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सर्वकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 266, कुल 656 में से

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पृष्ठ 266

२६४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

स्तुति करनेमें मेरी जो जिह्वा प्रवृत्त हुई, वह भी आज | दिखलाया और अपने शब्दसे उस समय आकाश, पृथ्वी
धन्य हो गयी है ॥ ३२-३३॥ | तथा दिशा-विदिशाओंको भर दिया था ॥ ४४ ॥
आपके दोनों चरणोंका दर्शन करनेसे मेरा कुल एवं | जिन गणेशजीके विराट् स्वरूपमें पृथ्वी चरणतल
मेरा शील धन्य हो गया। हे अखण्ड पराक्रमवाले | थी, दिशाएँ उनके कान थीं, सूर्य नेत्र था, ओषधियाँ
गणनायक! मुझे आप अपनी अखण्डित भक्ति प्रदान | उनके रोमस्वरूप थीं, धराको धारण करनेवाले पर्वत
करें। हे विघ्नराट् ! आप सर्वज्ञको मैं अपना क्या-क्या | उनके नख थे, मेघ स्वेदरूपी जलबिन्दु थे, चतुरानन
दुःख बताऊँ। अत्यधिक अभिमान करनेपर भगवान् | ब्रह्माजी उनकी जननेन्द्रिय थे, जिनके कुक्षिक्षेत्रमें सम्पूर्ण
शिवके द्वारा अत्यन्त क्रोध करके भूमिपर पटक दिये | चराचर जगत् और चारों सागर स्थित थे ॥ ४५-४६ ॥
जानेके कारण मेरे मस्तक फट गये हैं। तदनन्तर देवर्षि | वे एक होते हुए भी अनन्त मुखवाले थे और
नारदजीके अनुग्रहसे मुझे आपके चरणारविन्दका दर्शन | अनन्त नेत्रोंवाले थे, स्वराट् थे, अनन्त रूपवाले थे,
हुआ ॥ ३४-३६ ॥ | अनन्त शक्तियोंसे सम्पन्न थे और अत्यन्त प्रकाशमान थे।
हे देव ! इस समय आप मुझे तीनों लोकोंमें | उनके एक-एक रोमकूपमें हजारों-हजार ब्रह्माण्ड आभासित
सर्वश्रेष्ठ होनेका वर प्रदान करें। मेरे सभी सिरोंमें पूर्वकी | हो रहे थे, ऐसे उस विराट् स्वरूपको देखकर शेषनाग
भाँति दक्षता आ जाय और मैं पृथ्वीको धारण करनेमें | भयभीत होकर भ्रान्त-से हो गये ॥ ४७-४८ ॥
समर्थ हो जाऊँ ॥ ३७ ॥ | तदनन्तर उन्होंने गणेशजीसे प्रार्थना की कि वे पुनः
मुझे अचल स्थान प्राप्त हो और मैं निरन्तर आपका | सौम्य स्वरूपवाले हो जायें। तब वे भगवान् गणेश दस
दर्शन करता रहूँ। मुझे भगवान् शंकरका भी सान्निध्य | भुजाओंसे समन्वित और सिंहपर आरूढ़ स्वरूपवाले हो
प्राप्त हो, मैं नागोंके कुलमें श्रेष्ठता प्राप्त करूँ और | गये। तदनन्तर वर प्रदान करनेवाले वे भगवान् गणेश
भगवान् शिवमें मेरी प्रीति बनी रहे ॥ ३८ ॥ | बोले- हे शेष ! तुमने बड़े भाग्यसे तथा मेरी कृपासे इस
गणपति बोले- हे नागोंके स्वामी! यह जो | स्वरूपका दर्शन किया है, मेरा यह विराट् स्वरूप तो
तुम्हारा मस्तक दस भागोंमें विभक्त हुआ है, अतः तुम अब | देवता भी नहीं देख पाये हैं ॥ ४९-५० ॥
एक हजार मुखवाले तथा एक हजार फणोंसे सुशोभित | प्रसन्न हुए मैंने तुम्हें अपनेमें, पातालमें तथा
होओगे। जबतक चन्द्रमा, सूर्य और तारे रहेंगे, तबतक | भगवान् शिवमें अचल स्थान दिया है। तुम इस पृथ्वीको
तुम्हारी कीर्ति लोकोंमें बनी रहेगी और पृथ्वीको धारण करनेकी | पुष्पकी भाँति धारण करो ॥ ५१ ॥
तुम्हारी शक्ति और भी दृढ़ हो जायगी ॥ ३९-४० ॥ | शेष बोले- मैं अपने सिरपर इस धरणी पृथ्वीको
नागोंमें श्रेष्ठ हे नागराज ! तुम पाँच मुखवाले | धारण करता हूँ, इसलिये मेरा तथा आपका भी
भगवान् शिवके पाँचों सिरोंमें मेरी कृपासे अचल स्थान | धरणीधर यह नाम लोकमें अत्यन्त विख्यात हो जाय।
प्राप्त करोगे और तुम्हें मेरा सान्निध्य निरन्तर प्राप्त होगा। | आप इस क्षेत्रमें स्थित होकर भक्तोंकी कामनाओंको
हे शेष ! अन्य भी जो तुम्हारी अभिलाषा है, वह सब | पूर्ण करें ॥ ५२१/२॥
सफल होगी ॥ ४११/२॥ | ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर ऐसा ही होगा- इस
ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारके वर गणेशजीने उन्हें | प्रकार उनसे कहकर विघ्नेश्वर गणपति स्वयं अन्तर्धान
प्रदान किये और अपने उदरदेशमें उनको लपेटकर बाँध | हो गये। शेषनागने भी जिस रूपमें उनका दर्शन किया
लिया। तबसे गजाननका एक नाम 'व्यालबद्धोदर' प्रसिद्ध | था, वैसी ही मूर्ति बनाकर बड़े ही आदर-भक्तिपूर्वक
हो गया। तदनन्तर विभु गणेशजीने अभय होनेके लिये उन | उसकी स्थापना की और एक अत्यन्त ही शुभ मन्दिरका
शेषनागके मस्तकपर अपना हाथ रखा ॥ ४२-४३ ॥ | निर्माण किया, जो सुवर्णनिर्मित था और बहुत प्रकारके
उन्होंने प्रसन्न होकर अपना विराट् स्वरूप शेषनागको | रत्नोंसे सुसज्जित था ॥ ५३-५४ ॥