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दृष्टिसे ओझल होकर रहने लगा ॥ ६४ ॥
उस दैत्यराज सिन्धुके इस प्रकारके सम्पूर्ण वृत्तान्तको
शीघ्र ही जानकर देव मयूरेशने अपने गणोंसहित उच्च
स्वरसे गर्जना की। उस नादने सहसा तीनों लोकोंको
निनादित कर डाला ॥ ६५ ॥
तदनन्तर मयूरेशने अपने द्वारा प्रकट किये गये
कृतान्तास्त्रको उसी प्रकार समेट लिया, जैसे कि मन्त्रको
जाननेवाला सर्पको वापस अपने पास बुला लेता है।
इसके पश्चात् वे मयूरेश अपने गणोंको साथ लेकर शीघ्र
ही अपने भवनको चले गये ॥ ६६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्धुदैत्यका अपमान'
नामक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२१ ॥
एक सौ बाईसवाँ अध्याय
गौतम आदि महर्षियों तथा भगवान् शिवद्वारा मयूरेशकी महिमा एवं पराक्रमका वर्णन, षडानन
आदिका देवर्षि नारदके साथ संवाद, देव मयूरेशका दैत्य सिन्धुसे युद्धके लिये सन्नद्ध होना,
किंतु नन्दी, भृंगी आदिका उन्हें रोककर स्वयं युद्धके लिये प्रस्थान करना, वीरभद्र तथा
भूतराजका भी साथमें जाना, दैत्य सिन्धुके साथ उनका युद्ध और दैत्यसेनाका पराजित होना
ब्रह्माजी बोले-जब देव मयूरेश सिंहासनपर बैठे
हुए थे और चारों ओरसे अपने गणोंसे घिरे हुए थे, उस
समय गौतम आदि महर्षियोंने वहाँ आकर उन गुणेश्वरकी
महिमाका गान किया ॥ १ ॥
ऋषिगण बोले-जिस दैत्यराज सिन्धुने देवराज
इन्द्रपर विजय प्राप्त की तथा नागोंसहित पातालमें स्थित
शेषनागको जीत लिया, फिर उसके समक्ष अन्य किसी
औरकी क्या गणना ! ऐसे सिन्धुदैत्यको भी आपने जीत
लिया। हे सुरेश्वर ! आपने उस दुष्ट सिन्धु दैत्यसे बहुतोंकी
रक्षा की है, यदि आप ऐसा नहीं करते, तो गणोंका तथा
अन्य सभी लोगोंका जीवन कैसे बच पाता ! ॥ २-३ ॥
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारसे जब ऋषिगण उन
गुणेश्वरकी कीर्तिका गान कर रहे थे कि उसी समय देवी
गिरिजा वहाँ आयीं और अपने पुत्र गुणेशका आलिंगन
करके उनसे बोलीं-युद्धकी लालसा रखनेवाले तुम
अत्यन्त थक गये हो ॥ ४ ॥
उसी समय शीघ्र ही भगवान् शिव भी वहाँ आये
और उन्होंने उन मयूरेशका आलिंगनकर उनसे कहा-
जो कार्य देवराज इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी
असाध्य था, वह कार्य आपने करके दिखाया है। आप
साक्षात् परब्रह्मस्वरूप हैं, सम्पूर्ण चराचर जगत्के गुरु हैं,
सब कुछ जाननेवाले हैं और पृथिवीके भारको हलका
करनेमें सदा निरत रहते हैं, आपकी महिमाको, आपके
यथार्थ स्वरूपको ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जानते हैं
और न गौतम आदि मुनि ही भलीभाँति जानते हैं तो उसे
जाननेकी सामर्थ्य हममें कैसे हो सकती है ? ॥ ५-७ ॥
ब्रह्माजी बोले-जब देवेश्वर भगवान् शिव इस
प्रकार कह रहे थे, उसी समय मुनिश्रेष्ठ नारदजी माता
पार्वतीसे कहने लगे- हे माता ! आप मेरी बात सुनें ॥ ८ ॥
हे शिवे ! इस स्थानपर रहते हुए बहुत दिन व्यतीत
हो गये हैं, हे अनघे ! वह अत्यन्त दुष्ट दैत्यराज सिन्धु
कब मुक्तिको प्राप्त करेगा ? जिस दैत्य सिन्धुने इन्द्र आदि
देवताओंको भी जीत लिया है, उसका विनाश कैसे होगा ?
