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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

इकतालीसवाँ अध्याय

१२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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इकतालीसवाँ अध्याय
श्रीगणेशजीका कलाधर विप्रके रूपमें त्रिपुरासुरके पास आना और उसे स्वर्ण,
रजत एवं लौहसे निर्मित तीन पुर प्रदान करना

व्यासजी बोले—हे चतुर्मुख ब्रह्माजी ! [सृजन,
पालन और संहार आदि] सम्पूर्ण कार्योंको सम्पन्न
करनेवाले वरदायक भगवान् गणेशजीने क्या किया—यह
मुझ जिज्ञासुको बतलाइये ॥ १ ॥
ब्रह्माजी बोले— [हे व्यासजी !] तदनन्तर गजानन
गणेशजी ब्राह्मणका रूप धारणकर त्रिपुरासुरके पास
गये। वहाँ उन ब्राह्मणश्रेष्ठने उसे महामूल्यवान् आसनपर
विराजमान देखा ॥ २ ॥
उसने उठकर उन्हें नमस्कार करके अपने आसनपर
बैठाया और सम्यक् रूपसे उनका पूजनकर पूछा कि
'हे द्विज ! आपका आगमन कहाँसे हुआ है ? ॥ ३ ॥
हे द्विज ! आपने किस विद्याका ज्ञान प्राप्त किया
है ? आपका नाम क्या है ? आपके आनेका प्रयोजन क्या
है ?—यह सब मुझ जिज्ञासुको बताइये, मैं शक्तिभर
आपके कार्यको पूर्ण करूँगा' ॥ ४ ॥
द्विजरूपधारी गणेशजी बोले—हे दैत्य [राज] !
हम सर्वज्ञ और सब कुछ जाननेवाले हैं; परहितकी
कामनासे इच्छानुसार लोकोंमें भ्रमण करते रहते हैं और
जहाँ सायंकाल हो जाता है, वहीं रुक जाते हैं ॥ ५ ॥
मैं तीनों लोकोंमें 'कलाधर' नामसे प्रसिद्ध हूँ और
आपके वैभवको देखनेकी इच्छासे आपके भवनमें आया
हूँ। सम्प्रति आपकी सम्पूर्ण सम्पदाको देखकर हम तृप्त
हो गये। इस प्रकारकी सम्पत्ति तो कैलास, वैकुण्ठ और
ब्रह्मलोकमें भी नहीं है। इन्द्रलोकमें भी ऐसी सम्पत्ति नहीं
है, जैसी आपके पास दिखायी देती है ॥ ६—७१/२ ॥
दैत्य (त्रिपुरासुर) बोला—हे द्विज ! आपका
नाम ही कलाधर है या आप उसे जानते भी हैं ? ॥ ८ ॥
सम्पूर्ण लोकोंकी सम्पदाओंमें आप जो इस सम्पदाकी
प्रशंसा कर रहे हैं तो यदि आप जानते हों तो मुझे उनमें
जो सर्वश्रेष्ठ हो, उसे दिखायें ॥ ९ ॥
हे द्विज ! उसे देखकर मैं आपको आपका वांछित
[अवश्य] प्रदान करूँगा, भले ही वह मेरा प्रिय प्राण
ही क्यों न हो। हे मुने ! मुझे स्मरण नहीं है कि मैंने
परिहासमें भी कभी असत्य बोला हो ॥ १० ॥
कलाधर बोले—हे देवशत्रु ! दूसरोंकी सम्पदाको
देखकर तुम्हारा क्या प्रयोजन सिद्ध होगा ? तुम्हारी
विनम्रतासे मैं प्रसन्न हूँ और अपनी कलासे तुम्हें एक
बाणपर स्थित स्वर्ण, रजत और लौहनिर्मित तीन पुर
प्रदान करता हूँ। हे दैत्य ! तुम दीर्घकालतक वहाँ रहकर
सुखपूर्वक रमण करो ॥ ११-१२ ॥
ये तीनों पुर देवताओं, गन्धर्वों, मनुष्यों और
सर्पोंद्वारा अभेद्य, मनोवांछित पदार्थोंको देनेवाले, इच्छानुसार
