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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

ग्यारहवाँ अध्याय २८५

हाथी पर बिठा कर सब लोग उसकी पूजा करें तो उसकी वृत्ति आनन्दित नहीं होती। सुख-दुःखादि व्यथाएँ
अविद्या के कारण होने के कारण अनित्य हैं। इस प्रकार देह का मिथ्यात्व जान लेने के कारण उसे उसकी व्यथा
नहीं होती। जहाँ सम्मान होता दिखाई देता है वहाँ वह उस सुख से अभिभूत नहीं होता अथवा अपमान के घावों
से भयभीत होकर भाग नहीं जाता। देह पर अनेक प्रकार की विपत्तियाँ आती हैं लेकिन वह कौतुकवश उन्हें
देखता रह जाता है। शरीर मेरा है और मुझे व्यथा हो रही है इस बात का मुक्त को अनुभव ही नहीं होता।
जीवन्मुक्त में विदेह स्थिति इतनी दृढ़ हुई रहती है कि उसे देहदुःख की व्यथा बाधित नहीं करती। लौकिक सृष्टि
की नानाविध वार्त्ताओं से अथवा स्तुति सुमनों से उसकी पूजा की जाय अथवा अपशब्दों से उसकी निन्दा की
जाय तो उससे मुक्त को दुःख नहीं होता।
न स्तुवीत न निन्देत कुर्वतः साध्वसाधु वा।
वदतो गुणदोषाभ्यां वर्जितः समदृङ्मुनिः ॥ १६ ॥
दुष्टों द्वारा निन्दा के तीखे बाणों से हृदय पर प्रहार करने पर भी उसका मन नहीं कहता कि ये दुष्ट हैं,
उनके उन दोषों का वह उल्लेख भी नहीं करता। अथवा भक्त, सात्त्विक और साधु ये तीनों मिलकर 'तुम शुद्ध
दैवी पुरुष हो' कह कर उसकी स्तुति करें तो भी वह गुणानुवाद सुनकर 'मैं उत्तम पुरुष हूँ' इस प्रकार का भाव
उसके मन में नहीं आता। वह लोगों में ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं करता। ये लोग अत्यन्त 'सज्जन हैं', 'भले
हैं', 'गुणी हैं' ऐसी भाषा मुक्त के मुँह से नहीं निकलती। साधु हो या दुष्ट हो उन्हें वह ब्रह्मरूप ही समझता है।
निजात्मदर्शन से निजबोध होने के कारण वह चारों ओर तद्रूप होकर ही देखता रहता है। सारा विश्व मैं ही हूँ
ऐसा अनुभव होने के कारण उसे किसी की निन्दा या किसी की स्तुति करने की इच्छा ही नहीं होती। स्तुति और
निन्दा अपनी ही जगह विलीन हो जाती है। उसे आत्मसाक्षात्कार में ही विश्राम मिलता है, निजात्मपद में ही उसे
आराम मिलता है। 'साधु' और 'असाधु' का भ्रम नष्ट होकर वह स्वयं ही आत्माराम होकर रहता है। दुष्ट
कहकर जिसकी निन्दा की जाये उसे वह आत्मस्वरूप से देखने लगता है और तो और साधु कहकर जिसके गुणों
का वर्णन किया जाय तो वह भी उसे आत्मस्वरूप में दिखाई देता है। दाहिना अंग शुद्ध अर्थात् वन्दनीय और
बायाँ अंग अशुद्ध इसलिये त्याज्य ऐसा किसी को नहीं लगता। वह दोनों में ही उसका समान भाव रहता है उसी
प्रकार वन्दन करने वाले को तथा निन्दा करने वाले को भी समान भाव से देखता है। इसलिये वह किसी को
'साधु' अथवा किसी को 'असाधु' कहना अर्थात् स्तुति या निन्दा करने का उसने त्याग किया रहता है।
स्वानन्दसुख का बोध और समान भाव से वह समपद पर पहुँचा रहता है। उद्धव ! यही मुक्त की पहचान है, याद
रखो। अब और भी कुछ लक्षण तुम्हें बताता हूँ। मैंने तुम्हें प्रकट रूप से दिखाई देने वाला मुक्त का लक्षण बताया
है। लेकिन लोग इसे कहाँ मानते हैं? क्योंकि लोगों के तर्क-वितर्क बड़े विचित्र रहते हैं। भाग्य से इनमें से
एकाध लक्षण किसी मुक्त में सहज ही दिखाई देता है लेकिन केवल उतने ही से जगत में मुक्त को कौन स्वीकार
करेगा? क्योंकि जो मुक्त है वह अपनी मुक्तता की पहचान लोगों से छिपाकर रखता है। इसके विपरीत जो अपनी
मुक्तता का दिखावा करते हैं उन्हें स्वभाव का लोभी समझना चाहिये। शुक और वामदेव की मुक्तता को सभी
स्वीकार नहीं करते फिर दूसरों की क्या बात की जाय? मेरी मुक्तता भी अनेक लोग स्वीकार नहीं करते। मैंने
गोवर्धन पर्वत उठाया, दावाग्नि निगल लिया, अघासुर तथा बक दैत्य का संहार किया, कालिया का विनाश
किया। जब तक मैं देहधारी हूँ, तब तक मैं नित्य ये पराक्रम करता रहता हूँ। आत्मसुख की तो मैंने लूट मचा दी

२८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है। फिर भी मेरी मुक्तता को ब्राह्मण स्वीकार नहीं करते, फिर दूसरों की बात क्या करें? सारांश, संसार में अत्यन्त
कुतर्क भरे हुए हैं इसलिये मुक्तों की मुक्तता स्वयं मुक्त ही जानते हैं। दूसरा कितना ही चतुर क्यों न हो वह
उसका लक्षण नहीं जान सकता।
मुक्त इस संसार में जड़ एक मूक पिशाच की तरह विचरण करता है। अब वे लक्षण भी यथार्थ ढंग से
बताता हूँ।
न कुर्यान्न वदेत् किंचिन्न ध्यायेत् साध्वसाधु वा।
आत्मारामोऽनया वृत्त्या विचरेज्जडवन्मुनिः ॥ १७॥
मुक्त कायिक, वाचिक अथवा मानसिक इनमें से कोई भी कर्म उद्देश्यपूर्वक नहीं करता। उससे जो भी
कर्म होता है, वह स्वाभाविक रूप में होता है। इसी का नाम है 'अहेतुक' कर्म। गुणों में ध्यान रखकर स्तुति
अथवा निंदा की बातें न कर व मौन रहता है। लेकिन मौन का अहंकार करना भी उसका उद्देश्य नहीं होता।
अगर वह मौन का अहंकार रखता है तो वह मुक्त बन्धन में पड़ जायेगा। इसलिये बोलना और न बोलना यह
दोनों छोड़ वह मौनी हो जाता है। असत् वृत्ति से अर्थात् अनात्मवस्तु के निषेध से अशाश्वत का निराकरण कर
परब्रह्म का अखण्ड चिन्तन करने बैठा तो पुण्याई के कारण सद्गुरु की पहचान मिली जिससे ध्येय, ध्याता,
ध्यान समाप्त होकर भेद की भावना ही नष्ट हो गयी और चारों ओर चैतन्य ही भर गया। शास्त्रों की सहायता से
शाश्वत और अशाश्वत की जो दीवार खड़ी की जाती है वह चैतन्य की बाढ़ में ढह जाती है। तब सन्त और
असंत का भान ही नहीं रहता और चारों ओर चैतन्य ही भर जाता है। मन का मनपन टूट कर वृत्तिशून्य अवस्था
प्राप्त हो गयी। उस चैतन्य का मन में ध्यान करो तो मन ही चैतन्य हो जाता है। इससे ध्यान सहज ही टूट गया।
यही मुक्त का प्रमुख लक्षण है। उद्धव! चैतन्य में ही चित् खो जाने के कारण सच्चा मुक्त लोगों में जड़-मूक-
पिशाच की तरह विचरता हुआ दिखाई देता है। (इसीलिये वह औरों में अच्छी तरह पहचाना जाता है। इसलिये
उसका यह भी एक लक्षण है) नैष्कर्म ब्रह्म की उसे दृढ़ प्राप्ति हुई रहती है। अन्तर के निज बोध के कारण वह
प्रसन्न दिखाई देता है। हाँ बाह्य संसार में वह अवश्य ही जड़ बना दिखाई देता है जैसे अचेतन पत्थर हो।
