श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
न तो कहीं पुराण आदिकी कथा होती थी, न
३६६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
शास्त्राध्ययन ही हो पाता था ॥ ३३-३४ ॥
न तो कहीं पुराण आदिकी कथा होती थी, न
देवताओंका पूजन होता था, न कोई व्रत-नियम हो पाता
था और न तीर्थ आदिकी परिक्रमा ही हो पाती थी। उस
काशीमें दुष्टबुद्धि दुरासदके राज्य करते समय कर्मकाण्डके
विधि-विधानोंका लोप हो जानेपर धर्ममार्ग भी विलुप्त
हो गया। हे कीर्ते ! धर्माचरणके विनष्ट हो जानेपर सभी
देवता क्षुधासे पीड़ित हो गये ॥ ३६-३७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'दुरासदके उपाख्यानमें' उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३९ ॥
चालीसवाँ अध्याय
दुरासददैत्यके वधका निवेदन करनेके लिये देवताओं तथा ऋषियोंका केदारक्षेत्रमें
भगवान् शिव एवं पार्वतीके पास जाना, देवोंद्वारा भगवतीकी स्तुति, भगवतीके
मुखमण्डलसे गजाननका प्राकट्य, देवीका उनका 'वक्रतुण्ड' नाम रखना
गृत्समद बोले—तदनन्तर देवगुरु बृहस्पति, इन्द्र तथा
अग्नि आदि सभी देवता एवं ऋषिगण केदारक्षेत्रमें गये और
उन्होंने भगवान् शिवसहित सर्वज्ञ पद्मयोनि ब्रह्माजीको सम्पूर्ण
वृत्तान्त बताया ॥ १ १/२ ॥
देवता तथा ऋषि बोले—हम सभी देवता अपने-
अपने पदोंसे च्युत हो गये हैं तथा समस्त मुनिगण भी अपने
आचारसे वंचित हो गये हैं। दैत्य दुरासदके भयसे हम
सभी स्नानादि नित्य क्रियाओंको करनेमें भी असमर्थ हो
गये हैं। उस दुरासदको किसने ऐसा वर दे दिया है, जिससे
कि वह दुष्ट समस्त भुवनोंका स्वामी बन गया है, इसका
वध किस प्रकारसे हो, इसपर आप विचार करें। आप
दयालुओंद्वारा ऐसा उपाय किया जाना चाहिये, जिससे कि
सम्पूर्ण लोगोंको सुख प्राप्त हो सके ॥ २-४ ॥
गृत्समद बोले—उनका ऐसा वचन सुनकर चतुर्मुख
ब्रह्माजी बोले ॥ ४ १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले—हे देवताओ और ऋषियो ! उसके
वधका उपाय मैं बतलाऊँगा। जब उस दैत्य दुरासदने बहुत
दिनोंतक दारुण तप किया, तब पार्वतीपति भगवान् शंकरने
इसे बहुतसे वरोंको दिया ॥ ५-६ ॥
हे श्रेष्ठ देवो ! तीनों लोकोंमें ऐसा कोई देवता नहीं
है, जो इसका वध कर सके। कदाचित् वे देवाधिदेव, जो
सत्त्वादि तीनों गुणोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाले हैं, मैं
(ब्रह्मा), शिव और विष्णु—ये त्रिदेव जिनकी आज्ञासे
उत्पन्न हुए हैं, समस्त विश्वमें व्याप्त हैं, मायावी हैं,
जगत्की रचना करनेवाले तथा उसका संहार करनेवाले हैं,
गुणातीत हैं, तीनों गुणोंके स्वामी हैं, परसे भी परतर हैं,
और कल्याण करनेवाले हैं, वे प्रभु यदि भगवती पार्वतीके
उदरसे अवतार ग्रहण करें, तभी इस दुरासदका वध हो
सकता है, अन्य किसी भी उपायसे नहीं ॥ ७-१० ॥
अतः आप सभी जगत्की चिन्ता करनेवाले उन
प्रभुकी स्तुति करें। उससे पहले आप सभी शंकरप्रिया
उन भगवती पार्वतीको प्रसन्न करें ॥ ११ ॥
उनके तेजसे उत्पन्न बालक दैत्य दुरासदका वध
करनेमें समर्थ हो सकेगा। इस प्रकारका वरदान ही उन
भगवान् शंकरने दुरासदको दिया है ॥ १२ ॥
गृत्समद बोले—ब्रह्माजीके मुखसे इस प्रकारकी
बात सुनकर वे देवता अत्यन्त हर्षित हो गये। तदनन्तर
वे भक्तवत्सल शिवप्रिया उन भवानी देवी पार्वतीकी इस
प्रकार स्तुति करने लगे ॥ १३ ॥
देवता तथा ऋषिगण बोले—हे देवी ! आप
जगत्की एकमात्र कारणरूपा हैं, परसे भी पर हैं,
विश्वकी विचित्र शक्ति हैं, अचिन्त्य स्वरूपवाली हैं,
सम्पूर्ण देवताओंके द्वारा सब प्रकारसे वन्दनीय हैं,
त्रिगुणमयी और तीनों गुणोंकी स्वामिनी हैं। आपको हम
नमस्कार करते हैं ॥ १४ ॥
आप सम्पूर्ण पृथ्वीको धारण करनेवाली हैं, पृथ्वीरूपा
हैं, सम्पूर्ण चराचर जगत्की आधाररूपा हैं, तीनों
लोकोंकी साररूपा हैं, सत्त्वादि तीनों गुणोंकी आदि
कारणरूपा हैं, वेदत्रयीरूपी विग्रहवाली हैं तथा देवरूपा
