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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

सकती। उस लोक (के गौरव)-का वर्णन करनेमें अनेक

३९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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है और किसी भी लोकसे उसकी तुलना नहीं की जा
सकती। उस लोक (के गौरव)-का वर्णन करनेमें अनेक
मुखवाले शेषनाग अथवा स्वयं मैं ब्रह्मा भी समर्थ नहीं
हूँ ॥ ३७-३८ ॥
ऊर्ज (कार्तिक मास), झष (सूर्यके मकरराशिगत
होनेपर) तथा मेष (सूर्यके मेषराशिगत होनेपर)-के
पवित्र अवसरोंपर (गंगादि जलतीर्थोंमें) स्नान करनेवाला,
तिल-अन्नका दान करनेवाला, गोदान करनेवाला, गीताका
अनुशीलन करनेवाला और प्राणिमात्रका उपकार
करनेवाला-ये सभी निर्बाधरूपसे विष्णुलोक प्राप्त करते
हैं। वह लोक पाँच हजार योजनके परिमाणवाला है।
वहाँके देदीप्यमान भवनोंको विश्वकर्माने सोने, चाँदी
और रत्नोंसे निर्मित किया है। उन भवनोंकी आभा सूर्य
और चन्द्रमाके जैसी जान पड़ती है। [वहाँकि दिव्य]
रत्नोंकी कान्तिसे जगमगाते हुए भवनोंमें अन्धकारका
[स्वल्पमात्र भी] प्रवेश नहीं होता। वहींपर अपने पार्षदों
और देवी महालक्ष्मीके साथ दैत्यशत्रु भगवान् नारायण
विराजते हैं ॥ ३९-४११/२ ॥
अपनी पुण्यराशिके कारण उस वैष्णवधामको
देखकर वे नरेश आनन्दमग्न हो गये। तदुपरान्त दूतोंने
राजाको भगवान् शिवकी आवासभूमि कैलासके दर्शन
कराये। [वह शिवधाम] सुमेरुपर्वतके दस हजार योजन
विस्तारवाले शिखरपर अवस्थित है॥ ४२-४३॥
जहाँ सूर्य और चन्द्रमाके सदृश ज्योतिर्मय प्रासाद
शोभित होते हैं और जिसको पंचाक्षर मन्त्र तथा
रुद्राध्यायका जप करनेवाले एवं अनेक साधनानुष्ठानोंमें
निरत पुण्यात्मा लोग प्राप्त करते हैं, भगवान् विनायककी
कृपासे ऐसे शिवलोकका दर्शनकर राजाने कहा कि
दर्शनमात्रसे ही पुण्य प्रदान करनेवाले सभी देवलोकोंको
मैंने देख लिया है॥ ४४-४५१/२ ॥
उस स्थानसे आगे चलनेपर हजार योजनतक सूर्य-
चन्द्र [आदि प्रकाशक] नहीं थे [वहाँ केवल सघन
अन्धकार ही था]। राजा उस विमानके प्रकाशके ही
सहारे आगे बढ़ रहे थे, उन्हें कुछ भी दिखायी नहीं पड़
रहा था। वहाँ चारों ओर केवल बड़े-बड़े पहाड़ों-जैसे
भौरोंका बादलोंकी गड़गड़ाहट-सा असह्य घोष राजाको
सुनायी दे रहा था॥ ४६-४७१/२ ॥
तब राजाने दूतोंसे पूछा कि 'यह किसका शब्द
सुनायी पड़ रहा है और मैं भगवान् गणपतिके चरणोंका
प्रत्यक्ष दर्शन कब करूँगा?' ॥ ४८१/२ ॥
तभी राजाने अपने सामने भ्रामरी नामक एक
बलवती शक्तिको देखा। वह अनेक सूर्योंके सदृश
तेजोमयी, भयानक आकृतिवाली तथा ब्रह्माण्डको कौरके
समान निगलनेकी सामर्थ्यवाली थी ॥ ४९१/२ ॥
फैले हुए मुखवाली उस शक्तिको देखकर राजा
मूर्च्छित हो गये। तब दूतोंने राजाको चैतन्य किया और
उनको लेकर आगे चल पड़े। तदुपरान्त राजाने उस
शक्तिसे भी अधिक भयावह आधारशक्तिको देखा।
भ्रामरीके मस्तकपर स्थित वह प्रभामयी शक्ति विकराल
केशोंवाली और लम्बी जिह्वा तथा लटकते हुए ओष्ठोंसे
युक्त थी। उसे देखकर राजा [भयके मारे] काँपने
लगे ॥ ५०-५२ ॥
दूतोंके द्वारा सान्त्वना दिये जानेपर आगे बढ़ते
राजाने कामदायिनी नामक शक्तिको देखा, जो आधारशक्तिपर
आरूढ़ थी और दस हजार योजनके विस्तारवाली थी।
उसके श्वास-प्रश्वाससे पर्वत डोलने लगते थे और
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क्री०ख०-अ०५३ ] * काशिराजका गणपतिधाममें भगवान् विनायकका दर्शन करना * ३९७
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उसके वज्रतुल्य कठोर शरीरमें वह पुरी (गणपतिका
धाम) अवस्थित थी ॥ ५३-५४ ॥
तदुपरान्त दूतोंने राजासे कहा कि जिसका स्मरण
करके तुम परितृप्तिका अनुभव करते हो और जो करोड़ों
सूर्योंके समान तेजोमय तथा कल्याणमय है, उस
स्वानन्दपत्तन (गणपतिधाम)-का तुम दर्शन करो ॥ ५५ ॥
जिसके हजारों उत्तम प्रासाद मोती, चाँदी और
सूर्यकान्तमणियों (अथवा माणिक्य)-से बनाये गये हैं
और जो सुवर्ण तथा रत्नोंसे जटित हैं ॥ ५६ ॥
जहाँकी फर्श नीलमकी है और जहाँके लोग
अग्निके समान तेजस्वी हैं। पीतरत्न अर्थात् पुखराजके
द्वारा बनाये गये घाटों-तटोंवाले तथा नीलाभ, शीतल,
स्वच्छ जलसे पूर्ण कुआँ, बावली, तालाब, सरोवर आदि
जहाँ शोभित हो रहे हैं। जिनका कि जल पीनेसे लोगोंको
भूख-प्यास, बुढ़ापा, रोग आदि नहीं सताते ॥ ५७-५८ ॥
जहाँपर विविध प्रकारके वृक्षों और लताओंसे
शोभायमान और अत्यन्त स्वच्छ खेलके मैदान हैं तथा
जहाँ मध्याह्नकालीन करोड़ों सूर्योंके समान भासमान
दिव्य ओषधियाँ (अथवा तरु-लताएँ) शोभा पाती हैं।
जहाँपर रात्रिमें नीचे उतरे हुए निष्कलंक चन्द्रमण्डलमें
विलासीजन (दर्पणकी भाँति) अपना मुखावलोकन करते
हैं। जहाँकी पुष्पवाटिकाओंकी सुवासित वायु विलासीजनोंके
[विहारजनित] श्रमको दूर करती है। [ऐसे उस
गणपतिधामके अन्तर्वर्ती] इक्षु [रस]-सागरके तटपर
पहुँचकर आनन्दमग्न हुए वे [नरेश एवं दोनों दूत]
विमानसे उतर गये ॥ ५९-६१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डका 'विनायकलोकगमनवर्णन'
नामक बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५२ ॥
❖
तिरपनवाँ अध्याय
काशिराजका गणपतिधाममें भगवान् विनायकका दर्शन करना और उनकी स्तुति करना
ब्रह्माजी बोले-उन लोगोंने पुण्यराशिके कारण
मिलनेवाले उस इक्षुसागरके रसका भलीभाँति पान किया।
इक्षुसागरके मध्यमें एक निर्मल पुष्करिणी थी, जिसमें
सूर्यके समान भासमान और हजारों पंखुड़ियोंवाला एक
उत्तम कमल था। उस कमलके मध्यमें उन विनायकदेवका
अत्यन्त मनोहर पर्यंक स्थित था ॥ १-२ ॥
पर्यंकपर दिव्य आस्तरण (बिछौना) बिछा हुआ
था और वह दिव्य धूपोंसे सुवासित था। उसपर नानाविध
दिव्य पुष्प बिखेरे गये थे तथा उसमें जटित उत्तम
कान्तिवाली रत्नराशिकी आभा सभी दिशाओं और
विदिशाओं (दिक्कोण ईशान आदि)-को उद्भासित कर
रही थी। ऐसे उस पर्यंकपर सोये हुए विनायकदेवपर
व्यजन डुलाये जा रहे थे ॥ ३-४ ॥
वे विनायकदेव करोड़ों चन्द्रमाओंकी-सी कान्तिवाले,
विविध अलंकारोंसे मण्डित तथा सर्पोंसे विभूषित थे।
उनकी सूँड़ केलेके तने-जैसी थी और उसमें [एकमात्र]
दाँत शोभा पा रहा था। ओढ़े हुए दिव्याम्बरसे वे आवृत
थे। उनके ललाटपर [तीसरा] नेत्र और सिरपर मुकुट
शोभायमान था। उन्होंने [कानोंमें] कुण्डल, [हाथोंमें]
बाजूबन्द, [अँगुलियोंमें] अँगूठी और [कटिदेशमें]
बहुमूल्य करधनीको धारण कर रखा था ॥ ५-६ ॥
उनके सिद्धिप्रदायक चरणोंको सिद्धिदेवी और
बुद्धिदेवी दबा रही थीं तथा अणिमा एवं गरिमा नामक
सिद्धियाँ उनपर श्वेत चामर डुलानेमें निरत थीं। ज्वालिनी
और तेजिनी नामक शक्तियाँ जगमगाती हुई-सी [मानो
वहाँ प्रकाश फैलानेके लिये] उनके दोनों ओर अवस्थित
थीं। भगवान् विनायक दिव्य गन्धानुलेपनसे अनुलिप्त
एवं दिव्य मालाओंसे अलंकृत थे ॥ ७-८ ॥
महिमा तथा प्रथिमा नामक सिद्धियाँ उनके समक्ष
जल एवं निष्ठीवनपात्र (पीकदान) और रत्नजटित
सुवर्णमय छत्र लिये खड़ी थीं ॥ ९ ॥
[वहाँ पहुँचकर] वे दूत काशिराजका हाथ पकड़कर
विनायकदेवके समक्ष गये और वार्तालापका अवसर
देखने लगे, तभी भगवान् जग गये ॥ १० ॥
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Here is the complete text transcribed from the image:

३९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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उन दूतोंने विनायकदेवको प्रणाम करके निवेदन | स्थापना की। तदुपरान्त मैं आपसे आज्ञा लेकर जन्मदाता
किया कि आपकी आज्ञासे इन्हें हम लिवा लाये हैं- | पिता कश्यपजीके पास चला गया ॥ २०-२२ ॥
ऐसा कहकर उनके आदेशकी प्रतीक्षा करते हुए वे दोनों | उनको प्रणाम करके मैं समस्त वैभवोंसे परिपूर्ण इस
दूर खड़े हो गये ॥ १९॥ | अपने धाममें आ गया। [यहाँपर] आपके ही विषयमें
प्रबुद्ध हुए उन विनायकदेवको राजाने हाथ जोड़कर | सोचता हुआ मैं कहीं भी शान्ति न पा सका। तब आपके
प्रणाम किया और अत्यन्त प्रीतिसे बोले 'आज मेरा वंश | आदिभाव अर्थात् मेरे प्रति वात्सल्यमूलक भक्तिभावको
धन्य हो गया, मेरे माता-पिता, जन्म लेना, विद्या, | जानकर मैंने मुनिश्रेष्ठ मुद्गलको आपके घर भेजा और
तपस्या, नेत्र और पुत्र आदि भी धन्य हैं; क्योंकि ब्रह्माजीके | उनकी कृपासे आपने और स्वयं उन मुद्गलमुनिने भी इस
द्वारा जिनका ध्यान किया जाता है, ऐसे अपने चरणयुगलका | स्थानको प्राप्त किया है, यह स्थान तो श्रेष्ठ मुनिजनों
[आपने] हमें दर्शन कराया है॥ १२-१३॥ | तथा ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी सर्वदा अलभ्य ही
मैंने जैसा वैभव [यहाँका] देखा है, वैसा तो | है' ॥ २३-२५ ॥
ब्रह्मलोक, कैलास, इन्द्रलोक आदि किसी भी लोकमें | ब्रह्माजी बोले-उन विनायकके वचनामृतका
नहीं दिखायी देता' ॥ १४ ॥ | पानकर और बार-बार उनकी वन्दना करके काशिराज
तदुपरान्त उन विनायकने दूतोंको बैठनेकी आज्ञा | अपनी बुद्धिके अनुसार स्तवन करने लगे ॥ २६ ॥
दी। जब दूत बैठ गये, तब राजाने विनायकको [उन्हीं | राजा बोले- हे नाथ! जो कमल, पाश, खड्ग,
पूर्वपरिचित] बालकके रूपमें देखा, जिन्होंने नरान्तक | परशु आदिके चिह्नोंसे युक्त हैं, ब्रह्मा आदि देवगण अपने
और देवान्तक नामक दैत्योंका वध किया था। उन | कल्याणहेतु एकमात्र जिनका ही ध्यान किया करते हैं
मृदुलदेह, हिम और कर्पूरके समान शुभ्र, अत्यन्त गौर | और जो भक्तोंके विघ्नोंका ध्वंस कर देते हैं, आपके उन
तथा दो भुजाओंसे युक्त [बालरूप] विनायकको देखकर | चरणारविन्दोंकी मैं वन्दना करता हूँ॥ २७ ॥
राजा कुछ भी बोल न सके। आँसुओंसे उनका गला भर | [हे नाथ! मैं आपके उन चरणकमलोंकी वन्दना
आया। काशिराजने आनन्दाश्रुओंकी धारासे विनायकदेवके | करता हूँ,] जो विष्णु, शिव आदि देवताओं तथा
चरणयुगलको भिगो दिया ॥ १५-१७ ॥ | नानाविध अभीष्टसिद्धिके अभिलाषी मनुष्योंके द्वारा
राजाके अलौकिक भक्तिभावको जानकर विघ्न- | बारम्बार पूजित होते हैं और विघ्नोंका नाश करनेमें
विनायकने उन्हें उठाया और आलिंगन किया। [तब | कुशल एवं सांसारिक तापोंसे सन्तप्त प्राणियोंपर कृपामृतकी
काशिराजने भी] विनायकके मस्तकको वैसे ही सूंघा, | वर्षा करनेवाले हैं ॥ २८ ॥
जैसे सुदीर्घकालोपरान्त समागत पुत्रका मस्तक पिता | हे नाथ! कृपाकटाक्षरूपी अमृतवर्षणसे तीनों तापोंका
सूंघता है। तब विनायकदेवका भी गला आँसुओंसे भर | शमन करनेकी जिसमें प्रत्यक्ष सामर्थ्य गोचर होती है,
आया और वे तथा राजा दोनों ही रोमांचित हो उठे। | आपके उस अग्नि-सूर्य-चन्द्रात्मक तीन नेत्रोंवाले
आनन्दसिन्धुमें निमग्न हुए उन दोनोंको योगियोंकी भाँति | मुखारविन्दकी मैं वन्दना करता हूँ॥ २९ ॥
शरीरका भान न रहा॥ १८-१९॥ | हे नाथ! हे सुरेश्वर! जो नानाविध अस्त्र-शस्त्रोंके
इसके पश्चात् [प्रकृतिस्थ होनेपर] बालरूपी विनायकने | द्वारा दैत्यसमूहको विनष्ट करनेवाला, अनेकों भक्तोंको
राजासे कहा- 'हे तात! आपके घरमें खेल-खेलमें मैंने | निर्भय करनेवाला और संसाररूपी कूपसे निकलनेका सहारा
अनेक बार सदसद् व्यवहार किया है, वह सब आप सहन | है, मैं आपके उस करारविन्दकी वन्दना करता हूँ॥ ३०॥
करते रहे। मैंने वहाँ बहुत-से दैत्योंका वध किया, भूमिक | हे गणपति! आप [अजन्मा हैं तथापि] सत्त्वगुणका
भार नष्ट किया, सत्पुरुषोंकी रक्षा तथा धर्ममर्यादाकी | आश्रय लेकर [विष्णुरूपसे प्रजाओंका] भरण-पोषण