संकल्प और विकल्प को उभारने वाला मन आत्मस्वरूप में ही लीन हो जाने के कारण वह अपने स्थान से नहीं
उठता। इसीलिये जड़ मालूम होता है। शब्द ब्रह्म को निगल कर वह स्वयं निःशब्द ब्रह्म हुआ रहता है। इसलिये
'निंदा' या 'स्तुति' का नाम नहीं लेता। सदासर्वदा सर्वांग से 'गूंगा' रहता है। 'ब्रह्म' कभी भी वाचा से व्यक्त
नहीं हो सकता। इसलिये यदि वह कहता भी है तो मात्र संकेत से। वह किसी की स्तुति या निंदा भी नहीं
करता। इसीलिये उसे 'गूँगा' कहते हैं। हे उद्धव! उसके मन में धन का कभी भी लोभ नहीं होता। इसीलिये वह
कभी द्रव्य को स्पर्श नहीं करता। इसीलिये लोग उसे पिशाच कहते हैं। उसकी पैशाचिकता का विचित्र चमत्कार
है। संसार जिसका प्राशन नहीं कर सकता उस ब्रह्मरस का वह पान करता है और जिसका भक्षण नहीं किया जा
सकता उस अभक्ष्य का वह भक्षण करता है। संसार जहाँ जा नहीं सकता उस अगम्य स्थान पर वह गमन करता
है। संसार का मन जहाँ प्रवेश नहीं करता वहाँ यह सर्वांग के साथ प्रवेश कर जाता है। विधि-निषेध का विचार
ही वह मन में नहीं लाता। कर्माकर्म का प्रयत्न वह नहीं करता। उसके अंगों से स्वानंद फूटता रहता है।
इसीलिये संसार उसे पिशाच कहते हैं। इस प्रकार मुक्त की जड़ता, गूँगेपन और पिशाच के लक्षण मिथ्या अथवा
बाह्य नहीं होते वे वास्तविक होते हैं। व्यर्थ की किचकिच उसे अच्छी नहीं लगती। ध्यान रखो कि मुक्त के मन

ग्यारहवाँ अध्याय २८७
में किसी भी बात का आग्रह नहीं होता। जो अत्यन्त आग्रही होता है वह सचमुच ही बद्ध है। मुक्त के ये जो
लक्षण बताये हैं वही साधकों के साधन होते हैं। सिद्ध को वह सहज ही प्राप्त होते हैं। उसी प्रकार जो इन
साधनों को साध्य करना जानता है वह साधक भी इसका लाभ लेता है। इसके अतिरिक्त जो अन्य शास्त्रज्ञ और
पण्डित होने का अहंकार करते हैं उन्हें जिस प्रकार सज्जन दुर्बुद्धि को दूर ढकेल देते हैं उसी प्रकार मुक्तों की
पंक्ति से दूर कर दिया जाता है। जो उपलब्ध साधन का उपयोग न कर केवल शास्त्र का अहंकार करता है और
दिन-रात धन और मान-सम्मान की इच्छा करता है वह आत्मज्ञान से अलिप्त रहता है। जो स्वयं को कुशल
कर्मठ याज्ञिक एवं शास्त्र सम्पन्न एवं वेदपाठी कहते हैं अथवा सदा धन की इच्छा से लोलुप रहते हैं उन्हें भी
यह सुख नहीं प्राप्त होता। उद्धव! उन्होंने अब तक जो भी कष्ट किये हैं वे सब व्यर्थ हो जाते हैं। उसके
सम्बन्ध में जो सच्चाई है उसे बताता हूँ।
शब्दब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि।
श्रमस्तस्य श्रमफलो ह्यधेनुमिव रक्षतः ॥ १८ ॥
वेदों का पठन कर वेदशास्त्रों का अर्थ जानकर अति पण्डित बनता है। चारों वेद उसकी जिह्वा पर सदा
खड़े रहते हैं। स्वरयुक्त संहिता, पद, क्रम, अरण, ब्राह्मण, सूत्र, निरुक्त, जटापाठ, ध्वजस्थ आदि सवर्णक पढ़
सकता है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गायन शास्त्र के सारे भेद जानने वाला, काव्यनाटक का उत्तम मर्मज्ञ, वेद तथा
उपवेद जानने वाला, व्याकरण में नितांत पारंगत, सांख्यशास्त्र, योगशास्त्र, तर्कशास्त्र में निपुण, वैशेषिक शास्त्र का
जानकार यज्ञ का कर्ममीमांसक, वेदांत का निरूपण करने में बृहस्पति, वार्तिक शास्त्र का ज्ञाता, तीनों प्रस्थान हाथ
जोड़ कर सामने खड़े। शिल्पशास्त्र में नितांत निपुण, पाकशास्त्र में पारंगत, रत्नों की उत्तम परख करने वाला,
अश्वपरीक्षा में भी दक्ष; आगमोक्त मंत्र-तंत्र में तैयार, शैवदीक्षा, वैष्णवदीक्षा का सार जानने वाला, सौर, शाक्त,
तारण-मारण आदि मंत्र-तंत्र में कोई हाथ धरनेवाला नहीं, कामशास्त्र में निपुण, संगीतशास्त्र में भी प्रवीण, कविता
करने में कुशल, राजनीति में भी निपुण, निघंटु जिह्वा पर, नटों का चमत्कार करने में दक्ष, प्रसिद्ध पंचाक्षरी,
प्रसिद्ध वैद्य एवं रसायनशास्त्रवेत्ता। औषधि वही तैयार करे, भूत भविष्य का ज्योतिष जानने वाला, अमरकोशादि
शब्दकोश तथा अठारह पुराण कंठस्थ, प्रश्नावली देखना भी आता है, स्वप्नाध्याय तो कोई उसके ही मुख से सुने।
इतिहास के अध्याय मुखोद्गत, जाने गर्भ के लक्षण, शब्दव्युत्पत्ति का गहरा ज्ञान, साधक-बाधक प्रमाणों की
जानकारी, समयसूचकता तो पीठ पर हाथ धरे, बोलने के काम में तो साक्षात् बृहस्पति। ब्रह्मज्ञान पर ऐसे बोले
जैसे हथेली पर आँवला धरा हो लेकिन आत्मानुभव के सम्बन्ध में अन्धा। जिस प्रकार मोर के पंखों पर आँखें
बनी रहती है किन्तु उनमें दृष्टि न होने के कारण वे अन्धी रहती हैं, उसी प्रकार विद्वानों की स्थिति रहती है। जिन
स्तनों से दूध निकलता है उन्हीं स्तनों से लगी किलनी से चिपके रहने के कारण मूर्ख लोग रक्त ही चूस लेते हैं।
उसी प्रकार ऐसे विद्वान विषय से जूझते रहते हैं। किलनी के मुँह में दूध आने लगता है तो उसे छोड़ कर वह
केवल रक्त ही ग्रहण करती है, उसी प्रकार विद्वान भी ज्ञान बेच कर विषय माँगते हैं। मक्खी सुगन्धी चन्दन को
छोड़ बड़े चाव से गन्दगी पर जाकर बैठती है उसी प्रकार पण्डित लोग भी आत्मज्ञान को छोड़कर विषयों से ही
आकृष्ट होते हैं। अद्वैत मत की सिद्धता कर वह ज्ञान बेचने के लिए देश देशांतर जाते हैं, मूर्ख लोग ज्ञानियों का
उपहास करते हैं फिर भी सम्मान की इच्छा करते ही हैं। ज्ञाता जब ब्रह्म का निरूपण करता है तो सात्विक लोगों
का मन परमार्थ की ओर मुड़ता है लेकिन वक्ता केवल द्रव्य की इच्छा करता है। इस प्रकार विद्वानों का ज्ञान

२८८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
विपरीत हो जाता है। कहना कुछ और करना ठीक उसके विपरीत तो फिर ब्रह्मज्ञान किसलिये? जहाँ धन और
मान-सम्मान रहता है वहाँ आत्मज्ञान नहीं हो सकता। धन और मान-सम्मान से चिपक कर ब्रह्मज्ञान की कथा
कहने बैठो तो सहस्र कल्पों में भी आत्मसाक्षात्कार से भेंट नहीं होगी। एक-एक पद के अनेक आख्यान सुनाये,
या एक-एक श्लोक के दस-दस अर्थ बताये लेकिन जब तक मन में मानाभिमान है तब तक ब्रह्मज्ञान कैसे
होगा? मैं महान पण्डित, मैं बड़ा ज्ञाता इस अहंकार से ही वे त्रस्त हो जाते हैं। ऐसा अन्धा बालक नित्य अपने
बाप के साथ रहने पर भी उसे नहीं पहचानता। वही गति विद्वानों की रहती है। वे निरन्तर आत्मा से एकरूप रहते