हैं, आपको हम नमस्कार करते हैं ॥ १५ ॥
Kalyana Visheshank 2021_Section_13_2_Back
क्री०ख०-अ०४० ] * दुरासददैत्यके वधके लिये ऋषियों और देवताओंका केदारक्षेत्रमें जाना * ३६७
卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
३६८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
पार्वती, जो बार-बार निःश्वास ले रही थीं, उनके मुख, | स्वयंप्रकाश, जगन्मय, अव्यक्त, जगत्के आधार,
नासापुटों तथा नेत्रोंसे एक उत्तम तेज प्रकट हुआ ॥ ३१ ॥ | परब्रह्मस्वरूप और समस्त पदार्थोंके द्रष्टा हैं ॥ ३७-३८ ॥
अग्निकी ज्वालाओंसे समन्वित वह तेज मानो | आप पुराणपुरुषोत्तम, ज्ञानकी मूर्ति और वाणी
ब्रह्माण्डको जला डालनेके लिये उद्यत था। उसे देखकर | आदिसे अगोचर हैं। ऐसे आप विनायकका दर्शनकर हम
सभी देवताओंकी दृष्टि चकाचौंध हो उठी, तदनन्तर उन्होंने | धन्य हो गये, कृतार्थ हो गये, ऐसा कहते हुए वे देवता
अपने ज्ञानचक्षुओंसे उस तेजके मध्यमें भगवान् विनायककी | [आनन्दित हो] नृत्य करने लगे ॥ ३९ ॥
विशाल मूर्तिको देखा, जो दस हाथोंवाली थी, अन्धकारको | मुनि बोले—जिस प्रकारसे देवताओंने उस तेजस्वरूप
दूर करनेवाली थी, रत्नोंके मुकुटको धारण की हुई और | विनायक (की महिमा)-का वर्णन किया, उसी प्रकारसे
करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिवाली थी ॥ ३२-३३ ॥ | जगन्माता पार्वतीने भी उन गजाननकी महिमा वर्णित
गणेशजीकी वह मूर्ति विद्युत्के समान प्रभासे | की ॥ ४० ॥
सम्पन्न थी, उत्तम रत्नोंके कुण्डल धारण किये हुई थी | देवी बोलीं—जिन निर्गुण, निराकार, अव्यक्त,
और सुन्दर दाँतोंवाली थी। उसने दिव्य परिधान धारण | सर्वत्र गमन करनेवाले, ध्यानसे जाननेयोग्य, चिदाभास,
कर रखा था, सिन्दूरका विलेपन किया हुआ था और | सर्वत्र व्याप्त, पर, जगत्के कारणभूत एवं सच्चिदानन्द-
दस भुजाओंमें दस आयुध धारण कर रखे थे ॥ ३४ ॥ | विग्रहस्वरूप परमात्माके विषयमें आजतक मैंने जो भी
उस मूर्तिके मस्तकपर कस्तूरीका तिलक सुशोभित | चिन्तन किया, वह सब आज मैंने इस साकार विनायकरूपमें
हो रहा था। उसने वक्षःस्थलपर मोतियोंकी माला | स्पष्टरूपसे देखा है। वे ही परमात्मा अनेक दैत्योंका वध
धारण कर रखी थी। प्रलयकालीन अग्निके समान उसका | करनेके लिये, सम्पूर्ण जगत्का उपकार करनेके लिये
तेज सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हो रहा था। उस विनायकमूर्तिने | और अखिल चराचर विश्वकी रक्षा करनेके लिये मेरे
नागका यज्ञोपवीत धारण कर रखा था। उसे सर्वेश्वर | घरमें अवतीर्ण हुए हैं ॥ ४१-४३ ॥
जानकर तब उन देवताओंने उन्हें प्रणाम किया और वे | मुनि बोले—तदनन्तर देवी पार्वतीने भक्तिभावपूर्वक
उन आनन्दघन परमेश्वर विनायककी प्रार्थना करने | उनकी पूजा की और उन्हें अपना वाहन सिंह प्रदान
लगे ॥ ३५-३६ ॥ | किया। माता पार्वतीने उनका 'वक्रतुण्ड' यह नाम रखा,
देवता बोले—[हे प्रभो!] योग-साधनाद्वारा प्राप्त | जो मनुष्योंको सब प्रकारके अर्थोंको प्रदान करनेवाला
होनेवाले आपका हमने दर्शन प्राप्त किया है। आप | है। उन्होंने उनसे दैत्य दुरासदके वधके लिये, देवताओंको
अतर्क्य, अव्यय, स्वराट्, निरामय, निराभास, निर्विकल्प, | शत्रुओंसे रहित बनाकर उन्हें अपने-अपने पदकी प्राप्तिके
अजर और अमर हैं। आप सर्वस्वरूप, सबके ईश्वर, | लिये प्रार्थना की ॥ ४४-४५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विनायकके आविर्भावका वर्णन' नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४० ॥
इकतालीसवाँ अध्याय
विनायकदेव और दैत्य दुरासदका युद्ध, भयभीत
दैत्य दुरासदका युद्धक्षेत्रसे वापस लौटना
ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार देवी पार्वती तथा | प्राणियोंका श्रेष्ठ रीतिसे पालन करनेके लिये, दैत्य दुरासदका
देवताओंके द्वारा भगवान् विनायककी स्तुति-प्रशंसा की | वध करनेके लिये, पृथ्वीके भारका हरण करनेके लिये
