श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
नब्बेवाँ अध्याय
२६२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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नब्बेवाँ अध्याय
देवर्षि नारदजीका शेषनागको गणेशोपासनाकी दीक्षा देना, शेषनागद्वारा षडक्षर मन्त्रका
अनुष्ठान, प्रसन्न होकर गणेशजीका उन्हें दिव्यस्वरूपमें दर्शन देना, शेषनागद्वारा गणेश-स्तवन
और अनेक वरोंकी प्राप्ति, गणेशजीकी कृपासे शेषनागका सहस्र सिरवाला होना, शेषनागका
धरणीधर नामसे गणेश-प्रतिमाकी प्रतिष्ठा करना
नारदजी बोले-[हे नागराज!] तुम इस प्रकारसे
तेजरहित और अत्यन्त दुखी क्यों हुए हो? तुम्हारे सिर
कैसे फूटे हैं और तुमने किस मुनिका अत्यन्त अप्रिय
किया है? क्या तुमसे भगवान् शिव नाराज हैं? अथवा
तुमने गर्व क्यों किया था? हे शेष! इन सबका कारण
मुझे बताओ, तभी मैं उसको दूर करनेका उपाय
बतलाऊँगा ॥ १-२॥
तुम्हारे बिना कौन ऐसा है, जो चराचर जीवोंसे
समन्वित इस पृथ्वीको धारण कर सकता है। इतनेपर भी
जब वे शेषनाग कुछ नहीं बोले, तो मुनि नारदजीने स्वयं
ही उन नागराजको अपना पद पुनः प्राप्त करनेका शुभ
उपाय बताया ॥ ३१/२॥
नारदजी बोला- सम्पूर्ण कलाओंके निधान हे
शेषनाग ! मेरे कथनको ध्यानपूर्वक सुनो। मैं वह उपाय
बतला रहा हूँ, जिससे ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि
देवता भी तुम्हारे सेवकके समान हो जायँगे और तुम इस
सम्पूर्ण पृथ्वीको अपने ऊपर उसी प्रकार धारण कर
सकोगे, जैसे कि एक बालक पुष्पकी मालाको धारण
कर लेता है ॥ ४-५ ॥
शेषनाग बोले-मेरा कोई जन्मान्तरीय पुण्य था,
जिसके प्रभावसे अकस्मात् मुझे आपका दर्शन हुआ।
आगे भी ठीक ही होगा, इसमें कोई संशय नहीं ॥ ६ ॥
अन्यथा जो पुण्यकर्म नहीं करते हैं, उन्हें आपका
दर्शन कैसे हो सकता है? इस समय मेरा शरीर अत्यन्त
विह्वल हो गया है, अतः मैं पृथ्वीको धारण करनेमें
असमर्थ हूँ। हे मुने! आप वह उपाय बताइये, जिससे
कि मैं पूर्वके समान हो जाऊँ ॥ ७१/२ ॥
नारदजी बोले-हे नागराज! मैं तुमको उन
भगवान् गणेशजीके महामन्त्रको बताता हूँ, जिनके
कृपाप्रसादसे इन्द्र आदि देवताओैंने अपने-अपने पद प्राप्त
किये थे और ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव जिनकी आज्ञासे
सृष्टि, स्थिति तथा संहारका कार्य करते हैं ॥ ८-९ ॥
उन सर्वेश्वर भगवान् गणेशजीके प्रसन्न होनेपर तुम
अपनी पूर्वावस्थाको प्राप्त कर लोगे। तुम्हारी दीन दशा
देखकर मेरा मन अत्यन्त दयार्द्र हो उठा है ॥ १० ॥
इसी कारण मैं तुम्हें गणेशजीका षडक्षर मन्त्र
प्रदान करता हूँ। इसका अनुष्ठानमात्र करनेसे भगवान्
गजानन तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हो जायँगे और तुम उन सभी
कामनाओंको प्राप्त कर लोगे, जिन-जिनकी तुम उनसे
याचना करोगे ॥ १११/२ ॥
ब्रह्माजी बोले-शेषनागको उपदेश देकर देवर्षि
नारद अन्तर्धान हो गये और शेषनागने भी तपस्या
करनेके लिये अत्यन्त शुभ निश्चय करके अपनी सभी
इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे लौटाकर उन गणेशजीका
