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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

८३८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
चुम्बन लूँगी। तुम्हारे बिना मैं अत्यन्त दीन हो गयी हूँ। हे मेरे श्यामसुन्दर ! हे सुकुमार ! हे कमलाक्ष ! हे चतुर्भुज !
हे शारंगधर ! हे उदार श्रीकृष्ण ! मैं क्या करूँ ? कृष्णा, तुम्हारे बिना मैं अन्धी हो गयी हूँ! हे वनमाली ! मेरी उँगली
पकड़ने दौड़ते हुए आओ। मुझ अन्धी की वह लाठी था। उसे बैकुण्ठ में कौन छोड़ आया ? अब मैं अपना रास्ता
कैसे पार करूँ ? हे जगजेठी कृष्ण ! पुत्र, नाती, पौत्र आदि पूरे वंश की ही होली जल गयी ? यादवों के कुल में
कोई नहीं बचा ? कहते हुए वे वक्ष पीटने लगी। देवकी का रुदन सुनकर वसुदेव, उग्रसेन आदि सारे लोग रोते-
चिल्लाते प्रभास की ओर चल पड़े।
तत्र स्म त्वरिता जग्मुः कृष्णविश्लेषविह्वलाः ।
व्यसवः शेरते यत्र ज्ञातयो घ्नन्त आननम् ॥ १७॥
स्त्रियाँ, पुरुष, सुहृदजन आदि सभी एकत्र होकर रोते-चिल्लाते प्रभास की ओर चल पड़े। उनके चीख,
कोलाहल से वातावरण गूँज उठा। स्त्रियों ने तो आकाश-पाताल एक कर दिया। कृष्ण के वियोग में विह्वल सभी
लोग चल पड़े। यादव रण में जहाँ निर्जीव पड़े थे, वहाँ सभी लोग रोते-चिल्लाते जा पहुँचे।
देवकी रोहिणी चैव वसुदेवस्तथा सुतौ ।
कृष्णरामावपश्यन्तः शोकार्ता विजहुः स्मृतिम् ॥ १८॥
प्राणांश्च विजहुस्तत्र भगवद्विरहातुराः ।
उपगुह्यपतींस्तात चितामारुरुहुः स्त्रियः ॥ १९॥
देवकी और रोहिणी, वसुदेव और उग्रसेन ये दोनों, समरांगण में जहाँ यादव मृत पड़े थे वह स्थल देखने
पहुँचे। देखा तो वहाँ यादव वीरों की पंक्तियाँ महानिद्रा ले रही थीं। किन्तु उनमें बलराम और कृष्ण ये उनके पुत्र
नहीं दिखायी दिये। तब कृष्ण के विरह में शोकाकुल होकर उनका दुःख का आवेग नहीं थम पा रहा था। चारों
वहीं दहाड़ मारकर मूर्च्छित होकर गिर पड़े। निवर्तमान राम-कृष्ण का मुख भी हमें नहीं दिखायी दे रहा, इससे
उनके दुःख की पराकाष्ठा हो गयी और इसमें उनके प्राण भी निकल गये। सारे यादवों की पत्नियाँ अपने-अपने
पति का प्रेत लेकर सती होने के लिये चिता पर चढ़ गयीं। यादवों की स्त्रियाँ असंख्य थीं। उसमें कौन किस तरह
सती चली गयीं, उस अग्नि प्रवेश का शुक्राचार्य वर्णन करते हैं।
रामपत्न्यश्च तद्देहमुपगुह्याग्निमाविशन् ।
वसुदेवपत्न्यस्तद्गात्रं प्रद्युम्नादीन् हरेःस्नुषाः ।
कृष्णपत्न्योऽविशन्नग्निं रुक्मिण्याद्यास्तदात्मिकाः ॥ २०॥
रेवतीप्रमुख बलराम की स्त्रियों ने अपने पति का मन में ध्यान कर अग्नि में प्रवेश किया। देवकी और
रोहिणी तो वहाँ पहले से ही मृत पड़ी थीं। वसुदेव की जो शेष स्त्रियाँ थीं, उन्होंने भी अपने पति का देह ले कर
सहगमन किया। प्रद्युम्न के साथ महासाध्वी रती ने सहगमन किया और सांवा के साथ दुर्योधन की कन्या रूपवती
ने सहगमन किया। उसी प्रकार अनिरुद्ध के साथ रोचना और उरवा ने अग्निप्रवेश किया। इस प्रकार कृष्ण की
सभी बहुओं और यादवों की नायिकाओं ने अग्नि में प्रवेश किया। लेकिन श्रीकृष्ण की स्त्रियों ने जो अग्नि प्रवेश
किया, उसकी कृति अलौकिक थी। उन स्त्रियों में सभी सतियों में शिरोमणि जगन्माता रुक्मिणी प्रमुख थी। कृष्ण
का निर्वाण सुनने के बाद वह तत्क्षण तद्रूप हो गयी; ज्वाला जिस प्रकार अग्नि से जाकर मिलती है उसी प्रकार

इकतीसवाँ अध्याय ८३९
वह कृष्णत्व में लीन हो गयी। कृष्ण चला गया यह मालूम होते ही रुक्मिणी तटस्थ हो गयी और देह की खोल
त्याग कर कृष्णस्वरूप में मिलकर तद्रूप हो गयी। उसके देह का दहन करने के लिये देह बचा ही नहीं था। जिस
प्रकार कृष्ण स्वयंभू परिपूर्ण थे। वैसी ही वह भी थी। उन दोनों की गति एक जैसी थी। रुक्मिणी की तरह ही
सात अन्य पटरानियाँ थीं, वे तथा सोलह हजार स्त्रियाँ, इन्होंने भी तादात्म्य भाव से अग्नि में प्रवेश किया।
जिन्होंने कृष्णमुख का सुख भोगा, उनकी इससे कम गति हुई यह कहने में भी पाप लगेगा क्योंकि कृष्ण के
अंगसंग से ही वे ज्ञानस्वरूप हो गयी थीं। वाणी से 'कृष्ण कृष्ण' कहकर स्मरण करने से ही जब कोई पूर्ण
कृष्णस्वरूप हो जाता है तो फिर जिसने कृष्ण के साथ प्रत्यक्ष उपभोग किया, उसकी योग्यता कभी कम नहीं
होगी। जिसे कृष्ण का अंगसंग प्राप्त होगा, उसका वासनात्मक लिंगदेह भंग हो जायगा और अविनाशी की उपाधि
प्राप्त होकर, भोग भोगते हुए भी उसका कृष्ण के साथ तादात्म्य स्थापित रहेगा। जिसके ध्यान में श्रीकृष्ण की
मूर्ति रहती है, उसे चारों मुक्तियाँ वन्दन करती है। फिर जिसने स्वयं ही कृष्ण का उपभोग किया, उन्हें दूसरी गति
कभी नहीं प्राप्त होगी। इहलोक में जिसे कृष्ण का साथ होता है, उन्हें परलोक में दूसरी गति प्राप्त होगी ऐसा
कहने से ज्ञाता लोग रुष्ट हो जायेंगे। अतः उन्हें पूर्णत्व के कारण पूर्णस्वरूप की ही प्राप्ति होगी। जो लड़खड़ाकर
गंगा में गिरता है उसका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है; लेकिन जो विधियुक्त स्नान करता है उसका पाप क्यों नहीं
नष्ट होगा ? उसी प्रकार कृष्ण से व्यभिचार संगति करने से जब असंख्य गोपियों का उद्धार हुआ तो फिर उसकी
शादीशुदा स्त्रियों को दूसरी गति कैसे प्राप्त होगी ? अधिक क्या कहें, कृष्ण के पादस्पर्श से, अंगस्पर्श से जब
गोकुल वृन्दावन के तृण, वल्ली, मृग, पाषाण, गौएँ, गोपियाँ और ग्वाला लोग तर गये तो फिर कृष्ण की स्त्रियों
को अन्य गति कैसे मिलेगी ? इसलिये, किसी भी ढंग से क्यों न हो लेकिन जिसका कृष्ण से संग हुआ उनका हे
परीक्षित, कुरुराज अवश्य उद्धार हुआ।
अर्जुनः प्रेयसः सख्युः कृष्णस्य विरहातुरः।
आत्मानं सान्त्वयामास कृष्णगीतैः सदुक्तिभिः ॥ २१ ॥
जिसका रथ श्रीकृष्ण स्वयं हाँक रहा था, जिसका वह सारथी बना था, ऐसा वह प्रिय सखा अर्जुन तो
कृष्ण के विरह से अत्यन्त उद्विग्न हो गया था। इतने में उसे कृष्ण ने गीता में कही हुई सुदुक्ति का स्मरण हो
आया। फिर उसने अपने मन को किस प्रकार समझाया, जरा सुनिये। कृष्ण मेरे मन का मन है, कृष्ण मेरी बुद्धि
का अधिष्ठान है, कृष्ण प्रकाश से ज्ञान प्रकाशित होता है फिर उसमें और मुझमें भिन्नत्व कहाँ रह गया ?
कृष्णप्रभा से आँखें देखने का काम करती हैं, कृष्ण की अवधान शक्ति से कान सुनने का कार्य करते हैं, कृष्ण
की अनुवाद शक्ति से वाणी बोलती है, ऐसा होते हुए उसमें और मुझमें अन्तर है, यह मानना व्यर्थ है। कृष्ण ही
हृदय में रहने वाला अव्यंग आत्मा है, कृष्ण ही मेरे अंग का अवयव है; ऐसे उस कृष्ण का और मेरा वियोग
हुआ यह मानना भी केवल मिथ्या और मायाजनित है। कृष्ण मेरे जीव का जीवन है, कृष्ण मुझमें अंतर्बाह्य
व्याप्त है, कृष्ण का वियोग मानने वाला मेरा मन भी श्रीकृष्ण में ही लीन हो गया है। भिन्न-भिन्न प्राणियों के
जो आकार हैं, उनमें कृष्ण ऐक्यरूप से विद्यमान है। विषम में भी सम रहने वाला जो श्रीपति है उससे वियोग
कभी नहीं होगा। घर मिट्टी से भिन्न नहीं होता। तंतु का त्याग कर वस्त्र को अलग नहीं किया जा सकता। उसी
प्रकार मैं अर्जुन श्रीकृष्ण से बिलकुल अलग नहीं हूँ। जब मैं श्रीकृष्ण से वियोग की बात करता हूँ, उस समय
भी श्रीकृष्ण वहाँ उपस्थित रहता है। अतः जिसे लोग सच्चा वियोग कहते हैं, वह भ्रम के कारण तथा