जानेके अनन्तर गणेशजी बड़े ही प्रेमपूर्वक देवी पार्वतीको | तथा हे मातः ! हे सर्वज्ञे ! आपकी सेवा करनेके लिये और
प्रणाम करके प्रसन्न होकर उनसे बोले ॥ १ ॥ | वैदिक धर्म-कर्मकी स्थापना करनेके लिये अवतीर्ण हुआ
गणेशजी बोले—मैं देवताओं तथा सभी लोकोंके | हूँ, मैं जो कहता हूँ, वही करूँगा भी ॥ २-३ ॥
क्री०ख०-अ०४१ ] * विनायकदेव और दैत्य दुरासदका युद्ध * ३६९
ब्रह्माजी बोले—विघ्नेश्वर विनायकके द्वारा ऐसा
कहे जानेपर सभी देवता पुनः प्रणाम करके और स्तुति
करके उन जगत्के कारणके भी परम कारणस्वरूप
गणेशजीसे कहने लगे—जो व्यक्ति भूमिके रजकणोंकी
गिनती कर सके, आकाशस्थित नक्षत्रों एवं तारागणोंकी
गणना कर सके और जो सागरके जलको माप सके,
वही आपके गुणोंको जान सकता है॥४-५॥
हे विभो ! आज देवताओंके नेत्रोंका होना धन्य हो
गया, जो कि उनके द्वारा आपके युगलचरणोंका दर्शन
हुआ है। आज हमारा दुःख समाप्त हो गया और हमने
अपना-अपना पद भी प्राप्त कर लिया॥ ६॥
हे अखिलेश्वर ! इस दुरासदका वध करें और
पृथ्वीके भारका हरण करें। देवताओंका इस प्रकारका
वचन सुनकर वे विनायक हँसने लगे ॥७॥
अपने दस हाथोंमें दस आयुध धारण करनेवाले प्रभु
विनायक कहने लगे—'सब कुछ करूँगा।' हर्षित होकर
गद्गद वाणीमें इस प्रकार देवताओंसे कहकर भगवान्
गणेश सिंहपर आरूढ़ होकर शीघ्र ही वाराणसीपुरीकी
ओर चल पड़े। भगवान् शिव, पार्वती तथा सभी देवता
भी उनके पीछे-पीछे गये ॥ ८-९ ॥
देवसेनासहित विनायकको वहाँ आया हुआ जानकर
वीर दुरासद दैत्य नगरसे बाहर चला आया ॥ १० ॥
उस दैत्य दुरासदकी मन्त्रियोंसहित, नाना प्रकारके
आयुधोंसे सुसज्जित, बादलोंके समान बार-बार गर्जन
करती हुई विशाल सुदृढ़ सेनाको देखकर विनायकने
सभी कन्दराओंको विदीर्ण करनेवाला उच्च स्वरयुक्त
गर्जन किया और वे उस महादैत्यसे बोले-अरे दैत्य !
अब भी तुम क्यों भ्रममें पड़े हो ? ॥ ११-१२॥
तुमने बलपूर्वक देवताओं तथा राजाओंपर विजय
प्राप्त की है, सभी मुनियोंको अपमानित किया है, अरे
दुष्ट ! उस समय मैं नहीं था ॥ १३ ॥
पूर्वमें तुमने निर्भय होकर बहुतसे दोष-पापोंका
संचय किया हुआ है, अब उन सभीका फल इस समय
तुम मुझ गणेशसे प्राप्त करो। तुमने तीनों लोकोंमें
रहनेवाले समस्त प्राणियोंको बहुत कष्ट पहुँचाया है, मैं
उन्हींको सुख पहुँचानेके लिये तथा तुम्हारे भारसे पीड़ित
पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये प्रकट हुआ हूँ॥ १४-१५ ॥
अरे दुष्ट ! तुम मान-सम्मान तथा दुस्त्याज्य लज्जाको
छोड़कर मेरी शरणमें आ जाओ, यदि तुम युद्धस्थलमें
जाना चाहो, तो इस समय मृत्युको प्राप्त होओगे ॥ १६ ॥
भगवान् शिवसे प्राप्त वरदानके प्रभावसे तुमने
सम्पूर्ण त्रिलोकीको पीड़ित किया है। उस दुष्ट बुद्धिवाले
दैत्य दुरासदसे इस प्रकार कहकर युद्धोद्यत भगवान्
गणेशने अत्यन्त क्षुब्ध होकर प्रलयाग्निके समान दीप्तिमान्
और अग्निकी ज्वालामालाओंसे सुशोभित अपने परशु
नामक अस्त्रको उठाया। उस परशुकी प्रभासे भगवान्
सूर्य भी आच्छादित हो गये ॥ १७-१८ ॥
तदनन्तर उन्होंने यमराजके समान होकर बड़े ही
वेगसे उस परशुसे उसके वक्षःस्थलपर प्रहार किया। उस
परशुसे आहत होनेपर भी उसका एक रोमतक नहीं
हिला। क्रोधसे आँखें लाल करता हुआ तथा तीनों
लोकोंको मानो ग्रस लेता हुआ वह दैत्य दुरासद उन
गणेशसे कहने लगा। न तो देवता, न देवराज इन्द्र और
न दिक्पाल ही मेरे समक्ष युद्धके लिये आये, फिर तुम
बालभावसे किस प्रकार मेरे सम्मुख आये हो ? तुम मेरे
सामनेसे हट जाओ ॥ १९-२१ ॥
अरे मूर्ख ! मैं यमराजसे भी नहीं डरता हूँ, फिर तुम
क्यों मरनेकी इच्छा करते हो? ऐसा कहकर उस
दुरासदने म्यानसे छूरेके समान तीक्ष्ण धारवाली तथा
अत्यन्त दीप्तिमान् तलवार निकाली, जिसके आघातसे
पर्वत भी चूर-चूर हो जाते थे, उस तलवारसे दुरासदने
गणेशजीपर आघात किया, किंतु उन्होंने अपने अंकुशसे
