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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 656 में से

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पृष्ठ 131

उ०ख०-अ०४४] * नारदजीके निर्देशसे भगवान् शंकरका तप करके गणेशजीको प्रसन्न करना * १२९
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प्रक्षेपण करके उस अग्निका निवारण कर दिया और एक | पार्वती निर्भयतापूर्वक रहने लगीं। तदनन्तर वह दैत्य
बाणके प्रहारसे उस घोर पुरुषको गिरा दिया ॥ ३५-३६ ॥ | (त्रिपुरासुर) भी उन्हें पकड़ ले जानेकी इच्छासे
तदनन्तर वह पुरुष [पुनः] उठकर शिवजीके | हिमालयपर्वतपर आया, परंतु हे मुनिश्रेष्ठ ! उसने कहीं
सैनिकोंका भक्षण करने लगा, तब वे प्रमथगण भयसे | गिरिराजनन्दिनी पार्वतीको नहीं देखा ॥ ४१-४२१/२ ॥
विह्वल होकर भागने लगे ॥ ३७॥ | वहाँ भ्रमण करते हुए उसने चिन्तामणि गणेशकी
वे लुढ़कते, गिरते, हाँफते हुए काँपने लगे थे और | एक मंगलमयी मूर्ति देखी, जो सहस्रों सूर्योंके सदृश
शिवजी भी निःसहाय होकर गुफामें चले गये ॥ ३८ ॥ | प्रकाशमान और अनेक प्रकारके अलंकारोंसे शोभायमान
षडानन स्कन्द आदि वीरोंने भी उन्हींका अनुसरण | थी। उस त्रैलोक्यसुन्दरी मूर्तिको शीघ्र ग्रहणकर वह
किया। तब दैत्य त्रिपुरासुरने [मनमें] यह विचारकर कि | अपने स्थानको चला आया। उस समय वह स्तुतिपाठ
पर्वतपर गिरिराजनन्दिनी पार्वती अकेली हैं, वह रणभूमि | करनेवाले वन्दीजनोंसे घिरा हुआ था और अनेक
छोड़कर उनके अपहरणकी इच्छासे मन्दराचलपर गया। | प्रकारके वाद्य बज रहे थे ॥ ४३-४४१/२॥
तब दूरसे ही उसे आते देखकर गिरिराजनन्दिनी पार्वती काँपने | तदनन्तर वह सर्वत्र विजयी और बलवान् दैत्य
लगीं और अपने पिताके पास जाकर बोलीं कि क्या वह | पातालमें गया। वहाँ जाते ही वह चिन्तामणिगणेशकी
दैत्य मुझे हरण करके ले ही जायगा ? ॥ ३९-४०१/२ ॥ | मूर्ति उसके हाथसे अन्तर्धान हो गयी। वह एक अद्भुत-
पार्वतीके उस वचनको सुनकर [पिता हिमालयने] | सी घटना घटित हुई। उस घटनाको ही अपशकुन मानकर
उन्हें ले जाकर एक अत्यन्त दुर्गम गृहमें रख दिया, जो | वह पुनः अपने नगरमें वापस लौट गया और अत्यन्त
स्वयं उनके अतिरिक्त सबके लिये अज्ञात था। वहाँ वे | खिन्नचित्त होकर घोर चिन्तामें पड़ गया ॥ ४५-४७॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शंकरजीकी पराजयका वर्णन'
नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४३ ॥
चौवालीसवाँ अध्याय
नारदजीके निर्देशसे भगवान् शंकरका तप करके गणेशजीको प्रसन्न करना
व्यासजी बोले—[हे ब्रह्मन्!] तब त्रिपुरासुरसे | उन्हें देखकर भगवान् शिव वैसे ही हर्षित हो उठे,
पराजित शम्भुने क्या किया? कैसे उस जयशाली दैत्य | जैसे कोई मुमूर्षु व्यक्ति अमृतको प्राप्त करके हर्षित हो
त्रिपुरासुरपर उन्होंने विजय प्राप्त की? ॥ १ ॥ | उठता है। उन्होंने उन्हें आसनपर विराजमानकर उनका
ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] तब भूतलको | विधिवत् पूजन किया ॥ ५ ॥
स्वाहा और स्वधासे विहीन (देवकार्य और पितृकार्यसे | चिन्तासे अत्यन्त आतुर उन शिवने उनका आलिंगन
विहीन) समझकर भगवान् शम्भु मनमें बार-बार चिन्ता | करके देवताओंके हित और दैत्यके वधकी इच्छासे उनसे
करने लगे कि देवगण कब कष्टसे मुक्त होंगे और अपने | कहा—॥ ६ ॥
स्थानको प्राप्त कर सकेंगे अथवा किस उपायसे इस | शिवजी बोले—[हे मुनिवर !] दैत्य त्रिपुरासुरने
दुर्जय [दैत्य]-की पराजय होगी? ॥ २-३ ॥ | सम्पूर्ण देवताओंको बलपूर्वक पराजितकर उनकी दुर्दशा
उनके इस प्रकार चिन्तातुर होनेपर संयोगसे [उसी | कर दी है। उसके साथ संग्राममें सभी देवताओंको
समय] मुनिश्रेष्ठ नारदजी भगवान् शंकर और सभी | विफलमनोरथ होकर भागना पड़ा ॥ ७ ॥
देवताओंको देखनेके लिये आये ॥ ४ ॥ | हे ब्रह्मन् ! वे देवता दसों दिशाओंमें भाग गये हैं।