८४० श्रीमद् एकनाथी भागवत

मूर्खतावश है। नित्य सर्वगत, परिपूर्ण तथा अखण्ड दण्डायमान श्रीकृष्ण में और मुझमें कोई अन्तर नहीं है। 'न
जायते म्रियते' अर्थात् जो जन्म भी नहीं लेता और मरता भी नहीं, ऐसा अपने सम्बन्ध में श्रीकृष्ण ने स्वयं ही
कहा है। उन श्रीकृष्ण को जन्म और मरण है ऐसा मूर्ख लोग ही स्वीकार करेंगे। 'मैं अक्षर और परब्रह्म' हूँ,
ऐसा स्वयं पुरुषोत्तम ने ही कहा है। क्षर और अक्षर इनसे भी परे रहने वाला 'उत्तम पुरुष' श्रीकृष्ण, उसे भ्रांत
लोग अपने मनोधर्म के अनुसार जन्म-मरण के फेरे हैं ऐसी कल्पना करते हैं। उस कृष्ण में और मुझमें कल्पांत
में भी भिन्नता नहीं है। इस प्रकार गीतार्थ का स्मरण करते ही उसे अपने पूर्णत्व की प्रतीति होती है। मैं अजन्मा,
आद्य, अचल, नित्य, निर्मल तथा आत्मस्वरूप हूँ। मेरे स्वरूप में कभी कोई परिवर्तन नहीं है। त्रैलोक्य मेरा ही
खेल है। संसार को नियमों का बोध कराने वाला वेद मेरे ही श्वासोच्छ्वास से निकला हुआ बोध है। आनन्द
का परमानन्द और स्वानंद का कंद मैं स्वयं हूँ। उदक के रूप में मैं ही हूँ तथा प्रकृति पुरुषों का जनक हूँ। मेरे
ही स्वरूप के आधार पर मैं ही कृष्ण रूप में अवतार लेकर, अपनी ही लीला से नाना प्रकार के चरित्रों का
आचरण कर अन्त में स्वस्वरूप में समाविष्ट हो गया। मेरे निजस्वरूप के ही बल पर मैंने कृष्णरूप से क्रीड़ा
की और अन्त में अपने में ही आपनिष्ठा से एकरूप होकर स्वयं में ही मिल गया। एक नर और एक नारायण,
वे परस्पर अभिन्न ही थे इसीलिये अर्जुन अपने को पूर्ण स्वरूप में देखने लगा। वह कृपासागर कितना कृपालु
है। युद्ध के समय उसने अर्जुन को उपदेश किया; लेकिन उस समय उसकी जो समाधि लगी, वह सचमुच
कल्पांत में नहीं टूट पाएगी। वास्तव में देखा जाय तो वह स्थान भी बहुत पवित्र था एकांत में नहीं था। वहाँ
असंख्य रथों की घड़घड़ाहट चल रही थी और शस्त्रों की खनखनाहट हो रही थी। किन्तु वैसे स्थान पर भी
निर्दोष परमानिष्ठा मन पर अंकित कर दी। समाधि भी ऐसी लगी कि महायुद्ध में भी नहीं टूटी। अन्त में वह
बोध कृष्ण के निर्वाण प्रसंग में पूर्णरूप से प्रकट हुआ। जिसे श्रीकृष्ण ने स्वयं गीता का उपदेश किया, वह उस
पर प्रभावकारी नहीं हुआ यह कहने से वाणी को दोष लगेगा। वह वाणी गलित कुष्ठ से झड़ जायेगी, उसमें
विकल्प के कीड़े लगेंगे। कृष्णोक्ति से बोध नहीं हुआ यह कहने वाली जीभ ही झड़ कर गिर जायेगी। गीता के
उपदेश से पूर्णत्व नहीं आता, यह कहते समय वाणी की देवता सरस्वती थर-थर काँपने लगेगी। फिर दूसरों की
क्या कथा कहें? जो गीता सुनता है, देखता है और पठन करता है, जिसे गीता का केवल स्मरण होता है उसे
भी पूर्णत्व प्राप्त होता है; फिर जिसे प्रत्यक्ष उपदेश हुआ था, उसे पूर्णत्व क्यों नहीं आयेगा? गीतार्थ का पूर्णत्व
या तो उसका वक्ता श्रीकृष्ण जानता है या फिर उसका श्रोता अर्जुन जानता है क्योंकि उसका रहस्य उसके ही
अंतःकरण में अंकित था। वेदार्थ का सारांश निकालकर श्रीकृष्ण ने गीता प्रकट की। उसका रहस्य जानने पर
मोक्ष अनायास ही प्राप्त होता है। वेदान्त परदेशी हो गया था। उसे गीतार्थ ने आश्रय प्रदान किया। उसी के बल
पर वह सबका मन जीत कर समर्थ हो गया। वेदों का जन्म कृष्ण के श्वासोश्वास से हुआ; लेकिन गीता प्रत्यक्ष
उसके मुख से प्रकट हुई। इसीलिये गीता का अर्थ अगाध है। उसके ही योग से वेद सशक्त हुए। वेद ने
ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य इन तीन वर्णों को अपनाया था और शूद्र तथा स्त्रियों को दूर ढकेल दिया था। उनके कानों
को भी वह स्पर्श नहीं करता था। यह वेद में कमी थी। वेद की यह न्यूनता दूर करने के लिये श्रीकृष्ण ने गीता
का आविर्भाव किया। गीता के श्रवण से और पठन से सभी का उद्धार होता है। अर्जुन से प्रेम के कारण
श्रीकृष्ण ने गीतार्थ प्रकट किया। उस गीता के श्रवण से और पठन से जड़-जीवों का उद्धार होता है। सारांश,
गीता की महिमा महान है। उस गीतार्थ से ही अर्जुन ने अपनी सांत्वना कर ली और पहले की तरह देहभाव
स्थिर कर स्वस्थचित्त हो गया।

इकतीसवाँ अध्याय ८४१
बन्धूनां नष्टगोत्राणामर्जुनः साम्परायिकम्।
हतानां कारयामास यथावदनुपूर्वशः ॥ २२॥
सभी यादव अपने कुल के साथ मर गये। उनकी उत्तर क्रिया करने के लिये भी कोई गोत्रज शेष नहीं
बचा। वज्र नाम का अनिरुद्ध का पुत्र* द्वारका में रहता था इसलिये वह सारा उत्तर कार्य अर्जुन को करना पड़ा।
मैं अब निष्कर्म ब्रह्मस्वरूप हो गया हूँ, अतः मैं यह अंत्यकर्म नहीं करूँगा ऐसी ज्ञानगर्व की अकड़ अर्जुन में नहीं
थी। 'कर्मण्यकर्म यः पश्येत्' अर्थात् कर्म में जो अकर्म देखता है वह बुद्धिमान और योगी है (गीता अ ४/१८)
यह गीता का गूढ़ रहस्य अर्जुन के अंतःकरण में अंकित था। इसलिये उसने उन सबका अंत्यकर्म शान्त मन से
किया। पहले वरिष्ठों का दहन किया, फिर कनिष्ठों का किया। उसी क्रम में सबका पिण्डदान कर सबका तिल
तर्पण भी किया। इस पर सारी उत्तर क्रिया करके अर्जुन द्वारका लौटा। तो वहाँ दूसरा ही अरिष्ट सामने खड़ा था।
समुद्र अत्यन्त क्षुब्ध हो उठा था।
द्वारकां हरिणा त्यक्तां समुद्रोऽप्लावयत् क्षणात्।
वर्जयित्वा महाराज श्रीमद्भगवदालयम् ॥ २३ ॥
नित्यं संनिहितस्तत्र भगवान् मधुसूदनः।
स्मृत्याशेषाशुभहरं सर्वमङ्गलमङ्गलम् ॥ २४॥
कृष्ण के द्वारका छोड़कर जाते ही समुद्र ने क्षणभर का भी विलम्ब न कर द्वारका क्षणभर में डुबो दी। तब
सभी लोग हाहाकार करते हुए भागने लगे। समुद्र ने पूरी द्वारका डुबोयी लेकिन भगवान का स्थान छोड़ दिया
क्योंकि पाताल से वह कुशनिर्दलन करने आया था। भगवान का स्थान समुद्र ने नहीं डुबोया क्योंकि वहाँ श्रीकृष्ण
का संनिधान नित्य नूतन स्फूर्ति का स्रोत रहता है। जिसका स्मरण करते ही महापातकों का नाश होता है और जो
सर्वमंगल का अधिष्ठान है, वह श्रीहरि का स्थान बना हुआ है। उस द्वारका में अभी भी श्रीकृष्ण की पूजा होती
है। हे महाराज परीक्षित! वह अधोक्षज का जागृत स्थल है।
स्त्रीबालवृद्धानादाय हतशेषान् धनंजयः।
इन्द्रप्रस्थं समावेश्य वज्रं तत्राभ्यषेचयत् ॥ २५॥
इस प्रकार द्वारका के डूबने के बाद शेष बचे छोटे-छोटे बालक, वृद्ध, स्त्री, पुरुष तथा स्त्रियों को साथ
लेकर अर्जुन इन्द्रप्रस्थ जाने के लिये तैयार हुआ। जो यादव प्रभास तक गये थे वे सभी मर गये। वज्रादिक जो
शेष बचे थे उनको लेकर अर्जुन निकल पड़ा। इस प्रकार उन सबको लेकर अर्जुन इन्द्रप्रस्थ आया और
यादववंश के राजकर्ता के रूप में उसने वज्र का राज्याभिषेक किया। अनिरुद्ध का पुत्र वज्र यही यादववंश के
राज्य का उत्तराधिकारी था, इसलिये उसका राज्याभिषेक कर वीर अर्जुन तत्काल धर्मराज के पास जाने के
तैयार हुआ।
श्रुत्वा सुहृद्वधं राजन्नर्जुनात्ते पितामहाः।
त्वां तु वंशधरं कृत्वा जग्मुः सर्वे महापथम् ॥ २६ ॥
अर्जुन ने श्रीकृष्ण के निजधाम जाने का समाचार युधिष्ठिर को सुनाया। फिर परीक्षित, तुम्हें राजपाट देकर

