श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइकतीसवाँ अध्याय ८४९
व्यासजी ने महाभारत रचा। उस महाभारत का अर्थ अर्थात् भागवत में हरि की लीला है। ऐसे उस भागवत का
सारांश यह एकादश स्कंध है। वहाँ वक्ता स्वयं श्रीकृष्ण हैं, तथा उसने परब्रह्मरस का प्रबोधन किया है। जिस
प्रकार संन्यासियों में परमहंस, अथवा देवताओं में विष्णु हैं, उसी प्रकार भागवत में एकादश स्कंध परम वंदनीय
है। जिस प्रकार पक्षियों में राजहंस है अथवा रसों में अमृत है, उसी प्रकार भागवत में यह एकादश स्कंध भी
परम सरस और वन्दनीय है। तीर्थक्षेत्र में जिस प्रकार काशी है अथवा नदियों में पावनगंगा है, अथवा व्रतों में
जिस प्रकार उद्धार करने वाली एकादशी है, उसी प्रकार इस एकादश स्कंध की महिमा भी अवर्णनीय है। उस
एकादश स्कंध पर जनार्दन की कृपा से एकनाथ ने एक टीका प्रस्तुत की है। जो इसे सद्भावना से पढ़ेगा वह
एकत्व के निजसुख को प्राप्त करेगा। बच्चे का हाथ थाम कर बाप जिस प्रकार स्वयं ही अक्षर लिखता है उसी
प्रकार एकादश स्कंध का अर्थ अर्थात् परमार्थ मुझसे जनार्दन ने ही बुलवाया। ग्रन्थ कैसे लिखा जाता है, शब्द का
अर्थ कैसे किया जाता है, इस व्युत्पत्ति की मुझे कोई वार्ता ही नहीं है, लेकिन समर्थ जनार्दन ही मुझसे यह सब
कहलवा रहा है। जनार्दन ने एक बड़े आश्चर्य की यह बात की कि मुझ मूर्ख के मुख से ज्ञान कहलवाया; ग्रन्थ
को परमार्थ का स्वरूप प्रदान किया और एकादश स्कंध का वर्णन करवाया। एकादश स्कंध के प्रत्येक पद का
अर्थ शास्त्रकारों को भी अत्यन्त गूढ़ मालूम होता है, किन्तु वह भी मुझसे कहलवाया। इस प्रकार जनार्दन समर्थ
होते हुए कृपालु है और जनार्दन ने यह किया कि मेरा 'मैं 'पन समूल समाप्त कर दिया और फिर अपनी सत्ता से
परमार्थ कहलवाया। सूत्रधार जिस प्रकार कठपुतली अच्छी तरह नचाता है, उसी प्रकार ग्रन्थ की भाषा जनार्दन ने
कहलवायी। सर्वत्र जनार्दन ही व्याप्त है। वही एका (एकनाथ) बना और उसी नाम से सुन्दर ग्रन्थ तैयार कर
सात्त्विक लोगों को तत्वार्थ दिखला दिया। कवित्त्व में मेरा नाम है अवश्य, लेकिन अन्त में नाम के लिये भी
स्थान नहीं रखा। इस प्रकार जनार्दन का वैभव नितांत चमत्कारी और अलौकिक है। ज्ञानी लोग इस ग्रन्थ को
देखकर एकाजनार्दन को ज्ञानी समझ बैठेंगे। एकाजनार्दन की स्थिति देखकर कोई कहता है कि वह बहुत बड़ा
भक्त है, कोई कहता है वह जीवन्मुक्त है, कोई कहता है कि वह सचमुच प्रापंचिक है। फिर ऐसा भी कहते हैं
कि इसे आसन की जानकारी नहीं है, ध्यान नहीं जानता, नियम, मुद्रा, माला जपना आदि, इनमें से एक भी
उपासना का लक्षण नहीं है। इसका मंत्र क्या है? शिष्य को यह कैसा उपदेश देता है ? वह किसी को यह सब
नहीं मालूम होने देता। ऐसा होते हुए भी श्रद्धालु लोग उस पर अत्यन्त मोहित हैं। केवल हरिनाम का घोष कर
इसने लोगों पर मोहिनी डाल दी है। ऐसे नाना प्रकार के विकल्प स्वयं जनार्दन ही लोगों में उत्पन्न कर रहा है।
उसका उत्तर मैं देने लगता हूँ तो जनार्दन स्वयं ही बोलने लगता है। मेरा 'मैं 'पन जनार्दन ने आत्मसात कर लिया
है। इस समय मेरी उँगली जो हिल रही है, वह प्रक्रिया भी जनार्दन ही कर रहा है। आँखों का खुलना-बन्द होना,
श्वासोश्वास के प्रकार तथा चलने वाला प्रवाह और इन्द्रियों का सारा व्यापार करने वाला सचमुच जनार्दन ही है।
जब मैं कविता कहने लगता हूँ, तब वह भी जनार्दन ही कहता है। सारांश, मेरा 'मैं'पन धरने के लिये जगह ही
नहीं बच रहती। मेरा जो 'मैं 'पन था वह सब जनार्दन स्वयं हो गया है। इस प्रकार एका जनार्दन की पूरी तरह
शरण में आने के कारण, उसी ने यह पूरा ग्रन्थ पूर्ण किया। लेकिन यह कहने लगता हूँ तो जनार्दन इशारे से ही
मना कर देते हैं। अब एक कहिये या अलग कहिये, जनार्दन सर्वत्र व्याप्त है। देखो! उसी ने इस ग्रन्थ के लेखों
को विस्तृत रूप दिया। यह ग्रन्थ प्राकृत भाषा में है अतः कृपया पण्डितजन इसकी अवहेलना न करें। आत्मनिष्ठा
से देखें कि परमात्मस्थिति का अर्थ ठीक है या नहीं? जो इस ग्रन्थ का आदर करेंगे, अथवा जो उपेक्षा करेंगे
अथवा खरी-खरी निन्दा ही करेंगे, वे भी हमारी दृष्टि में सद्गुरुस्वरूप परब्रह्ममूर्ति ही हैं। जनार्दन ने मुझे यह