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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

प्रतिमाओंको खण्डित कर दिया। इस प्रकार प्रलयके

क्री०ख०-अ०१२९ ] * सिन्दूरके अत्याचारसे पीड़ित देवताओंद्वारा विनायककी स्तुति * ५८९
किन्हीं-किन्हींको अत्यन्त प्रताड़ित किया ॥ ७ ॥
उसने सभी मन्दिरोंको ध्वस्त कर डाला और देव-
प्रतिमाओंको खण्डित कर दिया। इस प्रकार प्रलयके
समान स्थिति हो जानेपर सभी यज्ञ-यागादि वैदिक
क्रियाएँ लुप्त हो गयीं ॥ ८ ॥
स्वाहाकार, स्वधाकार तथा वषट्कार अर्थात् देवपूजन,
हवन, यज्ञयागादि, श्राद्ध-तर्पण आदिके लुप्त हो जानेसे
सर्वत्र हाहाकार मच गया। तदनन्तर पर्वतोंकी गुफाओंमें
जो देवता छिपे हुए थे; उन्होंने, मुनियोंने, यक्षोंने तथा
किन्नरोंने इस संकटसे उबरनेके लिये देवगुरु बृहस्पतिका
आमन्त्रण किया। देवगुरु बृहस्पतिने वहाँ उपस्थित सभी
देवताओंसे कहा कि इस समय जो-जो भी देवता हैं, उन
सभीसे उस दैत्यको किंचित् भी भय नहीं है, अतः आप
लोग देव विनायककी प्रार्थना करें। हे विप्रो! जब वे
विनायक भगवान् शिवके घरमें 'गजानन' इस नामसे
अवतार लेंगे, तो वे निश्चित ही बलपूर्वक उस सिन्दूरका
वध कर डालेंगे—इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ९–१२ ॥
हे देवो! तब सम्पूर्ण जगत् सभी प्रकारकी बाधाओंसे
रहित हो जायगा। आचार्य बृहस्पतिद्वारा इस प्रकारसे
कहे गये वे देवता, मुनिगण आदि सभी परम श्रद्धा-
भक्तिपूर्वक उन विनायककी स्तुति करने लगे ॥ १३ १/२ ॥
देव बोले—जो इस जगत्के कारण हैं, सूर्य तथा
नक्षत्रोंको उत्पन्न करनेवाले हैं, जिनसे सिद्ध, साध्यगण,
समुद्र, गन्धर्व, किन्नर, यक्ष, मनुष्य, नाग तथा राक्षसोंसहित
सम्पूर्ण चराचर जगत्का प्रादुर्भाव हुआ है और जिनसे
मनुगण, लोकपाल, सरिताएँ, वृक्षराशि, इक्कीस प्रकारके
स्वर्ग (आदि दिव्य) लोक, पंचमहाभूत तथा सात पाताल
उत्पन्न हुए हैं, हम उन्हें प्रणाम करते हैं। जिनसे ब्रह्मा
आदि देवता, मुनिगण तथा महर्षिजन उत्पन्न हुए हैं, उन
देव विनायकको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १४–१७१/२ ॥
जिनसे सत्त्व, रज तथा तम—इन तीन गुणोंकी उत्पत्ति
हुई है, उन भगवान् विनायकको मैं नमस्कार करता हूँ।
जिनसे नाना प्रकारके अवतार हुए हैं और जो सभी प्राणियोंके
हृदयदेशमें विराजमान हैं, जिनकी स्तुति करनेमें सहस्र
मुखोंवाले शेषनाग भी समर्थ नहीं हो पाते, उन गणाधिप
विनायकका भजन करना चाहिये* ॥ १८-१९ ॥
विश्वका संहार करनेवाले महादैत्य सिन्दूरको ब्रह्माजीने
उत्पन्न किया है। आप-जैसे स्वामीके विद्यमान होनेपर
भी उस महादैत्यने जगत्को अत्यन्त प्रताड़ित कर रखा
है, अब हम अन्य किस देवकी शरणमें जायँ, हम
सभीकी रक्षा करनेवाला दूसरा और कौन है? [हे देव!]