ध्यान करते हुए एक हजार वर्षोंतक उस श्रेष्ठ (षडक्षर)
मन्त्रका जप किया। मन्त्रानुष्ठान पूरा होनेपर उन्होंने
देवाधिदेव भगवान् गजाननका अपने समक्ष दर्शन
किया ॥ १२-१४ ॥
वे सिंहपर आरूढ़ थे, उनके तीन नेत्र थे, दस
भुजाएँ थीं, वे नागको धारण किये थे तथा कुण्डल एवं
बाजूबन्द पहने हुए थे। उन्होंने वक्षःस्थलपर मोतियोंकी
माला धारण की थी, उनका मुकुट अत्यन्त सुन्दर था,
वे रत्नमुद्रा तथा अक्षसूत्र लिये हुए थे। वे अनेकों देवों
तथा ऋषिवृन्दोंद्वारा निरन्तर सेवित हो रहे थे, उनकी सूँड़
टेढ़ी थी और मुख हाथीका था। वे भक्तजनोंकी
अभिलाषाको परिपूर्ण करनेके लिये विग्रह धारण किये
थे, वे देवताओं तथा मनुष्योंको वर देनेवाले थे और
आराधना करनेवालेको उसका मनोभिलषित पदार्थ प्रदान
करनेवाले थे ॥ १५ ॥
शेषनागने सिद्धि-बुद्धि नामक दो पत्नियोंसे समन्वित
उ०ख०-अ०१० ] * देवर्षि नारदजीका शेषनागको गणेशोपासनाकी दीक्षा देना * २६३
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भगवान् गणेशजीका जैसा ध्यान पहले किया था, उसी
स्वरूपमें वे उन्हें दर्शन देनेके लिये प्रकट हुए ॥ १६ ॥
वे हजारों सूर्योंके समान थे और अपनी कान्तिसे
दिशाओं तथा विदिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। उनके
तेजसे शेषनाग भी चकाचौंध और अन्धे-जैसे हो गये।
वे भयभीत, व्याकुल चित्तवाले तथा अत्यन्त विह्वल
होकर काँप उठे। मुहूर्तभरमें जब वे स्वस्थचित्त हुए तो
अपने मनमें यह सोचने लगे ॥ १७-१८ ॥
प्रलयाग्निके समान दीप्तिसे सम्पन्न यह कौन-सा
तेज यहाँ उपस्थित हुआ है? यह कदाचित् सम्पूर्ण
लोकोंको जला डालेगा अथवा मुझे ही भस्म कर
डालेगा। कल्याणकारी कर्मोंको करनेपर बीचमें अमंगल
कैसे आ सकता है? अथवा नारदजीने जिस प्रकार कहा
है, मैं गणनायकके उसी स्वरूपका दर्शन कर रहा
हूँ ॥ १९-२० ॥
इस प्रकार जब शेषनाग अत्यन्त चिन्तातुर हो उठे
तो द्विरदानन भगवान् गणेश उनसे बोले-कुतर्क करनेमें
दक्ष हे शेषनाग ! भय मत करो। मैं वरदाता गणेश
उपस्थित हो गया हूँ। तुम रात-दिन जिसका ध्यान करते
रहते हो, मैं वही हूँ। तुम्हारे मनमें जो इच्छा है, उसे
माँगो। मैं ही इस जगत्का कर्ता, रक्षक और संहार
करनेवाला अखिलेश्वर हूँ ॥ २१-२२ ॥
मेरे ही तेजसे चन्द्रमा, अग्नि, सूर्य और ग्रह-नक्षत्र
प्रकाशित होते हैं। परब्रह्मस्वरूप होते हुए भी तुम्हारी
तपस्यासे प्रसन्न होकर मैं तुम्हें वर प्रदान करनेके लिये
तथा संसारका कल्याण करनेके लिये आविर्भूत हुआ हूँ।
तुम जिन-जिन वरोंकी कामना करते हो, उन सबको
मुझसे माँग लो ॥ २३-२४ ॥
शेष बोले-हे भगवन्! मैं आपके तेजसे धर्षित
हो जानेके कारण न तो आपको देखनेका साहस कर पा
रहा हूँ और न कुछ बोलनेका ही साहस कर पा रहा
हूँ। हे अनघ! यदि आपका मेरे ऊपर पूर्ण अनुग्रह है
तो आप (अपने इस तेजोमय स्वरूपको आवृत्तकर)
सौम्यरूपमें हो जाइये ॥ २५ ॥
ब्रह्माजी बोले-शेषनागद्वारा इस प्रकार प्रार्थना
किये गये करुणासागर वे सुरेश्वर गजानन करोड़ों चन्द्रमाओंकी