गमन करनेवाले, इच्छित भोगोंको प्रदान करनेवाले और
मंगलमय हैं ॥ १३ ॥
हे दैत्य ! कुछ काल बीत जानेपर जब भगवान्
शिव एक ही बाणसे उनका भेदन कर देंगे, तभी उनका
नाश होगा ॥ १४ ॥
ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] ऐसा कहकर
[उन द्विजरूपधारी गणेशजीने] धनुष लेकर और उसपर
बाणका संयोजनकर तीन पुरोंका निर्माण किया, जो तीन
लोकोंके सदृश थे। वे [तीनों.पुर] विशेष रूपसे चित्रित
भवनों, मनोरम दीर्घिकाओं (जलाशयों) और उद्यानोंसे
युक्त थे; वहाँ अनेक प्रकारके पक्षिसमूह कलरव करते
थे। वे तीनों पुर सभी प्रकारके भोगोंको प्रदान करनेवाले
और आकाशमार्गसे गमन करनेवाले थे ॥ १५-१६ ॥
[गणेशजीकी] मायासे मोहित वह दैत्य त्रिपुरासुर
वहाँ (उन पुरोंके मध्यमें) स्थित होकर अत्यन्त हर्षित
हुआ। उस दैत्यने मेघसदृश गर्जन किया, जिससे तीनों
लोक काँपने लगे। त्रैलोक्यको क्षुभित करके उसने
'मुझसे श्रेष्ठ कोई नहीं है'—इस प्रकार गर्व और दर्पसे
युक्त होकर उन ब्राह्मण-देवता (द्विजरूपधारी गणेशजी)—
से इस प्रकार कहा— ॥ १७-१८ ॥
हे द्विजश्रेष्ठ ! आप दुर्लभ-से-दुर्लभ पदार्थ माँगिये,
वह मैं आपको दूँगा। यह सुनकर उन द्विज (कलाधर)—

उ०ख०-अ०४२ ] * भगवान् शंकर और त्रिपुरासुरका युद्ध * १२५
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ने उस दैत्य (त्रिपुरासुर)-से किसी वस्तुकी स्पृहा न होते
हुए भी कहा— ॥ १९ ॥
द्विजरूपधारी गणेशजी बोले—मैं कैलासपर्वतपर
गया था, वहाँ मैंने शिवजीद्वारा सम्यक् रूपसे पूजित उत्तम
गणेशमूर्तिका दर्शन किया, जो समस्त मनोरथोंको पूर्ण
करनेवाली थी। हे असुरेश्वर! यदि आपमें शक्ति है, तो
उसे लाकर मुझे दीजिये; क्योंकि तीनों लोकोंमें विचरण
करते हुए मैंने वैसी मूर्ति कहीं नहीं देखी ॥ २०-२१॥
अतः हे दैत्यश्रेष्ठ! उसमें मेरा मन आसक्त हो गया
है, हे असुरेश्वर! उसे प्राप्तकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा।
मैं चराचरसहित तीनों लोकोंमें आपकी कीर्तिका विस्तार
करूँगा कि 'त्रिपुरासुरसे श्रेष्ठ कोई दाता नहीं है, जो
वांछित वस्तुको प्रदान करता है' ॥ २२-२३॥
दैत्य [त्रिपुरासुर] बोला—हे द्विजश्रेष्ठ ! मैं
शंकरको अपना किंकर (सेवक) मानता हूँ, अन्य
देवताओंकी तो मैं कोई गणना ही नहीं करता। मैं उस
मूर्तिको लाकर आपको प्रदान करूँगा ॥ २४॥
ब्रह्माजी बोले— [हे व्यासजी!] ऐसा कहकर
[उस दैत्यने] उन [द्विजश्रेष्ठ] कलाधरका आदरपूर्वक
पूजन किया। उसने उन्हें दस ग्राम, गौएँ, वस्त्र,
आभूषण, मोती, मूँगे तथा अन्य बहुत-से रत्न एवं रंकु
मृगके रोमसे बने हुए कम्बल और अनेक प्रकारके
आभूषणोंसे विभूषित सैकड़ों दास-दासियाँ प्रदान किये।
उस असुरने श्रेष्ठ अश्वोंसे युक्त एवं चाँदीसे निर्मित
