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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 370, कुल 656 में से

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पृष्ठ 370

३६८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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पार्वती, जो बार-बार निःश्वास ले रही थीं, उनके मुख, | स्वयंप्रकाश, जगन्मय, अव्यक्त, जगत्के आधार,
नासापुटों तथा नेत्रोंसे एक उत्तम तेज प्रकट हुआ ॥ ३१ ॥ | परब्रह्मस्वरूप और समस्त पदार्थोंके द्रष्टा हैं ॥ ३७-३८ ॥
अग्निकी ज्वालाओंसे समन्वित वह तेज मानो | आप पुराणपुरुषोत्तम, ज्ञानकी मूर्ति और वाणी
ब्रह्माण्डको जला डालनेके लिये उद्यत था। उसे देखकर | आदिसे अगोचर हैं। ऐसे आप विनायकका दर्शनकर हम
सभी देवताओंकी दृष्टि चकाचौंध हो उठी, तदनन्तर उन्होंने | धन्य हो गये, कृतार्थ हो गये, ऐसा कहते हुए वे देवता
अपने ज्ञानचक्षुओंसे उस तेजके मध्यमें भगवान् विनायककी | [आनन्दित हो] नृत्य करने लगे ॥ ३९ ॥
विशाल मूर्तिको देखा, जो दस हाथोंवाली थी, अन्धकारको | मुनि बोले—जिस प्रकारसे देवताओंने उस तेजस्वरूप
दूर करनेवाली थी, रत्नोंके मुकुटको धारण की हुई और | विनायक (की महिमा)-का वर्णन किया, उसी प्रकारसे
करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिवाली थी ॥ ३२-३३ ॥ | जगन्माता पार्वतीने भी उन गजाननकी महिमा वर्णित
गणेशजीकी वह मूर्ति विद्युत्के समान प्रभासे | की ॥ ४० ॥
सम्पन्न थी, उत्तम रत्नोंके कुण्डल धारण किये हुई थी | देवी बोलीं—जिन निर्गुण, निराकार, अव्यक्त,
और सुन्दर दाँतोंवाली थी। उसने दिव्य परिधान धारण | सर्वत्र गमन करनेवाले, ध्यानसे जाननेयोग्य, चिदाभास,
कर रखा था, सिन्दूरका विलेपन किया हुआ था और | सर्वत्र व्याप्त, पर, जगत्के कारणभूत एवं सच्चिदानन्द-
दस भुजाओंमें दस आयुध धारण कर रखे थे ॥ ३४ ॥ | विग्रहस्वरूप परमात्माके विषयमें आजतक मैंने जो भी
उस मूर्तिके मस्तकपर कस्तूरीका तिलक सुशोभित | चिन्तन किया, वह सब आज मैंने इस साकार विनायकरूपमें
हो रहा था। उसने वक्षःस्थलपर मोतियोंकी माला | स्पष्टरूपसे देखा है। वे ही परमात्मा अनेक दैत्योंका वध
धारण कर रखी थी। प्रलयकालीन अग्निके समान उसका | करनेके लिये, सम्पूर्ण जगत्का उपकार करनेके लिये
तेज सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हो रहा था। उस विनायकमूर्तिने | और अखिल चराचर विश्वकी रक्षा करनेके लिये मेरे
नागका यज्ञोपवीत धारण कर रखा था। उसे सर्वेश्वर | घरमें अवतीर्ण हुए हैं ॥ ४१-४३ ॥
जानकर तब उन देवताओंने उन्हें प्रणाम किया और वे | मुनि बोले—तदनन्तर देवी पार्वतीने भक्तिभावपूर्वक
उन आनन्दघन परमेश्वर विनायककी प्रार्थना करने | उनकी पूजा की और उन्हें अपना वाहन सिंह प्रदान
लगे ॥ ३५-३६ ॥ | किया। माता पार्वतीने उनका 'वक्रतुण्ड' यह नाम रखा,
देवता बोले—[हे प्रभो!] योग-साधनाद्वारा प्राप्त | जो मनुष्योंको सब प्रकारके अर्थोंको प्रदान करनेवाला
होनेवाले आपका हमने दर्शन प्राप्त किया है। आप | है। उन्होंने उनसे दैत्य दुरासदके वधके लिये, देवताओंको
अतर्क्य, अव्यय, स्वराट्, निरामय, निराभास, निर्विकल्प, | शत्रुओंसे रहित बनाकर उन्हें अपने-अपने पदकी प्राप्तिके
अजर और अमर हैं। आप सर्वस्वरूप, सबके ईश्वर, | लिये प्रार्थना की ॥ ४४-४५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विनायकके आविर्भावका वर्णन' नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४० ॥
इकतालीसवाँ अध्याय
विनायकदेव और दैत्य दुरासदका युद्ध, भयभीत
दैत्य दुरासदका युद्धक्षेत्रसे वापस लौटना
ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार देवी पार्वती तथा | प्राणियोंका श्रेष्ठ रीतिसे पालन करनेके लिये, दैत्य दुरासदका
देवताओंके द्वारा भगवान् विनायककी स्तुति-प्रशंसा की | वध करनेके लिये, पृथ्वीके भारका हरण करनेके लिये
जानेके अनन्तर गणेशजी बड़े ही प्रेमपूर्वक देवी पार्वतीको | तथा हे मातः ! हे सर्वज्ञे ! आपकी सेवा करनेके लिये और
प्रणाम करके प्रसन्न होकर उनसे बोले ॥ १ ॥ | वैदिक धर्म-कर्मकी स्थापना करनेके लिये अवतीर्ण हुआ
गणेशजी बोले—मैं देवताओं तथा सभी लोकोंके | हूँ, मैं जो कहता हूँ, वही करूँगा भी ॥ २-३ ॥