  • अनिरुद्ध को रुक्मिणी की नतिनी से हुआ पुत्र; यादवी के बाद अर्जुन उसे इन्द्रप्रस्थ ले गये और उसे राजगद्दी पर बिठाया।

८४२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वे तत्काल निर्वाण के पथ पर चल पड़े। श्रीकृष्ण निजधाम गये यह सुनते ही कुंती ने वहीं प्राण त्याग दिये और
द्रौपदी सहित पाँचों पाण्डव महापंथ पर चल पड़े।
य एतद् देवदेवस्य विष्णोः कर्माणि जन्म च।
कीर्तयेच्छ्रद्धया मर्त्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २७॥
ऐसा वह देवाधिदेव सर्वेश्वर, उसके मत्स्यकूर्मादि अवतार और जन्मकर्मादि नाना चरित्रों का जो गायन
करते हैं, वे अत्यन्त पवित्र और पुण्यराशि हैं। उस चरित्र का श्रद्धापूर्वक गायन करने से प्रयागादि सारे तीर्थों को
उसके योग से पवित्रता प्राप्त होगी। हे परीक्षित्! श्रद्धायुक्त हरिकीर्तन करने से, उससे अधिक पवित्र कुछ है ही
नहीं। वह श्रद्धा कैसी होती है, यह पूछो तो जिस प्रकार धन का लोभी धन के पास चिपक कर बैठता है, अथवा
चींटा को जिस प्रकार गुड़ से प्रेम होता है, वैसा ही प्रेम कीर्तन में होना चाहिये। अनेक दिन कष्ट करने के बाद
बाँझ स्त्री को जब बच्चा पैदा होता है तो उसे जिस प्रकार उसके प्रति अत्यन्त ममत्त्व होता है, उसी प्रकार कीर्तन
के प्रति प्रेम होना चाहिये। हे परीक्षित्! हरिकीर्तन के वैभव से बेहोश होकर श्रीहरि का चरित्र भक्तिभाव से गाने
के लिये जो पतंग की तरह दौड़कर आता है उसका नाम 'श्रद्धा' है। ऐसी श्रद्धासम्पत्ति से युक्त होकर भगवान की
गुणानुवाद कीर्ति का वर्णन करने पर, हे राजश्रेष्ठ! उस श्रद्धावान को 'परमप्राप्ति' होती है, यह निश्चित रूप से
जान लो। परमेश्वर ने यद्यपि अपनी लीला से नाना प्रकार के अवतार लिये हैं, फिर भी उनमें श्रीराम और
श्रीकृष्ण इनके चरित्र अत्यन्त गम्भीर और पवित्र हैं। कृष्ण की चोटी का गीतों में वर्णन करने से सुवर्णचोरी का
पाप धुल जाता है। कृष्ण के व्यभिचार का वर्णन करने से गुरुपत्नीगमन का पाप भी नष्ट हो जाता है। पूतना के
दुग्धप्राशन का चरित्र पढ़ने से, श्रद्धालु पुरुष के सुरापानादि दोष दूर हो जाते हैं। रावण राक्षस कुल का था किन्तु
वह शुद्ध ब्राह्मण जाति का था। वह नित्य वेदपाठ करता था क्योंकि वह ब्रह्मदेव का पोता है। श्रीराम ने उसके पूरे
कुल का नाश किया। उस चरित्र का पठन करने से ब्रह्म हत्या का लय होता है। श्रीकृष्ण धर्म का सहायक था।
इसलिये उसने पाण्डवों का संरक्षण किया। उस महाभारत के श्रवण से मृत ब्राह्मण जीवित हो उठे। जनमेजय ने
अठारह ब्रह्महत्याएँ की थीं। उसे महाभारत के अठारह पर्व सुनाकर मृत अठारह ब्राह्मणों को जीवित किया। कृष्ण
की यह कीर्ति अत्यन्त पावन है। श्रीराम और श्रीकृष्ण की कीर्ति सुनने पर बेचारे महापातक हैं ही कितने?
श्रद्धापूर्वक कीर्ति का गायन करने से चारों मुक्तियाँ चरण स्पर्श करती हैं। श्रद्धा के वैभव से तथा प्यार से श्रीकृष्ण
के चरित्र का गायन करने से देह को होते हुए ही वे सायुज्य स्थिति तक पहुँचते हैं। जिसके हृदय में और मुख में
हरिकीर्तन रहता है वह भले ही देह में विचरण करता दिखायी देता हो लेकिन वह देह में नहीं बल्कि हरि के
पास रहता है और हरि भी पूर्ण रूप से उसके हृदय में रहता है। वह भी हरि में ही रहता है और हरि भी उसमें
अन्तर्बाह्य रहता है। हे परीक्षित्! इस प्रकार 'कीर्तिवंत' अर्थात् कीर्ति गाने वाले संसार में विचरण कर रहे हैं।
अतः इस मृत्युलोक में हरिकीर्तन से अधिक सरल कोई अन्य साधन नहीं है। जो हरिकीर्तन में रममाण होते हैं वे
देहबंधन का स्पर्श भी नहीं करते। कृष्ण के कीर्तन से अंतःकरण एक बार शुद्ध और स्वच्छ होने पर वह कल्पांत
में भी मलिन नहीं होता। देह अवश्य कर्म करता है लेकिन उससे अंतर की स्थिति मलिन नहीं होती। आकाश
बारिश से नहीं भींगता; अथवा कुण्ड के जल का सूर्य का प्रतिबिम्ब उससे गीला नहीं होता। उसी प्रकार
हरिकीर्ति-कीर्तन के घोष से जिसकी निष्कामदशा उज्ज्वल होती है, वे देहकर्म में विचरण करते हुए भी देह की
मलिनता से अलिप्त रहते हैं। अपने भक्तों का शरीर कर्म पुरुषोत्तम स्वयं चलाता है, इसलिये भक्तों को अच्छे-बुरे
कर्मों की बाधा नहीं होती। वास्तव में भक्तों के और अभक्तों के कर्म भगवान ही करता है; फिर भक्तों की ही