हैं, दिन-रात उसी का वर्णन करते हैं लेकिन उस रूप को पहचानते नहीं हैं। विषय सेवन करने के लिये वे
शास्त्रव्युत्पत्ति का व्याख्यान सुनाते हैं, उनका वह परिश्रम बाँझ गाय की सेवा करने की तरह व्यर्थ होता है। बाँझ
गाय कभी बच्चा नहीं जनती, रस्सी छूटने पर भागती फिरती है, रोज दूसरों से उलझ कर सरकारी बगीचों में जाती
है और उसका प्रायश्चित्त उसके मालिक को भोगना पड़ता है। पण्डितों की दशा भी वैसी ही होती है। उनकी
विद्वता से उनकी वाणी पुष्ट होती है। यही वाणी विषयों में उलझती है और उससे भी नहीं सँवरती। जिस प्रकार
अभागे पुरुष के हाथ में सोना भी मिट्टी हो जाता है उसी प्रकार पण्डितों की विद्वत्ता भी विषयासक्ति के कारण
नष्ट हो जाती है। ब्राह्मण को हाथी दान में मिलने पर वह उसका पोषण नहीं कर पाता और उसे कौड़ियों के
मोल बेच देता है। वही हाल विद्वानों की विद्वत्ता का होता है। अद्वैतशास्त्र का सिद्धान्त वे जानते हैं यह उनका
अलभ्य लाभ है लेकिन उसे वे विषयसुख के लिये बेच देते हैं। ऐसे विद्वान सचमुच मूर्ख हैं। घान में गन्ना डालने
से वह उसका रस निकाल कर बर्तन में भर देता है और स्वयं सूखे चपटों को लेकर करकराता रहता है ऐसी
स्थिति विद्वानों की होती है। विद्वान लोग जब ज्ञान कथन करते हैं तो उसमें जो उपयोगी होता है उसे सात्त्विक
लोग ग्रहण कर लेते हैं और निःसत्व शब्दरूपी चिपाड़ों से विद्वानों का मुँह करकराता रहता है। उसमें मधुरता
कैसी? नपुंसक के हाथ पद्मिनी सौंपने से जैसे वह जीवनभर रोती रहती है उसी प्रकार विद्वानों के घर में विद्वत्ता
भी रोती ही रहती है। जरा देखो! यदि ब्रह्मज्ञान के बिना केवल शब्दज्ञान से संन्यास ग्रहण किया जाय और ध्यान
धारण न किया जाय तो संन्यास व्यर्थ है। शब्दज्ञान के अनुसार जिस प्रकार कहा गया है उस प्रकार यदि आचरण
न किया जाय और विषयासक्ति से रहा जाय तो समझ लो वह अपने हाथ से मुँह में मिट्टी डालता है। वेदशास्त्र
सम्पन्न होकर उस पर जीविका चलाने लगा तो समझ लो वह एक व्यापारी अवश्य हो जायेगा किन्तु अपना
मूलधन खो देगा। कोई रत्न के बदले कौड़ी खरीदे अथवा अमृत के बदले मांड पिये वही पण्डितों का अन्त होता
है। अर्थात् वे आत्मज्ञान से वंचित हो जाते हैं। कितने कष्ट से उन्होंने शब्दज्ञान प्राप्त किया था, लेकिन उतने ही
कष्ट के साधन से परब्रह्म को भेंट कर सकते थे। ईंट के बदले पारस पत्थर मिलने से मूर्ख पुरुष दुःखी होते हैं।
पेट भरने के साधन के रूप में तथा अपनी विद्वत्ता के प्रदर्शन के उद्देश्य से वे सिफारिश लेकर श्रीमानों के पास
जाते हैं। जिस प्रकार पेट भरने के लिये मांड पीना आवश्यक है उसी प्रकार विद्वान लोग पेट के लिये वितंडावाद
करते रहते हैं। व्युत्पत्ति बल से वेद का अर्थ निकाल कर जब परब्रह्म साध्य नहीं कर पाते तो उस श्रम का फल
श्रम ही प्राप्त होता है। उत्तम रत्न घान में डालो तो न तेल ही निकलता है और न ख़ली ही प्राप्त होती है, रत्न
व्यर्थ ही चकनाचूर हो जाते हैं। उसी प्रकार विद्वान विद्वत्ता के फेर में पागल हो जाते हैं। वे परिश्रम का फल
परिश्रम के रूप में ही प्राप्त करते हैं। श्रम से श्रम कमाते हैं, दुःख से दुःख भोगते हैं। यही बात श्रीकृष्ण उद्धव
को दृष्टांत देकर बताते हैं।

ग्यारहवाँ अध्याय २८९
गां दुग्धदोहामसतीं च भार्यां देहं पराधीनमसत्प्रजां च।
वित्तं त्वतीर्थीकृतमङ्ग वाचं हीनां मया रक्षति दुःखदुःखी ॥ १९॥
दूध के लालच में सूखी गाय का दूध निकालने लगो तो चम्मच भर दूध तो हाथ नहीं आता, अलबत्ता गाय
की दुलत्ती खानी पड़ती है। नटखट, अंग-चोर हर किसी को मारने वाली, ढेर सारा खाने वाली, अधर्मशील, लात
मारने वाली और बेकाबू, छूटी तो भाग कर राजमहल में घुस जाएगी, लाठी से मारो तो जगह से हिलने का नाम
नहीं लेगी, चाल भी ठीक नहीं, अपने मन से भटकती, चरती रहती है। जिससे दूध कभी न मिले, जो कभी
गाभिन नहीं होती, ऐसी गाय को पोसने में पोषक को ही दुःख होता है। ऐसे ही घर को सुव्यवस्थित रखना यह
गृहिणी का कर्त्तव्य है लेकिन यदि वह स्त्री ही पुरुष के अनुकूल न हो तो उसके कारण पुरुष को दुःख ही
अधिक होता है और हमेशा सिरदर्द रहता है। निन्दा करना, आज्ञा का पालन न करना, पति को ऊलजलूल
बकना, स्वयं मिष्ठान्न खाना यह स्त्रियों का बुरा लक्षण है। व्यवस्थित खाने-पीने को दो, पर्याप्त धन दो तो गुड़
की तरह मधुर बन जाती है लेकिन उसे धर्म करते हुए देखो तो सर फोड़ लेने की इच्छा होती है। यह स्त्री
सचमुच असाध्वी है। जो पापपुण्य का विचार नहीं करती, कामचारी, धर्मशून्य होना यह दुराचारी स्त्री का लक्षण
है यह ध्यान में रखो। ऐसे असाध्वी स्त्री के संग से सुख कैसे प्राप्त होगा? ये पुरुष अति दुःख से दुःखी होते हैं।
जिसका देह पराधीन रहता है वह जीवन में सदा दीन बने रहते हैं। पराधीन को कल्पांत में भी समाधान प्राप्त
नहीं होगा। अपनी सत्ता छोड़ जो पराधीन हो जाता है वह कभी स्वप्न में भी सुख की बात नहीं देखता। जो 'पर'
अर्थात् माया के अधीन हो गया उस पराधीन को स्वप्न में भी सुख का संवाद प्राप्त नहीं होता। वह सदा दुःख में
ही रहता है यह ध्यान में रखो। जो कहता है कि पराधीन को सुख है वह विशुद्ध मूर्ख है। दुःखों का दुःख
पराधीन को अवश्य भोगना पड़ता है। अब 'संतति का विचार' सुनो। किसी को 'सुपुत्र' मिलता है तो किसी को
'कुपुत्र'। कुछ तो इतने मूर्ख होते हैं कि उनसे माँ-बाप को रात-दिन दुःख ही प्राप्त होता है। जो नरक से तारता
है, जो पूर्वजों का उद्धार करता है, जो माँ-बाप को परमेश्वर समझ कर उनकी अनन्य भक्ति करता है, जो माँ-
बाप को छोड़ अन्य तीर्थों को जाने की इच्छा नहीं करता, उनके चरणों के तीर्थ से असीम पवित्रता प्राप्त होती है
ऐसी जिसकी भावना रहती है; जिस प्रकार लक्ष्मी और नारायण हैं उसी प्रकार मेरे माता-पिता हैं यह समझ कर
जो अत्यधिक भक्ति से उनका भजन करता है, उनकी सेवा से कभी नहीं ऊबता; जो सत्त्व से अधिक सात्त्विक,
जो पितृवचन का पालन करता है, धर्म और अधर्म का सतत विचार करना यही जिसका स्वाभाविक धर्म है, जो
माता-पिता की सेवा से ही अपना उद्धार कर लेता है और सारे पितरों को मुक्त करता है, वही संसार में 'सत्पुत्र'