बहुत-से रथ भी उन्हें प्रदान किये, जो रथकी रक्षा करनेवाले
कवच और सोनेके धुरोंसे युक्त थे ॥ २५-२७ ॥
उस (त्रिपुरासुर)-के द्वारा आग्रहपूर्वक दी गयी सम्पूर्ण
दान-सामग्रियों आदिको ग्रहणकर वे [द्विजश्रेष्ठ] कलाधर
अपने आश्रमको प्रस्थान कर गये। [उन्हें देखकर] उनकी
पत्नी और सम्पूर्ण आश्रमवासी हर्षित हो गये ॥ २८ ॥
ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी!] इस प्रकार इस
सम्पूर्ण वृत्तान्तको नारदजीने देवताओंसे कहा। वे देवता
भी उचित समयकी प्रतीक्षा करते हुए दिन व्यतीत करने
लगे ॥ २९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'नारदागमन' नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४१॥
बयालीसवाँ अध्याय
भगवान् शंकर और त्रिपुरासुरका युद्ध
व्यासजी बोले—[हे ब्रह्मन् !] उन [द्विजश्रेष्ठ]
कलाधरके चले जानेके बाद उस दैत्य (त्रिपुरासुर)-ने
क्या किया? उस मंगलमयी चिन्तामणि [गणेशजीकी]
मूर्तिको उसने कैसे लाकर उन कलाधरको प्रदान किया?
हे चतुरानन ब्रह्माजी! यह सब मुझसे विस्तारपूर्वक
कहिये; क्योंकि गजानन गणेशजीकी लीलाओंको संक्षेपमें
सुनकर मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ ॥ १-२ ॥
ब्रह्माजी बोले—हे मुनिश्रेष्ठ ! उन [द्विजश्रेष्ठ
कलाधर]-के चले जानेके बाद उस दैत्य त्रिपुरासुरने जो
कुछ किया, वह सब मैं कहूँगा; हे मुने! उसे सावधान
होकर श्रवण करो ॥ ३ ॥
[तदनन्तर] उसने मन्दराचलपर स्थित शिवके पास
दो दूतोंको भेजा। उसने उन्हें यह सिखाया कि शिवके
पास जाकर आदरपूर्वक मेरी बात उनसे कहो कि तुम्हारे
भवनमें जो सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थोंको प्रदान करनेवाली
चिन्तामणि-निर्मित मंगलमयी [गणेश] मूर्ति है, हे
पार्वतीपते! उसे शान्तिपूर्वक दैत्यराज (त्रिपुरासुर)-को
दे दीजिये ॥ ४-५॥
पाताल, स्वर्गलोक या मर्त्यलोकमें जो भी अद्भुत
वस्तुएँ हैं, उन सबको वह दैत्य [राज] बलपूर्वक अपने
घरमें लाया है, अतः हे देव ! उसे आप शीघ्र लाइये, उसे
लेकर हम दोनों शीघ्र ही महाबली दैत्य त्रिपुरासुरके पास
जायँ। यदि आप उसे शान्तिपूर्वक नहीं देंगे, तब वह
पराक्रमी दैत्य उस मूर्तिको आपसे बलपूर्वक ले लेगा, तब
आपको दुःखकी प्राप्ति होगी-उस दैत्यके इस प्रकारके
वचन सुनकर वे दोनों दूत शिवके पास गये ॥ ६–८॥

१२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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उ०ख०-अ०४३] * त्रिपुरासुरके साथ युद्धमें भगवान् शंकरकी पराजय * १२७
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धूलके शान्त हो जानेपर वीर योद्धा [शत्रुपक्ष]- | भाँति बह रहे थे। वह वीरोंके मनमें सन्तोष उत्पन्न