आप भगवान् शिवके यहाँ अवतीर्ण होकर इस दुष्टबुद्धि
सिन्दूरका वध करनेकी कृपा करें ॥ २०–२११/२ ॥
इस प्रकारसे देव विनायककी स्तुति करनेके पश्चात्
वे (देवता आदि) विविध अनुष्ठानोंमें तत्पर होकर
तपस्या करने लगे। कुछ निराहार रहकर, कुछ नियत
आहार लेकर प्राणायाममें संलग्न हो गये। कुछ एक
पाँवमें खड़े होकर तथा कुछ जलमें स्थित होकर तपस्या
करने लगे। कुछ लोग धुआँ पीकर तो कुछ लोग बिना
पलक झपकाये ही तपोनिरत थे ॥ २२-२३ ॥
कुछ अपने हाथोंको ऊपर करके साधना करने
लगे। कुछ योगपरायण हो गये। कुछने अपने शरीरके
अंगोंको काट दिया, तो कुछ अपने मस्तकोंको ही काट
दे रहे थे। इस प्रकारसे उन सबकी अत्यन्त कठोर तपस्या
और साधना देखकर गणराज विनायक प्रकट हो गये।
उनकी आभा करोड़ों सूर्योंके समान दीप्तिसम्पन्न और
प्रलयाग्निके समान थी ॥ २४-२५ ॥
विनायकके उस तेजोमय स्वरूपका दर्शनकर वे सभी
*देवा ऊचुः
जगतः कारणं योऽसौ रविनक्षत्रसम्भवः ॥
सिद्धसाध्यगणाः सर्वे यत एव च सिन्धवः । गन्धर्वाः किन्नरा यक्षा मनुष्योरगराक्षसाः ॥
यतश्चराचरं विश्वं तं नमामि विनायकम् । मनवो लोकपालाश्च सरितो वृक्षसञ्चयाः ॥
एकविंशतिस्वर्गाश्च पञ्चभूतानि यानि च । पातालािन च सप्तैव तं नमाम यतोऽभवत् ॥
यतो ब्रह्मादयो देवा मुनयश्च महर्षयः । यतो गुणास्त्रयो जातास्तं नमामि विनायकम् ॥
यतो नानावताराश्च यश्च सर्वहृदि स्थितः । यं स्तोतुं नैव शक्नोति शेषस्तं गणपं भजेत् ॥
(श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड १२९ । १४-१९)

५९० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
देवता अत्यन्त आनन्दित हो उठे। वे कहने लगे—प्रभुके | कारण समस्त दिशाओं तथा विदिशाओंको द्योतित कर
स्वरूपका जैसा हमने ध्यान किया था, वे ही अखिल | रही थीं। उनके जाते समय सभी प्रकारके वाद्य बज रहे
विश्वके स्वामी ये [उसी रूपमें] हमारे सामने प्रकट हो | थे। भगवान् शिव पार्वतीके साथ विविध गणोंसे समन्वित
गये हैं, ये हमारे दुःखको अवश्य ही दूर करेंगे, इसमें कोई | होकर भूलोकको गये और उन्होंने बहुत-से वनोंमें भ्रमण
विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ २६१/२ ॥ | किया। इधर-उधर भ्रमण करते हुए उन्होंने पर्यली
तदनन्तर चिन्तामें पड़े हुए उन देवोंसे भगवान् विनायक | नामक एक विशाल वन देखा ॥ ३६-३७॥
बोले—हे देवो ! आप लोग बिलकुल भी चिन्ता न करें, मैं | पार्वतीके मनको सुन्दर लगनेवाले उस पर्यली नामक
उस दैत्य सिन्दूरको मार डालूँगा। आपने जो मेरी स्तुति की | वनमें उन्होंने विश्राम किया। वह वन विविध प्रकारके
है, वह स्तुति दुःखका शमन करनेके कारण दुःखप्रशमन- | पुष्पोंसे समन्वित तथा नाना प्रकारके फलोंसे युक्त वृक्षों-
स्तोत्रके नामसे प्रसिद्ध हो जायगी ॥ २७-२८ ॥ | वाला था। वह वन अनेक सरोवरों तथा वापियोंसे युक्त
इस स्तोत्रके पाठ करनेसे मेरे अनुग्रहके कारण आप | था। वहाँ वृक्षोंकी घनी छाया व्याप्त थी। वह वन अत्यन्त