स्थिति अलिप्त क्यों रहती है? और अभक्त ही अत्यन्त बद्ध क्यों होते हैं? तो कृष्णकीर्ति का कीर्तन करने में
भक्तों का देहाभिमान नष्ट होता है, इसलिये वे अलिप्त रहते हैं और अभक्तों को अहंभाव होने के कारण बन्धन
प्राप्त होता है। हे परीक्षित! यह स्थिति माँगने से नहीं मिलती। बिलकुल इच्छापूर्वक श्रीकृष्ण कीर्ति गाने से अपने
आप ही अंकित हो जाती है। श्रीकृष्ण कीर्ति के कीर्तन से और पठन से सन्तुष्ट होकर श्रीकृष्ण ने अनेक लोगों
का संसार धारण छुड़ा दिया है। कृष्ण कीर्ति के कीर्तन में रुचि अहंकार का कारावास तोड़ देती है और असीम
रुचि से कीर्ति गाने से जीव का जीवन बंध टूट जाता है। इस प्रकार कृष्ण की कीर्ति का कीर्तन कर भक्तों को
'कृष्ण की उपाधि' प्राप्त कर लेनी चाहिये। संसार का उद्धार करने के लिये ही श्रीकृष्ण ने अपनी कीर्ति का
प्रसार किया है। ऐसा यह परमामृत का सार श्रीकृष्ण का चरित्र जन्म से अन्त तक परम अद्भुत है।
इत्थं हरेर्भगवतो रुचिरावतारवीर्याणि बालचरितानि च शान्तमानि।
अन्यत्र चेह च श्रुतानि गृणन् मनुष्यो भक्तिं परां परमहंसगतौ लभेत ॥ २८ ॥
ज्ञानधन श्रीकृष्ण का चरित्र जन्म से ही पावन है। जिसके संग से ग्वालों जैसे अज्ञानी जनों का उद्धार हुआ,
जिसके साथ व्यभिचार करने से कितनी ही गोपियों का उद्धार हुआ; क्योंकि उन्होंने कृष्ण की श्यामसुन्दर मूर्ति
देखकर मन में दृढ़ अभिलाषा रखी थी। कृष्ण की सुन्दर मूर्ति देखकर गौएँ भी सम्मोहित हो जाती थीं और
तटस्थ खड़ी रहती थीं। इस प्रकार कृष्ण की संगति से पशुओं का भी उद्धार हो गया। फिर गोपियों का उद्धार
क्यों नहीं होगा? वृन्दावन के तृण तथा पाषाण का (तृणजीव और पाषाण रूप के जीव) भी कृष्ण की संगति से
उद्धार हुआ, ऐसा वह श्रीकृष्ण ज्ञान का साक्षात पुतला था। स्तन में विष भर कर पूतना कृष्ण का प्राण हरने
आयी, उसका भी कृष्ण की संगति से उद्धार हो गया। कंस-शिशुपाल आदि का कृष्ण ने द्वेष के ही कारण उद्धार
किया। अंग में चन्दन लगाया इसलिये कुब्जा को तारा मद से उन्मत्त मूढ़ कवलयापीड हाथी मारने के लिये
आया, उसने कृष्ण को जोर से चोट पहुँचायी इसलिये उसे मोक्ष सुलभ कर उसका उद्धार किया। श्रीकृष्ण पर
अरिष्ट लादने के लिये अरिष्टासुर आया था, उसे सींग से पकड़ कर तारा। अघासुर ने श्रीकृष्ण को निगल लिया
था, उसे तत्काल चीर कर उसके दो फाँक कर उसका उद्धार किया। कृष्ण की प्रतीक्षा करते हुए बकासुर यमुना
के जल में ध्यानस्थ बैठा था, उसने कृष्ण को तत्काल निगल लिया। तब उसके दो फाँक कर उसका उद्धार
किया। तृणावर्त कृष्ण को उड़ाने आया था, उसे लट्टू की तरह घुमाकर मारा। ऐसा कृष्ण बैरी को भी अंगसंग से
कृपालु होकर तारता है। गोपालों को चोर चुरा कर ले गये, उस ठग व्योमासुर को मार कर उसका भी उद्धार
किया। श्रीकृष्ण मोक्ष दिलाने में उदार हैं। उसने कंस का केशी नामक घोड़ा मारकर उसे तारा। अखाड़े में मल्लों
का संहार कर मोक्ष की खैरात कर दी। विषैले कालिया सर्प को समाप्त कर दिया। वत्सासुर को वृक्ष पर फेंक
कर मारा। ऐसा श्रीकृष्ण संसार समुद्र की नौका है। वह स्वसंगति से जड़मूढ़ जीवों का उद्धार करता है। जिन्होंने
कृष्ण के साथ खेल खेले थे, जिनके घर का वह पानी पिया था, जिनके घर का मक्खन चुरा कर खाया था, उन
ग्वालिनों का भी उसने उद्धार किया। रुक्मिया की दुर्गत कर उसे तारा, बाणासुर की भुजाएँ तोड़कर उसे तारा।
कुशराक्षस का प्राण लेकर उसे तारा। इस प्रकार श्रीकृष्ण मोक्षदाता है। जिन्होंने श्रीकृष्ण से संबंध किया अथवा
जो मौज में उसे देखने आये उन्हें उसने दर्शन सुख से तृप्त कर लिया। पाण्डवों का पक्ष लेकर उन्हें तारा, बैरियों
को शस्त्राघात से तारा। इस प्रकार कृष्ण ने अपनी संगति से अनेक लोगों का उद्धार किया। वैरियों को द्वेषभाव से
ही तारा; भक्त भक्तिभाव से उसके पास पहुँचे और जीव भाव से अनुसरण करने वाली गोपियों को प्रत्यक्ष संगति
का अनुभव देकर उनका उद्धार किया। संरक्षण कर गौओं को तारा; मुकुट पर मोरपंख लगाकर मयूरों का उद्धार

८४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
किया। केशों में फूलों के गुच्छे खोंस कर वृक्षों का उद्धार किया। ऐसा कृष्ण पूर्णब्रह्म होने के कारण सभी दृष्टियों
से तारक ही है। कृष्णावतार पूर्ण ब्रह्म था। उसका लीलाचरित्र ज्ञानप्रधान था। उसमें भी उसका बालचरित्र परम
पावन है। वह सर्वत्र ज्ञानियों के लिये वन्दनीय है। षड्गुणों का वैभव लेकर श्रीकृष्ण का अवतार हुआ था। यश,
श्री, औदार्य, कीर्ति, ज्ञान और वैराग्य की स्थिति उसके पास अक्षय थी। अन्य अवतारों में ये गुण पूर्ण रूप में नहीं
थे। किन्तु कृष्णावतार परिपूर्ण ब्रह्म होने के कारण ये सारे गुण उसमें पूर्णरूप से प्रकट हुए थे। इसलिये
कृष्णावतार छहों गुणों से सम्पन्न था। इसलिये उसकी संगति से सभी का सदासर्वदा उद्धार हुआ। कृष्ण की संगति
से उद्धार हुआ हो, या कृष्ण की मूरत देखकर लोग तर गये हों इनमें कोई आश्चर्य नहीं है। लेकिन इस
कृष्णकीर्ति का ही गायन कर कितनों का उद्धार हो गया उनकी कोई गिनती नहीं है। अभी भी श्रद्धालु लोगों का
उद्धार हो ही रहा है। इच्छापूर्वक कृष्ण कीर्ति का गायन करने से सद्गति का लाभ होता है; और जिसे परा कहते
हैं, वह चौथी भक्ति घर चल कर आती है। आर्त, जिज्ञासु तथा अर्थार्थी इनकी स्थिति तो सहज रहती ही है,
लेकिन श्रीकृष्ण कीर्ति का स्वयं गायन करने से अखण्ड चौथी भक्ति प्रकट होती है, विषयों के प्रति अपने आप
ही विरक्ति उत्पन्न होती है और शमदम भी सहज ही चरण चूमते हैं। कृष्ण कीर्ति का जो निरन्तर जप करता है,
उसके पास श्रीकृष्ण सदा निवास करते हैं। श्रीकृष्ण की कीर्ति का भक्तिभाव से जप करने से समस्त प्राणिमात्र में
श्रीकृष्ण प्रकट होता है और परमात्म स्थिति के साथ चौथी भक्ति अपने आप हृदय में स्थापित हो जाती है। उस
भक्ति में पूज्य और पूज्यक दोनों श्रीकृष्ण ही रहते हैं। अर्थात् पूजा, अर्चना आदि सारे उपचार भगवान् स्वयं ही
हो जाता है। इत्र, गंध (पुष्प), धूप, दीप आदि सब कुछ श्रीकृष्ण स्वयं ही बन जाता है। स्वयं ही स्वयं को
भजना यही चौथी भक्ति का लक्षण है। चौथी भक्ति का स्वरूप यही है कि भोग्य और भोक्ता श्रीकृष्ण स्वयं ही
होने के कारण भक्त और श्रीकृष्ण में क्षणार्ध के लिये भी अलगाव नहीं होता। उस समय भक्त का देह, घर, द्वार
सब कुछ श्रीकृष्ण ही बन जाता है। जिस स्वरूप में कभी च्युति नहीं है, वह निश्चित रूप से कृष्ण स्वरूप ही
है। कृष्ण की कीर्ति वर्णन करने से भक्त स्वयं तद्रूप होकर रहते हैं। कृष्णकीर्ति का प्रत्येक अक्षर वेदों का
आत्मलिंग है। हे परीक्षित्! कृष्ण चरित्र सभी शास्त्रों का परमसार है। वेदों का जन्मस्थान, सकल शास्त्रों का
समाधान, षड्दर्शनों का ज्ञान अथवा समन्वय यही श्रीकृष्ण का आठवाँ पूर्णावतार है। हरि के ऐसे अनंत अवतार
हुए हैं किन्तु कृष्णावतार यह ज्ञानघन अवतार है। उसका चरित्र अत्यन्त पवित्र तथा भवबंधन नष्ट करने वाला है।
हे नृपनाथ! उस कृष्णकीर्ति का सादर स्मरण करने से संसारबन्धन की सचमुच ही समाप्ति होती है।
श्रीकृष्णकीर्ति के साथ वैभव रहता है, श्रीकृष्ण कीर्ति के पास वैराग्य रहता है; जिनके मन में श्रीकृष्ण की कीर्ति
रहती है वे कलिकाल से भी भयभीत नहीं होते। यदि आलस में भी कृष्णमूर्ति का स्मरण करें तो भी सारे पातक
भस्म हो जाते हैं। कृष्ण की कीर्ति का जो सदासर्वदा गायन करते हैं, उनके पास चारों मुक्तियाँ दासी बनकर रहती
हैं, श्रीकृष्ण कीर्ति का एक अक्षर भी महापातकों की राशि भस्म कर देता है। वह मोक्ष दिलाकर, उदारतापूर्वक
संसार का उद्धार करने वाला है। भगवान ने अनेक अवतार लिये हैं, लेकिन इस अवतार की बात निराली है।
इसकी सारी लीला ज्ञानप्रधान है। इसका रहस्य अगम्य है, वह ब्रह्मादिक देवताओं की भी समझ में आने लायक
नहीं है। जन्म से ही जो कर्म किये, वे सब एक से एक अद्भुत थे। नित्य नया चमत्कार और ब्रह्मसुख का सुकाल
कर दिया। अवतारों में केवल श्रीकृष्ण ही निश्चित पूर्ण ब्रह्मस्वरूप है। उसके ज्ञानधन चरित्र के पठन से लोग
पवित्र होते हैं। इस प्रकार कृष्णकीर्ति पावन है। उसका पठन करने से पाठकों का उद्धार होता है और श्रद्धापूर्वक
श्रवण करने वाले भी संसार सागर तर जाते हैं। कलियुग में लोग मंद बुद्धि होंगे। उसका सुगम रीति से निदान हो