है। ऐसे पुत्र का पालन-पोषण करने में माँ-बाप को आनन्द प्राप्त होता है। वह पितृभक्ति कर स्वयं भी तरता है
और पूर्वजों का भी उद्धार करता है। 'सत्पुत्र' उत्पन्न होने पर इतना सुख प्राप्त होता है। अब तुम्हें 'असत्प्रजा'
की स्थिति बताता हूँ। मूल में यह शब्द 'असत्प्रज' है। उसके व्यवहार के बारे में बताते हुए लज्जा आती है।
लेकिन वह भी तुम्हें बताता हूँ। ऐसे जो पुत्र पैदा होते हैं उनका प्रेम केवल पत्नी और धन पर होता है। माँ-बाप
की बिलकुल उपेक्षा करते हैं। ये दुष्ट, शठ, कर्मभ्रष्ट और अत्यन्त दुर्जन होते हैं, इनकी पूँजी है झूठ बोलना,
झूठी कसम खाना, माँ-बाप को ठगना और सात्त्विक लोगों को कष्ट देना यही इनका धन्धा होता है, स्वयं तो
नरक जाते ही हैं पर पूर्वजों को भी वहाँ ले जाते हैं। ऐसे कुपुत्रों का जो पोषण करते हैं वे अति दुःख से दुःखी
होते हैं। पेट में फोड़ा पैदा हो जाये तो जैसे उसे फोड़ना सम्भव नहीं है उसी प्रकार असत् संतति का संसार उसे
असह्य दुःख भोगने का बाध्य करता है। ऐसे पुत्र जब तक जीवित रहते हैं तब तक दुःख भोगना पड़ता है और

२९० श्रीमद् एकनाथी भागवत
मरने पर नरक देते हैं। इस प्रकार दुष्ट संतति के लाड़-प्यार का अर्थ है दुःख से असीम पाप भोगना। उसी प्रकार
गांठ में धन होते हुए उसे सत्पात्र को दान न करना यही सब दुःखों का मूल है। इसीलिये धन के लोभी को
अपार दुःख भोगना पड़ता है। धन प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार के प्रयत्न तथा धोखाधड़ी करनी पड़ती है।
तिस पर यदि अनेक प्रकार के संकट सह कर धन प्राप्त हो भी जाय तो पहले उसे संग्रह करने के लिये दुःख
भोगना पड़ता है, फिर उसकी रक्षा करने के लिये दुःख भोगना पड़ता है, उस धन के लिये जब पत्नी और बच्चे
भी घात करने के लिये तैयार हो जाते हैं तो फिर औरों की क्या कथा वर्णन की जाय ? सत्पात्र को दान न देकर
जो कुबेर का धन सुरक्षित रखता है उसे दुःखातिरेक के कारण अनेक विघ्नों का सामना करना पड़ता है और
इससे धर्म की रक्षा नहीं होती। इस प्रकार रखा हुआ धन चला जाता है तो उससे दुःख की ज्वाला भड़क उठती
है। इस प्रकार अमीरों को सैकड़ों जन्म लेने पड़ते हैं और वे करोड़ों दुःख भोगते रहते हैं। नरदेह प्राप्त कर जिसे
अव्यंग वाणी प्राप्त हुई है और फिर भी जो हरिनाम का उच्चार नहीं करता उसके लिये तो पाप रखा ही हुआ है।
जमीन में गाड़ कर रखे हुए लोहे को जिस प्रकार मिट्टी खा जाती है और उसका कोई उपयोग न होकर वह व्यर्थ
नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार नामोच्चार के बिना वाणी व्यर्थ नष्ट हो जाती है। आसन, ध्यान आदि की चिन्ता में
न पड़ जो राम का नाम लेता है उसके करोड़ों जन्मों के कष्टों का परिहार उससे होता है, वही वाणी अत्यन्त
उत्तम है। जो नित्य रामनाम का जाप करता है उसे मेरे ही जैसा (परमेश्वर जैसा) समझना चाहिये। सारे नियमों
का पालन उसी ने किया यही माना जायेगा और सभी पुरुषों में वही उत्तम पुरुष है इसे ध्यान में रखो। चतुर्वर्णों में
जो कोई रामनाम का अखण्ड जप करेगा वही मेरा लाड़ला बन जायगा। त्रिभुवन में भी मेरा उससे अधिक दुलारा
कोई नहीं है। जिसे यह रामनाम अच्छा नहीं लगता, समझ लो उसके मुँह में पातकरूपी मुखरोग लग गया है।
वह स्वयं ही अपने सुख से वंचित हुआ और आत्मघाती सिद्ध हुआ ऐसा समझना चाहिये। रामनाम के सिवाय
जो मुँह है उसे केवल चमड़े का कुण्ड समझना चाहिये और उसमें की जीभ को केवल चमड़े का टुकड़ा
समझना चाहिये। असत्य मल से वह जीभ लिपटी रहती है अथवा हरिनाम के सिवाय जो वाणी है वह गलित
कुष्ट से सड़ी हुई है ऐसा समझना चाहिये। उसमें से असत्यरूपी कोढ़ का पानी रिसता रहता है और निन्दा की
बदबू फैली रहती है। ऐसी वाणी में सचमुच अधर्म के कीड़े पड़ते हैं ओर वे चारों ओर बिलबिलाते रहते हैं।
ऐसी वाणी जिसके सामने आती है, वह उससे मुँह फेर लेता है और नाक पर कपड़ा रखकर 'हरहर' कहता है।
छोटे-बड़े सभी उस वाणी पर थूकते हैं। उस वाणी की दुर्गन्ध मुझे भी असह्य हो उठती है। ऐसी वाणी का जो
रखवाला है वह दुर्बुद्धि है। उस पर अनर्थों का पहाड़ टूटता है और अनेक दुःख प्राप्त होते हैं। ऐसे पुरुष की
वाणी सचमुच दुःखों का परिपाक है। जो वाणी नाम से विमुख होती है वह वाणी शुद्ध नरक है ऐसा समझो फिर
वह वाणी वेदश्रुत ही क्यों न हो ? जो नामकीर्त्तन की निन्दा करता है वह महापातकी से भी अधिक पापी है।
उसके कारण पृथ्वी को भी अत्यन्त पीड़ा होती है। नामकीर्तन से ही वाणी धन्य हो उठती है इस भाव का
निरूपण स्पष्ट करने के लिये श्रीकृष्ण तैयार हुए।
यस्यां न मे पावनमङ्ग कर्म स्थित्युद्भवप्राणनिरोधमस्य।
लीलावतारेप्सित जन्म वा स्याद् वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः॥२०॥
मेरे नाम, कर्म और गुणों की कीर्ति संसार को पवित्र करती है तथा महान दोषों का विनाश करती है।
हरिनाम का स्मरण करने से जड़ जीवों का उद्धार होता है। तुम कहोगे "मैं विद्या तथा अविद्यातीत ब्रह्मस्वरूप

ग्यारहवाँ अध्याय २९१
हूँ' तो फिर तुम्हें गण, नाम तथा कर्म किस बात का ? और कीर्तन धर्म भी कैसे होगा ? लेकिन उद्धव ! तुम ऐसी
बात मन में न लाओ। मैं अपनी ही माया के सहारे अपनी अनेक लीलाएँ दिखाता हूँ, अनेक अवतार धारण करता
हूँ और बिना कुछ किये ही सबका पालन और संहार करता हूँ। ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर ये त्रिगुणात्मक तीन
गुणावतार हैं, लेकिन उन तीनों रूपों में सचमुच मैं ही रहता हूँ, मैं ही चराचर का निर्माण करता हूँ और उनका
संहार भी करता हूँ। ब्रह्मदेव के रूप में सृष्टि को उत्पन्न करने वाला भी मैं, विष्णु के रूप में उसका प्रतिपाल
करनेवाला भी मैं और रुद्ररूप से उसका संहार करने वाला भी मैं ही हूँ यह समझ लो। जिस प्रकार बाल्य, यौवन
तथा वार्धक्य इन तीनों अवस्थाओं का कर्त्ता एक ही पुरुष होता है, उसी प्रकार उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय इन
तीन कर्मों का कर्त्ता मैं ही हूँ। 'मैं' कर्त्ता होते हुए अकर्त्ता हूँ और अकर्त्ता के रूप में कर्त्ता हूँ। मेरी यह बात स्वयं