आभासे सम्पन्न तथा सौम्य तेजवाले हो गये। तदनन्तर
शेषनागने उन अखिलेश्वरको प्रणाम करके उनका स्तवन
किया और उनसे वरोंकी याचना की ॥ २६ १/२ ॥
शेष बोले-जो आदि और अन्तसे रहित हैं, उन
गणोंके नायक भगवान् गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ।
जो सर्वत्र व्याप्त हैं, ईशानस्वरूप हैं, इस संसारके
कारणके भी कारण हैं, जगत्के स्वामी हैं तथा सम्पूर्ण
विश्वके द्वारा वन्दनीय हैं, उन गणेशको मैं प्रणाम करता
हूँ ॥ २७-२८ ॥
जो गणोंके अध्यक्ष हैं, भगवान् विष्णुद्वारा स्तुत हैं,
गुणोंके स्वामी हैं, गुणातीत हैं, उन गणाधिपति गणेशको
मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २९ ॥
जो समस्त विद्याओंके स्वामी हैं, देवोंके भी देव
हैं, देवताओंके अत्यन्त प्रिय हैं, सिद्धि तथा बुद्धिके प्रिय
हैं, सब प्रकारकी सिद्धियोंको देनेवाले हैं, भुक्ति एवं
मुक्तिको प्रदान करनेवाले हैं तथा सब प्रकारके विघ्नोंका
नाश करनेवाले हैं, उन गणनायक भगवान् गणेशको मैं
प्रणाम करता हूँ* ॥ ३० १/२ ॥
ब्रह्माजी बोले-हे महामुने! इस प्रकार देवताओंके
स्वामी, वर प्रदान करनेवाले द्विरदानन भगवान् गणेशकी
स्तुति करके शेषने उनसे जिन-जिन वरोंकी याचना की
थी, उन्हें आप सुनें ॥ ३१ १/२ ॥
शेष बोले-आज मेरे द्वारा की गयी तपस्या धन्य
हो गयी, मेरा ज्ञान धन्य हो गया, मेरे माता-पिता धन्य
हो गये, मेरा जन्म लेना सफल हो गया, मेरा शरीर, मेरे
अनेक नेत्र तथा बहुतसे सिर भी धन्य हो गये। आपकी
- शेष उवाच
अनादिनिधनं देवं वन्देऽहं गणनायकम् ॥
सर्वव्यापिनमीशानं जगत्कारणकारणम्। सर्वस्वरूपं विश्वेशं विश्ववन्द्यं नमाम्यहम् ॥
गजाननं गणाध्यक्षं गरुडेशस्तुतं विभुम्। गुणाधीशं गुणातीतं गणाधीशं नमाम्यहम् ॥
विद्यानामधिपं देवं देवदेवं सुरप्रियम्। सिद्धिबुद्धिप्रियं सर्वसिद्धिदं भुक्तिमुक्तिदम् ॥
सर्वविघ्नहरं देवं नमामि गणनायकम्।
२६४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
स्तुति करनेमें मेरी जो जिह्वा प्रवृत्त हुई, वह भी आज | दिखलाया और अपने शब्दसे उस समय आकाश, पृथ्वी
धन्य हो गयी है ॥ ३२-३३॥ | तथा दिशा-विदिशाओंको भर दिया था ॥ ४४ ॥
आपके दोनों चरणोंका दर्शन करनेसे मेरा कुल एवं | जिन गणेशजीके विराट् स्वरूपमें पृथ्वी चरणतल
मेरा शील धन्य हो गया। हे अखण्ड पराक्रमवाले | थी, दिशाएँ उनके कान थीं, सूर्य नेत्र था, ओषधियाँ
गणनायक! मुझे आप अपनी अखण्डित भक्ति प्रदान | उनके रोमस्वरूप थीं, धराको धारण करनेवाले पर्वत
करें। हे विघ्नराट् ! आप सर्वज्ञको मैं अपना क्या-क्या | उनके नख थे, मेघ स्वेदरूपी जलबिन्दु थे, चतुरानन
दुःख बताऊँ। अत्यधिक अभिमान करनेपर भगवान् | ब्रह्माजी उनकी जननेन्द्रिय थे, जिनके कुक्षिक्षेत्रमें सम्पूर्ण
शिवके द्वारा अत्यन्त क्रोध करके भूमिपर पटक दिये | चराचर जगत् और चारों सागर स्थित थे ॥ ४५-४६ ॥
जानेके कारण मेरे मस्तक फट गये हैं। तदनन्तर देवर्षि | वे एक होते हुए भी अनन्त मुखवाले थे और
नारदजीके अनुग्रहसे मुझे आपके चरणारविन्दका दर्शन | अनन्त नेत्रोंवाले थे, स्वराट् थे, अनन्त रूपवाले थे,