के दूसरे योद्धाओंसे युद्ध करने लगे। उनमेंसे कुछ | करनेवाली और गृध्रों एवं शृगालोंके लिये प्रसन्नताका
भालोंसे, कुछ खड्गोंसे, कुछ पत्थरपर घिसकर तेज | कारण थी ॥ ३२ ॥
किये गये बाणोंसे, कुछ ऋष्टि (दुधारी तलवार)-से, | उस नदीको देखकर गिरिशायी बलवान् भगवान्
कुछ मुष्टिकासे, कुछ परशुसे, तो कुछ तोमरोंसे युद्ध कर | शंकर दैत्य त्रिपुरासुरके निकट गये, [तब] वह दैत्य भी
रहे थे॥ २९ १/२ ॥ | त्रिपुरमें आरूढ़ होकर सेनाके साथ उनके सामने
वहाँ मारे गये वीरों, घोड़ों और पैदल सैनिकोंके | आया ॥ ३३ ॥
रक्तसे एक रक्तकी नदी उत्पन्न हो गयी, जिसमें | तब दोनों नायकोंको युद्धोद्यत देखकर भगवान्
शैवालकी भाँति केश प्रवाहित हो रहे थे। [उस नदीमें] | शंकर और त्रिपुरासुरके सैनिक बिना व्याकुल हुए परस्पर
ढालें कछुओंकी भाँति, तलवारें मत्स्योंकी तरह और | द्वन्द्व-युद्ध करने लगे ॥ ३४ ॥
[योद्धाओंके कटे] सिर कमलसदृश प्रतीत हो रहे | उस समय वे अनेक प्रकारके आयुधों, दिव्य
थे ॥ ३०-३१ ॥ | अस्त्र-शस्त्रों और वृक्षोंसे प्रहार कर रहे थे। उन
भयंकरसे भी भयंकर प्रतीत होनेवाली उस नदीमें | योद्धाओंके नामों और युद्धविषयक चेष्टाओंको मैं
छत्र आवर्त (भँवर)-की भाँति और कबन्ध वृक्षकी | [आगे] संक्षेपमें कहूँगा ॥ ३५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'युद्धका वर्णन' नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४२ ॥
तैंतालीसवाँ अध्याय
त्रिपुरासुरके साथ युद्धमें भगवान् शंकरकी पराजय
ब्रह्माजी बोले-[हे व्यासजी!] उस द्वन्द्व-युद्धमें | गजारोहियोंके साथ, अश्वारोही अपने सदृश अश्वारोहियोंके
गिरिशायी भगवान् शंकर असुर सेनानायक त्रिपुरासुरसे, | साथ और पैदल सैनिक पैदल सैनिकोंके साथ युद्ध करने
षडानन भगवान् स्कन्द प्रचण्डसे और नन्दी चण्डसे युद्ध | लगे। उस भयंकर संग्राममें अनेक प्रकारके वाद्योंके घोष,
करने लगे ॥ १ ॥ | हाथियोंकी चिंघाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, वीरोंके
बलवान् पुष्पदन्त भी भीमकायसे तथा भुशुण्डी | सिंहनाद और रथोंके धुरोंके घर्षणसे उत्पन्न ध्वनिसे [वह
विषके सदृश प्राणहारी कालकूटसे युद्ध करने लगे ॥ २ ॥ | रणभूमि] अत्यन्त कोलाहलयुक्त हो गयी थी ॥ ६-७ ॥
वज्रदंष्ट्र और वीरभद्र-दोनों महान् बलशाली | उस युद्धमें कुछ वीर शस्त्रोंका त्याग करके विविध
[परस्पर] युद्ध करने लगे। वहाँ [उस संग्राममें] | प्रकारसे मल्लयुद्ध करने लगे। वे अपने अंगोंसे दूसरेके
बलवान् इन्द्रने भी दैत्य (त्रिपुरासुर)-के अमात्यसे युद्ध | अंगोंपर प्रहार कर रहे थे ॥ ८ ॥
किया। दैत्यपुत्र बलिके साथ रणदुर्मद [इन्द्रपुत्र] जयन्तने | तभी प्रचण्डने धनुषको कानतक खींचकर पत्थरपर