उसे रोक दिया ॥ २२-२३ ॥
वह तलवार परशुकी चोटसे सौ भागोंमें टूटकर
नीचे गिर पड़ी। तलवारके टूट जानेपर महाबली दैत्य
दुरासद मल्लयुद्धके लिये आया। तब देव विनायक भी
आयुधोंसे युद्ध करना छोड़कर उसीके समान वेगसे
उसके समक्ष आये। तब उन दोनोंमें रोमांचकारी भीषण
युद्ध हुआ ॥ २४-२५ ॥
बाहुओंसे, कोहनियोंसे तथा मुष्टियोंसे वे एक-
दूसरेपर आघात करने लगे, साथ ही पैरोंसे, जानुओंसे,
जंघाओंसे तथा पीठसे एक-दूसरेको चोट पहुँचाने लगे।
३७० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
वे दोनों बार-बार महान् गर्जना करते हुए उछल-
उछलकर बारी-बारीसे एक-दूसरेके शरीरपर गिर रहे थे
और एड़ियोंके प्रहारसे तथा कोहनियोंके आघातसे एक-
दूसरेपर वार कर रहे थे॥ २६-२७॥
वे दोनों अपनी जाँघों, घुटनों तथा कन्धोंसे परस्पर
आघात कर रहे थे। युद्ध करते हुए वे धरतीपर लुढ़क
रहे थे और बहुत अधिक धूलिधूसरित हो गये थे॥ २८॥
जब वे दोनों दूसरेपर विजय प्राप्त कर लेते थे तो
'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा'- इस प्रकारसे चिल्ला
उठते थे। इस प्रकार बहुत दिनोंतक होनेवाले उनके
युद्धको देखकर देवता अत्यन्त विस्मित हो उठे॥ २९॥
वे इस दैत्य दुरासदके सामर्थ्यको देखकर मनमें
बहुत लज्जित हो रहे थे। तदनन्तर देव विनायकने उसके
ललाटपर अपनी मुट्ठीसे प्रबल आघात किया॥ ३०॥
इस प्रहारसे वह भूमिपर गिर पड़ा और उसका मुख
फूट गया। दो मुहूर्ततक वह उसी प्रकार अचल होकर
भूमिपर गिरा रहा, जैसे कि वज्रके प्रहारसे पर्वत गिरकर
अचल पड़ा रहता है। दीर्घकालीन मूर्च्छाको छोड़कर
किसी प्रकार वह उठ तो खड़ा हुआ, किंतु अपनेको वह
असमर्थ मानने लगा। वह बहुत व्याकुल हो चुका
था॥ ३१-३२॥
तदनन्तर सायंकाल होनेपर वह दैत्य दुरासद अपनी
सेनाके बीच चला आया और वे विनायक भी युद्धभूमिसे
हर्षपूर्वक अपने स्थानको लौट गये। जो व्यक्ति युद्धकाल
उपस्थित होनेपर विनायकदेव और दुरासदके बीच हुए
युद्धके इस वृत्तान्तका श्रवण करता है, वह निश्चित ही
विजय प्राप्त कर लेता है, जिस प्रकार कि विनायकने
विजय प्राप्त की॥ ३३-३४॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'द्वन्द्वयुद्धका वर्णन'
नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४१॥
बयालीसवाँ अध्याय
दैत्य दुरासदद्वारा पुनः विनायकसे युद्ध, विनायकद्वारा अपने तेजसे छप्पन विनायकोंको प्रकट
करना, विनायकोंद्वारा सम्पूर्ण सेनाके मारे जानेपर दुरासदद्वारा भगवान् शंकरसे प्राप्त
वरदानका स्मरण करना, विनायकद्वारा योगबलसे विराट् रूप धारणकर एक
पैर काशीमें तथा दूसरा पैर दुरासदके सिरपर रखकर उसे काशीके द्वारके
रूपमें काशीमें प्रतिष्ठित करना और स्वयं भी 'एकपाद
विनायक'के नामसे काशीमें स्थित होना
गृत्समद बोले- उन वक्रतुण्ड भगवान् गजाननके
पराक्रमको जानकर धैर्य धारणकर वह दैत्यराज दुरासद
अस्त्रोंको लेकर पुनः युद्धके लिये आया॥ १॥
भगवान् शिवका स्मरण करके तथा बड़े ही
आदरपूर्वक अग्निदेवके मन्त्रका उच्चारणकर और उस
मन्त्रसे बाणको अभिमन्त्रित करके उसने विनायकपर वह
आग्नेयास्त्र छोड़ा॥ २॥
प्रज्वलित अग्निकी उस ज्वालासे भयभीत होकर
सभी देवता देव विनायकके पीछे छिप गये। तब सर्वज्ञ
विनायकने पर्जन्यास्त्रको छोड़ा॥ ३॥
उस पर्जन्यास्त्रके द्वारा क्षणभरमें हाथीकी सूँड़के
समान मोटी जलकी धारा प्रवाहित हो गयी। फलतः वह
अग्नि क्षणभरमें शान्त हो गयी। यह देखकर वह दैत्य
दुरासद अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा॥ ४॥
तब उसने जलवृष्टिको रोकनेके लिये अत्यन्त
वेगशाली मारुतास्त्रको छोड़ा। उस वेगयुक्त वायुके
कारण पृथ्वी कम्पायमान हो उठी। वृक्ष तथा पर्वत
भूमिपर गिरने लगे॥ ५॥
उस मारुतास्त्रके प्रभावसे महामेघ भी आधे क्षणमें
विनष्ट हो गये। तब विनायकदेवने अपने मनोबलसे
क्री०ख०-अ०४२ ] * दैत्य दुरासदद्वारा पुनः विनायकसे युद्ध * ३७१