हुआ ॥ ३४-३६ ॥ | अनन्त शक्तियोंसे सम्पन्न थे और अत्यन्त प्रकाशमान थे।
हे देव ! इस समय आप मुझे तीनों लोकोंमें | उनके एक-एक रोमकूपमें हजारों-हजार ब्रह्माण्ड आभासित
सर्वश्रेष्ठ होनेका वर प्रदान करें। मेरे सभी सिरोंमें पूर्वकी | हो रहे थे, ऐसे उस विराट् स्वरूपको देखकर शेषनाग
भाँति दक्षता आ जाय और मैं पृथ्वीको धारण करनेमें | भयभीत होकर भ्रान्त-से हो गये ॥ ४७-४८ ॥
समर्थ हो जाऊँ ॥ ३७ ॥ | तदनन्तर उन्होंने गणेशजीसे प्रार्थना की कि वे पुनः
मुझे अचल स्थान प्राप्त हो और मैं निरन्तर आपका | सौम्य स्वरूपवाले हो जायें। तब वे भगवान् गणेश दस
दर्शन करता रहूँ। मुझे भगवान् शंकरका भी सान्निध्य | भुजाओंसे समन्वित और सिंहपर आरूढ़ स्वरूपवाले हो
प्राप्त हो, मैं नागोंके कुलमें श्रेष्ठता प्राप्त करूँ और | गये। तदनन्तर वर प्रदान करनेवाले वे भगवान् गणेश
भगवान् शिवमें मेरी प्रीति बनी रहे ॥ ३८ ॥ | बोले- हे शेष ! तुमने बड़े भाग्यसे तथा मेरी कृपासे इस
गणपति बोले- हे नागोंके स्वामी! यह जो | स्वरूपका दर्शन किया है, मेरा यह विराट् स्वरूप तो
तुम्हारा मस्तक दस भागोंमें विभक्त हुआ है, अतः तुम अब | देवता भी नहीं देख पाये हैं ॥ ४९-५० ॥
एक हजार मुखवाले तथा एक हजार फणोंसे सुशोभित | प्रसन्न हुए मैंने तुम्हें अपनेमें, पातालमें तथा
होओगे। जबतक चन्द्रमा, सूर्य और तारे रहेंगे, तबतक | भगवान् शिवमें अचल स्थान दिया है। तुम इस पृथ्वीको
तुम्हारी कीर्ति लोकोंमें बनी रहेगी और पृथ्वीको धारण करनेकी | पुष्पकी भाँति धारण करो ॥ ५१ ॥
तुम्हारी शक्ति और भी दृढ़ हो जायगी ॥ ३९-४० ॥ | शेष बोले- मैं अपने सिरपर इस धरणी पृथ्वीको
नागोंमें श्रेष्ठ हे नागराज ! तुम पाँच मुखवाले | धारण करता हूँ, इसलिये मेरा तथा आपका भी
भगवान् शिवके पाँचों सिरोंमें मेरी कृपासे अचल स्थान | धरणीधर यह नाम लोकमें अत्यन्त विख्यात हो जाय।
प्राप्त करोगे और तुम्हें मेरा सान्निध्य निरन्तर प्राप्त होगा। | आप इस क्षेत्रमें स्थित होकर भक्तोंकी कामनाओंको
हे शेष ! अन्य भी जो तुम्हारी अभिलाषा है, वह सब | पूर्ण करें ॥ ५२१/२॥
सफल होगी ॥ ४११/२॥ | ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर ऐसा ही होगा- इस
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारके वर गणेशजीने उन्हें | प्रकार उनसे कहकर विघ्नेश्वर गणपति स्वयं अन्तर्धान
प्रदान किये और अपने उदरदेशमें उनको लपेटकर बाँध | हो गये। शेषनागने भी जिस रूपमें उनका दर्शन किया
लिया। तबसे गजाननका एक नाम 'व्यालबद्धोदर' प्रसिद्ध | था, वैसी ही मूर्ति बनाकर बड़े ही आदर-भक्तिपूर्वक
हो गया। तदनन्तर विभु गणेशजीने अभय होनेके लिये उन | उसकी स्थापना की और एक अत्यन्त ही शुभ मन्दिरका
शेषनागके मस्तकपर अपना हाथ रखा ॥ ४२-४३ ॥ | निर्माण किया, जो सुवर्णनिर्मित था और बहुत प्रकारके
उन्होंने प्रसन्न होकर अपना विराट् स्वरूप शेषनागको | रत्नोंसे सुसज्जित था ॥ ५३-५४ ॥