इकतीसवाँ अध्याय
८४५

सके इसलिये कृष्णकीर्तिका विस्तार किया है। ऐसी परमपावन भगवान की कीर्ति का श्रीभागवत में विस्तार से
वर्णन हुआ है। उसमें दशमस्कंध की श्रीकृष्ण की कीर्ति तो अत्यन्त मधुर है। दीनजनों के तरने के लिये श्रीकृष्ण
नित्य नूतन दिन बढ़-चढ़ कर अपनी कीर्ति का प्रसार करते हैं। नट का वेश धारण कर श्रीकृष्ण ने अवतार लिया
था। उसके अनुसार उसने प्रतिदिन नाना प्रकार के चरित्रों का अभिनय किया। उसका बालचरित अत्यन्त मधुर,
सुन्दर और पवित्र है। उसमें अखाड़े में मल्लों का गर्व हरण करने का चरित्र परम पावन है। जरासंध को पराजित
कर, कालयवन का नाश कर श्रीकृष्ण ने अद्भुत चरित्र दिखलाया है। रण में रुक्मिया को दुर्गत कर तथा
शिशुपालादि वीरों का दमन कर कृष्ण ने रुक्मिणी का हरण किया। वह लीला भी परम पावन है। पटरानियों का
विवाह, भौमासुर का संहार, पारिजातक का हरण, सोलह सहस्र स्त्रियों का पाणिग्रहण, समुद्र में द्वारका की बस्ती
बसाकर रातों रात किसी की निद्रा को भंग किये बिना पूरी मथुरा वहाँ ले आये, यह कृष्ण की लीला अघटित ही
हे। बछड़े और गोपाल बनकर उसने अपना पूर्णत्व प्रकट किया, ऐसा कृष्ण पूर्णरूप से अवतारी है, यह
ब्रह्मादिदेवताओं को भी नहीं मालूम हुआ। सब्जी का एक पत्ता खाकर समस्त ऋषि समुदाय का तृप्त किया। ऐसे
ज्ञानप्रधान तथा परमपावन चरित्रों का उसने निर्वाह किया। कृष्ण की ऐसी लीलाएँ अद्भुत हैं। वह पठन करने
वालों को पुनीत करती हैं। वह साद्यंत कथा दशम स्कंध में कही गयी है। एकादश स्कंध उससे अलग है। उसमें
मूल से ही परम पद की प्राप्ति है। ज्ञान, वैराग्य, भक्ति और मुक्ति इनके बारे में श्रीकृष्ण ने अपने मुख से बताया
है। पहले अध्याय में नारद और वसुदेव का संवाद तथा वैराग्य पूर्णरूप से भरा हुआ है। वही साधकों की
भूमिशुद्धि अर्थात् स्थान का चयन है। उसमें निमिजायंत का सवांद निर्भयस्थान कौन सा है? उत्तम भागवत कौन
है ? माया और उससे तरना, कर्म और ब्रह्म आदि जनक के नौ प्रश्नों के सम्पूर्ण उत्तर, वही जमीन की जुताई है।
प्रश्नोत्तर रूप हल से खेत जोत कर तैयार किया। छठवें अध्याय में देवताओं ने श्रीकृष्ण की प्रार्थना की, उस
समय कृष्ण कुलक्षय के अन्त में निजधाम के लिये प्रयाण करेगा, इस बात को ध्यान में रखकर उद्धव ने जो खेद
प्रकट किया, उसने कल्पनाकाश का निर्दलन कर विकल्प के पत्ते तोड़ दिये। काम और लोभरूपी गुप्त खूँट
भीतर रह गये थे, वे अवरोध उत्पन्न करने लगे। उन्हें तीव्र अनुताप से समूल उखाड़ कर समतल भूमि तैयार की।
क्रोध की मोटी जड़ें थीं उन्हें शान्ति ने समूल उखाड़ दिया। उद्धव स्वरूप चातक का दुःख हरण करने के लिये
श्रीकृष्ण ने कृपारूपी मेघ की जलवृष्टि की। इससे सारा खेत अच्छी तरह गीला हो गया और तत्काल आत्मज्ञान
की वाष्प तैयार हो गयी। फिर पूर्ण ब्रह्मरूपी बीज, व्यर्थ के तन्तु, रस्सी आदि सब छोड़कर केवल कर्णरूपी नली
से श्रीकृष्ण ने स्वयं बोये। इसके उपरान्त यदु अवधूत संवाद के रूप में चौबीस गुरुओं की उपपत्ति सुनायी। यही
उस खेत के चारों ओर खोदा हुआ खंदक है ताकि कोई जानवर खेत में न घुस सके। इसके बाद जब फसल
पकने लगी तब वहाँ फसल का नाश करने वाली चिड़ियों को श्रीकृष्ण ने दसवें अध्याय में भजनरूपी गुलेल से
उड़ा दिया। अर्थात् उन सभी मतों का खण्डन किया। ग्यारहवें अध्याय में मुक्त के हस्त से ज्ञाताओं को तिलगुड़
के साथ ज्वार के भुट्टे, गेहूँ की बालियाँ तथा बजरे का परमल खिलाया। उस वैभव के भोक्ता यहाँ सत्संगति करने
वाले भगद्भक्त हैं, ऐसा बारहवें अध्याय में कृपापूर्वक बतलाया। विषयों की विषयावस्था साधक के चित्त को
बाधक न हो ऐसी कथा तेरहवें अध्याय में सुनायी। इस प्रकार तेरहवें अध्याय में फसल पूरी तरह पक गयी। वही
हंसगीत का निरूपण और समाधि श्रीकृष्ण ने बतायी। उस समाधि में एकत्र फसल साधकों को कैसे प्राप्त हो ?
इसी उद्देश्य से भजनपूर्वक चौदहवाँ अध्याय सुनाया। वह फसल हाथ में आते-आते ऋद्धि-सिद्धि बीच में ही
झपट्टा मार कर ले जाती हैं इसलिये उन्हें टालने का उपाय पन्द्रहवें अध्याय में बताया। वह फसल पूरे त्रिभुवन में

८४६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
भी नहीं समा पाती। उसके संग्रह कितने हैं उनके सम्बन्ध में विभूति के रूप में श्रीकृष्ण ने सोलहवें अध्याय में
बताया। इस खेत के अधिकारी यहाँ चार आश्रम और चार वर्ण हैं; अतः सत्रहवें और अठारहवें अध्याय में उनके
विभागों के बारे में बतलाया। उन्नीसवें अध्याय में बताया कि फसल काटकर अनाज प्राप्त करने के लिये जिस
छिलके से अनाज तैयार हुआ है उसे पछोड़ कर अलग करना चाहिये। फिर अनाज के जो दाने अपने हिस्से में
आये हों उन्हें हमें सुरक्षित रखना चाहिये क्योंकि गुणदोषरूपी चोर अनाज चुराकर ले जाते हैं। अनाज सभी को
मिलता है लेकिन चोरों के भय से वे खा नहीं पाते। उन चोरों ने बड़े-बड़े लोगों को हानि पहुँचायी है। इसलिये
उसकी अच्छी तरह सुरक्षा करनी चाहिये। गुणदोषों की बात विचित्र-सी है। वे चोर हमसे मिल-जुल कर, स्नेह
दिखाकर सब कुछ ठग कर ले जाते हैं। एक दाना भी हाथ में नहीं आने देते। गुण-दोष अत्यन्त बलवान हैं,
ज्ञानियों का तो वे निश्चित रूप से छल करते हैं। उन गुणदोषों का जो संहार करता है वही त्रैलोक्य में बलशाली
है। यह उपदेश उद्धव ने सुना तो उसने तत्काल ही कहा, इन चोरों को आश्रय देने वाला तो आपका वेद ही है।
उसी की सहायता से ये गुणदोष बढ़े हैं। तुम्हारा वेद ही खराब है। वही मुख्य चोरों का वाड़ा है। उसी में
गुणदोषों ने आश्रय लिया है। वही हर प्रकार की चिहुल सिखाता है। इस प्रकार गुणदोषों का पालन-पोषण कर
वेद ही सबको लूटता है, ऐसी स्थापना वेद के सम्बन्ध में उद्धव ने की। लेकिन वेद की बात में दुष्टता नहीं है
ऐसा प्रत्येक शब्द में स्पष्ट कर दिया है। वही इक्कीसवाँ अध्याय है। चोर किस मार्ग से आते हैं, किस रास्ते
फसल ले जाते हैं उन रास्तों को ही बन्द करने के लिये तत्व संख्या का विचार बाईसवें अध्याय में बताया।
मुख्यरूप से ज्ञान का संरक्षण करने के लिये दृढ़ शान्ति ही कारण है। उसी भिक्षुगीत का निरूपण श्रीकृष्ण ने
किया। प्रमुख चोर की चुराने की प्रवृत्ति मन में रहती है। इसी मनोजय का लक्षण ही तेईसवें अध्याय का
निरूपण है। चोर जहाँ जन्म लेता है, वह प्रकृति ही झूठी है इसलिये पकी हुई फसल को लूट कर वे
अन्त में उसी में छिप कर बैठ जाते हैं। आदि भी निर्गुण और अहं भी निर्गुण; बीच ही में उत्पन्न प्रकृति के तीन
गुण होते हैं, इसलिये मुख्य फसल को उससे बचाना चाहिये। यही निरूपण चौबीसवें अध्याय में किया गया है।
खेत में फसल पड़ी हो फिर भी पशु, पक्षी अथवा चोर उसमें प्रवेश न कर सकें ऐसी सहज सुरक्षा का उपाय
निर्गुणोक्ति ने पचीसवें अध्याय में बताया। स्त्रीभोग की इच्छा प्रबल होने पर पूरा अनाज नष्ट हो जाता है, जहाँ
राजा पुरूरवा नष्ट हुआ वहाँ औरों की क्या बिसात है? काम की आसक्ति से जो पूर्णरूप से स्त्रियों के मोह जाल
में फँसते हैं उन्हें पश्चात्ताप से छुटकारा मिलता है, इसी का छब्बीसवें अध्याय में निरूपण हुआ है। निरोग फसल
प्राप्त होने पर भी उसकी पाक क्रिया जानना आवश्यक है। इसलिये कर्मयोग का स्वरूप सत्ताईसवें अध्याय में
प्रकट किया गया है। इस प्रकार पूरी फसल हाथ में आने पर भी उसके स्वादिष्ट पकवान की विधि आनी
चाहिये। ऐसे सरस अमृत फलों का वर्णन अट्ठाईसवें अध्याय में किया गया है। वे पकवान इतने मृदु, मधुर और
कुरकुरा होते हैं कि उसके सुवास से ही भोजन करने वाले तृप्त हो जाते हैं और उसका ग्रास मुँह में डालना ही
काफी है, अंतर्बाह्य नित्य तृप्ति ही हाथ लगती है। तब इच्छा के अनुसार भूख शांत होती है, सुख पर भी तृप्ति
सुख का आवरण रहता है अपने माधुर्य के कारण अपूर्व वह अट्ठाईसवाँ अध्याय है। इस अध्याय का माधुर्य इतना
अनूठा है कि उसे चखने के लिये ब्रह्मदेवादि देवता भी छटपटाते रहते हैं। यह भोजन जिसके बिना खाया जाता
है, रसना के बिना उसका माधुर्य चखा जाता है। अदंत के दाँत गिराकर ही स्वयं उसे चखना पड़ता है। श्रीकृष्ण
की कुशलता इसमें है कि उसने उद्धव को थाल बनाया। एकनाथ जनार्दन चरण की मक्खी बनकर उस रस का
आस्वाद ले रही है। जहाँ बड़ों-बड़ों का प्रवेश नहीं हो पाता, वहाँ मक्खी आराम से चली जाती है। सारांश, जो