[बायाँ स्तम्भ]
पर्वतास्त्रको प्रकट किया। सर्वत्र पर्वत-ही-पर्वत हो गये,
जिससे उस मारुतास्त्रकी गति कुण्ठित हो गयी। मारुतास्त्रके
विलीन हो जानेपर उस दुरासदने रौद्रास्त्रको उत्पन्न
किया॥ ६-७॥
उस रौद्रास्त्रके छोड़े जानेपर वक्रतुण्ड गणेशजीने
भी उसको निवारित करनेके लिये ब्रह्मास्त्रको प्रकट
किया। उससे दुरासदकी सेना भस्म हो गयी ॥ ८॥
वे दोनों अस्त्र-रौद्रास्त्र और ब्रह्मास्त्र बहुत दिनोंतक
परस्पर युद्ध करते रहे। उनके परस्पर संघातसे उत्पन्न
अग्नि पृथ्वीपर गिरने लगी ॥ ९ ॥
[हे शुभे!] उस अग्निसे लोगोंको जलता
हुआ जानकर ब्रह्मा तथा शिवजीने उन दोनों अस्त्रोंको
रोका। तब वह दैत्य विनायकको अपनेसे अधिक उत्कृष्ट
पराक्रमी जानकर अपने अमात्योंसे बोला- ॥ १० ॥
आप सभी लोग उस विनायकसे युद्ध करें, मैं
भोजन करके पुनः युद्ध करूँगा। तब सभी सैनिकोंसहित
अमात्यगण उन विनायकसे युद्ध करने लगे ॥ ११ ॥
उस समय विनायक अकेले होनेके कारण चिन्तित
हो गये। तब उन्होंने अपने तेजसे छप्पन विनायकमूर्तियोंको
प्रकट किया। वे सभी विनायक विविध प्रकारके
अलंकारोंसे समन्वित थे, विविध प्रकारकी मालाओंसे
सुशोभित थे। उन सभी ने दिव्य बाजूबन्द धारण कर रखे
थे और सभी चन्द्रमाको अपने मस्तकपर आभूषणके
रूपमें धारण किये हुए थे ॥ १२-१३॥
उनमें कोई चार भुजावाले थे, कोई छः भुजावाले
और कोई दस भुजावाले थे। कोई सिंहके ऊपर
विराजमान थे, कोई मयूरके ऊपर आरूढ़ थे, तो कोई
मूषकपर सवार थे। वे सभी शत्रुओंके सैनिकोंको विदारित
करते हुए युद्ध करने लगे। उन्होंने कुछ दैत्योंके पाँव तोड़
डाले, तो किसीके मस्तकोंको फोड़ डाला ॥ १४-१५॥
कुछके बाहुओंको छिन्न-भिन्न कर डाला और
किसीके जानु, जंघा तथा उदरदेशको तोड़-मरोड़ दिया।
वे हुंकार करते हुए गरज रहे थे। कुछ दैत्य उनकी
शरणमें आ गये ॥ १६॥
कुछ दैत्य अपने प्राणोंकी रक्षा करनेके लिये वहाँसे
[दायाँ स्तम्भ]
भागने लगे। कुछ दैत्य प्रहार करते हुए युद्धके आमने-
सामने मृत्युको प्राप्त हो गये ॥ १७ ॥
युद्धमें वीरगतिको प्राप्त हुए वे स्वर्गलोकमें गये
और वहाँ विविध भोगों तथा अप्सराओंके साथ आनन्द
मनाने लगे। अनेकों घोड़े, रथ, हाथी, खच्चर तथा ऊँट
विविध प्रकारके शस्त्रोंके द्वारा आहत होनेपर शरीरके
कट जानेसे भूमिपर गिर पड़े और उनके प्राण निकल
गये। वहाँ रक्तकी नदियाँ प्रवाहित हो चलीं। जो
केशरूपी सेवारसे सुशोभित हो रही थीं ॥ १८-१९ ॥
छुरी और खड्ग उन रक्तरूपा नदियोंके मत्स्य थे,
हाथी मगरमच्छ थे तथा ढालें ही कच्छपरूप थीं। दैत्य
सैनिकोंके धड़ ही कमलरूप थे, सैनिकोंकी चर्बी ही
नदीका फेन और मेद ही कीचड़रूप था ॥ २० ॥
धनुष [उन रक्तसरिताओंके] सर्प थे, हड्डियाँ
बगुले थे, कवच एवं युद्धपरिधान बड़े-बड़े मेढक थे
और भाले ही [पानीके साथ बहनेवाले] काष्ठखण्ड थे।
[इन सभी विशेषताओंसे युक्त] तथा मनस्वीजनोंको
हर्षित करनेवाली वे [रक्तसरिताएँ] शोभायमान हो रही
थीं। भोजन कर लेनेके अनन्तर वहाँ आकर उसने जब
रणांगणको देखा तो सारी सेनाके मारे जानेसे वह दैत्य
दुरासद अत्यन्त दुखित हो उठा ॥ २१-२२ ॥
उस समय वह शूलपाणि भगवान् शंकरद्वारा
वरदानके समय दिये गये उस वचनको याद करने लगा,
जिसमें कहा गया था कि शक्तिसे उत्पन्न कोई देवता ही
तुमपर विजय प्राप्त करेगा। क्या यही बालक शक्तिसे
उत्पन्न तो नहीं है? क्योंकि इसमें तीनों लोकोंका सारभूत
बल दिखायी देता है ॥ २३-२४ ॥
काल भी इसपर विजय प्राप्त करनेमें समर्थ नहीं
है, फिर अन्य दूसरेकी क्या बात है! ऐसा मनमें
विचारकर वह अकेला पड़ जानेके कारण भाग उठा ॥ २५ ॥
वक्रतुण्ड गणेशजीने उस समय विचार किया कि
भागते हुए शत्रुको मारना नहीं चाहिये। [वैसे तो]
देवताओंके द्वारा भी यह मारे जा सकनेयोग्य नहीं है,
जैसा कि शंकरजीने कहा है- ॥ २६ ॥
अतः अब मैं अपने योगबलसे उत्तम विराट् रूप
३७२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