उ०ख०-अ०९१] * गणेशजीकी आज्ञासे ब्रह्माजीद्वारा सात मानस पुत्रोंकी सृष्टि * २६५
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शेषनागने उन गणेशजीकी मूर्तिका 'धरणीधर' यह | नाभिकमलमें भी स्थित हुए। हे व्यासजी! इस प्रकार मैंने
नाम रखा। तदनन्तर वे शेषनाग भगवान् विष्णुके | गणेशजीकी अद्भुत महिमाका आपसे वर्णन किया ॥ ५६ ॥
शय्याभावको प्राप्त हुए अर्थात् उनकी शय्या बने और | गणेशजी प्रवालनगरमें 'धरणीधर' इस नामसे प्रसिद्ध
उन्होंने अपने मस्तकपर पृथ्वीको उसी प्रकार धारण | हुए। [हे व्यासजी!] शेषनागने इन्हीं अभिलाषाओंकी
किया, मानो पुष्पको धारण किया हो ॥ ५५ ॥ | पूर्तिके लिये विभु भगवान् गणेशजीकी आराधना की
वे विघ्नराज गणेशजीके आभूषणके रूपमें उनके | थी ॥ ५७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शेषोपाख्यान' नामक नब्बेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९० ॥
इक्यानबेवाँ अध्याय
गणेशजीकी आज्ञासे ब्रह्माजीद्वारा सात मानस पुत्रोंकी सृष्टि, ब्रह्मपुत्र कश्यपद्वारा गणेशजीकी
आराधना और विविध वरोंकी प्राप्ति, कश्यपपत्नियोंसे सृष्टिका विस्तार,
कश्यपपुत्रोंद्वारा गणेशजीकी स्तुति
व्यासजी बोले- हे देव! भगवान् गणेशजीकी | हुए थे और उन्होंने सुन्दर बाजूबन्द पहन रखा था ॥ ८ ॥
दूसरी अन्य कथा भी मुझे बतलाइये। प्रभो! कथाओंको | सुवर्ण, मणि तथा रत्नोंसे समन्वित मौक्तिकमालाओंको
सुनते हुए मेरा मन अत्यन्त उत्सुक हो रहा है ॥ १ ॥ | धारण करनेसे उनका कण्ठदेश अत्यन्त सुशोभित हो रहा
ब्रह्माजी बोले- एक बारकी बात है कि प्रलय | था। वे अपने उदरमें सर्प लपेटे हुए थे। करोड़ों सूर्योंके
होनेके अनन्तर भगवान् गजाननने मुझे आज्ञा देते हुए | दीप्तिमान् मण्डलके समान उनकी आभा थी ॥ ९ ॥
कहा- 'हे ब्रह्मन्! मेरी आज्ञासे आप विविध प्रकारकी | उनके प्रफुल्लित नेत्र सुशोभित हो रहे थे। सुन्दर-
सृष्टि करें' ॥ २ ॥ | सूँड़से उनका मुख रमणीय दिखायी दे रहा था। उनके चरण-
तब मैंने अपने मनसे सात मानस पुत्रोंको उत्पन्न | युगल छोटी-छोटी घण्टियों तथा नूपुरोंकी रुन-झुन ध्वनिसे
किया। उनके नाम मैं आपको बताता हूँ। कश्यप, गौतम, | झंकृत हो रहे थे। इस प्रकारके स्वरूपवाले भगवान् गजानन
जमदग्नि, वसिष्ठ, भरद्वाज, अत्रि एवं विश्वामित्र-ये | कश्यपजीके सामने प्रकट हुए। कश्यपजी उनका दर्शनकर
सात मानस पुत्र सभी विद्याओंके ज्ञाता थे ॥ ३-४॥ | हर्षसे विभोर हो उठे और नृत्य करने लगे ॥ १०-११॥
उन सभीने मुझसे कहा- 'हे ब्रह्मन्! हे सुरेश्वर! | कश्यपजीने उन्हें प्रणाम करके विविध प्रकारके
हमें आज्ञा दीजिये।' मैंने कश्यपको उन सभीमें अधिक | मांगलिक उपचारोंसे उनकी पूजा की, तदनन्तर दोनों
बुद्धिमान् जानकर उन्हें आज्ञा दी। मेरा सृष्टि रचनेका कार्य | हाथ जोड़कर अत्यन्त आनन्दित हुए कश्यपजीने भगवान्
तुम करो-ऐसी आज्ञा मैंने उन्हें दी। वे 'ठीक है' ऐसा | गजाननसे इस प्रकार कहा - ॥ १२ ॥
कहकर तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये ॥ ५-६ ॥ | हे तात! मेरे पिता धन्य हैं, मेरी माता धन्य हैं, मेरा