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:

क्री०ख०-अ०५३ ] * काशिराजका गणपतिधाममें भगवान् विनायकका दर्शन करना * ३९९
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करते हैं, रजोगुणका आश्रय लेकर [ब्रह्माके रूपमें
विश्वप्रपंचकी] रचना करते हैं और तमोगुणका आश्रय
लेकर [रुद्ररूपसे ब्रह्माण्डका] संहार करते हैं। यह
चराचर जगत् आपके ही नियन्त्रणमें है॥ ३१ ॥
जो निर्मलचित्त व्यक्ति आपका अहर्निश भजन
करता है, आप उसके विघ्नोंको आक्रान्त करके
[भक्तवत्सलताके कारण] उसके चारों ओर मँडराया
करते हैं। वह [अपने निश्छल भक्तिभावसे] आपको
वशीभूत करके सुखपूर्वक सोता है और आप [उसके
हितार्थ] वैसे ही दौड़ते रहते हैं, जैसे बछड़ेके लिये गाय
दौड़ती है॥ ३२ ॥
जो लोग दूसरे (देवताओं)-की उपासना करते हुए
नानाविध सन्ताप प्राप्तकर संसार-चक्रमें बारम्बार भटकते
रहते हैं, वे भी कभी-कभी आपके [करुणापूर्ण]
अनुग्रहको प्राप्त करके [पुनः] मनुष्य-शरीर धारण
करते हैं और तब [आपका सायुज्य] पा लेते हैं॥ ३३॥
भले ही कोई व्यक्ति धूलके कणों, आकाशीय
तारागणों और बादलोंके द्वारा बरसाये जलबिन्दुओंको
गिन ले, परंतु आपके गुणोंको गिन पानेमें तो अपनी सारी
ही आयुमें शेषनाग अथवा ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हो
सकते। [हे भगवन्! वस्तुतः आप निराकार और
साकार—दोनों ही रूपोंवाले हैं; क्योंकि] निराकार कहे
जानेवाले आपकी यदि आकृति न होती, तो उपासनाविधि
ही व्यर्थ हो जाती और गुणोंके परिणामभूत प्राकृतिक
प्रपंच तथा विभिन्न जीवोंके भाँति-भाँतिके कर्मभोग भी
किस प्रकार सिद्ध हो पाते ? ॥ ३४-३५॥
यदि सज्जनोंकी संगति हो, उनका अनुग्रह हो,
शास्त्रविहित कर्तव्यमें निष्ठा हो और निरन्तर आपका
अनुध्यान हो तो चित्तकी शुद्धि, आपका महान् अनुग्रह,
ज्ञान और मोक्ष—ये सभी दुर्लभ नहीं रहते * ॥ ३६ ॥
ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारके स्तवनको सुनकर
सन्तुष्ट हुए उन विनायकने काशिराजसे कहा कि
'मनोवांछित वर ग्रहण करो' ॥ ३७ ॥
राजाने कहा—[हे प्रभो !] जो मैं यहाँ आ सका
हूँ, इतनेसे ही वरदानका प्रयोजन सिद्ध हो गया, अब मेरा
पुनः जन्म-मरण न हो, इसका उपाय कीजिये ॥ ३८ ॥
ब्रह्माजी बोले—स्तुतिसे सन्तुष्ट हुए विनायक
उन दिव्य देहवाले काशिराजसे 'तथास्तु' (ऐसा ही
हो)—इस प्रकार बोले और करोड़ों कल्पोंतकके लिये
उनको अपने समीपमें स्थान दिया ॥ ३९ ॥
हे मुने ! उन विनायकदेवने ही कृपापूर्वक मुझको
यह स्तोत्र बताया था, तदुपरान्त मैंने नारदजीको और
नारदजीने महर्षि गौतमको यह स्तोत्र बतलाया। फिर
महर्षि गौतमने इसे सभी ऋषियोंको प्रदान किया।
अत्यन्त पावन यह स्तोत्र विघ्ननाशक और ज्ञान, मोक्ष
तथा समस्त वांछित फलोंको देनेवाला है ॥ ४०-४१ ॥
गणपतिदेवके समक्ष जो मनुष्य तीनों सन्ध्याओंमें
इसका पाठ करता है, उसे भक्तिकी प्राप्ति होती है।
इसका पाठ करके विद्यार्थी विद्या, पुत्रार्थी सन्तान तथा
विजयार्थी विजय प्राप्त कर लेता है। हे मुने ! जो-जो