धारण करूँगा। तब विराट् स्वरूपधारी उन विनायकने | प्रकार दैत्य दुरासदपर विजय प्राप्त करके देव विनायकने
अपने एक हाथसे उस दुरासदको पकड़ लिया ॥ २७ ॥ | समस्त जगत्को आनन्दित कर दिया ॥ ३२ ॥
वे एक पैरसे काशीमें स्थित हुए ताकि बलपूर्वक | उन वक्रतुण्ड विनायकपर पुष्पोंकी वर्षा करके उन्हें
उस नगरीकी रक्षा कर सकें और दूसरा पैर उन्होंने उस | प्रणाम करके और उनका भलीभाँति पूजन करके सभी
दैत्यके सिरपर रखा। विनायक उस दैत्यसे बोले—अरे | देवता अपने-अपने स्थानोंको गये और मुनिगण भी
दैत्य! भगवान् शिवके वरदानके प्रभावसे तुम्हारी मृत्यु | अपने-अपने आश्रमोंकी ओर चले गये ॥ ३३ ॥
नहीं हो रही है, अतः तुम इस काशीनगरीमें पर्वतके | अन्य जो-जो भी मनुष्य उन विनायककी पूजा करते
समान निश्चल होकर रहो ॥ २८-२९ ॥ | हैं, उनकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। इस प्रकार
तुम इस नगरीके द्वारके समान बनकर स्थित रहो, | काशीमें विनायकदेव छप्पन मूर्तियोंसे युक्त विख्यात हुए।
ताकि यहाँ आनेवालोंकी दृष्टि सबसे पहले तुमपर ही पड़े। | वे विनायक अपने विराट् रूपको अन्तर्धान करके तुण्डन
तुम यहाँ दुष्टजनोंको निरन्तर पीड़ा पहुँचाते रहो। तुम्हें | नामक पुरमें भी 'एकपाद विनायक' नामसे स्थित हुए और
मेरी नित्य सन्निधि प्राप्त होगी। उस दैत्य दुरासदने भी | वहाँ वे सभीकी कामनाएँ पूर्ण करते हैं ॥ ३४-३५ ॥
परम भक्तिभावपूर्वक उसी वरकी याचना की ॥ ३०१/२ ॥ | जो भक्तिमान् पुरुष इस श्रेष्ठ आख्यानका श्रवण
दैत्य दुरासद बोला— [हे विनायक !] आप इसी | करता है, वह अपनी सभी मनोकामनाओंको प्राप्त कर
प्रकारसे मेरे मस्तकपर पैर रखकर सदा स्थित रहें ॥ ३१ ॥ | लेता है और अन्तमें गणेशजीके धामको प्राप्त होता है।
मुनि बोले—उस दैत्यसे 'ऐसा ही होगा' इस | वह सर्वत्र विजय प्राप्त करता है और पुष्टि तथा आरोग्य
प्रकार कहकर विनायक काशीमें स्थित हो गये। इस | प्राप्त करता है ॥ ३६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'दुरासदपर विजयका वर्णन' नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४२ ॥
तैंतालीसवाँ अध्याय
देवताओं तथा मुनियोंद्वारा ढुण्ढिराज गणेश तथा छप्पन विनायकोंकी स्तुति तथा पूजाका वर्णन
गृत्समद बोले—गणेशजीद्वारा उस दैत्य दुरासदपर | भी आप ही हैं ॥ ४ ॥
विजय प्राप्त कर लेनेके अनन्तर आठों दिक्पाल, | आप नाना प्रकारके अर्थोंकी गवेषणा करते हैं और
मुनिगण, चन्द्रमा, सूर्य, देवगुरु बृहस्पति तथा शुक्राचार्य— | प्राणियोंको उन-उन कर्मोंमें नियुक्त करते हैं। मनीषियोंके
ये सभी दुरासदके शत्रु प्रभु देवाधिदेव विनायककी | द्वारा ढुण्ढि (ढुन्ध्) धातुका प्रयोग गवेषण अर्थमें किया
महिमाका इस प्रकार गान करने लगे— [हे प्रभो!] | गया है। इसलिये आपकी 'ढुण्ढि' यह संज्ञा है और
आपने दैत्य दुरासदका दमन करके श्रुति-स्मृतिविहित | ढुण्ढिके अनन्तर 'राज' पदके प्रयोगसे आपको 'ढुण्ढिराज'
मार्गकी स्थापना की है। दुरासदको पराजित करनेमें सब | कहा जाता है ॥ ५१/२ ॥
प्रकारसे अशक्त हम देवताओंको अपने अपने-अपने | आपका दर्शन, पूजा, ध्यान तथा स्मरण धर्म-अर्थ-
पदपर प्रतिष्ठित किया है। आप ही इस विश्वकी सर्जना | काम तथा मोक्ष इस चतुर्विध पुरुषार्थका साधन है और
करते हैं और आप ही कर्मफलोंको प्रदान करनेवाले | पुत्र-पौत्रको प्रदान करनेवाला है ॥ ६१/२ ॥
हैं ॥ १–३॥ | ऐसा कहकर उन सभी देवता आदिने मन्दार पुष्पों,
आप समस्त प्राणियोंमें समान दृष्टि रखते हैं। आप | शमीपत्रों, हरित वर्णके दूर्वांकुरों तथा श्वेत पुष्पों और
कर्मोंमें लिप्त नहीं होते। ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि चारों वर्ण | नाना प्रकारके पक्वान्नोंके नैवेद्यों और बहुत प्रकारके
आपके ही आश्रयमें रहते हैं और सभी प्राणियोंके आधार | फलोंके द्वारा उन ढुण्ढिराजका पूजन किया ॥ ७-८ ॥