उन्होंने दिव्य हजार वर्षोंतक भगवान् गणेशजीके | तप धन्य है, मेरा ज्ञान धन्य है, मेरा यह शरीर धन्य है और
एकाक्षर मन्त्रका जप किया। इससे द्विरदानन भगवान् | आज मेरे ये नेत्र धन्य हो गये, यह पृथ्वी धन्य है और ये
गणेश प्रसन्न हो गये [और उनके समक्ष प्रकट हुए] ॥ ७ ॥ | लताएँ, वृक्ष तथा फल धन्य हैं। यह एकाक्षर मन्त्र धन्य है,
उनकी चार भुजाएँ थीं, कमलके समान सुन्दर | जिसके प्रभावसे आज मुझे अखिलेश्वर, परात्पर, प्रसन्नात्मा,
उनके नेत्र थे, वे बहुत बड़े मुकुटको धारण किये थे। | परमात्मा गजाननका दर्शन हुआ है ॥ १३-१४ ॥
वे अपने हाथोंमें पाश, अंकुश, माला तथा हाथीदाँत लिये | जिसके यथार्थ स्वरूपका निर्धारण करनेमें चारों
२६६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
वेद भी कुण्ठित हो जाते हैं, वेदान्तके विद्वान् मूक हो
जाते हैं, जो मनके तर्कोंसे अगोचर हैं, उन्हीं देव
गणेशका आज मैंने दर्शन किया है॥ १५॥
जिनसे ये विष्णु, शिव तथा अग्नि आदि प्रधान
देवता प्रकट होते हैं, सातों पाताल तथा चौदहों भुवन
आविर्भूत होते हैं और जिनमें लयको प्राप्त होते हैं, उन्हीं
देव गणेशका आज मैंने दर्शन किया है। जो निर्गुण हैं,
जिनका कोई स्वामी नहीं है, जो गुरुके उपदेशसे
जाननेयोग्य हैं, जिनका कोई आकार नहीं है, जिन्हें कुछ
लोग ब्रह्म कहते हैं, उन्हीं देव गणेशका आज मैंने दर्शन
किया है॥ १६-१७१/२॥
ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारके वचनामृतरूपी रससे
भगवान् गजानन अत्यन्त प्रसन्न हुए और विविध
स्तुतियोंद्वारा स्तवन करनेवाले विनयसम्पन्न उन कश्यपसे
बोले- ॥ १८१/२॥
गणेशजी बोले-हे मुने! आपकी श्रद्धा-भक्ति
तथा किये गये स्तवन एवं मन्त्रानुष्ठानसे मैं आपपर
प्रसन्न हूँ। आप अपने मनमें जो-जो भी अभिलाषा रखते
हैं, वे सब मुझसे माँग लें॥ १९१/२॥
कश्यपजी बोले-हे प्रभो! विविध प्रकारकी
सृष्टि करनेकी सामर्थ्यके साथ ही मुझे यह भी प्रदान करें
कि आपके चरणकमलोंमें मेरी अविचल भक्ति बनी रहे
और मुझे कभी भी आपका विस्मरण न हो। मैं जहाँ-कहीं
भी आपका स्मरण करूँ, वहाँ-वहाँ आप मुझे दृष्टिगोचर
हो जायँ। इसके साथ ही मुझे वैसा पुत्र प्रदान करें, जो
कश्यपनन्दनके नामसे विख्यात हो ॥ २०-२११/२॥
गणेशजी बोले-हे महामुने ! आप मुझसे जो-जो
भी चाहते हैं, वह सब मनोरथ शीघ्र ही पूर्ण होगा। आपको
मेरी भक्ति तथा अविस्मरणीय स्मृति प्राप्त होगी और आप
संकटकालमें मुझे अपने पास पायेंगे। मेरे कृपाप्रसादसे
आप विचित्र सृष्टि करनेमें समर्थ होओगे ॥ २२-२३ ॥
ब्रह्माजी बोले-महर्षि कश्यपजीसे इस प्रकार
कहकर भगवान् गणेश वहीं अन्तर्धान हो गये और वे
कश्यपजी भी प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थानको चले गये ॥ २४॥
एक समयकी बात है, महर्षि कश्यप अकस्मात्
अनंग कामदेवद्वारा पीड़ित हो गये। उन्हें कहीं भी शान्ति
नहीं मिली, तब वे अपने घरके भीतर चले गये ॥ २५ ॥
उन्हें अपने नित्य, नैमित्तिक तथा काम्य कर्मोंको करनेका
