श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 383, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०४७ ] * भगवान् विष्णुद्वारा बौद्धरूप धारणकर काशीवासियोंको उपदेश देना * ३८१
卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
धन-धान्यमें कोई रुचि नहीं है, मैं सर्वथा आसक्तिरहित | आप बिना कुछ विचार किये कर लें ॥ ४१ ॥
हूँ। मैं एक बात आपको बताता हूँ, उसे आप अपने मनमें | हे राजन् ! इससे तुम्हारा परम कल्याण होगा, इसमें
बैठा लें ॥ ३९-४० ॥ | संशय नहीं है। इस बातसे ही आप समझ लें कि मैंने
आजसे सत्रहवें दिन जो कोई भी पुरुष आपके पास | आपके द्वारा देनेयोग्य ग्रामों, धन-धान्य तथा धन-
आयेगा और वह आपसे जो कुछ भी कहे, उस बातको | सम्पत्तिको प्राप्त कर लिया ॥ ४२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'काशिराजका वशीकरण' नामक छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४६ ॥
सैंतालीसवाँ अध्याय
भगवान् विष्णुद्वारा बौद्धरूप धारणकर काशीनिवासियोँको उपदेश प्रदान करना, काशीमें
अधर्माचरणकी वृद्धि, भगवान् विष्णुका अपने चतुर्भुजरूपमें दिवोदासको दर्शन देना और
अनेक वर प्रदान करना तथा शिवके काशी-आगमनके लिये दूतद्वारा सन्देश भेजना,
दिवोदासद्वारा काशीका राज्य त्यागकर तपस्यामें निरत होना
राजा दिवोदास बोले- हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं आपके | हैं। यज्ञ-यागादिमें हवन करनेके लिये वृक्षोंका काटना
वचनका अवश्य पालन करूँगा। मैं भगवान् शिवकी | तथा यज्ञमें पशुओंकी हिंसा करना व्यर्थ ही है। दूसरेको
शपथ लेकर कहता हूँ कि जैसा आपने कहा है, मैं वैसा | दान देना अथवा दक्षिणा देना अपने धनको नष्ट करना
ही करूँगा। उससे अन्यथा कुछ नहीं करूँगा ॥ १॥ | है ॥ ६-७ ॥
गृत्समद बोले- इस प्रकार ज्योतिषीका वेश | शरीरके नष्ट हो जानेपर पृथ्वी आदि पाँचों भूत
धारण किये उन ढुंढिराजने भूत, भविष्य, वर्तमान तथा | पाँचों भूतोंमें लीन हो जाते हैं। अतः प्रसन्नताके साथ
दूरकी बातोंकी सत्य-सत्य भविष्यवाणियाँ करते हुए | घृतसहित पक्वान्न अकेले ही खाना चाहिये। नाना
काशीमें निवास करनेवाले सभी जनोंको अपने वशमें कर | प्रकारके भोगोंके द्वारा तथा विविध सुखोंका आनन्द लेते
लिया। वे लोग अपने सभी कर्मोंको छोड़कर उन्हींकी | हुए इस शरीररूपी आत्माकी ही सेवा करना चाहिये।
सेवामें लग गये। तदनन्तर काशीके पंचक्रोशीक्षेत्रसे बाहर | ऐसा उपदेश सुनकर वहाँके सभी लोग अपने-अपने
स्थित होकर भगवान् विष्णु बौद्धका अवतार धारणकर | आचार-विचारका परित्यागकर जैसा बुद्धने कहा था,
काशीमें आकर सभी लोगोंको अपनी मायासे मोहित | उसी प्रकारका आचरण करने लगे ॥ ८-९ ॥
करने लगे। उन्होंने सनातनधर्मरूपी वृषसे द्वेष करते हुए | वे ब्राह्मणोंतकको भोजन न कराकर स्वयं ही उत्तम
श्रुति-स्मृतिके विरुद्ध मतका वहाँके निवासियोंको पाठ | भोगोंका उपभोग करने लगे। उन (बौद्ध)-की पत्नीका
पढ़ाया ॥ २-४॥ | नाम कमला था। उसने भी वाराणसीमें स्थित होकर वहाँ
उन्होंने भी अपने वचनोंके द्वारा काशीके सभी | निवास करनेवाली सभी स्त्रियोंके मनोरथोंको पूर्ण करते
बड़े-बड़े लोगोंको अपने वशमें कर लिया। उन्होंने | हुए उन सभीको व्यामोहमें डाल दिया। वह उन्हें प्रतिदिन
भगवान्के साकार भजन अर्थात् मूर्तिपूजाको सर्वांशमें | कुमार्गमें चलनेको प्रेरित करती थी ॥ १०-११ ॥
बड़े ही समारोहपूर्वक दूषित बताया ॥ ५ ॥ | इस प्रकार उन दोनोंके वचनोंसे काशीपुरी तथा
उन्होंने कहा कि सभी लोग मूर्ख बुद्धिवाले हैं; | वहाँके ग्रामोंमें निवास करनेवालोंकी बुद्धियाँ नष्ट-भ्रष्ट
क्योंकि परमात्माके हृदयमें स्थित होनेपर भी न जाने क्यों | हो गयीं। जो परमात्मा अपने शरीरमें तथा पतिके शरीरमें
वे मिट्टी तथा धातु आदिसे निर्मित मूर्तियोंकी पूजा करते | स्थित है, वही दूसरेके शरीरमें भी स्थित है ॥ १२ ॥