मैं ही जानता हूँ, दूसरा नहीं जानता। मेरे नाम और कर्मों का वर्णन करने से उस वक्ता को मेरी ही उपाधि प्राप्त
होती है और मेरी लीलावतारों का कीर्तन किया जाय तो कीर्तनकार को आत्मप्राप्ति होती है। सारे अवतारों में
श्रेष्ठ श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि के जन्मकर्म, उनके विविध चरित्र तथा लीलाएँ इनका जो अखण्ड गायन करते हैं
उन्हें आत्मप्राप्ति होती है। श्रीराम ने सहज लीला के रूप में सेतु का निर्माण किया तथा समुद्र में पत्थरों को तैरने
के लिये बाध्य किया, श्रीकृष्ण ने खेल ही खेल में गोवर्धन पर्वत उठा लिया और दावाग्नि को निगल लिया,
श्रीराम ने एक ही बाण से ताड़का का वध किया, श्रीकृष्ण ने बाल्यावस्था में ही पूतना का स्तन चूस कर उसे मार
डाला। श्रीराम ने पैर से अहिल्या का उद्धार किया, श्रीकृष्ण ने यमलार्जुन दोनों का ही उद्धार किया। जिस धनुष
को उठाने में रावण भी लड़खड़ा कर गिर पड़ा वही धनुष तोड़कर श्रीराम ने सीता का वरण किया, श्रीकृष्ण
शिशुपाल आदि को जीत कर भीमकराजा की कन्या रुक्मिणी को घर ले आये। श्रीराम ने सुबाहु, खर, दूषण
आदि का वध किया, श्रीकृष्ण ने अधासुर, बकासुर, केशी आदि को मारा। श्रीराम ने सुग्रीव को राजपाट देकर
उसकी सिंहासन पर स्थापना की। उसी प्रकार श्रीकृष्ण ने उग्रसेन को सिंहासन पर बिठाया। श्रीराम ने वानर सेना
एकत्र कर राक्षसकुल का वध किया श्रीकृष्ण ने बालगोपाल इकट्ठा कर सारे मल्लों को मार डाला। श्रीराम ने
रावण और कुम्भकर्ण को मारा, श्रीकृष्ण ने कंस और चाणूर का वध किया। श्रीराम ने बालि नामक वानर को
धोखा दिया, श्रीकृष्ण ने महाघोर कालयवन को ठगा। श्रीराम ने राज्य पर विभीषण को स्थापित किया, श्रीकृष्ण ने
राज्य पर धर्म की स्थापित की। एक बाप की आज्ञा से वनवास पर गया तो दूसरा माता के मृतपुत्रों को लेकर
आया। इन अवतारों का चरित्र वर्णन कर ही पहले चोर रहा कोली महान ऋषि वाल्मीकि बना और व्यास जाटपुत्र
होते हुए व्यास अवतार चरित्रों का गायन करने से ही त्रिभुवन में श्रेष्ठ कहलाये। इन दोनों अवतारों की महानता
का वर्णन करते-करते ही दोनों महान कवि हो गये। देवताओं ने भी स्तुतिस्तोत्रों का गायन तथा वन्दन कर व्यास-
वाल्मीकि को गौरवान्वित किया है। उन महाकवियों की काव्यकथा शेष नेत्रद्वार से श्रवण करते-करते तथा दो
सहस्र नेत्रों से सुनने पर भी उसका मन नहीं भरता। यही कथा सुनने के लिये स्वर्ग में इन्द्र ने बृहस्पति का
चरणस्पर्श किया। इस प्रकार सारे त्रिभुवन में इन अवतारों की चरित्रकथा की. कीर्ति फैली हुई है। कथा महिमा
का वर्णन अब बन्द करता हूँ। लेकिन केवल मेरे नाम का स्मरण करने से ही मैंने अजामिल ब्राह्मण का उद्धार
किया। हरिनाम स्मरण से ही गजेन्द्र का उद्धार हुआ। पक्षी को नाम लेने के बहाने राम इन दो अक्षरों का स्मरण
किया लेकिन केवल उतने से ही महापापी वेश्या का उद्धार हो गया। वेदशास्त्रों का अर्थ जानना कठिन है किन्तु
मेरा नाम कठिन नहीं है यह ध्यान में रखो पठन करने से वेदशास्त्र पढ़ सकते हैं लेकिन केवल उतने से ही मुझमें
प्रवेश नहीं हो पाता। लेकिन कोई सहज ही मेरा नाम ले ले तो वह मुझे अच्छा लगता है। वेदशास्त्रों के अधिकारी

२९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
केवल ब्राह्मण हैं किन्तु मेरे नाम के अधिकारी चारों वर्ण हैं और संसार का उद्धार मेरे नाम से ही होता है इसे
ध्यान में रखो। जहाँ नित्य मेरा नाम लिया जाता है, वहाँ सचमुच मैं ही रहता हूँ। इसमें सोचने या विचार करने
की कोई आवश्यकता नहीं है। मेरा नाम ही तारने में समर्थ है। जिस वाणी से मेरा जन्म, नाम, कीर्ति अथवा
गुणानुवाद का पठन नहीं होता वह वाणी व्यर्थ की बकवास करने वाली पिशाचिनी है, यह जान लो। जिस मुँह
से मेरी कीर्ति का वर्णन नहीं किया जाता है वह केवल मदिरा भरा प्याला है। उस मद्य के प्याले के नशे की
गन्दगी के भय से नाम वहाँ आता ही नहीं है। जिस वाणी से नाम का उच्चार नहीं होता उसे बाँझ समझना चाहिये
क्योंकि वह हरिकथा का गर्भ धारण नहीं करती। उस वाणी के अन्य सारे उद्योग निष्फल हैं। श्रीकृष्ण ने उद्धव से
कहा, भैय्या! एक अच्छा उपाय सुनो। मेरा नाममार्ग अत्यन्त सुगम होने के साथ ही परिपूर्ण है। वहाँ किसी अन्य
मार्ग की आवश्यकता ही नहीं है। इसलिये सज्जनों को हरि के नाम के अतिरिक्त वाणी का उपयोग करना ही
नहीं चाहिये। यही उद्देश्य श्रीकृष्ण ने अत्यन्त प्रेम से प्रदर्शित किया। शब्दव्युत्पत्ति का ज्ञान प्राप्त कर लेने से
उसकी योग्यता बढ़ेगी। उसे पंडिताई प्राप्त होगी लेकिन वैराग्य प्राप्त नहीं होगा और वैराग्य के बिना मेरी प्राप्ति
कदापि नहीं होगी। मान लो वैराग्य प्राप्त हो भी गया तो वह भी यदि विवेक के बिना उत्पन्न हुआ तो जिस प्रकार
आँखें न होने के कारण ज्येष्ठ होते हुए भी धृतराष्ट्र का राजपाट चला गया, उसी प्रकार विवेक के बिना वैराग्य
अन्धा है और अनधिकारी है। उसमें सन्मार्ग देखने का सामर्थ्य नहीं है। उसका परिभ्रमण व्यर्थ है। जो विवेक से
परिपूर्ण है उसका वैराग्य उफन कर बाहर आता है। उसे मेरी कुछ विचित्र जिज्ञासा रहती है। उसी का वर्णन
श्रीकृष्ण करते हैं।
एवं जिज्ञासयापोह्य नानात्वभ्रममात्मनि।
उपारमेत विरजं मनो मय्यर्प्य सर्वगे॥ २१॥
जरा देखो! जिसके मन में मेरा नित्यमुक्त तथा नाशरहित स्वरूप जानने की उत्कट इच्छा बनी रहती है, उसे
उसके अतिरिक्त और कुछ स्मरण नहीं होता। मुझे जानने की इसी तीव्र उत्कंठा को जिज्ञासा कहते हैं। मुझे प्राप्त
करने के लिये वह कभी विद्वत्ता या मान-सम्मान को स्वीकार नहीं करता। श्रवण और मनन तथा मन में विचार
करने के बाद देहादिक संसार चिन्तन व्यर्थ है ऐसा उसने निश्चित किया रहता है। इससे गुरुचरणों में उसका पूर्ण
विश्वास रहता है और पूर्ण ब्रह्म के प्रति दृढ़ निश्चय रहता है। अतः अगले मार्ग पर चलने के लिये वह
भगवद्भजन के प्रति तत्पर हो जाता है अथवा कर्म की झंझट छोड़कर वह ध्याननिष्ठ हो जाता है। अतः ध्येय,
ध्याता और ध्यान इस त्रिगुट का उसे भान नहीं रह जाता, चारों ओर चैतन्य भर जाने के कारण वह भी सनातन
