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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 867, कुल 869 में से

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पृष्ठ 867

ग्रन्थ पर जो भक्ति करेंगे उनके संसारबंधन मैं तोड़ डालूँगा।' मेरा अहो भाग्य कि मेरे समस्त श्रोताओं ने मुझ पर
पूर्ण कृपा की। अर्थ परमार्थ की दृष्टियों से उन्होंने मुझे समान रूपसे संबल प्रदान किया। आगे भी इस ग्रन्थ का
जहाँ निरूपण होगा, अथवा जहाँ-जहाँ यह कथा कही जायेगी, वहाँ भी इसी प्रकार अवधान दें ऐसी मुझ दीन की
उनसे प्रार्थना है। यह प्रार्थना सुनकर सज्जन श्रोतागण सन्तुष्ट हो गये और बोले, यह कथा हमारा प्राण है, इसका
जहाँ-जहाँ निरूपण होगा वहाँ हम रहेंगे ही। इस प्रकार श्रोता सन्तुष्ट हो गये और वर प्रदान कर जनार्दन भी
प्रसन्न हो उठे। एका (एकनाथ) जनार्दन की शरण में जाने के कारण ग्रन्थ पूर्ण हुआ। वाराणसी नामक महामुक्ति
क्षेत्र में, विक्रमशंक (संवत) १६३०, वृषनाम संवत्सर में जनार्दन कृपा से एकनाथ ने यह टीका प्रस्तुत की।
महामंगल कार्तिक मास के शुद्ध पौर्णिमा के दिन सोमवार को शिवयोग के दिन यह एकादश स्कंध की टीका
समाप्त हुई। अब स्वदेश का शक और संवत्सर बताता हूँ। दण्डकारण्य स्थित श्रीरामक्षेत्र तथा गोदावरी के तट पर
बसा हुआ गाँव पैठण ! वहाँ का उल्लेख सुनिये। इस ग्रन्थ में १५०० सरस श्लोक हैं और उसके ३१ अध्याय हैं।
उसमें का ज्ञानरहस्य श्रीकृष्ण ने स्वमुख से सुनाया है। यह एकादशस्कंध ऐक्य से भरा है, इसमें दूजापन नहीं है।
ग्यारह का अर्थ है, एक पर एक ! उसमें दूसरे-अंक के प्रवेश के लिये स्थान नहीं है। उन्हीं ग्यारह इन्दियों का
सुख उसमें एक होकर अद्भुत ढंग से परिपक्व हुआ है। उस एकादश स्कंध की टीका, एक ब्रह्मरस से ही
एकनाथ ने की है, वह जनार्दन कृपा से साधकों को भी एकत्व के आत्मसुख से ही फलदायी होगी। यह चिद्रत्न
रूप ज्ञानग्रन्थ यथार्थ रूप से अर्थ बताकर प्रस्तुत किया है। मेरे नाम से श्रीजनार्दन स्वयं ही ग्रन्थकर्ता बन गया है।
एका जनार्दन की शरण में है और जनार्दन को एकपन की चाह है। सूर्य के किरण जिस प्रकार अपने तेज से सारा
अन्धकार नष्ट करते हैं, उसी प्रकार जनार्दन के तेज से एका (एकनाथ) का एकपन प्रकाशित हुआ है। इसीलिये
यह ग्रन्थ प्रकाश में आया। वह एकपंन से ही जनार्दन को अर्पित है। 'जन और जनार्दन एक है' इसे जो जान
लेगा वही वास्तव में मुक्त होगा लेकिन यह न जानने के कारण ही लोग भ्रम में पड़े हुए हैं।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यांसंहितायां एकादश स्कंधे
एकाकार टीकायां मौसलोपाख्यानं नाम एकत्रिशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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