और [दैत्यगुरु] शुक्राचार्यके साथ अस्त्रोंके ज्ञाता देवताओंके | घिसकर तेज किये गये नौ दृढ़ बाणोंसे षडानन
आचार्य बृहस्पतिने युद्ध किया ॥ ३-४ ॥ | कार्तिकेयजीपर प्रहार किया ॥ ९ ॥
इस प्रकार देवताओं और दैत्योंके अनेक जोड़ोंमें | तब भगवान् कार्तिकेयने उन्हें अपनेतक पहुँचनेके
युद्ध हुआ, जिसका वर्णन करनेमें मैं सैकड़ों वर्षोंमें भी | पहले ही झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे काटकर पाँच
समर्थ नहीं हूँ ॥ ५ ॥ | बाणोंसे उसपर प्रहार किया। इससे भ्रान्तचित्त प्रचण्ड
उस युद्धमें रथी रथियोंके साथ, गजारोही | मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ा ॥ १० १/२ ॥

१२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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[उधर] नन्दीने भी चण्डपर पाँच तीक्ष्ण बाणोंसे
प्रहार किया, वह भी मूर्च्छित होकर सहसा धरतीपर गिर
पड़ा। भीमकायने पुष्पदन्तपर दस बाणोंसे प्रहार किया,
परंतु पुष्पदन्तने अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उन्हें समरभूमिमें
काट डाला और उसपर तीन बाणोंसे प्रहार किया, जिससे
उसने भी भूतलका आश्रय ले लिया अर्थात् पृथ्वीपर गिर
पड़ा ॥ ११-१३ ॥
भुशुण्डीने पाँच बाणोंसे कालकूटको गिरा दिया।
महाबली वीरभद्रने भी उस समरभूमिमें क्रोधित होकर
वज्रदंष्ट्रपर चार तीक्ष्ण बाणोंका प्रहार किया, उन
बाणोंका निवारण करके उसने वीरभद्रपर तीन बाणोंका
प्रहार किया ॥ १४-१५ ॥
उन आते हुए बाणोंको वीरभद्रने शीघ्र ही तीन
बाणोंसे काट डाला और वेगपूर्वक चलाये गये तीन
बाणोंसे वज्रदंष्ट्रको गिरा दिया ॥ १६ ॥
इन्द्रने भी वज्रके प्रहारसे दैत्य त्रिपुरासुरके अमात्यको
गिरा दिया। अनेक वीरोंका पतन हो जानेपर इन्द्रपुत्र
जयन्तको मारनेकी इच्छासे तीक्ष्ण तलवार उठाये दैत्यपुत्र
बलि उसके निकट आया। उसे इस प्रकार आते देखकर
एक पंखयुक्त बाणसे [जयन्तने उसके] खड्गको काट
डाला ॥ १७-१८ ॥
पुनः जयन्तने शीघ्र ही दैत्यपुत्र बलिपर तीन
बाणोंसे प्रहार किया। उससे आहत होकर वह रक्तका
वमन करते हुए मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ॥ १९ ॥
इस प्रकार सम्पूर्ण सेनाके नष्ट-भ्रष्ट हो जानेपर
देवसमूहद्वारा पीड़ित होकर चारों ओर पलायन कर रहे
दैत्योंको देखकर कुछ विजयी प्रमथगण उनके पीछे दौड़
पड़े। इस प्रकार देवताओंकी विजय होने और अपनी
सेनाके पलायन कर जानेपर भी त्रिपुरमें अधिष्ठित असुर
त्रिपुरासुर स्वयं ही ईश्वर [भगवान् शंकर]-से युद्ध
करनेके लिये आया। पहले उन दोनोंने शस्त्र-युद्ध किया
और तत्पश्चात् अस्त्रोंसे युद्ध किया ॥ २०-२२ ॥
उस दैत्य त्रिपुरासुरने वरुणास्त्र छोड़ा, जिससे
भयंकरसे-भी-भयंकर वर्षा होने लगी। उस समय
अत्यधिक कुहासा छा जानेके कारण कुछ भी ज्ञात नहीं