  • नृप उवाच
    नमामि ते नाथ पदारविन्दं ब्रह्मादिभिर्ध्येयतमं शिवाय। यत्पद्मपाशासिपरश्वधादिसुचिह्नितं विघ्नहरं निजानाम्॥
    यदर्च्यते विष्णुशिवादिभिः सुरैरनेककार्यार्थकरैर्नैरैश्च। अनेकशो विघ्नविनाशदक्षं संसारतप्तामृतवृष्टिकारि ॥
    नमामि ते नाथ मुखारविन्दं त्रिलोचनं वह्निरवीन्दुतारम्। कृपाकटाक्षामृतसेचनेन तापत्रयोन्मूलनदृष्टशक्ति ॥
    नमामि ते नाथ करारविन्दं अनेकहेतिक्षतदैत्यसङ्घम्। अनेकभक्ताभयदं सुरेश संसारकूपोत्तरणावलम्बम्॥
    त्वमेव सत्त्वात्मतया बिभर्षि सृजस्यदो राजसतामवाप्य। तमोगुणाधारतया च हंसि चराचरं ते वशगं गणेश ॥
    यः शुद्धचेता भजतेऽनिशं त्वामाक्रम्य विघ्नान् परिधावसि त्वम्। स त्वां वशे कृत्य सुखं हि शेते वत्सं यथा गौरिव धावसि त्वम् ॥
    येऽन्यन् भजन्तः समवाप्य तापान् संसारचक्रे बहुधा भ्रमन्तः। कदापि तेऽनुग्रहमाप्य तेऽपि भजन्ति मानुष्यमवाप्य तेऽपि ॥
    धरारजः कोऽपि मिमीते नाके तारागणं वारिमुचां च धाराः। नालं गुणानां गणनां हि कर्तुं शेषो विधाता तव वर्षपूरैः ॥
    निराकृतेस्ते यदि नाकृतिः स्यादुपासनाकर्मविधिर्वृथा स्यात्। गुणप्रपञ्चः प्रकृतेर्विलासा जनस्य भोगश्च तथा कथं स्यात् ॥
    सत्सङ्गतिश्चेत्सदनुग्रहः स्यात् सत्कर्मनिष्ठा सदनुस्मृतिश्च। चित्तस्य शुद्धिर्महती कृपा ते ज्ञानं विमुक्तिश्च न दुर्लभा स्यात् ॥
    (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ५३ । २७-३६)

४०० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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तुमने पूछा था, वह सब मैंने इस प्रकार बतलाया,
काशिराजका आख्यान सुननेके बाद तुम और क्या सुनना
चाहते हो ?॥ ४२-४३१/२॥
भृगुजी बोले- ब्रह्माजीके इन वचनोंको सुनकर
व्यासजीका सन्देह नष्ट हो गया और उन उत्तमबुद्धि
मुनिवरने दूसरी कथाओंको विस्तारपूर्वक सुननेके लिये
प्रश्न किया॥ ४४१/२॥
व्यासजीने पूछा- [हे ब्रह्मन् !] उन विनायकने
किस प्रकार अतिदरिद्र शुक्लके घरमें आदरपूर्वक साधारण
भोजन करके उसकी दरिद्रताको दूर किया और काशिराजके
समीप क्या-क्या लीलाएँ की थीं तथा काशिराजने क्या
किया, यह सब बतलािये॥ ४५-४६॥
विनायकदेवने कैसे दोनों दैत्यों (नरान्तक और
देवान्तक)-को मारा और कैसे पृथ्वीका भार हरण किया
तथा किस रीतिसे धर्मकी स्थापना की-यह सब भली-
भाँति आप मुझे बतलािये॥ ४७॥
ब्रह्माजी बोले-हे मुने ! उन बालरूप विनायकने
शुक्लकी दरिद्रताका हरण करके और भी जो-जो
लीलाएँ की थीं, वह सब चरित मैं तुमको संक्षेपमें बता
रहा हूँ॥ ४८॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'राजाको स्वानन्दभुवनप्राप्तिका वर्णन'
नामक तिरपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५३॥
चौवनवाँ अध्याय
काशीमें 'वरदविनायक' की स्थापना
ब्रह्माजी बोले- [एक दिन विनायकदेव भक्तिके
वशीभूत होकर धनहीन शुक्लके घर जा पहुँचे और] उन
बालरूप गणपतिने शुक्लके यहाँ भोजन किया, तदुपरान्त
वहीं प्रांगणमें खेलते-खेलते क्षणभरमें सो गये। इधर
[बहुत-से] नगरनिवासी जन, जो कि उन्हें भोजन
कराना चाह रहे थे, विनायकको बुलानेके लिये काशिराजके
भवनमें आये॥ १-२॥
काशिराजने उन नागरिकोंसे कहा [कि विनायक
तो अभी यहीं खेल रहा था, लगता है] कि वह खेलता-
खेलता यहाँसे [कहीं और] चला गया। तब लोग
प्रत्येक घरमें विनायकको खोजने लगे। तभी कुछ लोगोंने
कहा कि वह तो शुक्लके घर गया हुआ है, तब वे
नागरिक उस अकिंचन शुक्ल और विनायकदेवकी निन्दा
करने लगे॥ ३-४॥
नागरिक जन बोले- जैसे ऊँट कोमल पल्लवोंको
छोड़कर काँट चबाता है, वैसे ही यह विनायक
वैभवसम्पन्न हम लोगोंकी उपेक्षा करके उस दरिद्रके घर
जा पहुँचा। राजाने तो उसे व्यर्थ ही ईश्वर मान लिया
है; क्योंकि यदि वह बालक ईश्वर होता तो सभीके
मनको प्रसन्न रखता॥ ५-६॥
उस बच्चेने कैसे [उस दरिद्रका] अतिसामान्य और
अल्पमात्र भोजन किया होगा, यह सोचकर उन नागरिकोंमें-
से कुछ भले लोग विनायकको ले आनेके लिये उद्यत
हो गये। वे लोग इधर-उधर भटकने लगे और विनायकका
पता पानेके लिये पथिकजनोंसे पूछने लगे कि क्या [आप
लोगोंने] विनायकको कहीं देखा है। विनायकके प्रति
भक्तिसम्पन्न वे लोग स्थान-स्थानपर उसके बारेमें पूछते
हुए भ्रमण कर रहे थे। तब कुछ लोगोंने कहा कि वह
कदाचित् शुक्लके घर गया है॥ ७-९॥
तब वे लोग तत्काल ही शुक्लके घर जा पहुँचे,
वहाँ उन्हें जब ज्ञात हुआ कि विनायकदेव शयन कर रहे
हैं तो वे सत्त्वगुणी जन [यह सोचकर] मौन भावसे बैठ
गये कि जब वे विभु जगेंगे, तब उनसे हम [भोजनके
लिये] प्रार्थना करेंगे। उन्हीं लोगोंमें कुछ रजोगुणी जन
भी थे, वे [सोते हुए] विनायकसे कहने लगे- 'अरे !
उठो, भोजन करनेके लिये चलो, नहीं तो भोजन बासी
हो जायगा॥ १०-११॥
[अरे !] तेरे लिये राजधानीके लोग कोलाहल कर
रहे हैं, [और तू यहाँ शान्तिपूर्वक सो रहा है]। शुक्ल
अर्थात् विशुद्ध भिक्षासे जीविकोपार्जन करनेवाले इस