इकतीसवाँ अध्याय
८४७

सबसे छोटे बन जाते हैं, उन्हें ही भगवद् रस सहज ही चखने को मिलता है। ऐसे अगम्य योग का भण्डार, गूढ़
ज्ञान का गहन ज्ञान, परमसुख का सुखसार, अट्ठाईसवाँ अध्याय है। इस भोजन से जो लोग तृप्त हो गये, वही यह
समर्थ उन्नीसवाँ अध्याय है। उसका निरूपण अत्यन्त अद्भुत है। इस अध्याय का रहस्य यदि मन में बस जाय तो
पूरे भागवत का फल उसके पास दौड़ कर आयेगा। इस अध्याय में साध्य-साधनों की एकात्मता हो गयी है।
इसलिये अहंकार का नाश होकर वह परमानन्द की ढकार दे रहा है। पूरे भोजन की शोभा ताम्बूल और चन्दन है।
वही तीसवाँ और इकतीसवाँ अध्याय है। उसमें कृष्णनिर्वाण का आत्मज्ञान है। इस भोजन से जो तृप्त हो गये उन्हें
ममतापाश कभी बाधक नहीं बनता। इस प्रकार सारे कुल का संहार कर श्रीकृष्ण निजधाम चले गये। जिन्हें पूर्ण
ब्रह्मानुभव प्राप्त हुआ हो, उसमें अब तक ममता नहीं होनी चाहिये; यह प्रतीत कराकर श्रीकृष्ण निजधाम चला
गया। श्रीभागवत एक बड़ा खेत है। इसमें प्रमुख बीज धारण करने वाला है, ब्रह्मदेव ! क्योंकि आदिकल्प में
नारायण से इसे ही पहली बार चतुःश्लोकी भागवत का उपदेश हुआ था। नारद इस खेत का जमींदार है (क्योंकि
उसे ब्रह्मदेव से भागवत का उपदेश प्राप्त हुआ था।) उसने भी अद्भुत ढंग से बीड़ा बोये। उसमें श्री व्यास ने इस
प्रकार के लक्षण जोड़ दिये। इससे फसल बहुत ही अच्छी हुई। उससे स्वानंदबोध परिपक्व हुआ है। शुक वहाँ
रखवालदार बन गये। उन्होंने हरि कथारूपी गोफन फड़का कर पातकरूपी पक्षियों का अस्तित्व ही समाप्त कर
दिया। उद्धव ने एकादश स्कंध में उस फसल की कटाई की और कृष्णोक्ति से पछोड़े हुए स्वच्छ दाने एकत्र
किये। वहाँ नाना प्रकार की युक्ति-प्रयुक्ति से, प्रश्नों की मालिका से स्वादिष्ट पकवान तैयार किये। उनका माधुर्य
नित्य नूतन और अविनाशी है। उसकी वह अविनाशी मिठास एकादश स्कंध में प्रत्यक्ष प्रतीत होती है। इसलिये
उद्धव के ही साथ संसार पर भी उपकार हुआ है। उद्धव की पिछली पंक्ति में श्रवण के संकप लेकर बैठे परीक्षित
शुक के मुख से आत्मज्ञान से तृप्त होकर सन्तुष्ट हुआ। उन्हीं बड़ों की पंक्ति में श्रीधर भावार्थ दीपिका रूप दीपक
हाथ में ले कर पदरूपी पदार्थ दिखाकर आत्मज्ञान से तृप्त हुआ। उसमें देशी भाषा में एकनाथ कृपा की मक्खी
भी भोजन करके तृप्त हुई क्योंकि उसे कहीं भी कोई भी प्रतिबन्ध नहीं है। एकनाथ जनार्दन की दुलारी बिल्ली
है। भावार्थ दीपिका के प्रकाश से उसे यह उत्तम दिखायी पड़ा इसलिये वह थाली में पहुँची। "मियो मियो
कहकर क्या मैं आऊँ यह शब्द सुनते ही सज्जन प्रसन्न हो उठे और उन्होंने कृपाकर शेष प्रसाद देकर मुझे सन्तुष्ट
किया। एका जनार्दन का दास है अतः मैंने नम्रभाव धारण कर बिल्ली का रूप लिया और संतों का उच्छिष्ट
पत्तल चाट कर मैं पूर्णरूप से तृप्त हुआ। जो काया वाचा मन से सद्‌भक्ति से नम्र होता है, नीच के सामने भी नम्र
होता है—वही एकादश स्कंध का अधिकारी है, ऐसा जनार्दन का उपदेश है। जब तक ज्ञान का अभिमान रहता
है, जब तक मान-सम्मान की इच्छा रहती है, तब-तब एकादश स्कंध के ज्ञान से अपरिचय रहेगा ही। पूर्ण
सद्भावना से जब तक समस्त प्राणिमात्र में भगवद्भाव उत्पन्न नहीं हुआ, तब तक एकादश स्कंध का ज्ञान बिलकुल
समझ में नहीं आयेगा। इस प्रकार श्रीभागवतरूपी खेत में परम पवित्र फसल तैयार हुई है। जिन्हें समस्त प्राणिमात्र
के प्रति अपार आदर हो वही साधकजन यहाँ सुखी होंगे। एकादश स्कंध केवल खेत नहीं है, वह तो परिपूर्ण
चित्समुद्र है। इसमें जो जितना डूबेगा उतने ही अधिक चिद्रत्न वह प्राप्त करेगा। यह केवल एकादश स्कंध ही
नहीं, अपितु जीवरूपी गजेन्द्र के उद्धार के लिये हाथ में ज्ञानचन्द्र लेकर वेग से आये श्रीकृष्ण ही हैं। लेकिन इस
उपमा से भी एकादश स्कंध की महानता का वर्णन पर्याप्त नहीं हो पाता; बल्कि यह कहना उपयुक्त होगा कि
अहंकार रूपी हिरण्यकश्यपु का विदारण करने के लिये पूर्ण कृपालु और भक्तों का पक्षधर यह नरहरि ही प्रकट
हुआ है। या ऐसे कहें कि कृष्ण और उद्धव ये गंगा और यमुना हैं और ज्ञानधारा यह गुप्त सरस्वती है। अतः

