श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 866, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें८५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
सिखाया है कि सारे प्राणियों में स्वयं देखें। प्रकृति-गुणों के लक्षण हमें कभी नहीं देखने चाहिये। जिन्हें शिष्य का
क्षोभ सहन न होता हो, निंदकों की निन्दा हजम न होती हो, वह साधक परमार्थ में कोरा ही है ऐसा समझना
चाहिये। उसे क्रोध निश्चित रूप से डुबो देगा, यह जान लो। सारांश, दूसरे की प्रकृति के गुण देखकर मन क्षुब्ध
हो जाता है अतः उन्हें नहीं देखना चाहिये। समस्त प्राणियों में चैतन्य ही भरा हुआ है यह देखें। यही उपदेश मुझे
जनार्दन ने अत्यन्त आग्रह से किया है। इसके बिना ज्ञातागण भवसागर का पार नहीं पा सकेंगे। इसी निश्चय से
देखने पर हमारे लिये गुरु तो गुरु ही है और शिष्य संवाद गुरु और निंदक परमगुरु; और नीच और दुष्ट तो
सद्गुरु है; यह जनार्दन कृपा की सीख है। जनार्दन की कृपा से गुरु के बिना कोई खाली स्थान दिखायी ही नहीं
देता। उसी ने सचमुच 'मैं'पन के साथ सारे ही प्राणिमात्र गुरुस्वरूप तक लाये हैं। उसी ने यह ग्रन्थकथा परमार्थ
सिद्धि तक पहुँचायी। यह योग्यता मेरी अपनी नहीं है, यह मैंने श्रोताओं से पहले ही कह दिया है। इस ग्रन्थ का
प्रारम्भ पैठण में हुआ और वहाँ पाँच अध्याय पूरे कर शेष ग्रन्थ आनन्दवन अर्थात् काशी में पूरा हुआ।
'अविमुक्त', 'महाश्मशान', 'आनन्दवन' ये सब काशीक्षेत्र के ही नाम हैं। उसका भी कारण सुनें। जहाँ अन्तिम
मुक्ति प्राप्त होती है, सुजन और दुर्जन को एक ही गति प्राप्त होती है, बार-बार जन्म-मरण के चक्र में नहीं
फँसना पड़ता इसलिये इस क्षेत्र को 'अविमुक्त' कहते हैं। जिस श्मशान में प्राण त्यागने पर, प्राणी को पुनः
श्मशान का दर्शन नहीं करना पड़ता इसलिये इसे 'महाश्मशान' कहते हैं, यहाँ अंतकाल में शंकर जीव को
ब्रह्मज्ञान सुनाता है। 'वरुणा' और 'अस्सी' इन दो नदियों के बीच पंचक्रोशी है, इसमें पातकों का प्रवेश नहीं है
इसलिये इसे 'वाराणसी' कहते हैं। वरुणा पातकों का संहार करती है, असी महादोष का नाश करती है और बीच
में विश्वेश्वर का नगर है। इसीलिये यह वास्तव में 'वाराणसी' है। विश्वेश्वर का यह क्रीड़ास्थल, जहाँ शंकर
स्वानंद से स्वयं क्रीड़ा करते रहते हैं इसलिये इसे 'आनंदवन' कहते हैं। देवता भी यहाँ मरने की इच्छा करते हैं।
यहाँ जीवितावस्था में स्वादिष्ट भोजन मिलता है और मरने के बाद अचूक मुक्ति मिलती है। इसलिये इसे
'आनंदवन' कहते हैं, ऐसा शंकर ने पार्वती से कहा है। उस वाराणसी नामक मुक्तिक्षेत्र में, मणिकर्णिका के
महातट पर, पंचमुद्रा नामक पीठ में यह एकादश स्कंध पर टीका लिखी है। उसे सुनकर सज्जनों को संतोष प्राप्त
हुआ और जनार्दन भी आनन्द से प्रसन्न हो उठे। उन्होंने पाँच अध्याय पूर्ण होने पर ही अपने मुख से वरदान दिया
था। वरदान यह था कि यह ग्रन्थ निर्विघ्न रूप से सम्पन्न होगा; इसके योग से ज्ञाताओं को भी संतोष होगा,
मुमुक्षुओं को परमार्थ का लाभ होगा और साधक संसार सागर पार कर जायेंगे। भोले भाले और विषयी लोग यदि
इसका श्रवण और पाठ करेंगे तो वे भी हरि के भक्त होकर पूर्ण सन्मार्गी होंगे। संस्कृत भाषा में न होते हुए भी
यह ज्ञानदान करने में महासमर्थ है। ऐसा स्वमुख से कहकर उन्होंने कृपादृष्टि से मेरी ओर देखा। तब मैंने भी
उनसे विनती की कि, "जो लोग इस ग्रन्थ का अर्थ ग्रहण करेंगे, उन्हें ब्रह्मभावना से ब्राह्मणों के प्रति भक्ति और
नाम के प्रति अखण्ड प्रीति प्रदान करें। वे ब्रह्मद्वेष्टा न बने, उन्हें निन्दा का स्पर्श भी न हो; क्योंकि ब्रह्मद्वेष से
समूल क्षय होता है और निन्दा के पास सारे पातक रहते हैं।" यह विनती सुनकर जनार्दन कृपापूर्वक प्रसन्न हो
उठे और उन्होंने मुझे इच्छित वरदान दिया। इस ग्रन्थ पर जो अत्यन्त भक्ति करेंगे उनके मन में निन्दा और द्वेष का
प्रवेश ही नहीं होगा; और रामनाम का प्रेम निश्चित रूप से बढ़ेगा। ब्राह्मण जाति में विद्वान और अविद्वान का भेद
न कर ब्रह्मभावना से ही उनमें भक्ति उत्पन्न होगी; और इससे अचूक ब्रह्मप्राप्ति होगी। साधकों के लिये नाम से
सरल और कोई साधन नहीं है और ब्राह्मण के अतिरिक्त कोई देवता नहीं है। वह भजनभाव इस ग्रन्थ के कारण
नित्य नूतन बढ़ता रहेगा। ऐसा वरदान देकर जनार्दन ने मुझे अपने पेट से कसकर चिपका लिया और कहा, "इस