हे सुव्रते ! मयूरेशका विवाह कब होगा ? ॥ ९-१० ॥
हमें आप आज्ञा दीजिये, हम लोग जायँगे, पुनः
शीघ्र ही लौट भी आयेंगे। दैत्यराज सिन्धुके बन्धनसे वे
देवता कब मुक्त होंगे ? हे माता ! उस दैत्य सिन्धुका वध
तो मुझे असाध्य ही प्रतीत होता है ॥ ११-१२ ॥
ब्रह्माजी बोले-देवर्षि नारदजीकी बातोंको सुनकर
वे गण और षडानन आदि वीर उन सुरेश्वर देव
मयूरेश्वरको उद्बुद्ध करनेके प्रयोजनसे देवदर्शन नारदजीसे
कहने लगे- हे मुने ! हे अनघ ! हे नारद ! आश्चर्य है
क्री०ख०-अ०१२२] * गौतम तथा भगवान् शिवद्वारा मयूरेशके पराक्रमका वर्णन * ५६७
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[बायाँ स्तम्भ]
कि आप सर्वज्ञ हैं, तथापि इस प्रकारकी बातें कर रहे
हैं। ये प्रभु मयूरेश तो इसी कार्यकी सिद्धिके लिये अपने
निज धामसे इस पृथ्वीपर आये हुए हैं ॥ १३-१४॥
ये मयूरेश सम्पूर्ण कामनाओंसे परिपूर्ण हैं, सम्पूर्ण
पदार्थोंको प्रदान करनेवाले हैं। ये गुणातीत हैं, गुणोंके
ईश हैं और सत्त्व-रज तथा तम—इन तीनों गुणोंमें क्षोभ
उत्पन्न करनेवाले हैं, इनके यथार्थ स्वरूपका निरूपण
करनेमें ब्रह्मा आदि देव भी सर्वथा असमर्थ हैं, ये पृथ्वीके
भारका हरण करनेके इच्छुक हैं, इन्द्र आदि देवताओंके
लिये भी अवध्य महाबलशाली असुरोंका वध करनेमें
निरत हैं, ये अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंके नायक हैं, सम्पूर्ण
जगत्के आत्मस्वरूप हैं और सभी लोकोंकी उत्पत्ति
करनेवाले, पालन करनेवाले और फिर संहार करनेवाले
भी ये ही हैं, क्या आप इन मयूरेशके स्वरूपको तथा
इनके बल-पराक्रमको नहीं जानते ? ॥ १५-१७१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले—षडानन आदिकी इस प्रकारकी
वाणी सुनकर देवर्षि नारदजी पुनः कहने लगे—जब मैं
उस दैत्य सिन्धुको मरा हुआ देखूँगा और मुक्तिको प्राप्त
हुआ देखूँगा, तभी मैं सभी वचनोंको सत्य मानूँगा,
अन्यथा कभी नहीं ॥ १८-१९ ॥
नारदजीके इस प्रकारके वचनको सुनकर मयूरेश्वर
अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे। वे क्रोधसे उद्दीप्त हो उठे और
तीनों लोकोंको निनादित करते हुए गरजे ॥ २० ॥
उस समय वे तीनों लोकोंको जलाते हुए-से और
इस पृथिवीको चूर-चूर करते हुए-से मेघके समान
गम्भीर वाणीमें उन मुनि नारदजीसे बोले ॥ २१ ॥
मयूरेश बोले—हे मुनीश्वर नारदजी ! आप ब्रह्माजीके
पुत्र होनेके कारण और सर्वज्ञ होनेके कारण माननीय हैं,
अतः मैं आपसे कहता हूँ कि आप अपनी मर्यादाका
पालन करें ॥ २२ ॥
मैं आपकी कृपासे क्षणभरमें ही इस सम्पूर्ण
ब्रह्माण्ड तथा यमराजको भी निगल जाऊँगा। भूलोकको
उलट डालूँगा और सभी सागरोंको सोख डालूँगा। हे
मुने ! मैं अपनी निःश्वासवायुसे मेरुको हिला डालूँगा। हे
नारदजी ! हे सर्वत्रगामी ! आप मेरी इस सत्य प्रतिज्ञाका
इस समय श्रवण करें। मैं उस दैत्य सिन्धुको मार
[दायाँ स्तम्भ]
डालूँगा, इसमें विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं
है ॥ २३-२४१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर वे विनायक मयूरेश
मयूरपर आरूढ़ होकर युद्धके लिये चल पड़े। उसी समय
नन्दी तथा भृंगी—दोनोंने उन विनायकसे कहा—हम दोनों
युद्ध करेंगे, आप हमारे रणकौशलको देखें ॥ २५-२६ ॥
ऐसा कह करके वे दोनों वायुके समान वेगसे
गण्डकीपुरीकी ओर चल पड़े। उन दोनोंके जानेका
समाचार सुनकर वीरभद्र तथा भूतराज भी युद्धके लिये
निकल पड़े। उस समय धरती काँपने लगी और शेषनाग
व्याकुल हो उठे। तदनन्तर कार्तिकेय आदि चारोंने उस
दैत्य सिन्धुका वह दुर्ग देखा, जो देवराज इन्द्र आदि
देवताओंके लिये भी दुर्गम था ॥ २७-२८ ॥
उस दुर्गके भीतर एक पलंगपर सुखपूर्वक बैठे हुए
दैत्यराज सिन्धुको उसके गुप्तचरोंने बताया कि हे महान्
असुर ! पर्वतके समान विशाल आकृतिवाले चार वीर
दसों दिशाओंको गुंजायमान करते हुए आपकी नगरीमें
चले आये हैं, फिर आप निश्चिन्त क्यों बैठे हुए हैं ? इस
प्रकारके वचनोंको सुनकर दैत्यराज सिन्धु क्षणभरमें ही
चिन्तासागरमें निमग्न हो गया ॥ २९-३० ॥
सिन्धुपत्नी दुर्गा भी चिन्तासे व्याकुल हो उठी।
दैत्य सिन्धुके समान ही उसका मुख भी काला पड़ गया।
दोनोंका मुख नीचेको झुक गया और वे उसी क्षण महान्
दुःखको प्राप्त हो गये ॥ ३१ ॥
दुर्गा कहने लगी—हे महाराज ! मैंने आपसे जो
कुछ कहा था, उसे आपने नहीं किया, उसीका यह सब
फल है, अब इस समय चिन्ता करनेसे क्या लाभ ? ॥ ३२ ॥
दुर्गा इस प्रकार बोल ही रही थी कि वे चारों
श्रेष्ठ वीर—नन्दी, भृंगी, वीरभद्र और भूतराज राजाके
सभामण्डपमें प्रविष्ट हो गये। वह सभामण्डप अनेक
प्रकारके आश्चर्योंसे समन्वित था, विविध प्रकारके
रत्नों तथा स्वर्णसे उसका निर्माण हुआ था तथा वह
अनेक शिखरोंवाला था। क्रुद्ध होकर एकाएक भृंगी
उछलकर उस सभामण्डपके बीचमें खड़े हो गये,
उन महाबली भृंगीने बलपूर्वक तत्काल उस मण्डपको
तोड़ डाला। उस मण्डपके टुकड़े-टुकड़े वहाँ आँगनमें
५६८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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चारों ओर बिखर गये॥ ३३-३५॥ सिन्धुने सर्पास्त्रको छोड़ा। उन सर्पोंने तीनों योद्धाओंको
तदनन्तर वे तीनों वीर-नन्दी, वीरभद्र और भूतराज लपेट लिया, तब भृंगीने उसी समय एकाएक गरुड़ास्त्रका
भी उस भृंगीके पास चले गये। युद्धके लिये आविष्ट उन संधान किया। तदनन्तर दैत्य सिन्धुने आग्नेयास्त्र चलाया,
सभीके मुख लालवर्णके हो गये थे और वे सेनासहित यह देखकर भृंगीने पर्जन्यास्त्रको छोड़ा ॥ ४५-४६॥
उस सिन्धुको निगल जानेकी इच्छा रखनेवाले थे ॥ ३६ ॥ तब सिन्धुदैत्यने वायव्यास्त्रका प्रयोग किया तो
उन वीरोंका वैसा पराक्रमपूर्ण कर्म देख करके भृंगीने पर्वतास्त्रसे उसका निवारण किया। तदनन्तर नन्दी
दैत्यराज सिन्धुकी सेना सामने आ गयी। वह सेना आदि वे चारों वीर उसके साथ बड़े ही मान-सम्मानके
खड्ग, ढाल, धनुष-बाण, भाला तथा मुद्गर धारण की साथ क्रमशः मल्लयुद्ध करने लगे। नन्दीने दैत्य सिन्धुके
हुई थी। 'मारो, इन चारों महान् वेगशाली वीरश्रेष्ठोंको मस्तकपर स्थित मुकुटको गिरा दिया, भृंगीने अत्यन्त रुष्ट