परब्रह्म होकर रह जाता है। वहाँ कर्त्ता, कर्म और क्रिया का क्या काम? भेदभाव का भ्रम मिट जाता है, अन्दर
बाहर परब्रह्म ही भरा रहता है और गुरुकृपा से मन निश्चल हो जाता है। चारों ओर सर्वकाल, सभी देशों में जहाँ
परब्रह्म व्याप्त हो जाता है वहीं आत्मज्ञान स्थिर हो जाता है। ऐसे परब्रह्म का ध्यान जो नहीं कर पाता उसके लिये
दूसरा आसान उपाय बताता हूँ।
यद्यनीशो धारयितुं मनो ब्रह्मणि निश्चलम्।
मयि सर्वाणि कर्माणि निरपेक्षः समाचर॥ २२॥
मन स्वभावतः चंचल होता है और विषयवासना उससे भी अधिक चपल! इसी कारण से निर्गुण ब्रह्म में
प्रवेश करने का सामर्थ्य मन नहीं जुटा पाता। वह सामर्थ्य लाने के लिये सांख्य, योग अथवा संन्यास का जो मार्ग

ग्यारहवाँ अध्याय २९३
है उसमें आने वाले परिश्रम से यदि बचना है तो बस अत्यन्त उल्हास से मेरे प्रति भक्ति बढ़ानी चाहिए। इससे
पहले बद्धमुक्तों के लक्षण बताते समय मुक्तों का लक्षण भी बताया था और शब्दों का पांडित्य करने वालों के
खोखले शब्दज्ञान का भी विवेचन किया था। अब अपनी आत्मभक्ति का उद्धव से वर्णन करने के उद्देश्य से
श्रीकृष्ण आदरपूर्वक भक्ति का स्वरूप बता रहे हैं। उद्धव! यदि इच्छापूर्वक मत्कर्म करने हों तो मनोधर्म भक्ति को
अर्पण कर देना चाहिये और आनन्दपूर्वक मेरे गुण, कीर्ति तथा नाम आदि का स्मरण करना चाहिये। मेरे भजन से
ही कार्य सम्पन्न होगा यह विश्वास मन में दृढ़ कर दिन रात, अथक मेरे भजन में प्रवृत्त होना चाहिये। भजन पूर्ण
होने पर भी मन नहीं भरता एक पल भी व्यर्थ नहीं जाने देना चाहता। मेरे भजन में विशेष प्रेम होते हुए भी
वैदिक, लौकिक अथवा दैहिक नैमित्तिक कर्म नहीं छोड़ना चाहिये। वह कर्म भक्तों को बाधक नहीं होता।
लेकिन मेरे सभी कर्मों का आचरण करते समय फल की आकांक्षा की कल्पना नहीं करनी चाहिये यही भक्तों का
गूढ़ मर्म है।
जो अन्तर से बिना ऊबे मुझ पर भक्ति रख सारे कर्म करता है और कभी फल की आशा नहीं करता वही
भक्ति का अधिकारी होता है इसे ध्यान में रखो। पीपल का पेड़ फल खाने की आशा से नहीं लगाया जाता उसी
प्रकार इच्छापूर्वक कर्म करने से आगे फल की इच्छा उत्पन्न ही नहीं होती। मेरा भजन करने पर ज्ञान की भी कमी
नहीं पड़ती मुझ पर भक्ति कर मेरा भजन करने से ही मेरे भक्तों को नित्यमुक्तता प्राप्त होती है। ज्ञान के बिना
भक्ति नहीं होती यह केवल शब्दज्ञान है। भक्ति से ही प्रत्यक्ष अपरोक्ष ज्ञान की प्राप्ति होती है इसलिये मेरा भजन
करते समय भक्तों को ज्ञान की कमी नहीं होती। घर गृहस्थी में रहने पर भी मेरे भक्तों को उसका बन्धन नहीं
होता। जिसके मुख में मेरा नाम होता है, जिसे मेरे भजन की लगन रहती है, जिसके मन में मैं आत्माराम रहता हूँ
उसके घर मुक्ति दासी की तरह रहती है। लेकिन जिसकी प्रवृत्ति निर्विषय हो जाती है उसके लिये मुक्ति का क्या
महत्त्व है ? भक्तों को किसी भी कर्म में विषय की आसक्ति नहीं रहती है। उसका मन विषय में नहीं रहता।
उसका विषय मैं भगवान ही रहता हूँ। वे सदा मुझमें ही लोलुप रहते हैं इसलिये वे नित्यमुक्त रहते हैं। भक्त यदि
विषयों का सेवन करते भी हैं तो उसे कण-कण में मुझे ही अर्पित करते हैं और समस्त प्राणिमात्र में वे मेरा ही
रूप देखते हैं। इसीलिये मुक्ति उनका वन्दन करती है। इसलिये मेरे भक्तों पर कर्मों का बन्धन तो नहीं ही लगता,
बल्कि मेरा स्मरण और कीर्तन करते हुए वे संसार का बन्धन तोड़ देते हैं। मेरे भक्तों का जो निवास होता है वही
मेरा भी निवास रहता है इसे ध्यान में रखो। उसके द्वार पर मुक्ति आठों पहर हाथ जोड़ कर खड़ी रहती है। मेरा
भजन करते रहने से किसी बात की कमी नहीं रह जाती। चारों पुरुषार्थों की अपेक्षा भक्ति मुझे अधिक प्रिय है।
ज्ञान, नित्यानित्यविवेक तथा भक्ति इनमें भी मेरा अत्यन्त प्रेम रहता है। उसी प्रकार प्यारे भक्तों का भी मुझे रात
दिन अधिक से अधिक सुख प्राप्त होता है। जिस प्रकार एकमेव बच्चा रहने पर माँ को वह अधिक प्रिय रहता है
उसी प्रकार प्यारे भक्तों का कौतुक करने में मुझे अत्यन्त सुख का अनुभव होता है। इसलिये ऐसे भक्तों को मैं
तत्काल अपनी छत्रछाया में ले लेता हूँ और उसे आत्मसुख देता हूँ। अगर वह उसे ग्रहण नहीं करता तो मैं उसका
दास बन जाता हूँ जिसने अपने प्रेम के कारण अपनी चित्तवृत्ति मुझे अर्पण की उसकी सेवा करने का निश्चित
विचार मैं उसी क्षण से करता हूँ। प्यारे भक्तों का जूठा खाने में अथवा उनके घोड़ों को नहलाने में मुझे जरा भी
लज्जा नहीं होती। अधिक क्या कहा जाय ? उनके घर की जूठन उठाने में मुझे जरा भी लज्जा नहीं होती। प्यारे
भक्तों की मुझे इतनी अधिक चाह है कि उनके जूते भी मैं अपने मस्तक पर धारण करता हूँ। प्रेमी भक्तों की बात
कहते-कहते श्रीकृष्ण भाव विह्वल हो उठे। उनका कंठ भर आया। शरीर पर रोमाञ्च उभर आये। उन्होंने दौड़कर

२९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उद्धव को आलिंगन दिया। श्रीकृष्ण का प्रेम ही अद्भुत था। आँखें अश्रुपूरित हो गयीं और वे स्वानंदजीवन की
वर्षा करने लगीं। मानों श्रीकृष्ण अपने आसुओं से उद्धव को भक्ति के साम्राज्य का राज्याभिषेक कर रहे थे।
प्रसंगानुसार, भक्तों की कथा कहते-कहते उनकी आँखों के सामने उद्धव दिखायी दिया और उन्होंने दौड़ कर उसे
बाहुपाश में बाँध लिया। श्रीकृष्ण को भक्तों से बहुत प्रेम था। जिस समय उसने आलिंगन दिया उस समय वह
कार्यकारण भी भूल गया, अपने धाम जाने का भी उसे विस्मरण हो गया और 'मैं' और 'तुम' का तो उसे स्मरण
ही नहीं रहा। मैं देवता हूँ और उद्धव भक्त हैं इस भेदभाव का भी उसे स्मरण नहीं रहा। कथा निरूपण की बात
भी उसे याद नहीं रही। उद्धव अपने आपको भूल गया और कृष्ण अपने को। प्रिय लोगों की बात सुनाते समय
परस्पर की बात से परे एकता के कारण दोनों गले मिले। प्रेम की चाह बहुत बड़ी चीज है। भक्ति का सच्चा सुख
क्या है वह आज उद्धव को मालूम हुआ। भक्ति का जो अलौकिक प्रेम होता है उसी को इस समय उद्धव ने
अभिव्यक्त किया। श्रीकृष्ण निजधाम की ओर जा रहे थे उस समय यदि उद्धव ने नहीं पूछा होता तो श्रीकृष्ण ने
ज्ञान, वैराग्य और भक्ति की कथा क्यों सुनायी होती ? उद्धव ने सचमुच भक्तिप्रेम विशेष होता है यह बात उजागर
