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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 406, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 406

४०४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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मन्द! तुम मिथ्या भाषण कर रहे हो। [तुमने मुझे बालक | शुक्लको उत्तम वैभव प्रदान किया, जो सबको
कहा है, पर वास्तवमें] बुद्धि आपकी ही बालकों-जैसी | आश्चर्यचकित करनेवाला तथा कुबेरके वैभवसे अधिक
है। मेरी बातके साक्षी ये सभी लोग हैं, तुम इनसे पूछो, | श्रेष्ठ था। इधर महामना शुक्लने [सोचा कि लगता है]
ये बतायेंगे ॥ ९-१० ॥ | विनायकदेव साधारण भोजन अर्पित करनेके कारण
ब्रह्माजी बोले- तब विनायककी बात सुनकर | मुझपर रुष्ट हो गये हैं, यह विचारकर वे दीनभावसे
लोगोंने राजासे कहा कि आपने विनायकके साथ अभी- | पत्नीके साथ [घर] लौट आये ॥ १९-२० ॥
अभी भोजन किया है। हे नृपसत्तम ! आप तो वृद्ध हैं, | [वहाँसे लौटकर अपने घरके समीपमें आये हुए]
सत्पुरुष हैं, आप मिथ्या क्यों बोल रहे हैं? तब वे | शुक्लने जब अपनी घास-फूसकी कुटिया नहीं देखी तो
ज्ञानवान् नरेश स्वाभाविक अवस्थामें आकर कहने | वे अत्यधिक चिन्तित हो उठे। उसी समय मानो
लगे- ॥ ११-१२ ॥ | [किसीके द्वारा] बलपूर्वक प्रेरित किये गये सेवक-
राजा बोले- [हे देव!] आपकी यह सर्वोत्कर्षमयी | सेविकाओंने शुक्ल और उनकी पत्नीको सुगन्धित तैलका
माया जानी नहीं जा सकती, यह तो योगियोंको भी | मर्दन करके स्नान कराया तथा आभूषणों एवं स्वर्णिम
मोहित करनेवाली है। आप धन्य हैं, क्योंकि सभी रूपोंमें | वस्त्रोंसे सुसज्जित किया ॥ २१-२२ ॥
सर्वत्र आप ही पूजित होते हैं ॥ १३ ॥ | [अपने भवनमें] सब प्रकारके वैभवको देखकर
ब्रह्माजी बोले-तदुपरान्त रोमांचित शरीरवाले वे | वे दोनों अत्यधिक विस्मित थे। [वहाँकी] सुवर्णमयी
नरेश ध्यानस्थ हो गये और उस दशामें वे स्वयं ही | दीवारोंमें रत्न जड़े थे, स्थान-स्थानपर मोतियों-
विनायकके समान रूपवाले प्रतीत होने लगे ॥ १४ ॥ | मणियोंसे जटिल, भाँति-भाँतिके चित्र-विचित्र मंच, शय्या,
जिस प्रकार जल (-राशि)-में गिरा हुआ जल | आसन आदि तथा स्वर्णसे निर्मित पात्र विद्यमान थे।
(-बिन्दु) उस जल (-राशि)-की समताको प्राप्त | वहाँपर नाना प्रकारके वस्त्र, आच्छादन (बिस्तर, पर्दे
करता है, वैसे ही उन विनायकके ध्यानमें तन्मय होकर | आदि) तथा खानेयोग्य भाँति-भाँतिके भोज्य पदार्थ
राजाने उन्हींका स्वरूप पा लिया। तदुपरान्त वैनायकी | थे ॥ २३-२४१/२ ॥
मायाके प्रभावसे वे नृपश्रेष्ठ पुनः (विनायकरूपसे) भिन्न | यह सब देखकर वे आपसमें कहने लगे- [अरे!]
रूपवाले अर्थात् अपने स्वाभाविक रूपवाले हो गये ॥ १५ ॥ | यह छोटा-सा घर कैसे इन्द्रभवनके जैसा हो गया!
तदुपरान्त राजाने विनायकको पालकीमें बैठाया | तदुपरान्त शुक्लने पत्नीसे कहा- 'हे भाग्यशालिनि!
और भाँति-भाँतिके बाजे बजवाते, नानाविध नृत्य- | इस सबको तुम विनायककी ही कृपासे प्राप्त हुआ
गीतादिके साथ उनको अपने महलमें ले गये ॥ १६ ॥ | समझो। अल्पमात्र [पूजा-सत्कार]-से सन्तुष्ट होनेवाले
उस समय बालरूप विनायक देवताओंके बीचमें | वे महाविभु यद्यपि प्रकटरूपसे तो कुछ नहीं देते, परंतु
कामदेवके समान अत्यधिक शोभा पा रहे थे और उनके | परोक्षरूपसे अपने द्वारा प्रचुर मात्रामें दिये गये [धन-
पीछे-पीछे पत्नीके साथ शुक्ल धीरे-धीरे भक्तिपूर्वक जा | वैभवादि]-को भी वे थोड़ा ही मानते हैं। उन विभुको
रहे थे। [एकाएक] बालक विनायकने अपना मुँह | भक्तिपूर्वक समर्पित किया गया यत्किंचित् (उपहार) भी
घुमाकर जब शुक्लको देखा तो उन्हें बड़ी लज्जा आयी | उनको अत्यधिक जान पड़ता है ॥ २५-२८ ॥
कि अरे! बिना इसको सन्तुष्टिदायक कोई वर दिये मैं | इसलिये अपने कल्याणके लिये भयवश, कामनाविश,
कैसे चला आया ? ॥ १७-१८ ॥ | स्नेहके कारण अथवा शत्रुभावसे ही सही, उन
इस प्रकार मनमें विचारकर उन विभु विनायकदेवने | (विनायकदेव)-का स्मरण, वन्दन, स्तवन तथा पूजन