हो रहा था ॥ २३ ॥
उस कोलाहलपूर्ण, भयंकर और अत्यन्त कठिनाईसे
जीते जा सकनेवाले युद्धमें कभी-कभी बिजलीकी
चमकसे ही अपने-परायेका ज्ञान हो पाता था ॥ २४ ॥
वर्षा और आँधीसे पीड़ित उस अपनी सम्पूर्ण
सेनाको उपलवृष्टिके भयसे दसों दिशाओंमें भागते
देखकर गिरिशायी भगवान् शंकरने तुरंत वायव्यास्त्र
छोड़ा। [उससे उत्पन्न] महान् वायुसे विशाल बादल
खण्ड-खण्ड होकर आकाशमें बिखर गये ॥ २५-२६ ॥
दैत्योंकी सम्पूर्ण सेना वायुवेगसे घूमने लगी।
पक्षियोंके पंखोंसे युक्त वीरोंकी पगड़ियाँ दूर-दूरतक उड़
गयीं। कुछ रथ, अश्व और हाथीसवार सैनिक गिरकर
चूर-चूर हो गये, उन्मूलित वृक्षों और लताओंने सैनिकोंको
आच्छादित कर लिया ॥ २७-२८ ॥
तब दैत्य त्रिपुरासुरने पर्वतास्त्रसे उस वायुका
निवारण किया और अपने तूणीरसे एक बाण लेकर उसे
आग्नेयास्त्रसे अभिमन्त्रितकर धनुषको कानतक खींचकर
शिवकी सेनापर छोड़ दिया। उससे सहसा सब कुछ भस्म
कर डालनेवाली अंगारोंकी वर्षा होने लगी ॥ २९-३० ॥
उस समय ज्वालामालाओंसे पीड़ित सम्पूर्ण शिवसेना
उसे प्रलयकाल ही मानने लगी। उन देदीप्यमान ज्वालाओंसे
एक महाभयंकर पुरुषका प्राकट्य हुआ, जिसका सिर
नभतलको स्पर्श कर रहा था। उसका मुख भयंकर
दाढ़ोंसे युक्त था। वह भूखसे पीड़ित और उच्च स्वरमें
चिल्ला रहा था ॥ ३१-३२ ॥
वह अपनी सौ योजन विस्तृत जिह्वाको लपलपा
रहा था और अपनी नासिकासे छोड़ी गयी वायुके वेगसे
युद्धभूमिमें हाथियोंको घुमाते हुए उस सेनाका उसी
प्रकार भक्षण करने लगा, जैसे पक्षिराज गरुड़ सर्पोंका
भक्षण करते हैं ॥ ३३ १/२ ॥
तब उस पुरुषसे अत्यन्त पीड़ित भगवान् शंकरकी
सेना भागने लगी और शिवके पीछे छिपकर 'रक्षा करो,
रक्षा करो'-ऐसा कहने लगी ॥ ३४ १/२ ॥
तब गिरिजापति शिवने उस सेनाको 'भय मत
करो'-ऐसा कहकर अभयदान दिया और पर्जन्यास्त्रका

उ०ख०-अ०४४] * नारदजीके निर्देशसे भगवान् शंकरका तप करके गणेशजीको प्रसन्न करना * १२९
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प्रक्षेपण करके उस अग्निका निवारण कर दिया और एक | पार्वती निर्भयतापूर्वक रहने लगीं। तदनन्तर वह दैत्य
बाणके प्रहारसे उस घोर पुरुषको गिरा दिया ॥ ३५-३६ ॥ | (त्रिपुरासुर) भी उन्हें पकड़ ले जानेकी इच्छासे
तदनन्तर वह पुरुष [पुनः] उठकर शिवजीके | हिमालयपर्वतपर आया, परंतु हे मुनिश्रेष्ठ ! उसने कहीं
सैनिकोंका भक्षण करने लगा, तब वे प्रमथगण भयसे | गिरिराजनन्दिनी पार्वतीको नहीं देखा ॥ ४१-४२१/२ ॥
विह्वल होकर भागने लगे ॥ ३७॥ | वहाँ भ्रमण करते हुए उसने चिन्तामणि गणेशकी
वे लुढ़कते, गिरते, हाँफते हुए काँपने लगे थे और | एक मंगलमयी मूर्ति देखी, जो सहस्रों सूर्योंके सदृश
शिवजी भी निःसहाय होकर गुफामें चले गये ॥ ३८ ॥ | प्रकाशमान और अनेक प्रकारके अलंकारोंसे शोभायमान