की। उद्धव के उस प्रश्न से ही श्रीमद्भागवत त्रिभुवन में पूज्य हो गये। इसलिये तन, मन और प्राण से उद्धव की
बड़े प्रेम से आरती उतारनी चाहिये। इससे अधिक उसकी स्तुति करने में वाणी असमर्थ है। जो शब्दों में भी
व्यक्त नहीं किया जा सकता, बुद्धि भी जिसका आकलन नहीं कर सकती वह भक्तिप्रेम का आत्मगुह्य उद्धव को
देने के लिये श्रीकृष्ण ने आलिंगन का केवल बहाना किया। उस पुरुषोत्तम ने भक्ति का शुद्ध और अति उत्तम प्रेम
उद्धव को दिया और उससे श्रीकृष्ण आनन्दित हुआ। प्रेमी भक्तों की कथा सुनाते-सुनाते, महाराज ! मैं श्लोक का
अर्थ भी भूल गया। कृष्ण को भी प्रेम की यह कथा अच्छी लगी इसलिये उसे नियंत्रण में रखना कठिन हो गया।
प्रेम का स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि वह स्मरण का मरण नहीं होने देता। यह बात सज्जन जानते ही हैं क्योंकि वे
भक्तिप्रेम को जानते हैं। लेकिन यह सब होते हुए भी मेरा सबसे बड़ा अपराध तो है ही क्योंकि श्लोक का अर्थ
भूलकर मैं बहक गया। इसके लिये लोग मुझे क्षमा करें। इस पर श्रोताओं ने कहा, “रुको! जिस निरूपण से
आनन्द प्राप्त होता है उसके सम्बन्ध में ऐसी बातें सहन नहीं होतीं। इतना मधुर है वह रहस्य। भागवत वैसे भी
उत्तम है, तिस पर उसमें भक्तिप्रेम का वर्णन है, उससे मानों परब्रह्म ही प्रकट हो गया और हमारा मनोरथ पूर्ण हो
गया। श्लोकों का सम्बन्ध छूटा और कथाभाग दूर हट गया ऐसी प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं है। हमलोग
श्रीकृष्णगुणानुवाद में तल्लीन हो गये हैं। तुम्हारे इस भक्तिप्रेम का निरूपण सुनकर श्रवणसुख में बाढ़ आ गयी है,
वह रुकेगी ऐसा नहीं लगता। इसलिये चुपचाप निरूपण को चलने दो।” प्रेमी भक्तों की कथा कहते समय कृष्ण
और उद्धव एकरूप होकर गले में बाँहें डालकर बैठे थे वह दुनिया से न्यारी मिलनी श्रीकृष्ण ने छुड़ायी और मन
ही मन बोले, यह बिलकुल अयोग्य है क्योंकि उद्धव यदि अभी ही ऐक्यरूप में पहुँच गया तो फिर मेरी कथा को
इससे अच्छा श्रोता और कौन मिलेगा? मेरे भक्तिज्ञान का विस्तार करने के लिये मेरे भक्तों का सखा एक उद्धव
ही है, इसीलिये उसे सच्चे आत्मज्ञान का बोध कराकर उसे ब्रह्मपाप से विलग किया। गुह्यज्ञान की सारी मिठास
और भक्तिप्रेम की चाह, साथ ही श्रीकृष्ण की दृढ़ मधुरता तथा चाह सचमुच उद्धव के पास ही थी। भक्तिप्रेम का
एकमेव भोक्ता श्रीकृष्ण हैं और कृष्ण की कृपा भक्त ही जानते हैं। यह बात अनिर्वचनीय है। उसका शब्दों में
वर्णन नहीं हो सकता। कृष्ण ने उद्धव से कहा, हुँ! अब सावधान हो जाओ और भक्तिमार्ग के लिये उपयोगी आगे
की कथा सुनो। फल का त्याग कर यदि सारे कर्म मुझे अर्पण करना सम्भव न हो तो प्रेमलक्षण का अत्यन्त सरल
निरूपण सुनाता हूँ, उसे ध्यान से सुनो।

ग्यारहवाँ अध्याय २९५
श्रद्धालुर्मे कथाः शृण्वन् सुभद्रालोकपावनीः ।
गायन्ननुस्मरन् कर्म जन्म चाभिनयन् मुहुः ॥ २३ ॥
मेरी कथा का श्रवण प्रारम्भ करने पर वहाँ काल का भी प्रवेश सम्भव नहीं है फिर दूसरों की क्या बात
की जाय? और वहाँ कर्मबन्धन किस बात का? हरिकथा में जो क्षण व्यतीत होता है उसे काल भी ग्रस नहीं
सकता। इसलिये हरिकथा का श्रवण यदि श्रद्धापूर्वक किया गया तो उसी को 'काल की सार्थकता' समझना
चाहिये। अब कथा का माहात्म्य सुनो। यदि श्रद्धापूर्वक कथा श्रवण की जाय तो उसके प्रत्येक अक्षर से तीनों
लोकों के पातक भस्म हो जाते हैं। अब श्रद्धा किसे कहते हैं यह भी सुनो। हरिकथा श्रवण करते समय जिसके
अर्थ की ओर मन लगा रहता है उसी का अर्थ है श्रद्धापूर्वक श्रवण करना। कथा का प्रतिपादन सुनकर भी
नास्तिक कहते हैं, "भगवान तो है ही नहीं। जो कहते हैं कि ईश्वर है वह केवल अपना पेट भरने के लिये हमें
उस पर जरा भी विश्वास नहीं है।" ऐसे नास्तिकों की बात की चिन्ता न कर जिसकी आस्तिकता बढ़ती जाती
है उसी का नाम है श्रेष्ठ श्रद्धा और उसमें अप्रतिम सुख होता है। श्रवण में अथवा ध्यान में लय, विक्षेप, कषाय
तथा रसास्वाद आदि से बाधा उत्पन्न होती है। इसलिये इन चारों बाधाओं से बचना चाहिये। हरिकथा सुनते
समय भी यदि मन में विषय की चिन्ता लगी रहे तो वह अच्छा है ही नहीं। प्रमुख विक्षेप यही है। स्त्रियों के
हावभाव का वर्णन, उनके नेत्र कटाक्षों का वर्णन एवं श्रृंगार चेष्टाओं का वर्णन सुनने में ही जिसकी श्रद्धा रहती
है उसका नाम है 'रसास्वादन'। अथवा वह हरिकथा सुनने के लिये बैठा अवश्य रहता है किन्तु उस कथा में
उसका मन बिलकुल नहीं रहता। उसका चित्त कहीं अन्यत्र ही भ्रमण करता रहता है। उसे मर्कटरूपी विक्षेप
कहते हैं। अन्यथा अनेक प्रकार के उद्वेग होने के कारण हरिकथा सुनते रहने पर भी उसमें मन नहीं लगता
अथवा नींद आ जाती है। उसे तत्काल लय विक्षेप समझना चाहिये। सुनने अथवा ध्यान में बैठने पर सगुण
अथवा निर्गुण इनमें से कोई भी रूप मन में नहीं उभरता और आँखों के आगे नीले-पीले रंग नाचने लगते हैं।
यही तीन गुणों के क्षोभ का मिश्रण है। इसे 'कषाय' कहते हैं। श्रवण और ध्यान में इस प्रकार के दोष हैं। उसी
प्रकार प्रेम तीन प्रकार का है। चतुर लोग इन तीनों प्रकार के प्रेम को पहचानते हैं। उसके लक्षण बताता हूँ,
सुनो। महान वीरों के समर में पराक्रम अथवा भीषण युद्ध का वर्णन सुनकर मन प्रसन्नता से नाच उठता है, वह
राजस प्रेम है। दुःख शोक का प्रसंग, मरने की वार्ता अथवा शोक कथाओं का सुनना भी जिसे सहन नहीं होता,
उनमें का प्रत्येक प्रसंग सुनकर आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगती है, सिसकी आने से जिसका बदन
थर-थर काँपने लगता है वह सच्चा तामस है, यह समझ लो। सगुण मूर्ति का ऐश्वर्य, शंख, चक्र, कमल, गदा
तथा पीताम्बर धारण किये गोविन्द का वर्णन सुनकर जो प्रसन्न हो उठता है, आँखों से आनंदाश्रु बहने लगते हैं,
सिसकी रूक नहीं पाती, मन कृष्णमय हुआ रहता है, वह प्रेम सात्त्विक होता है। चौथे प्रकार के प्रेम की
कल्पना भी अतर्क्य है। उद्धव! तुम मेरे अत्यन्त लाडले हो इसलिये तुम्हें उसके बारे में भी बताता हूँ। तुम्हारा