क्री०ख०-अ०५४] * काशीमें 'वरदविनायक' की स्थापना * ४०१
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[बायाँ स्तम्भ]
गरीब शुक्लको तो स्वयंके लिये भी भिक्षा पूरी नहीं
पड़ती और इसके घर कोई पानीतक नहीं पीता। तब तूने
कश्यपका पुत्र होकर भी इसके घरका दूषित भोजन कैसे
कर लिया ?' इस प्रकार उन विनायककी कुछ लोग तो
भाँति-भाँतिकी बातें कहकर भर्त्सना कर रहे थे और कुछ
अन्य लोग उनका स्तवन करनेमें लगे थे ॥ १२-१४ ॥
मुनि बोले- इस प्रकार उन सभी लोगोंकी बातें
सुनकर कश्यपात्मज गणेशजी [जग गये और] कहने लगे।
विनायकदेव बोले- [हे नागरिको !] भक्तिपूर्वक
अर्पित किये गये भोजनको मैं इच्छानुरूप ग्रहण कर चुका
हूँ, अब तो मुझमें एक पग भी चल पानेकी सामर्थ्य नहीं
है। मैं पूर्णरूपसे तृप्त हूँ, जिसके कारण इस समय तो एक
ग्रास भी खानेकी मुझे इच्छा नहीं हो रही है ॥ १५-१६ ॥
ब्रह्माजी बोले - तब [गणेशजीकी] ऐसी निष्ठुरता
देखकर वे लोग हतोत्साह हो गये और आपसमें
वार्तालाप करने लगे कि इस बालकके विषयमें क्या
किया जाय ? ॥ १७॥
जब गणेशजीने पुरवासियोंकी विकलताको जाना
तो जैसे आकाश एक और अखण्ड होकर भी घटाकाश,
मठाकाशादिके भेदसे अनेकरूप प्रतीत होता है अथवा
जैसे सूर्यविम्ब एक होकर भी विभिन्न जलकुम्भोंमें
अनेक रूपोंमें प्रतिबिम्बित होता है, वैसे ही वे विभु
क्षणभरमें अनन्त रूपोंमें प्रकट हो गये और प्रत्येक
(नागरिक)-के घरमें जाकर अनेकविध बालक्रीड़ाएँ
करने लगे ॥ १८-१९ ॥
वे विनायकदेव कहीं मार्गकी सीढ़ियोंमें, कहीं
झूलों-हिंडोलोंमें, कहीं शय्यापर तो कहीं महलोंमें
जाकर खेलते और हास-परिहास करते। कहीं घरके
बच्चोंके साथ बैठकर भोजन करते। कहीं स्वयं शास्त्राध्ययन
करते, तो कहीं आप ही पढ़ाने लगते ॥ २०-२१॥
काशिराजके साथ उन्हें अपने घरपर आया देख
वह गृहस्वामी हर्षित होता और कहता कि आज तो मैं
धन्य हो गया। इस प्रकार वे विनायक राजाके साथ
सभीके घर गये। कहीं उनका तैलसे अभ्यंग (मालिश)
किया जाता तो किसीके घरमें वे स्वच्छ जलसे स्नान कर

[दायाँ स्तम्भ]
रहे होते। कहींपर अत्यन्त आदरसे उनके पैर धुले जाते,
तो कहीं षोडशोपचार विधिसे भक्तिपूर्वक उनकी पूजा
होती ॥ २२-२४ ॥
कहीं वे बालभाव (बालोचित चंचलता) - के कारण
जैसे-तैसे परमान्न (पायस, कृसर आदि) ग्रहण करते तो
कहीं कस्तूरी, चन्दन आदि नानाविध सुगन्धित द्रव्यों
और पुष्पोंसे पूजित होते। तदुपरान्त उन्हें भाँति-भाँतिके
नैवेद्य अर्पित किये जाते। जब वे यथेष्ट मात्रामें भोजन
करके सो जाते तो घरकी महिलाएँ, छोटे बच्चे और
सेवक उनकी चरण-संवहनादि (पैर दबाना, पंखा झलना
आदि)-के द्वारा सेवा कर रहे होते ॥ २५-२६१/२ ॥
कहीं वे वेदपारायण करते, तो कहीं गायन कर रहे
होते। कहीं वे महापुरुषों और श्रीहरिके चरित्रोंको सुना
करते, तो कहीं राजाके साथ नृत्यांगनाओंका नृत्य
देखते ॥ २७-२८ ॥
कहीं उनका मंगलदीपोंसे नीराजन किया जाता, तो
कहीं वे विभु हाथमें पाश लेकर छोटे-छोटे बच्चोंके साथ
खेला करते। कहीं वे पुराणों, धर्मशास्त्रों, स्मृतियों
आदिका प्रवचन करते। इस प्रकारसे विनायकदेवने सभीके
घरोंमें भोजनकर सबकी कामनाओंको पूर्ण किया। जिस-
जिस व्यक्तिने जो-जो अभिलाषा की, उसकी वह-वह
अभिलाषा उन्होंने वैसे ही पूर्ण की, जैसे प्रसन्न हुए
भगवान् शिव, सर्वकामप्रदायक कामधेनु, कल्पवृक्ष अथवा
चिन्तामणि- ये सभी पूर्ण करते हैं ॥ २९-३११/२ ॥
उस समय [सबकी अभिलाषा पूर्ण करके] उन
विनायकने अपने 'दीननाथ' इस नामको सफल बनाया।
[उनके इस अलौकिक चरितसे विस्मित हुए] देवताओंने
दुन्दुभी बजायी और घर-घरमें फूल बरसाये। इधर वे
काशिराज ऐसे विलक्षण चरितको देखकर भ्रमित हो गये
और अपने लोगोंसे कहने लगे ॥ ३२-३३॥
'यह बालक विनायक तो मेरे ही समीप स्थित है,
तब कैसे ये सभीके घरोंमें जा पहुँचा और सबके द्वारा
पूजित हो रहा है ॥ ३४ ॥
यदि यह सभीके घरोंमें गया तो इस समय इसका यहाँ
होना कैसे सम्भव है? मुझे जो भी बुलाने आता है, उससे मैं