लोगोंका कष्ट दूर हो जायगा। जो एक समय अथवा | रमणीय था। वहाँपर उष्णता (सूर्यकी प्रतप्त किरणों) - का
प्रातः-सायं—दो समय अथवा प्रातः-मध्याह्न एवं सन्ध्या— | प्रवेश नहीं हो पाता था। वह वन कैलासशिखरके समान
तीनों कालोंमें इस स्तोत्रका पाठ करेगा, उसे कभी भी तीनों | शीतलता प्रदान करनेवाला था ॥ ३८-३९ ॥
प्रकारका अर्थात् आधिदैविक, आध्यात्मिक और | वह पर्यली नामक वन नन्दनवन तथा चैत्ररथ वनसे
आधिभौतिक—दुःख अणुमात्र भी नहीं होगा ॥ २९१/२ ॥ | भी अधिक शोभासे सम्पन्न था। उस वनको देखकर
हे देवो ! अब मैं भगवान् शिवके घरमें अवतार लेकर | गिरिजा कहने लगीं— हे शिव ! मुझे मेरी इच्छाके
गजानन नामसे प्रसिद्ध होऊँगा, और सभी प्रकारके अर्थोंकी | अनुकूल वन प्राप्त हो गया है। हे विभो! हम यहाँपर
सिद्धि देनेवाला बनूँगा। मैं सिन्दूर आदि बड़े-बड़े दैत्योंका | चिरकालतक क्रीड़ा करेंगे। गणोंका भी उस समय उस
वध करूँगा और विविध प्रकारकी लीलाओंको दिखाते | वनसे प्रेम हो गया था ॥ ४०-४१ ॥
हुए माता पार्वतीकी सेवा करूँगा ॥ ३०-३११/२ ॥ | तदनन्तर गणोंने देवी पार्वतीकी प्रसन्नताके लिये
ब्रह्माजी बोले—देवताओंसे इस प्रकार कहकर | वहाँ एक मण्डपका निर्माण कर दिया। वह मण्डप
देव विनायक अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर कुछ काल | विविध वेदियों तथा गृहोंसे युक्त था और गृहस्थ-
व्यतीत होनेके अनन्तर भगवान् शिवके अनुग्रहसे हिमवान्की | सम्बन्धी विविध सामग्रियोंसे सम्पन्न था ॥ ४२ ॥
पुत्री देवी पार्वतीने गर्भ धारण किया। वह गर्भ दिन- | भगवान् शिवने देवी पार्वतीसे कहा कि तुम गणोंके
प्रतिदिन उसी प्रकार बढ़ने लगा, जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा | साथ यहाँ निवास करो। तुम्हें जो-जो भी अभीष्ट होगा,
कला-प्रतिकला बढ़ता रहता है ॥ ३२-३३ ॥ | ये वे सभी वस्तुएँ मेरे अनुग्रहसे तुम्हें प्रदान करेंगे ॥ ४३ ॥
तदनन्तर उस गर्भके तेजसे सन्तप्त हुई पार्वतीको | तब भगवान् शिव वहाँसे शीघ्र ही चल पड़े और
गर्भकालीन इच्छा जाग्रत् हुई। तब वे भगवान् शंकरसे | हिमालयपर आकर ध्यानमें निमग्न हो गये। वे पार्वती
बोलीं- हे शंकर ! मैं अपने गर्भके तेजसे अत्यन्त सन्तप्त | अपनी सखियोंके साथ उस पर्यली नामक वनमें यथेच्छ
हो गयी हूँ, अतः जहाँ पर्याप्त ठण्डक हो, ऐसे स्थानपर | विहार करने लगीं। उन पार्वतीको चारों ओरसे घेरकर
मुझे ले चलिये। तदनन्तर भगवान् शंकर वृषपर आरूढ़ | करोड़ों गण उनकी रक्षा किया करते थे। वे सभी गण
हुए और उन्हें भी वृषभकी पीठपर बैठाया ॥ ३४-३५ ॥ | माता पार्वतीकी आज्ञाके अधीन थे और कन्द-मूल तथा
देवी पार्वती महान् तेजके पुंजसे समन्वित होनेके | फलका भक्षण करनेवाले थे ॥ ४४-४५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'गौरीके दोहदका वर्णन' नामक एक सौ उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२९ ॥
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