तथा ध्यानयोगका भी स्मरण नहीं रहा। उन्हें उस प्रकारसे
कामविह्वल देखकर उनकी दिति, अदिति, दनु, कद्रू तथा
विनता आदि चौदह पत्नियाँ उनके समक्ष आयीं। तब
कश्यपमुनिने विभिन्न भवनोंमें उन स्त्रियोंके साथ रमण
किया। यथोक्त समय उपस्थित होनेपर दिति नामक पत्नीने
अनेक दैत्योंको जन्म दिया। अदितिने देवताओं तथा गन्धर्वोंको
और दनुने दानवोंको जन्म दिया ॥ २६-२८॥
इसी प्रकार उनकी अन्य स्त्रियोंसे क्रमशः किन्नर,
यक्ष, सिद्ध, चारण, गुह्यक, अनेक प्रकारके ग्राम्य तथा
आरण्यक पशु उत्पन्न हुए। इसी प्रकार पृथ्वी, पर्वत, वृक्ष,
समुद्र, सरिताएँ, लता, विविध धान्य, अनेक धातुएँ, रत्न,
मुक्ता, कृमि, पिपीलिका, सर्प तथा पक्षिगण आदि चराचर
जगत् उन स्त्रियोंसे उत्पन्न हुआ ॥ २९-३०१/२॥
उस समय इस प्रकारकी विविध सन्तानोंको उत्पन्न
हुआ देखकर महर्षि कश्यप अत्यन्त प्रसन्न हो उठे।
तदनन्तर उन धीमान् कश्यपजीने ऋण-धनशोधन, सिद्धमन्त्र
और अरिचक्रका विचार करके गणेशजीके विविध
मन्त्रोंका उपदेश अपने पुत्रोंको दिया ॥ ३१-३२ ॥
उन मुनिश्रेष्ठ कश्यपजीने किसीको गणेशजीका
षोडशाक्षर मन्त्र, किसीको अष्टादशाक्षर मन्त्र, किसीको
एकाक्षरमन्त्र, किसीको षडक्षर मन्त्र, किसीको पंचाक्षर
मन्त्र, किसीको अष्टाक्षर मन्त्र, किसीको द्वादशाक्षर मन्त्र
और किसीको उनका महामन्त्र प्रदान किया ॥ ३३-३४॥
उन्होंने अपने पुत्रोंसे यह भी कहा कि जबतक
अखिलाधार, सर्वसिद्धिप्रदायक भगवान् गणेशजीका दर्शन
नहीं होता, तबतक तुम लोग इन मन्त्रोंका अनुष्ठान करते
रहो। कश्यपजीने इस प्रकारकी आज्ञा पुत्रोंको प्रदान की
और तब वे सभी तपस्या करनेके लिये विभिन्न स्थानोंको
चले गये और अपने-अपनेको उपदिष्ट मन्त्रका जप
करने लगे ॥ ३५-३६ ॥
वे सभी बैठते समय, भोजनके समय, निद्राके समय
तथा जाग्रदवस्थामें-इस प्रकार सभी समय अनन्य
उ०ख०-अ०९१ ] * गणेशजीकी आज्ञासे ब्रह्माजीद्वारा सात मानस पुत्रोंकी सृष्टि * २६७
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भक्ति-निष्ठापूर्वक देवेश्वर गजाननका स्मरण करते रहते
थे। दिव्य हजार वर्षोंके बीत जानेपर अनेक रूप धारण
करनेवाले, करुणानिधान भगवान् गजानन उन
(कश्यपपुत्रों)-के समक्ष प्रकट हुए ॥ ३७-३८ ॥
गणेशजीके जैसे रूपका जिन्होंने ध्यान किया था,
उनके समक्ष वे उसी रूपको धारणकर प्रकट हुए,
किसीके समक्ष वे मेघके समान आभावाले होकर आठ
विशाल भुजाओंको धारण किये हुए प्रकट हुए ॥ ३९ ॥
किसीके समक्ष चन्द्रमाके समान कान्तिसे सम्पन्न
होकर चार भुजाओंवाले स्वरूपमें वे आविर्भूत हुए,
किसीके आगे रक्तवर्णकी आभासे सम्पन्न होकर वे
गणेश्वर छः भुजाओंवाले स्वरूपमें प्रकट हुए ॥ ४० ॥
किसीको हजार नेत्रों तथा हजार भुजाओंसे समन्वित
रूपमें वे अपने सामने दिखायी दिये, किसीके सामने
बालकके रूपमें, किसीके सामने युवावस्थावाले तथा
किसीको वृद्धके रूपमें भी वे आभासित हो रहे थे ॥ ४१ ॥
वे गजानन किसीके सामने दस भुजाओंवाले,
किसीके सामने बारह भुजाओंवाले, किसीके सामने
धूम्रवर्णके तो किसीके सामने महान् प्रकाशसे समन्वित