४०२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

बार-बार यही कहता हूँ कि विनायकके बिना मैं आपके
घर भोजनके लिये कैसे चल सकता हूँ?' ॥ ३५१/२ ॥
राजाने अपने घरमें कश्यपपुत्र विनायकके साथ
भोजन किया और [रहस्य जाननेके अभिप्रायसे] बीचमें
ही उठकर, भोजन करते विनायकको छोड़कर बाहर जब
आकर देखने लगे तो उन्होंने विनायकको बाहर भी बैठा
हुआ देखा ॥ ३६१/२ ॥
[राजाने देखा कि] जहाँ-तहाँ अत्यन्त विस्मित
लोग इस बातकी चर्चा कर रहे थे कि 'विभु विनायकने
काशिराजके साथ जाकर अनेक घरोंमें भोजन किया है!'
उनकी बातें सुनकर हँसते हुए वे काशिराज लोगोंसे
कहने लगे- 'मेरे बिना विनायक किस प्रकार विभिन्न
घरोंमें भोजन करने चला गया?' तदुपरान्त राजाने दो-
तीन घरोंमें जाकर देखा कि कश्यपपुत्र और वे स्वयं भी
प्रत्येक घरमें भोजन कर रहे हैं - ॥ ३७-३९१/२ ॥
इसी बीच [एक अन्य अद्भुत वृत्तान्त काशीमें
घटित हुआ-] सनक और सनन्दन ये दोनों मुनिश्रेष्ठ
स्नानादिसे निवृत्त होकर भोजनार्थ भ्रमण कर रहे थे।
उन्होंने देखा कि [सारी काशीमें] महान् उल्लास छाया
हुआ है और वह सुन्दर [नगरी] विनायकमयी हो गयी
है। वे जिस-जिस घरमें प्रवेश करते, उन्हें वहाँ-वहाँ
विनायक ही दीखते। तब वे [आश्चर्यचकित-से होकर]
बाहर आ जाते ॥ ४०-४२ ॥
उन मुनियोंने विनायकको कहीं भोजन करते हुए,
कहीं भोजन किये हुए, कहीं सोते हुए, कहीं खेलते हुए,
कहीं जप करते हुए, कहीं पढ़ते हुए तो कहीं पढ़ाते हुए
देखा। प्रत्येक स्थानपर ऐसी ही स्थितिको देखकर वे
आपसमें कहने लगे कि 'यहाँ तो भोजनके लिये कोई
उपयुक्त स्थल दीखता नहीं है, अतः हमलोग शुक्लके
घर चलते हैं, वही आदरपूर्वक हमारा विविध प्रकारसे
आतिथ्य करेगा' ॥ ४३-४४१/२ ॥
इस प्रकारसे [आपसमें] निश्चय करके वे शुक्लके
घर जा पहुँचे तो उनको वहाँ भी कश्यपपुत्र विनायक
दिखायी पड़े। तब क्षुधापीड़ित वे लोग मुँह लटकाये हुए
नगरसे बाहर चले गये। उन्होंने वहाँ भी भगवान् विनायकके

परम मनोहर स्वरूपको प्रत्यक्ष देखा ॥ ४५-४६ ॥
यह देख उन्होंने अपने नेत्र मूँद लिये तो उन्हें
अन्तःकरणमें विनायक दीखने लगे, जब मुनियोंने फिर
आँखें खोलीं तो उनको बाहर भी विनायकके ही
दर्शन हुए। उन मुनियोंने ऊपर-नीचे, मध्यमें तथा
दिशाओं-विदिशाओं (ईशान आदि कोणों)-में विनायकको
ही देखा ॥ ४७ ॥
तदुपरान्त वे मुनि नेत्र बन्दकर ध्यानमग्न हो गये
और कुछ क्षणोंके बाद जब उन्होंने नेत्र खोले तो दोनों
एक-दूसरेको विनायकरूपमें देखने लगे। सनकको सनन्दन
और सनन्दनको सनक विनायकके रूपमें दीखने लगे। वे
जिस-जिस देवताका ध्यान करते, उस-उस देवताके
रूपमें उनको विनायकका ही दर्शन हुआ ॥ ४८-४९ ॥
तदुपरान्त उन मुनियोंके समक्ष सर्वव्यापक, सर्वरूप
भगवान् विनायक प्रत्यक्ष प्रकट हो गये। उन मुनियोंने
दश भुजाओंसे युक्त, सिद्धि और बुद्धिदेवीसे समन्वित,
सिंहपर आरूढ़, देदीप्यमान मुकुट-कुण्डल एवं बाजूबन्द
(आदि अलंकारों)-से विभूषित, दिव्य गन्ध, दिव्य
माल्य, नाग, अर्धचन्द्र, कस्तूरीका तिलक और अग्निसदृश
कान्तिमय वस्त्रोंको धारण किये हुए और दुष्टोंके लिये
दुःसह तथा सत्पुरुषोंके लिये सौम्य, तेजस्वितासे युक्त
भगवान् विनायकको देखा ॥ ५०-५२ ॥
तब निर्भ्रान्त हुए तत्त्ववेत्ता परम बुद्धिमान् मुनियोंने
उन विनायकदेवको प्रणाम किया और बड़ी ही भक्तिसे
हाथ जोड़कर उन पंचभूतस्वरूप विभु गणेशका स्तवन
करने लगे ॥ ५३१/२ ॥
वे बोले-जो परब्रह्म नित्य, अद्वैत, अद्वय, सनातन,
चराचरात्मा एवं सर्वरूप है और जिसके [एक-एक]
रोममें कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड भ्रमण करते रहते हैं।
उपनिषद्वाक्य भी जिसका प्रतिपादन कर पानेमें समर्थ
नहीं होते, उसका स्तवन करना कैसे सम्भव हो सकता
है? हे देव! आपने हमारी मनोकामना जानकर उसे पूर्ण
कर दिया ॥ ५४-५६ ॥
बालरूपको धारण करनेवाले आपकी महिमाको
हम समझ नहीं सके, आपने पृथ्वीके भारका हरण