मार डालो', ऐसा कहकर दैत्य सिन्धुके सैनिक उन होते हुए उस दैत्यकी पीठपर प्रहार किया ॥ ४७-४८ ॥
चारोंको मारनेके लिये आये ॥ ३७-३८ ॥ वीरभद्रने उस दैत्यके देखते-देखते उसकी भार्याके
दैत्यराज सिन्धुके असंख्य सैनिक बड़े ही उत्साहसे बाल पकड़ लिये और भूतराजने वैरभावका स्मरण करके
उन चारों वीरभद्रादिके साथ युद्ध करने लगे। 'मैं तुम्हें उस सिन्धुदैत्यको लातोंसे मारा। दैत्य सिन्धुकी पत्नी
मारता हूँ, तुम मुझे मारो'-इस प्रकार कहते हुए दुर्गानि अपने नेत्र बन्द कर लिये, वह उस प्रकारकी
[वीरोंका] वहाँ महान् कोलाहल व्याप्त हो गया ॥ ३९ ॥ दुर्गति को प्राप्त अपने पतिको वैसी स्थितिमें देख न सकी।
तदनन्तर दैत्यसेनाका उन चारोंके साथ भीषण वह अपने पतिके कर्मोंकी निन्दा करती हुई अपने भवनके
संग्राम होने लगा। उठनेवाली धूलिके कारण वहाँ लिये पलायित हो गयी ॥ ४९-५० ॥
अन्धकार छा गया था, उस अन्धकारमें वे योद्धागण दैत्य सिन्धु भी अत्यन्त आवेशमें आ गया। उसने
शस्त्रोंके चमचमाते प्रकाशमें युद्ध कर रहे थे ॥ ४० ॥ वीरभद्रका पाँव पकड़ लिया। नन्दीको मुष्टिकाके प्रहारसे
उस युद्धमें नन्दी आदि चारों वीरोंने सैकड़ों करोड़ मारा और भृंगीकी चोटी पकड़कर जमीनपर गिरा दिया।
दैत्योंको मार डाला। उन्होंने अपने ओजसे असंख्य भूतराज मूर्च्छित हो गये। तब दैत्यराज सिन्धु पुनः मुकुट
महावीर दैत्योंका पाँव पकड़कर उन्हें भूमिपर पटक धारणकर और गलेमें मोतियोंकी माला पहनकर एक उत्तम
दिया। फिर उन दैत्योंको बार-बार घुमाकर आकाशमें घोड़ेपर सवार हुआ और शेष बचे हुए सैनिकोंको बुलाकर
फेंक दिया। वहाँसे जमीनपर गिरकर उनके सौ-सौ उनसे बोला- 'आज मैं उस मयूरेशको मार डालूँगा', ऐसा
टुकड़े हो गये ॥ ४१-४२ ॥ कहकर वह पुनः युद्धके लिये चल पड़ा ॥ ५१-५३ ॥
उस युद्धभूमिमें बाणोंसे, विविध अस्त्रोंसे, शस्त्रोंसे, दैत्य सिन्धुने दिशाओं तथा विदिशाओंको गुंजायमान
पाँवके प्रहारसे और हाथकी चोटसे दैत्योंकी उस सम्पूर्ण करते हुए गर्जना की। उस समयतक नन्दी आदि चारों
सेनाका उन्होंने विनाश कर दिया ॥ ४३ ॥ वीर गणनायक मयूरेशके पास जा चुके थे, उन्होंने
तदनन्तर वीरभद्र आदि वे चारों वीर वेगपूर्वक बताया कि दैत्यसेनाके सभी वीरोंको उन्होंने नष्ट कर
दैत्यराज सिन्धुके भवनमें जाकर पलंगपर बैठे हुए उस डाला है। हे गणेश्वर ! उस सिन्धु दैत्यको भी हम
सिन्धु दैत्यके बाल पकड़कर उसे विजयके स्मारक रणभूमिमें ले आये हैं। वह थोड़ी-सी सेनाके साथ है।
स्तम्भके रूपमें रणक्षेत्रमें ले आये ॥ ४४ ॥ आप उसे इस भवसागरसे मुक्त कर दें। हे विघ्नराज !
तदनन्तर दैत्यराज सिन्धुने अपने महान् अस्त्रोंके आपकी आज्ञा नहीं थी, नहीं तो हम ही उसे मार
द्वारा उन नन्दी आदिके साथ युद्ध किया। दैत्यराज डालते ॥ ५४-५६॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्धुकी सेनाके संहारका वर्णन'
नामक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२२ ॥