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सर्वकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 656 में से

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पृष्ठ 213

उ०ख०-अ०६९] * देवराज इन्द्रका राजा शूरसेनसे संकटचतुर्थीव्रतकी विधिका निरूपण करना * २११
उनहत्तरवाँ अध्याय
देवराज इन्द्रका राजा शूरसेनसे संकटचतुर्थीव्रतकी विधिका निरूपण करना
[ राजा] शूरसेन बोले— [हे देवराज ! सिद्धि
प्रदान करनेवाले तथा] हितकर उत्तम संकटचतुर्थी
व्रतका ब्रह्माजीने कृतवीर्यके पिताको किस प्रकार उपदेश
किया था ? वह आप मुझसे कहिये ॥ १ ॥
इन्द्र बोले—हे राजन् ! राजा कृतवीर्यके पिताने
सत्यलोकमें जाकर सुखपूर्वक बैठे हुए सर्वज्ञ चतुर्मुख
ब्रह्माजीको प्रणाम करके पूछा ॥ २ ॥
कृतवीर्यके पिता बोले—प्रणतजनोंके कष्टोंका
निवारण करनेवाले, जगत्को धारण करनेवाले हे देवाधिदेव !
मेरे हृदयमें जो प्रश्न है, उसे मैं आपसे पूछता हूँ, आप
[कृपया] उसके विषयमें बतलाइये ॥ ३ ॥
हे प्रभो ! आपत्तियोंसे घिरे हुए, व्याकुल चित्तवाले,
चिन्तासे व्यग्र मनःस्थितिवाले, सुहृज्जनोंसे वियुक्त, दुर्लभ
लक्ष्यप्राप्तिकी कामनावाले मनुष्यको कार्यकी सिद्धि
कैसे हो ? उसे नित्य अर्थसिद्धिकी प्राप्ति कैसे हो
तथा पुत्र, सौभाग्य और सम्पत्तिकी प्राप्ति कैसे हो ?
समस्त संकटोंके नाशके लिये मनुष्यको क्या करना
चाहिये ? ॥ ४-५ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले—हे राजन् ! सुनो, मैं तुमसे सम्पूर्ण
सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले व्रतको कहता हूँ, जिसके
अनुष्ठानमात्रसे मनुष्य अपनी सभी मनोकामनाओंकी
प्राप्ति कर लेता है। व्रतके दिन औषधियों और सफेद
तिलमिश्रित जलसे स्नान करे। तत्पश्चात् [व्रतका]
संकल्प करे। भगवान् गजाननका सम्यक् प्रकारसे
ध्यानकर भक्तिपूर्वक आगमोक्त मन्त्रोंसे कृष्णपक्षकी
चतुर्थीतिथिको रात्रिमें चन्द्रमाके उदय होनेपर गणेशजीका
पूजन करे ॥ ६-८ १/२ ॥
कृतवीर्यके पिता बोले—हे ब्रह्मन् ! देवाधिदेव |
गणेशजीका पूजन कैसे करना चाहिये ? प्रेमपूर्वक पूछनेवाले
मुझसे आप विस्तारपूर्वक कहें ॥ ९ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले—नित्यकर्मका समापनकर रात्रिमें
चन्द्रमाके उदित होनेपर पवित्र स्थानमें गोबरसे लीपकर
छोटा-सा मण्डप बनाये। वहींपर गणेशजीके पूजनहेतु
पीठकी स्थापनाकर कुंकुमयुक्त अक्षतोंसे उसका पूजन
करे। तदनन्तर उसपर पंचरत्न१ समन्वित कलशकी स्थापना
करे। [और] उस कलशके ऊपर स्वर्णनिर्मित पात्र
रखे ॥ १०-१२ ॥
सुवर्णके अभावमें चाँदी, ताँबा या बाँसका बना पात्र
स्थापित करे और उसमें रेशमी या अपनी शक्तिके अनुसार
वस्त्र रखे। तत्पश्चात् उस [वस्त्र] - के ऊपर आगमोंमें
वर्णित विधानके अनुसार गणेशयन्त्रकी रचना करे और
उसपर शुभ लक्षणोंसे युक्त गणेशजीकी सोनेकी मूर्ति
प्रतिष्ठापित [ करके उन भगवान् गजानन गणेशजीका ध्यान
करते हुए इस प्रकार पूजा] करनी चाहिये - ॥ १३-१४ ॥
[उपासक सर्वप्रथम निम्नोक्त मन्त्रोंसे गजाननदेवका
ध्यान करे-] ध्यान- जिनका वर्ण प्रतप्त स्वर्णके
सदृश प्रभावाला है, जो विशाल शरीर और एक दाँतवाले
हैं; जिनका उदर विशाल है, जिनकी बड़ी-बड़ी आँखें
दहकती हुई अग्निके समान हैं, जो मूषक [-रूपी
वाहन]-के पृष्ठदेशपर सम्यक् रूपसे आरूढ़ हैं तथा
[अपने] गणोंद्वारा चँवर डुलाये जा रहे हैं, शेषनागको
यज्ञोपवीतके रूपमें धारण किये हुए-ऐसे गजानन
गणेशजीका ध्यान करना चाहिये ॥ १५-१६ ॥
आवाहन२—हे देवाधिदेव ! आप आइये और मुझे
संकटसे उबारिये। जबतक मेरा व्रत सम्पूर्ण न हो जाय,
तबतक आप [इस मूर्तिमें] विराजमान रहें ॥ १७ ॥ [इस
१-कनकं कुलिशं मुक्ता पद्মরাगं च नीलकम् । एतानि पञ्चरत्नानि सर्वकार्येषु योजयेत् ॥
अर्थात् सोना, हीरा, मोती, पद्মরাग और नीलम-ये पंचरत्न कहे जाते हैं।
२-कतिपय विद्वान् इन आवाहनादि सभी उपचारोंका समर्पण 'ॐ नमो हेरम्ब मदमोदित मम संकटं निवारय हुं फट् स्वाहा' -इस मन्त्रके
द्वारा करनेका निर्देश करते हैं।