क्री०ख०-अ०५५] * भगवान् विनायकका भक्त ब्राह्मणको सर्ववैभवसम्पन्न भवन प्रदान करना * ४०३
करनेके लिये इस उत्तम कश्यपात्मजरूपको अंगीकार
किया है॥ ५७॥
ब्रह्माजी बोले-उन मुनियोंके स्तवन करते-
करते उनके समक्ष [आविर्भूत हुआ] वह रूप अन्तर्धान
हो गया। उन निर्भ्रान्त मुनियोंने जब स्वरूपको अन्तर्हित
जाना तो एक विशाल प्रासाद बनवाकर भगवान्
विनायककी एक सुन्दर मूर्ति, जैसी कि उन्होंने देखी
थी, उस प्रासादमें वेदघोष तथा मंगलवाद्योंकी ध्वनिके
साथ शुभ मुहूर्तमें स्थापित कर दी और उसका नाम
'वरदविनायक' रखा। वहींपर उन मुनियोंने एक उत्तम
सरोवरका भी निर्माण कराया, जो गणेशतीर्थके नामसे
विख्यात हुआ ॥ ५८-६०१/२॥
इस तीर्थमें स्नान, दान और उन गणपतिदेवका
पूजन करनेसे मनुष्य अपने पूर्वकृत पापोंसे मुक्त होकर
समस्त मनोवांछितोंको प्राप्त कर लेता है। [वरद-
विनायककी स्थापना होनेके बाद] वहाँ मुनिगण तथा
दिक्पालोंसहित सभी देवगण उपस्थित हुए और समर्चित
हुए विनायकदेवका दर्शन, स्तवन तथा वन्दन करके
पुनः लौट गये। इस प्रकार बालरूप विनायकके प्रभावकी
परीक्षा करनेके लिये आये हुए सनक और सनन्दन
उनके प्रभावको देखकर सन्तोषपूर्वक अपने परमलोकको
चले गये ॥ ६१-६३१/२॥
जो इन बालरूप विनायकके इस मंगलमय चरित्रका
भक्ति-भावसे श्रवण करता है, उसकी सभी कामनाएँ
पूर्ण हो जाती हैं और वह देहावसानके बाद ब्रह्मस्वरूप
हो जाता है। [इस अरिष्टनाशक चरित्रका पाठ-श्रवण
करनेसे] बालग्रहजनित पीड़ा नहीं होती और सर्वत्र
विजयकी प्राप्ति होती है ॥ ६४-६५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'काशीमें वरदविनायकमूर्तिकी स्थापनाका वर्णन'
नामक चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५४ ॥
पचपनवाँ अध्याय
भगवान् विनायकका अपने भक्त ब्राह्मण शुक्लको सर्ववैभवसम्पन्न भवन प्रदान करना
ब्रह्माजी बोले-उन (सनक और सनन्दन)-के
चले जानेके अनन्तर जब काशिराजने विनायकको नहीं
देखा तो उन नृपश्रेष्ठको बड़ा मोह हुआ। [उसी दशामें]
वे अश्वारूढ़ हो घर-घर भटकने लगे और कहने लगे
विनायक कहाँ भोजन करने गया है, वह मुझे छोड़कर
अकेला ही मिठाई खाने क्यों चला गया ? ॥ १-२ ॥
वे घर-घर जाकर पूछने लगे कि विनायक कहाँ
चला गया, अभी-अभी तो भोजन करके वह बाहर
आया था और खेलना चाह रहा था। तब [पुरवासियोंने
उनसे कहा कि] आप व्यर्थमें क्यों पूछ रहे हैं? वह तो
आपके ही साथ था। सभी नागरिकोंके द्वारा ऐसा उत्तर
दिये जानेपर वे वैसे ही विह्वल हो उठे, जैसे परिवारवाला
निर्धन गृहस्थ ॥ ३-४१/२॥
[तभी राजासे] कुछ लोगोंने कहा कि वह
विनायक तो शुक्लके घरमें खेल रहा है। तब राजा
प्रसन्नतापूर्वक शुक्लके घर जा पहुँचे, वहाँ उन्होंने
बालरूपधारी विभु विनायकको उसके घरके आँगनमें
वृषभपर आरूढ़ देखा ॥ ५-६॥
दूसरे शिवके समान प्रतीत होनेवाले वृषभारूढ़ उन
विनायकको देखकर राजाने बड़े ही भक्तिभावसे प्रणाम
किया और हाथ जोड़कर कहने लगे- ॥ ७॥
राजा बोले- [यह उचित ही कहा गया है कि]
बालकमें न साधुता होती है और न ज्ञान अथवा स्नेह
ही होता है। मुझे छोड़कर [अकेले-अकेले] तुमने
विविध प्रकारके मिष्टान्न क्यों खाये ? ॥ ८॥
ब्रह्माजी बोले-राजाकी इस बातको सुनकर
विनायक कहने लगे- [हे राजन्!] जहाँ-जहाँ मैंने
भोजन किया, वहाँ-वहाँ तुमने भी भोजन किया है। हे

४०४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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मन्द! तुम मिथ्या भाषण कर रहे हो। [तुमने मुझे बालक | शुक्लको उत्तम वैभव प्रदान किया, जो सबको
कहा है, पर वास्तवमें] बुद्धि आपकी ही बालकों-जैसी | आश्चर्यचकित करनेवाला तथा कुबेरके वैभवसे अधिक
है। मेरी बातके साक्षी ये सभी लोग हैं, तुम इनसे पूछो, | श्रेष्ठ था। इधर महामना शुक्लने [सोचा कि लगता है]
ये बतायेंगे ॥ ९-१० ॥ | विनायकदेव साधारण भोजन अर्पित करनेके कारण
ब्रह्माजी बोले- तब विनायककी बात सुनकर | मुझपर रुष्ट हो गये हैं, यह विचारकर वे दीनभावसे
लोगोंने राजासे कहा कि आपने विनायकके साथ अभी- | पत्नीके साथ [घर] लौट आये ॥ १९-२० ॥
अभी भोजन किया है। हे नृपसत्तम ! आप तो वृद्ध हैं, | [वहाँसे लौटकर अपने घरके समीपमें आये हुए]
सत्पुरुष हैं, आप मिथ्या क्यों बोल रहे हैं? तब वे | शुक्लने जब अपनी घास-फूसकी कुटिया नहीं देखी तो
ज्ञानवान् नरेश स्वाभाविक अवस्थामें आकर कहने | वे अत्यधिक चिन्तित हो उठे। उसी समय मानो
लगे- ॥ ११-१२ ॥ | [किसीके द्वारा] बलपूर्वक प्रेरित किये गये सेवक-
राजा बोले- [हे देव!] आपकी यह सर्वोत्कर्षमयी | सेविकाओंने शुक्ल और उनकी पत्नीको सुगन्धित तैलका
माया जानी नहीं जा सकती, यह तो योगियोंको भी | मर्दन करके स्नान कराया तथा आभूषणों एवं स्वर्णिम
मोहित करनेवाली है। आप धन्य हैं, क्योंकि सभी रूपोंमें | वस्त्रोंसे सुसज्जित किया ॥ २१-२२ ॥
सर्वत्र आप ही पूजित होते हैं ॥ १३ ॥ | [अपने भवनमें] सब प्रकारके वैभवको देखकर
ब्रह्माजी बोले-तदुपरान्त रोमांचित शरीरवाले वे | वे दोनों अत्यधिक विस्मित थे। [वहाँकी] सुवर्णमयी
नरेश ध्यानस्थ हो गये और उस दशामें वे स्वयं ही | दीवारोंमें रत्न जड़े थे, स्थान-स्थानपर मोतियों-
विनायकके समान रूपवाले प्रतीत होने लगे ॥ १४ ॥ | मणियोंसे जटिल, भाँति-भाँतिके चित्र-विचित्र मंच, शय्या,
जिस प्रकार जल (-राशि)-में गिरा हुआ जल | आसन आदि तथा स्वर्णसे निर्मित पात्र विद्यमान थे।
(-बिन्दु) उस जल (-राशि)-की समताको प्राप्त | वहाँपर नाना प्रकारके वस्त्र, आच्छादन (बिस्तर, पर्दे
करता है, वैसे ही उन विनायकके ध्यानमें तन्मय होकर | आदि) तथा खानेयोग्य भाँति-भाँतिके भोज्य पदार्थ
राजाने उन्हींका स्वरूप पा लिया। तदुपरान्त वैनायकी | थे ॥ २३-२४१/२ ॥
मायाके प्रभावसे वे नृपश्रेष्ठ पुनः (विनायकरूपसे) भिन्न | यह सब देखकर वे आपसमें कहने लगे- [अरे!]
रूपवाले अर्थात् अपने स्वाभाविक रूपवाले हो गये ॥ १५ ॥ | यह छोटा-सा घर कैसे इन्द्रभवनके जैसा हो गया!
तदुपरान्त राजाने विनायकको पालकीमें बैठाया | तदुपरान्त शुक्लने पत्नीसे कहा- 'हे भाग्यशालिनि!
और भाँति-भाँतिके बाजे बजवाते, नानाविध नृत्य- | इस सबको तुम विनायककी ही कृपासे प्राप्त हुआ
गीतादिके साथ उनको अपने महलमें ले गये ॥ १६ ॥ | समझो। अल्पमात्र [पूजा-सत्कार]-से सन्तुष्ट होनेवाले
उस समय बालरूप विनायक देवताओंके बीचमें | वे महाविभु यद्यपि प्रकटरूपसे तो कुछ नहीं देते, परंतु
कामदेवके समान अत्यधिक शोभा पा रहे थे और उनके | परोक्षरूपसे अपने द्वारा प्रचुर मात्रामें दिये गये [धन-
पीछे-पीछे पत्नीके साथ शुक्ल धीरे-धीरे भक्तिपूर्वक जा | वैभवादि]-को भी वे थोड़ा ही मानते हैं। उन विभुको
रहे थे। [एकाएक] बालक विनायकने अपना मुँह | भक्तिपूर्वक समर्पित किया गया यत्किंचित् (उपहार) भी
घुमाकर जब शुक्लको देखा तो उन्हें बड़ी लज्जा आयी | उनको अत्यधिक जान पड़ता है ॥ २५-२८ ॥
कि अरे! बिना इसको सन्तुष्टिदायक कोई वर दिये मैं | इसलिये अपने कल्याणके लिये भयवश, कामनाविश,
कैसे चला आया ? ॥ १७-१८ ॥ | स्नेहके कारण अथवा शत्रुभावसे ही सही, उन
इस प्रकार मनमें विचारकर उन विभु विनायकदेवने | (विनायकदेव)-का स्मरण, वन्दन, स्तवन तथा पूजन