क्री०ख०-अ०४४ ] * मुनि गृत्समदद्वारा रानी कीर्तिसे विनायकदेवकी महिमाका कथन * ३७३
卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
साथ ही रत्नोंकी महान् राशि अर्पित करके तथा ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन विनायकको सन्तुष्ट किया। इसी प्रकार उन्होंने [अविमुक्तेश्वर श्रीकाशी विश्वनाथजीके बाहर] सातों आवरणोंमें स्थित सभी छप्पन विनायकोंका भी पूजन किया ॥ ९॥
तबसे वे सभी छप्पन विनायक वाराणसी नगरीकी रक्षा करनेके लिये वहीं स्थित हो गये। उनसे अतिरिक्त पाँच मुखवाले एक पंचमुखी विनायक भगवान् विश्वनाथके द्वारपर स्थित हो गये ॥ १० ॥
अन्य सभी छप्पन विनायक भिन्न-भिन्न नामोंसे वाराणसीमें व्याप्त होकर (सातों आवरणोंमें) स्थित हो गये। भगवान् विश्वेश्वरके वाराणसीमें स्थित हो जानेपर वे सभी भी वहीं स्थित हो गये ॥ ११॥
तबसे सूर्य तथा चन्द्रमाके स्थित रहनेतक ब्रह्मा आदि सभी देवता तथा सभी मुनिजन अपने-अपने अधिकारोंमें स्थित हो गये। सभी लोग उसी प्रकार सभी धर्म-कर्मोंको करने लगे, जैसा कि वे पूर्वमें करते थे ॥ १२ ॥
हे कीर्ते ! जिस प्रकार तुमने पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया है। ढुण्ढिराज गणेशके अवतारकी कथाका श्रवण धर्म [-अर्थ], काम तथा सुख (मोक्ष) प्रदान करनेवाला है। अब मैं तुम्हें काशीके राजा दिवोदासके राज्यसे बाहर चले जानेकी कथा बताऊँगा ॥ १३॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'ढुण्ढिराजाख्यान' नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४३ ॥
चौवालीसवाँ अध्याय
मुनि गृत्समदद्वारा रानी कीर्तिसे विनायकदेवकी महिमाका कथन, काशीमें राजा दिवोदासके राज्य-शासनका वर्णन
कीर्ति बोली— [हे मुने!] आपने दैत्य दुरासदके वधके लिये तथा तीनों लोकोंके पालनके लिये अवतरित हुए शक्तिपुत्र ढुण्ढिराजकी कथाका वर्णन किया। मैंने आपसे यह सुना कि वे विनायक एक पैरसे तुण्ड[न] नगरमें स्थित हुए और दूसरे पैरसे दैत्य दुरासदके मस्तकको आक्रान्तकर वाराणसीमें स्थित हुए; तो दो पैरोंसे एक बारमें दो अलग-अलग स्थानोंपर रहना कैसे सम्भव है? हे ब्रह्मन् ! आप सब कुछ जाननेवाले हैं, अतः मेरे इस संशयका निवारण करें ॥ १–३॥
मुनि गृत्समद बोले— [हे कीर्ते!] विश्वरूप, विश्वके कर्ता, समस्त विश्वकी रक्षा करनेवाले तथा समस्त विश्वमें व्याप्त रहनेवाले विश्वेश्वर ढुण्ढिराज गणेशके शासनमें क्या असम्भव है ! ॥ ४॥
जो जगत्के अन्तर्यामी हैं, पर हैं, विश्वका संहार करनेवाले हैं, सातों पाताल ही जिनके चरण हैं, स्वर्गलोकतक जिनके केश व्याप्त हैं, जिनके हाथ-पैर सब ओर हैं, सभी ओर जिनके कान और नेत्र हैं, जो मनसे, वेदोंसे, ब्रह्मा आदि देवताओंसे तथा योगियोंके लिये भी यथार्थरूपसे अगम्य हैं। जो वायु, पृथिवी तथा जलस्वरूप हैं, जो हजारों सूर्योंके सदृश तेजोमय हैं, सूर्य, चन्द्रमा, आकाश आदि जिनका ही स्वरूप हैं, जो चराचर जगत्के गुरु हैं और स्वयं चराचरात्मा भी हैं। जिनके रोमकूपोंमें करोड़ों-करोड़ों ब्रह्माण्ड उसी प्रकार भ्रमण करते रहते हैं, जिस प्रकार कि हवाके द्वारा लाये गये पतंगे आकाशमें घूमते रहते हैं, अतः हे मात: ! ऐसे उन देव विनायकके विषयमें कोई भी संशय अथवा तर्क-वितर्क नहीं किया जा सकता ॥ ५–९॥
वे प्रभु विनायक अनेक स्वरूपवाले हैं और चराचर विश्वकी सृष्टि करनेमें समर्थ हैं। हे राज्ञि! उनकी इच्छासे अमृत भी विषरूप तथा विष भी अमृतरूप हो जाता है, अतः उनके लिये कुछ भी असम्भव नहीं है। उन भगवान् गजाननके अवतारकी विचित्र गति कही गयी है ॥ १०-११ ॥
उन विनायकके कितने अवतार हुए, कब हुए और कहाँ हुए, इसे जाननेमें शेषनागसहित समस्त देवता भी कभी भी समर्थ नहीं हुए ॥ १२ ॥
अतः सभी धर्मोंको जाननेवाली हे कीर्ते ! इस प्रकारके संदेहोंका परित्यागकर मेरे द्वारा कही जानेवाली