८४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
एकादश स्कंध को त्रिवेणी संगम का प्रयाग ही समझना चाहिये। यहाँ वैराग्यरूपी माघ मास में, श्रद्धा के
अरुणोदय के समय जो भी नित्य स्नान करेगा, वह पावन होकर पूर्ण कृष्ण-पद को प्राप्त करेगा। लेकिन यह
उपमा भी एकादश स्कंध के लिये उपयुक्त नहीं है। तो कृष्ण उद्धव का यह गुह्य संवाद साधकों के लिये लम्बे
समय बाद आने वाला कपिला षष्ठी का सुन्दर पर्वकाल है। इस पर्वकाल में जो डुबकी लगायेंगे उनका तत्काल
कल्याण होगा। उन्हें जन्म-मरण की बाधा नहीं होगी, वे स्वयं परिपूर्ण ब्रह्म होंगे। यह एकादश स्कंध नहीं,
अपितु एकतीस खण्ड का एक तुलसी वृन्दावन ही है; उसमें ज्ञानमंजरी के गुच्छे शोभा दे रहे हैं। उनमें जो अपना
जीवित जलरूप डालेगा, वे परमपावन होंगे और परिपूर्ण ब्रह्म होकर स्वानंदरूप कृष्ण सदन पहुँचेंगे। जो मूल के
उदक का वंदन करेंगे, जो मूल की मिट्टी लगायेंगे वे त्रिभुवन में वंद्य होकर उन्हें नित्य निजसखा कृष्ण की प्राप्ति
होगी। उसी प्रकार, हे सुजान परीक्षित ! जो भी कोई पठन के द्वारा प्रत्यगावृत्ति अर्थात स्वस्वरूपाकार वृत्ति के इस
वृन्दावन को सद्भावना से प्रदक्षिणा करेगा,' वे भी श्रीकृष्ण चरणों में रंग जायेंगे। जो इस कथा की विचित्र
लीलाओं की रंगोली इस तुलसी वृन्दावन के सामने नित्य सजायेंगे वे कलिकाल को भी जीतेंगे व उनके साथ
श्रीकृष्ण सदासर्वदा खड़ा रहेगा। इस एकादश स्कंध रूप वृन्दावन की जो श्रवणरूप से नित्य पूजा करेगा, उस पर
श्रीकृष्ण प्रसन्न होकर उसका देहाभिमान नष्ट करेगा। जो मनन की पुष्पांजलि (मंत्रपुष्प) नित्य त्रिकाल अर्पण
करेगा, वह भी आत्मनिष्ठा से हरि के पास पहुँचेगा। श्रीभागवतरूपी वृन्दावन के पास संत-सज्जनों को एकत्र
कर, इसकी कथा का जो निरूपण करेंगे वह वृन्दावन की निरपेक्ष महापूजा होगी। यह महापूजन देखकर श्री
जनार्दन सन्तुष्ट होगा और जो श्रोता-वक्ता सावधान रहेंगे उन्हें वह स्वयं आत्मज्ञान देगा। श्रवण से, पठन से,
मनन से तथा अर्थनिरूपण से एकादश स्कंध समान फल देगा। उसके मन में ज्ञाता और अज्ञानी के प्रति कोई भेद
नहीं है। यदि श्रवण, मनन अथवा पठन सम्भव न हो तो एकादश स्कंध की पुस्तक ही ब्राह्मण को दान में दें।
इससे विवेक ज्ञान उत्पन्न होगा। एकादश स्कंध का दान दें, एकादश स्कंध की पूजा करें अथवा केवल एकादश
स्कंध का स्मरण करें तो भी सारे पातकों का नाश होगा। एकादश स्कंध का जो संग्रह करता है, उसके घर में
श्रीकृष्ण का वास रहता है। एकादश स्कंध में जो श्रद्धा रखता है, उसमें ज्ञान अपने आप प्रवेश करता है। जिसके
मुख से इसके श्लोकों का, आधे श्लोक का अथवा एक चतुर्थांश श्लोक का नित्य स्मरण होता है, वह भी परम
पवित्र होता है। इस प्रकार एकादश स्कंध अत्यन्त उदार है। किसी काम के लिये जाते समय यदि अकस्मात भी
एकादश स्कंध पर दृष्टि पड़ जाये तो सारे पातक भय के मारे भाग जाते हैं। एकादश स्कंध जिसके हाथ में हो,
उसे देवतागण भी प्रणाम करते हैं। वह स्वयं सारे संसार का उद्धार कर सकता है। एकादश स्कंध का इतना
माहात्म्य है। सारे पुराणों में एकादश स्कंध एक वनकेशरी (सिंह) है वह एक श्लोकार्ध में ही, क्षणभर में
संसाररूपी गज का विदारण कर देता है। 'मामेकमेवशरणं' (अ० १२, श्लोक १७) इस श्लोक का पठन करने
से, वह माया का गला दबाकर भय से ही संसार को नष्ट देता है। 'निरपेक्षं मुनि शांत' (अ० १४, श्लोक १६)
यह श्लोक यदि अंतःकरण में बस गया तो उस भक्त की कृष्ण भी सेवा करता है, फिर संसार का भय कहाँ
रहेगा ? एकादश स्कंध का प्रत्येक श्लोक भवबंध को काटने वाला है। जिसमें साक्षात श्रीकृष्ण ही वक्ता हैं, उसमें
किसी एक को ही अच्छा कैसे कहा जा सकता है ? श्रीभागवत में एकादश स्कंध ही मोक्ष का स्थान है। इसलिये
आधे श्लोक से भी संसार बंधन का पूरी तरह नाश होता है। श्रीकृष्ण वेदों का जन्मस्थान है और निरूपण उसके
मुख से निकला है। इसलिये सारे वेदों का अर्थ स्वयमेव ही यहाँ अपने मैके आया है। इसलिये एकादश स्कंध में
वेदार्थ मैके में रहकर सुखी हो गया है। वे साधक को स्वानंदस्वरूप सम्पूर्ण परमार्थ देते हैं। वेदशास्त्रों का मंथन कर

इकतीसवाँ अध्याय ८४९
व्यासजी ने महाभारत रचा। उस महाभारत का अर्थ अर्थात् भागवत में हरि की लीला है। ऐसे उस भागवत का
सारांश यह एकादश स्कंध है। वहाँ वक्ता स्वयं श्रीकृष्ण हैं, तथा उसने परब्रह्मरस का प्रबोधन किया है। जिस
प्रकार संन्यासियों में परमहंस, अथवा देवताओं में विष्णु हैं, उसी प्रकार भागवत में एकादश स्कंध परम वंदनीय
है। जिस प्रकार पक्षियों में राजहंस है अथवा रसों में अमृत है, उसी प्रकार भागवत में यह एकादश स्कंध भी
परम सरस और वन्दनीय है। तीर्थक्षेत्र में जिस प्रकार काशी है अथवा नदियों में पावनगंगा है, अथवा व्रतों में
जिस प्रकार उद्धार करने वाली एकादशी है, उसी प्रकार इस एकादश स्कंध की महिमा भी अवर्णनीय है। उस
एकादश स्कंध पर जनार्दन की कृपा से एकनाथ ने एक टीका प्रस्तुत की है। जो इसे सद्भावना से पढ़ेगा वह
एकत्व के निजसुख को प्राप्त करेगा। बच्चे का हाथ थाम कर बाप जिस प्रकार स्वयं ही अक्षर लिखता है उसी
प्रकार एकादश स्कंध का अर्थ अर्थात् परमार्थ मुझसे जनार्दन ने ही बुलवाया। ग्रन्थ कैसे लिखा जाता है, शब्द का
अर्थ कैसे किया जाता है, इस व्युत्पत्ति की मुझे कोई वार्ता ही नहीं है, लेकिन समर्थ जनार्दन ही मुझसे यह सब
कहलवा रहा है। जनार्दन ने एक बड़े आश्चर्य की यह बात की कि मुझ मूर्ख के मुख से ज्ञान कहलवाया; ग्रन्थ
को परमार्थ का स्वरूप प्रदान किया और एकादश स्कंध का वर्णन करवाया। एकादश स्कंध के प्रत्येक पद का
अर्थ शास्त्रकारों को भी अत्यन्त गूढ़ मालूम होता है, किन्तु वह भी मुझसे कहलवाया। इस प्रकार जनार्दन समर्थ
होते हुए कृपालु है और जनार्दन ने यह किया कि मेरा 'मैं 'पन समूल समाप्त कर दिया और फिर अपनी सत्ता से
परमार्थ कहलवाया। सूत्रधार जिस प्रकार कठपुतली अच्छी तरह नचाता है, उसी प्रकार ग्रन्थ की भाषा जनार्दन ने
कहलवायी। सर्वत्र जनार्दन ही व्याप्त है। वही एका (एकनाथ) बना और उसी नाम से सुन्दर ग्रन्थ तैयार कर
सात्त्विक लोगों को तत्वार्थ दिखला दिया। कवित्त्व में मेरा नाम है अवश्य, लेकिन अन्त में नाम के लिये भी
स्थान नहीं रखा। इस प्रकार जनार्दन का वैभव नितांत चमत्कारी और अलौकिक है। ज्ञानी लोग इस ग्रन्थ को
देखकर एकाजनार्दन को ज्ञानी समझ बैठेंगे। एकाजनार्दन की स्थिति देखकर कोई कहता है कि वह बहुत बड़ा
भक्त है, कोई कहता है वह जीवन्मुक्त है, कोई कहता है कि वह सचमुच प्रापंचिक है। फिर ऐसा भी कहते हैं
कि इसे आसन की जानकारी नहीं है, ध्यान नहीं जानता, नियम, मुद्रा, माला जपना आदि, इनमें से एक भी
उपासना का लक्षण नहीं है। इसका मंत्र क्या है? शिष्य को यह कैसा उपदेश देता है ? वह किसी को यह सब
नहीं मालूम होने देता। ऐसा होते हुए भी श्रद्धालु लोग उस पर अत्यन्त मोहित हैं। केवल हरिनाम का घोष कर
इसने लोगों पर मोहिनी डाल दी है। ऐसे नाना प्रकार के विकल्प स्वयं जनार्दन ही लोगों में उत्पन्न कर रहा है।
उसका उत्तर मैं देने लगता हूँ तो जनार्दन स्वयं ही बोलने लगता है। मेरा 'मैं 'पन जनार्दन ने आत्मसात कर लिया
है। इस समय मेरी उँगली जो हिल रही है, वह प्रक्रिया भी जनार्दन ही कर रहा है। आँखों का खुलना-बन्द होना,
श्वासोश्वास के प्रकार तथा चलने वाला प्रवाह और इन्द्रियों का सारा व्यापार करने वाला सचमुच जनार्दन ही है।
जब मैं कविता कहने लगता हूँ, तब वह भी जनार्दन ही कहता है। सारांश, मेरा 'मैं'पन धरने के लिये जगह ही
नहीं बच रहती। मेरा जो 'मैं 'पन था वह सब जनार्दन स्वयं हो गया है। इस प्रकार एका जनार्दन की पूरी तरह
शरण में आने के कारण, उसी ने यह पूरा ग्रन्थ पूर्ण किया। लेकिन यह कहने लगता हूँ तो जनार्दन इशारे से ही
मना कर देते हैं। अब एक कहिये या अलग कहिये, जनार्दन सर्वत्र व्याप्त है। देखो! उसी ने इस ग्रन्थ के लेखों
को विस्तृत रूप दिया। यह ग्रन्थ प्राकृत भाषा में है अतः कृपया पण्डितजन इसकी अवहेलना न करें। आत्मनिष्ठा
से देखें कि परमात्मस्थिति का अर्थ ठीक है या नहीं? जो इस ग्रन्थ का आदर करेंगे, अथवा जो उपेक्षा करेंगे
अथवा खरी-खरी निन्दा ही करेंगे, वे भी हमारी दृष्टि में सद्गुरुस्वरूप परब्रह्ममूर्ति ही हैं। जनार्दन ने मुझे यह