षडानन स्कन्द आदि वीरोंने भी उन्हींका अनुसरण | थी। उस त्रैलोक्यसुन्दरी मूर्तिको शीघ्र ग्रहणकर वह
किया। तब दैत्य त्रिपुरासुरने [मनमें] यह विचारकर कि | अपने स्थानको चला आया। उस समय वह स्तुतिपाठ
पर्वतपर गिरिराजनन्दिनी पार्वती अकेली हैं, वह रणभूमि | करनेवाले वन्दीजनोंसे घिरा हुआ था और अनेक
छोड़कर उनके अपहरणकी इच्छासे मन्दराचलपर गया। | प्रकारके वाद्य बज रहे थे ॥ ४३-४४१/२॥
तब दूरसे ही उसे आते देखकर गिरिराजनन्दिनी पार्वती काँपने | तदनन्तर वह सर्वत्र विजयी और बलवान् दैत्य
लगीं और अपने पिताके पास जाकर बोलीं कि क्या वह | पातालमें गया। वहाँ जाते ही वह चिन्तामणिगणेशकी
दैत्य मुझे हरण करके ले ही जायगा ? ॥ ३९-४०१/२ ॥ | मूर्ति उसके हाथसे अन्तर्धान हो गयी। वह एक अद्भुत-
पार्वतीके उस वचनको सुनकर [पिता हिमालयने] | सी घटना घटित हुई। उस घटनाको ही अपशकुन मानकर
उन्हें ले जाकर एक अत्यन्त दुर्गम गृहमें रख दिया, जो | वह पुनः अपने नगरमें वापस लौट गया और अत्यन्त
स्वयं उनके अतिरिक्त सबके लिये अज्ञात था। वहाँ वे | खिन्नचित्त होकर घोर चिन्तामें पड़ गया ॥ ४५-४७॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शंकरजीकी पराजयका वर्णन'
नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४३ ॥
चौवालीसवाँ अध्याय
नारदजीके निर्देशसे भगवान् शंकरका तप करके गणेशजीको प्रसन्न करना
व्यासजी बोले—[हे ब्रह्मन्!] तब त्रिपुरासुरसे | उन्हें देखकर भगवान् शिव वैसे ही हर्षित हो उठे,
पराजित शम्भुने क्या किया? कैसे उस जयशाली दैत्य | जैसे कोई मुमूर्षु व्यक्ति अमृतको प्राप्त करके हर्षित हो
त्रिपुरासुरपर उन्होंने विजय प्राप्त की? ॥ १ ॥ | उठता है। उन्होंने उन्हें आसनपर विराजमानकर उनका
ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] तब भूतलको | विधिवत् पूजन किया ॥ ५ ॥
स्वाहा और स्वधासे विहीन (देवकार्य और पितृकार्यसे | चिन्तासे अत्यन्त आतुर उन शिवने उनका आलिंगन
विहीन) समझकर भगवान् शम्भु मनमें बार-बार चिन्ता | करके देवताओंके हित और दैत्यके वधकी इच्छासे उनसे
करने लगे कि देवगण कब कष्टसे मुक्त होंगे और अपने | कहा—॥ ६ ॥
स्थानको प्राप्त कर सकेंगे अथवा किस उपायसे इस | शिवजी बोले—[हे मुनिवर !] दैत्य त्रिपुरासुरने
दुर्जय [दैत्य]-की पराजय होगी? ॥ २-३ ॥ | सम्पूर्ण देवताओंको बलपूर्वक पराजितकर उनकी दुर्दशा
उनके इस प्रकार चिन्तातुर होनेपर संयोगसे [उसी | कर दी है। उसके साथ संग्राममें सभी देवताओंको
समय] मुनिश्रेष्ठ नारदजी भगवान् शंकर और सभी | विफलमनोरथ होकर भागना पड़ा ॥ ७ ॥
देवताओंको देखनेके लिये आये ॥ ४ ॥ | हे ब्रह्मन् ! वे देवता दसों दिशाओंमें भाग गये हैं।