३७४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
कथाको सुनो, जिसे सुनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो | आज्ञाका पालन करनेवाली थी ॥ २०-२१ ॥
जाता है ॥ १३ ॥ | राजा दिवोदास आचार, व्यवहार अथवा प्रायश्चित्त-
प्राचीन कालकी बात है, सूर्यवंशमें दिवोदास | सम्बन्धी बातोंका निर्णय पण्डितजनोंसे करवाते थे, वे
नामके एक राजा हुए, जो बहुत बड़े दानी, स्वाभिमानसे | किसीको भी राजदण्ड नहीं देते थे। उस समय सभी
भरे हुए, सम्पूर्ण भूमण्डलमें मान-सम्मानको प्राप्त, | देवता शंकरजीके साथ मन्दराचल-पर्वतपर चले गये थे।
देवगुरु बृहस्पतिके समान वक्ता, सर्वज्ञ, सर्वदा सभीका | राजा दिवोदासके काशीमें शासन करनेपर न तो किसीकी
कल्याण करनेवाले, वेद-शास्त्रों तथा पुराणोंके ज्ञाता, | अपमृत्यु होती थी, न किसीको कोई शोक ही होता था
और विद्वज्जनोंके अत्यन्त प्रिय थे ॥ १४-१५ ॥ | और न किसी प्रकारका दुःख ही था ॥ २२-२३ ॥
वे अपनी सुन्दर आकृतिसे स्त्रियोंको मोहित करनेवाले | उनके द्वारा शासित राज्यमें तीनों प्रकारके उत्पात
होनेपर भी जितेन्द्रिय थे। वे निरन्तर उपकार-परायण, | (दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम) नहीं होते थे। वर्षा न
दूसरेसे द्रोह करनेसे दूर रहनेवाले, पराये धनकी तनिक | होनेके कारण पशु-पक्षी तथा मनुष्योंमें जो महान्
भी अभिलाषा न रखनेवाले, दूरदृष्टि रखनेवाले और | हाहाकार हो रहा था, वह अब शान्त हो गया था। वर्षा
अत्यन्त पराक्रमसम्पन्न थे ॥ १६ १/२ ॥ | हो जानेके कारण खेतोंमें बहुत प्रकारके सस्य (धान्यादि)
उन राजा दिवोदासकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर | उत्पन्न होने लगे। उन्हीं धान्यादिपर प्राणिमात्रका जीवन
लोकोंपर उपकार करनेवाले ब्रह्माजीने वृष्टि न होनेके | आधारित रहता है ॥ २४-२५ ॥
कारण अकालग्रस्त काशीपुरीका उत्तम राज्य उन्हें प्रदान | पूर्व समयमें जिस प्रकारसे स्वाहाकार, स्वधाकार
किया। सभी देवताओंको बहिष्कृत करनेपर ही उन | तथा वषट्कार (अर्थात् देवपूजन, यज्ञ-यागादि, श्राद्ध
बुद्धिमान् राजा दिवोदासने काशीका राज्य स्वीकार किया | तथा तर्पण आदि) होता था, वह सब फिरसे होने लगा।
था ॥ १७-१९॥ | जिन देवताओंने पूर्वमें उन राजाकी प्रार्थना की थी, वे
तदनन्तर राजा दिवोदास स्वयं ही सूर्य, इन्द्र, अग्नि, | सुखी हो गये। ब्रह्माजीके कथनानुसार सभी देवताओंने
वायु तथा चन्द्रमा बनकर धर्मपूर्वक उस काशीपुरीका | राजा दिवोदासकी स्तुति की, उन राजा दिवोदासने भी
परिपालन करने लगे। उनकी सुशीला नामकी पत्नी थी, | देवोंका दर्शन प्राप्तकर विविध प्रकारसे उनकी बहुत
जो पतिव्रता, धर्माचरणपरायण, दानशील तथा पतिकी | स्तुति की ॥ २६-२७॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'दिवोदासके उपाख्यानमें' चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४४ ॥
पैंतालीसवाँ अध्याय
शंकरजीका सभी देवताओंको लेकर मन्दरगिरिपर जाना, राजा दिवोदासका काशीमें राज्य
करना, भगवान् शिवका दिवोदासके विकार देखनेके लिये देवताओं तथा ऋषियोंको
काशी भेजना, किंतु दिवोदासको निर्विकार देखकर उन सभीका काशीमें स्थित
हो जाना, फलस्वरूप शिवका काशीदर्शनके लिये चिन्तित होना
कीर्ति बोली- हे मुने ! सभी देवता मन्दराचल | कृपा करें ॥ १ १/२ ॥
पर्वतपर क्यों चले गये और भगवान् शिवने उस रमणीय | मुनि गृत्समद बोले- एक बार जब बारह वर्षोंतक
पुरी वाराणसीका क्यों परित्याग किया ? हे महामुने ! हे | लगातार वृष्टि नहीं हुई, तो सम्पूर्ण चराचर जगत् विनष्ट
देवर्षे ! मुझे इस विषयमें संशय है, इसे आप दूर करनेकी | होने लगा, पृथ्वीपर स्वाहाकार-स्वधाकार तथा वषट्कार
क्री०ख०-अ०४५ ] * श्रीगणेशपुराणके कतिपय लीला-प्रसंग-तीन * ३७५
卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
श्रीगणेश-परिवार
श्रीशिव-परिवार