८५० श्रीमद् एकनाथी भागवत

सिखाया है कि सारे प्राणियों में स्वयं देखें। प्रकृति-गुणों के लक्षण हमें कभी नहीं देखने चाहिये। जिन्हें शिष्य का
क्षोभ सहन न होता हो, निंदकों की निन्दा हजम न होती हो, वह साधक परमार्थ में कोरा ही है ऐसा समझना
चाहिये। उसे क्रोध निश्चित रूप से डुबो देगा, यह जान लो। सारांश, दूसरे की प्रकृति के गुण देखकर मन क्षुब्ध
हो जाता है अतः उन्हें नहीं देखना चाहिये। समस्त प्राणियों में चैतन्य ही भरा हुआ है यह देखें। यही उपदेश मुझे
जनार्दन ने अत्यन्त आग्रह से किया है। इसके बिना ज्ञातागण भवसागर का पार नहीं पा सकेंगे। इसी निश्चय से
देखने पर हमारे लिये गुरु तो गुरु ही है और शिष्य संवाद गुरु और निंदक परमगुरु; और नीच और दुष्ट तो
सद्गुरु है; यह जनार्दन कृपा की सीख है। जनार्दन की कृपा से गुरु के बिना कोई खाली स्थान दिखायी ही नहीं
देता। उसी ने सचमुच 'मैं'पन के साथ सारे ही प्राणिमात्र गुरुस्वरूप तक लाये हैं। उसी ने यह ग्रन्थकथा परमार्थ
सिद्धि तक पहुँचायी। यह योग्यता मेरी अपनी नहीं है, यह मैंने श्रोताओं से पहले ही कह दिया है। इस ग्रन्थ का
प्रारम्भ पैठण में हुआ और वहाँ पाँच अध्याय पूरे कर शेष ग्रन्थ आनन्दवन अर्थात् काशी में पूरा हुआ।
'अविमुक्त', 'महाश्मशान', 'आनन्दवन' ये सब काशीक्षेत्र के ही नाम हैं। उसका भी कारण सुनें। जहाँ अन्तिम
मुक्ति प्राप्त होती है, सुजन और दुर्जन को एक ही गति प्राप्त होती है, बार-बार जन्म-मरण के चक्र में नहीं
फँसना पड़ता इसलिये इस क्षेत्र को 'अविमुक्त' कहते हैं। जिस श्मशान में प्राण त्यागने पर, प्राणी को पुनः
श्मशान का दर्शन नहीं करना पड़ता इसलिये इसे 'महाश्मशान' कहते हैं, यहाँ अंतकाल में शंकर जीव को
ब्रह्मज्ञान सुनाता है। 'वरुणा' और 'अस्सी' इन दो नदियों के बीच पंचक्रोशी है, इसमें पातकों का प्रवेश नहीं है
इसलिये इसे 'वाराणसी' कहते हैं। वरुणा पातकों का संहार करती है, असी महादोष का नाश करती है और बीच
में विश्वेश्वर का नगर है। इसीलिये यह वास्तव में 'वाराणसी' है। विश्वेश्वर का यह क्रीड़ास्थल, जहाँ शंकर
स्वानंद से स्वयं क्रीड़ा करते रहते हैं इसलिये इसे 'आनंदवन' कहते हैं। देवता भी यहाँ मरने की इच्छा करते हैं।
यहाँ जीवितावस्था में स्वादिष्ट भोजन मिलता है और मरने के बाद अचूक मुक्ति मिलती है। इसलिये इसे
'आनंदवन' कहते हैं, ऐसा शंकर ने पार्वती से कहा है। उस वाराणसी नामक मुक्तिक्षेत्र में, मणिकर्णिका के
महातट पर, पंचमुद्रा नामक पीठ में यह एकादश स्कंध पर टीका लिखी है। उसे सुनकर सज्जनों को संतोष प्राप्त
हुआ और जनार्दन भी आनन्द से प्रसन्न हो उठे। उन्होंने पाँच अध्याय पूर्ण होने पर ही अपने मुख से वरदान दिया
था। वरदान यह था कि यह ग्रन्थ निर्विघ्न रूप से सम्पन्न होगा; इसके योग से ज्ञाताओं को भी संतोष होगा,
मुमुक्षुओं को परमार्थ का लाभ होगा और साधक संसार सागर पार कर जायेंगे। भोले भाले और विषयी लोग यदि
इसका श्रवण और पाठ करेंगे तो वे भी हरि के भक्त होकर पूर्ण सन्मार्गी होंगे। संस्कृत भाषा में न होते हुए भी
यह ज्ञानदान करने में महासमर्थ है। ऐसा स्वमुख से कहकर उन्होंने कृपादृष्टि से मेरी ओर देखा। तब मैंने भी
उनसे विनती की कि, "जो लोग इस ग्रन्थ का अर्थ ग्रहण करेंगे, उन्हें ब्रह्मभावना से ब्राह्मणों के प्रति भक्ति और
नाम के प्रति अखण्ड प्रीति प्रदान करें। वे ब्रह्मद्वेष्टा न बने, उन्हें निन्दा का स्पर्श भी न हो; क्योंकि ब्रह्मद्वेष से
समूल क्षय होता है और निन्दा के पास सारे पातक रहते हैं।" यह विनती सुनकर जनार्दन कृपापूर्वक प्रसन्न हो
उठे और उन्होंने मुझे इच्छित वरदान दिया। इस ग्रन्थ पर जो अत्यन्त भक्ति करेंगे उनके मन में निन्दा और द्वेष का
प्रवेश ही नहीं होगा; और रामनाम का प्रेम निश्चित रूप से बढ़ेगा। ब्राह्मण जाति में विद्वान और अविद्वान का भेद
न कर ब्रह्मभावना से ही उनमें भक्ति उत्पन्न होगी; और इससे अचूक ब्रह्मप्राप्ति होगी। साधकों के लिये नाम से
सरल और कोई साधन नहीं है और ब्राह्मण के अतिरिक्त कोई देवता नहीं है। वह भजनभाव इस ग्रन्थ के कारण
नित्य नूतन बढ़ता रहेगा। ऐसा वरदान देकर जनार्दन ने मुझे अपने पेट से कसकर चिपका लिया और कहा, "इस

ग्रन्थ पर जो भक्ति करेंगे उनके संसारबंधन मैं तोड़ डालूँगा।' मेरा अहो भाग्य कि मेरे समस्त श्रोताओं ने मुझ पर
पूर्ण कृपा की। अर्थ परमार्थ की दृष्टियों से उन्होंने मुझे समान रूपसे संबल प्रदान किया। आगे भी इस ग्रन्थ का
जहाँ निरूपण होगा, अथवा जहाँ-जहाँ यह कथा कही जायेगी, वहाँ भी इसी प्रकार अवधान दें ऐसी मुझ दीन की
उनसे प्रार्थना है। यह प्रार्थना सुनकर सज्जन श्रोतागण सन्तुष्ट हो गये और बोले, यह कथा हमारा प्राण है, इसका
जहाँ-जहाँ निरूपण होगा वहाँ हम रहेंगे ही। इस प्रकार श्रोता सन्तुष्ट हो गये और वर प्रदान कर जनार्दन भी
प्रसन्न हो उठे। एका (एकनाथ) जनार्दन की शरण में जाने के कारण ग्रन्थ पूर्ण हुआ। वाराणसी नामक महामुक्ति
क्षेत्र में, विक्रमशंक (संवत) १६३०, वृषनाम संवत्सर में जनार्दन कृपा से एकनाथ ने यह टीका प्रस्तुत की।
महामंगल कार्तिक मास के शुद्ध पौर्णिमा के दिन सोमवार को शिवयोग के दिन यह एकादश स्कंध की टीका
समाप्त हुई। अब स्वदेश का शक और संवत्सर बताता हूँ। दण्डकारण्य स्थित श्रीरामक्षेत्र तथा गोदावरी के तट पर
बसा हुआ गाँव पैठण ! वहाँ का उल्लेख सुनिये। इस ग्रन्थ में १५०० सरस श्लोक हैं और उसके ३१ अध्याय हैं।
उसमें का ज्ञानरहस्य श्रीकृष्ण ने स्वमुख से सुनाया है। यह एकादशस्कंध ऐक्य से भरा है, इसमें दूजापन नहीं है।
ग्यारह का अर्थ है, एक पर एक ! उसमें दूसरे-अंक के प्रवेश के लिये स्थान नहीं है। उन्हीं ग्यारह इन्दियों का
सुख उसमें एक होकर अद्भुत ढंग से परिपक्व हुआ है। उस एकादश स्कंध की टीका, एक ब्रह्मरस से ही
एकनाथ ने की है, वह जनार्दन कृपा से साधकों को भी एकत्व के आत्मसुख से ही फलदायी होगी। यह चिद्रत्न
रूप ज्ञानग्रन्थ यथार्थ रूप से अर्थ बताकर प्रस्तुत किया है। मेरे नाम से श्रीजनार्दन स्वयं ही ग्रन्थकर्ता बन गया है।
एका जनार्दन की शरण में है और जनार्दन को एकपन की चाह है। सूर्य के किरण जिस प्रकार अपने तेज से सारा
अन्धकार नष्ट करते हैं, उसी प्रकार जनार्दन के तेज से एका (एकनाथ) का एकपन प्रकाशित हुआ है। इसीलिये
यह ग्रन्थ प्रकाश में आया। वह एकपंन से ही जनार्दन को अर्पित है। 'जन और जनार्दन एक है' इसे जो जान
लेगा वही वास्तव में मुक्त होगा लेकिन यह न जानने के कारण ही लोग भ्रम में पड़े हुए हैं।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यांसंहितायां एकादश स्कंधे
एकाकार टीकायां मौसलोपाख्यानं नाम एकत्रिशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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या चित्रामध्ये कोणताही मजकूर (text) उपलब्ध नाही. हे संत तुकाराम महाराजांचे चित्र आहे, ज्यामध्ये ते हातात वीणा व चिपळ्या घेऊन विठ्ठलाचे नामस्मरण करताना दर्शविलेले आहेत.