श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 410, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें४०८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण-
गण्डस्थलसे बहते हुए] मदजलने [दिशाओंको ढक | बाणोंसे समन्वित, छोटी-छोटी घण्टियोंसे सज्जित और
लेनेवाली] धूलको शान्त कर दिया ॥ ४२१/२ ॥ | सुवर्णनिर्मित धुरी, ध्वज तथा विशाल पहियोंसे युक्त
तदुपरान्त [नरान्तककी सेनाके] घुड़सवार निकले। | था ॥ ४७-४८ ॥
उनके सिर मुकुटकी भाँति शोभायमान शिरस्त्राणोंसे युक्त | वह नरान्तक स्वर्णभूषण, मौक्तिकमालिका, अँगूठी,
थे और उनके हाथोंमें चाकू, ढाल, कृपाण, धनुष तथा | तथा खड्गादिसे विभूषित था। उसकी विशाल काया
बाण शोभा पा रहे थे। [नरान्तककी सेनाके हाथियोंकी] | कृष्णवर्णकी थी और उसके हाथमें वीरोचित विजयकंकण
चिंघाड़ और [घोड़ोंकी] हिनहिनाहटने आकाशको | बँधा हुआ था। विशाल मुकुटसे शोभायमान नरान्तकके
अतिशय गुणयुक्त कर दिया अर्थात् आकाश उन शब्दोंसे | कानोंमें कुण्डल झिलमिला रहे थे और उसने अपने
भर-सा गया ॥ ४३-४४ ॥ | शरीरमें केसर, अगुरु, कस्तूरी तथा कर्पूरसे युक्त सुगन्धित
वे सैनिक कवच, शिरस्त्राण, त्रिशूल [आदि | लेप लगा रखा था ॥ ४९-५० ॥
युद्धोपकरणों]-से समन्वित थे और उन्होंने अपने हाथोंमें | उसने पवित्र होकर उन अस्त्रोंका स्मरण किया, जिनका
गदा, मुद्गर, पट्टिश, विशाल फरसा आदि आयुधोंको | कहीं भी प्रयोग नहीं किया गया था। वीरोचित आवेशके
धारण कर रखा था। कुछ सैनिक हाथोंमें चक्र, तोमर, | कारण उसका शरीर वैसे ही फूल गया, जैसे [वातप्रकोप
भाला, तलवार, पाश, अंकुश आदि लिये हुए थे। उनके | आदि] रोगके कारण रोगीका शरीर फूल जाता है। नाना
घोड़े नानाविध अलंकारों और चामरोंसे अलंकृत थे। उन | प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे दिशाओं और दिक्कोणोंको
अश्वोंमें वायुकी-सी तीव्रता और मनके समान गतिशीलता | गुंजित करते हुए अनेकों वीर सैनिक विनायकको जीतनेके
थी, उनकी चेष्टाओंसे जान पड़ता था कि वे मानों | लिये गरजते हुए दीख रहे थे ॥ ५१-५२ ॥
आकाशको ही आक्रान्त कर लेंगे ॥ ४५-४६१/२ ॥ | हाथियोंके चिंघाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, सैनिकोंकी
इसके पश्चात् अपने मन्त्रियोंको साथ लेकर रथारूढ़ | ललकार और रथोंके पार्श्वभागकी घर्घरहाटसे बड़ा
महारथी नरान्तकने प्रस्थान किया। उसका रथ स्वर्ण, | भीषण नाद हुआ, उसे सुनकर भयभीत देवगण पर्वत-
रजत तथा मुक्तामणियोंसे जटिल, अनेकों अलंकृत घोड़ोंसे | कन्दराओंमें प्रविष्ट हो गये। इस प्रकारसे वह नरान्तक
युक्त, नानाविध आयुधोंसे पूर्ण, सैकड़ों धनुषों और | काशिराजके नगरमें जा पहुँचा ॥ ५३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'नरान्तकका निर्गमन' नामक छप्पनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५६ ॥
सत्तावनवाँ अध्याय
काशिराजकी पराजय और नरान्तकका उन्हें बन्दी बना लेना
ब्रह्माजी बोले-जब उस दैत्यराजने युद्धहेतु | बचानेके लिये दसों दिशाओंमें भागते जा रहे थे ॥ ३ ॥
प्रयाण किया तो प्राग्गुल्मों (राज्यकी सीमावर्ती चौकियों)- | [यह दशा देखकर] राजाने भोजन त्याग दिया
में स्थित लोग भागकर राजाके समीप आये और भोजन | और वायुके समान (वेगपूर्वक) उठ खड़े हुए। सर्वप्रथम
करते हुए राजासे कहने लगे कि चतुरंगिणी सेनाके साथ | उन्होंने युद्धोचित वेषभूषा धारण की और फिर लोगों
वह दैत्यराज नरान्तक आ गया है। इधर नगरनिवासी भी | (सैनिकों)-को आदेश दिया कि 'युद्धके लिये तैयार हो
युद्ध-वाद्योंकी ध्वनि सुनकर जोर-जोरसे चिल्लाने | जाओ।' ऐसा कहकर राजाने रणभेरी बजवायी ॥ ४१/२ ॥
लगे ॥ १-२ ॥ | बलवान् नरेशने खड्ग, ढाल, तरकस, धनुष,
नगरमें लोगों (-के चीखने-चिल्लाने)-के कारण | कवच तथा शिरस्त्राण धारण किया और उन विनायककी
अत्यधिक कोलाहल हो रहा था। लोग अपने प्राण | पूजा की, 'विनायक! आपकी जय हो'-ऐसा कहकर