क्री०ख०-अ०५५] * भगवान् विनायकका भक्त ब्राह्मणको सर्ववैभवसम्पन्न भवन प्रदान करना * ४०५
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करना चाहिये' ॥ २९ ॥
ब्रह्माजी बोले- इसके बाद (-का एक अन्य
वृत्तान्त है।) नरान्तकके द्वारा प्रेरित शूर तथा चपल
नामक दूत उस नगरमें बहुत समयसे छिपकर रह रहे थे।
जिनके प्रचण्ड गर्जनसे तीनों लोक पीपलके पत्तेके समान
काँप उठते थे और जिनके सिर हिला देनेमात्रसे
इन्द्रसहित सभी देवगण काँपने लगते थे। बल, पराक्रम
और गर्जनमें जिनकी बराबरी करनेवाला त्रिलोकीमें कोई
भी नहीं था ॥ ३०-३१ १/२ ॥
[पालकीमें बैठे विनायकदेवको देखकर] वे दोनों
परस्पर कहने लगे कि डोलीमें बैठा हुआ यह मुनिकुमार
तो मार डालनेयोग्य है; क्योंकि इसने पूर्वमें आये हुए
बलशाली दैत्योंका वध किया है। हमें उनका बदला
लेना चाहिये ॥ ३२-३३ ॥
[ऐसा निश्चय करके उन दैत्योंने] विद्युत्-रूप
धारण किया और उच्च स्वरसे गरजने लगे। उनके तेजके
कारण [पालकीकी रक्षामें नियुक्त] सैनिकोंके नेत्र चौंधिया-
से गये और वे अत्यन्त व्याकुल होकर 'यह क्या, यह
क्या' इस प्रकार चीखने-चिल्लाने लगे ॥ ३४ १/२ ॥
इसी बीचमें वे दोनों दैत्य पालकीके समीप आ
पहुँचे। [उन्हें देखकर] पालकी ढोनेवाले [भयवश]
उन विनायकको छोड़कर भाग निकले। तब उन बलवान्
दैत्योंको विनायकने बलपूर्वक अपने हाथोंसे पकड़ लिया
और धरतीपरसे उन्हें उखाड़ फेंकनेके लिये वे बलपूर्वक
दोनोंको घुमाने लगे, फिर सहसा करुणावश दैत्योंको
पुनः भूतलपर खड़ा कर दिया ॥ ३५-३७ ॥
[विनायकदेवने उनसे कहा कि] मनुष्यको उसीका
वध करना चाहिये, जो अपनेसे अधिक पराक्रमी हो।
मच्छरको मार डालनेसे व्यक्तिका कौन-सा पौरुष प्रकट
होगा? ॥ ३८ ॥
तदुपरान्त विनायकने दैत्योंसे पूछा-'बताओ, तुम
लोग किसके दूत हो ? [तुम्हें अपराधबोध नहीं होना
चाहिये, क्योंकि] अपनी शक्तिभर प्रयत्न करनेसे भी
[सफलता न मिलनेपर] व्यक्तिको दोष नहीं लगता' ॥ ३९ ॥
विनायककी इन बातोंको सुनकर उनके समक्ष
स्थित दैत्योंने कहा कि आप दयासिन्धु कहे गये हैं,
दीनपालक ! आप तो हमारे साक्षात् पिता ही हैं ॥ ४० ॥
गर्भाधान करनेवाला, उपनयन करनेवाला, विद्या
देनेवाला, रक्षक और भरण-पोषण करनेवाला- इन पाँच
लोगोंको तीनों लोकोंमें पिता कहा जाता है ॥ ४१ ॥
हे देव! हमलोग नरान्तकके द्वारा भेजे गये दूत हैं।
हमने [अपने वास्तविक] स्वरूपको छिपा रखा है। हम
तो आपका अपकार कर रहे थे, पर आपने कृपापूर्वक
हमें बचा लिया ॥ ४२ ॥
हे सर्वज्ञ ! आप अतीत, वर्तमान तथा भविष्य -
सबको जानते हैं। जो-जो लोग वैरवश आपके समीप
आये, वे सभी क्षणभरमें आपके द्वारा मार डाले
गये ॥ ४३ ॥
इसी बीच पुरवासी जन विनायकसे कहने लगे-
'देव! ये दोनों दुष्ट तो संसारको भय देनेवाले हैं, आपने
इनकी क्यों रक्षा की, इनपर किया गया उपकार तो हानि
ही करेगा, क्योंकि साँपको दिया गया दूध तो जहर ही
बनता है' ॥ ४४-४५ ॥
ब्रह्माजी बोले- तब विनायकदेवने पुरवासियोंसे
कहा- 'मैं पहले ही इन्हें अभयदान दे चुका हूँ, अब
इसके विपरीत व्यवहार कैसे किया जा सकता है ? ॥ ४६ ॥
यह कहकर विनायकने उन दोनोंको मुक्त कर
दिया, तब काशिराजने कहा [हे प्रभो! आपने] असंख्य
अपराधोंको क्षमा करके उन शत्रुओंको मुक्त कर दिया।
[वास्तवमें कोई] प्राणी जीवित रहेगा या मृत्युको
प्राप्त करेगा, इसमें आपकी इच्छा ही कारण है। यह
कहकर विनायकके साथ काशिराज राजभवन आ
गये ॥ ४७-४८ ॥
तदुपरान्त विनायक और काशिराजको प्रणाम करके
और राजा तथा विविध रूपोंवाले विनायककी प्रशंसा
करते हुए सभी लोग अपने-अपने घर चले आये ॥ ४९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'दूतोंकी मुक्तिका वर्णन' नामक पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५५ ॥