रूपमें दिखलायी पड़े। किसीके सामने वे अठारह
भुजाओंको धारण किये हुए प्रकट हुए और किसीने
करोड़ों सूर्योंकी प्रभासे सम्पन्न उनके स्वरूपका दर्शन
किया। वे अत्यन्त तेजसे सम्पन्न तथा विशाल विग्रहवाले
थे। कभी वे मूषककी पीठपर सवार दिखायी देते थे, तो
कभी सिंहके ऊपर और कभी मयूरवाहनके रूपमें
दृश्यमान होते थे। वे कभी हाथीके मुखवाले दीखते थे
तो कभी अनेक मुखोंवाले हो जाते थे ॥ ४२-४३ ॥
उन देव गणेशजीका दर्शनकर वे सभी बड़े प्रसन्न
हो गये और उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर बड़े ही
विनयपूर्वक भक्तिभावसे अनेक प्रकारसे उन भगवान्
गजाननकी स्तुति की ॥ ४४ ॥
सभी बोले-जिन अनन्त शक्तिवाले परमेश्वरसे
अनन्त जीव प्रकट हुए हैं; जिन निर्गुण अप्रमेय परमात्मासे
उन (सत्त्वादि) गुणोंकी उत्पत्ति हुई है; सात्त्विक, राजस
और तामस-इन तीन भेदोंवाला यह सम्पूर्ण जगत्
जिनसे प्रकट एवं भासित हो रहा है, उन गणेशका हम
सर्वदा नमन एवं भजन करते हैं ॥ ४५ ॥
जिनसे इस समस्त जगत्का प्रादुर्भाव हुआ है;
जिनसे कमलासन ब्रह्मा, विश्वव्यापी विश्वरक्षक विष्णु,
इन्द्र आदि देव-समुदाय और मनुष्य प्रकट हुए हैं, उन
गणेशका हम सदा ही नमन एवं भजन करते हैं ॥ ४६ ॥
जिनसे अग्नि और सूर्यका प्राकट्य हुआ; पृथ्वी,
जल, समुद्र, चन्द्रमा, आकाश और वायुका प्रादुर्भाव हुआ
तथा जिनसे स्थावर-जंगम और वृक्षसमूह उत्पन्न हुए हैं,
उन गणेशका हम सर्वदा नमन एवं भजन करते हैं। जिनसे
दानव, किन्नर, चारण और यक्षसमूह प्रकट हुए; जिनसे
हाथी और हिंसक जीव उत्पन्न हुए तथा जिनसे पक्षियों,
कीटों और लता-बेलोंका प्रादुर्भाव हुआ, उन गणेशका
हम सदा ही नमन और भजन करते हैं ॥ ४७-४८ ॥
जिनसे मुमुक्षुको बुद्धि प्राप्त होती है और अज्ञानका
नाश होता है; जिनसे भक्तोंको सन्तोष देनेवाली सम्पदाएँ
प्राप्त होती हैं तथा जिनसे विघ्नोंका नाश और समस्त
कार्योंकी सिद्धि होती है, उन गणेशका हम सदा नमन
एवं भजन करते हैं। जिनसे पुत्र-सम्पत्ति सुलभ होती है;
जिनसे मनोवांछित अर्थ सिद्ध होता है; जिनसे अभक्तोंको
अनेक प्रकारके विघ्न प्राप्त होते हैं तथा जिनसे शोक,
मोह और काम प्राप्त होते हैं, उन गणेशका हम सदा
नमन एवं भजन करते हैं ॥ ४९-५० ॥
जिनसे अनन्त शक्तिसम्पन्न सुप्रसिद्ध शेषनाग प्रकट
हुए; जो इस पृथ्वीको धारण करने एवं अनेक रूप
ग्रहण करनेमें समर्थ हैं; जिनसे अनेक प्रकारके अनेक
स्वर्गलोक प्रकट हुए हैं, उन गणेशका हम सदा ही
नमन एवं भजन करते हैं ॥ ५१ ॥
जिनके विषयमें वेदवाणी कुण्ठित है; जहाँ मनकी
भी पहुँच नहीं है तथा श्रुति सदा सावधान रहकर 'नेति-
नेति'-इन शब्दोंद्वारा जिनका वर्णन करती है; जो
सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म हैं, उन गणेशका हम सदा ही
नमन एवं भजन करते हैं ॥ ५२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'गणेशजीकी स्तुतिका वर्णन'
नामक इक्यानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९१ ॥
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