भक्ति का स्वरूप महान है। उसके कारण मुझे गुप्त बात भी बतानी पड़ती है। तुम्हारे सिवाय दूसरों को देखने
पर दूसरा अधिकारी पुरुष दिखायी नहीं देता। श्रीकृष्ण ने कहा, ध्यान दो। निर्गुण परब्रह्म के स्वरूप के बारे में
जानकर जिसका मन चित्तस्वरूप में डूब जाता है उसे पुनः होश में आने का भान ही नहीं रहता। नमक का
टुकड़ा समुद्र में डालने पर वह जिस प्रकार समुद्र के आकार का ही हो जाता है उसी प्रकार वह भी साक्षात्
ब्रह्मस्वरूप ही हो जाता है। चित्त और चैतन्य का मिलन होने पर और लिंगदेह का बन्धन टूटने पर आँखों में
अश्रुओ की बाढ़ आ जाती है, शरीर रोमांचित हो जाता है, जीव भाव की दशा टूट जाती है और भाव विह्वल

होने के कारण गला रुंध जाता है, शब्द मुँह से बाहर नहीं आ पाते। शरीर से पसीना बहने लगता है, नेत्र
अधोन्मीलित हो जाते हैं, आश्चर्य अपरिमित हो उठता है और वह स्वानंद से भर जाता है। इसे चौथा प्रेम जान
लो। यही उत्तम भागवत की स्थिति है। वही मैंने यथार्थ रीति से बतायी। इस स्थिति को जानने वाला बस मैं ही
हूँ। निर्गुण में प्रेम होना यह शुद्ध सात्त्विक लक्षण है। इसके लक्षण या तो मैं जानता हूँ या जो ब्रह्मस्वरूप हैं वे
जानते हैं। उद्धव! श्रद्धापूर्वक श्रवण करने से इतना लाभ है, यह ध्यान में रखो। श्रद्धा से श्रवण करने का
माहात्म्य त्रैलोक्य में बहुत अधिक है। विवेकी और इच्छारहित वक्ता मिले तो उसे श्रद्धापूर्वक श्रवण करना
चाहिये या श्रोता यदि ज्ञानसम्पन्न हो उसे भी कथा कहनी चाहिये। जब श्रोता और वक्ता में से कोई भी न हो तो
अपने मन का ही आश्रय लेना चाहिये और मेरे अवतार, अवतार कार्य आदि का अकेले में ही विचार करना
चाहिये। विषयों की आस्था त्याग कर तथा काल को टक्कर देकर, मेरे कीर्तन में अत्यन्त उल्हास धारण करना
चाहिये। वासना का त्याग कर तथा लौकिक की लज्जा न कर श्रीकृष्ण का नामस्मरण करते हुए नृत्य के साथ
कीर्तन करना चाहिये। रामकृष्ण, हरि, गोविन्द आदि का काव्य गायन करते हुए उनमें के अनेक प्रकार के
छन्दबंद पदों से कीर्तन में आनन्द की वर्षा कर देनी चाहिये। जिनसे आत्मज्ञान का लाभ हो ऐसे प्रिय पदों का
कीर्तन में गायन करना चाहिये तथा ऐसे समय संत समुदाय को सामने बैठाना चाहिये। वीणा, मृदंग, करताल
आदि वाद्य लेकर तथा वैष्णवों के समुदाय एकत्र कर कीर्तन में जयघोष करना चाहिये। काल-प्रहर की चिन्ता
नहीं करनी चाहिये। दशमी को धार्मिक उत्सव के उपलक्ष्य में जागरण करना चाहिये तथा सुमधुर गायन करना
चाहिये और मेरे अवतार कार्यों का स्मरण कर उनका हावभाव के साथ प्रदर्शन करना चाहिये। राम ने धनुष की
प्रत्यंचा खींचकर किस प्रकार शंकर का धनुष तोड़ा इसका हावभाव के साथ प्रदर्शन कर, वह राम मैं ही हूँ
ऐसी जो गर्जना करता है वह कीर्तन में रंग जमा देता है। कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत किस प्रकार उठाया, किस तरह
दावाग्नि प्राशन किया, वह सब अपने हावभाव से प्रदर्शित कर तथा राम ने सेतु कैसे बाँधा इसका भी अनुकरण
करके दिखाता है, आलस त्याग कर जो अहंकार को दूर भगा कर रात-दिन कीर्तन का घोष करता है, उसमें भी
मैं अच्छा गायक हूँ इस बात का गर्व नहीं करता, गायन की प्रौढ़ता, ज्ञान का अभिमान तथा चतुराई के गर्व को
जो न्योछावर कर देता है और शुद्ध प्रेम तथा सादगी से कथा का गौरव करता है, उससे मुझे अत्यन्त आनन्द
प्राप्त होता है। नामसंकीर्तन का जयघोष जब अपनी चरम सीमा पर रहता है और नामोच्चार के साथ सबकी
एक साथ ताली बजती है, उससे महान पातक भी भस्म हो जाते हैं। वैष्णवों के उस समुदाय में मैं भी खड़ा
रहता हूँ। क्षीरसागर में भी जो सुख मुझे नहीं प्राप्त होता, वैकुण्ठ में जो सुख देखने को भी नहीं मिलता वह
सुख मुझे कीर्तन में मिलता है। कीर्तन के वश में मैं डोलता रहता हूँ। प्यारे भक्तों को मैं बहुत चाहता हूँ। भक्तों
की भक्ति के कौशल से मैं भी कीर्तन के ताल पर आनन्द से नाचता रहता हूँ। इस प्रकार के कीर्तन में अनेक
पाप-प्रायश्चित्त विलीन हो गये, यमदूतों का मार्ग अवरुद्ध हो गया और पापों का तो उन्मूलन ही हो गया।
नामस्मरण की चाह से करोड़ों मंत्र बीज लज्जित हो उठे और तपादिक साधन तो हरिनाम से पागल हो गये।
हरिनाम का जयघोष सुनते ही योगयाग मुँह छिपाने लगते हैं। उस हरिनाम के भय से विषयसुखों का तो
पलायन ही हो गया और अधर्म अपने स्थान पर ही जम से गये। हरिनाम का, गर्जन सुनकर समस्त दोषों का
दिगंत में पलायन हो गया और तीर्थों का गर्व भी चूर-चूर हो गया। ऐसा यह कीर्तन कौशल हरि को अत्यन्त
प्रिय लगता है। मेरे प्रेम में मदमस्त होकर जो रात-दिन कीर्तन करते रहते हैं वे मन से तथा वाणी से अनेक
प्रकोर के कार्य करते हुए भी मेरे सिवा और कुछ नहीं जानते।

ग्यारहवाँ अध्याय २९७
मदर्थे धर्मकामार्थान्नाचरन् मदपाश्रयः।
लभते निश्चलां भक्तिं मय्युद्धव सनातने॥ २४॥
मेरे जो उत्तम भक्त हैं उनका धर्म, अर्थ और काम मैं ही हूँ। उनका मनोधर्म मेरे अतिरिक्त और कोई कार्य
करना ही नहीं जानता। मेरा भजन यही उनका उत्तम कर्म है मुझे जो धर्म अर्पण होता है वही उनका पवित्र धर्म है
मेरी चाह करना यही उनकी शुद्ध इच्छा है और उस इच्छा का विश्राम भी मुझमें ही है। वे अनेक प्रकार का धन
खर्च कर परमार्थ का ही संग्रह करके रखते हैं। अशाश्वत रूप सम्पत्ति का संग्रह मेरे भक्तगण नहीं करते। धन में ही
जिसका चित्त लगा रहता है वे अभक्त हैं, इसे याद रखो। वे जो भी भजन आदि करते हैं वह किसी नट द्वारा पैसों
के लिये किये नाटक की तरह है। मन और वाणी से किये गये जो कर्म मुझे अर्पण नहीं होते वह सब ढोंग रहता
है। वह केवल पेट भरने के लिये होता है। वह भक्ति के विरुद्ध होता है। उस विरुद्ध धर्म का लक्षण भी बताऊँगा।
मेरे भजन को कम कर जो पैसा कमाने निकलता है उस भक्त का यह लक्षण प्रमुखता से भजन के विरुद्ध है। पास
का धन खर्च करना नहीं जानता और मेरा सूखा ही भजन करता है, इस प्रकार जिसने मुझे ठगा है यह कार्य
मुख्यतः विरोधी लक्षण है। इसी को 'अर्थविरुद्धता' कहते हैं। अब जो भक्त दुष्ट वासना से कर्म करता है, और मैं
भगवान का भजन कर रहा हूँ इसलिये मुझे कोई दोष नहीं लगेगा इस भावना में जो दुष्ट वासनाओं में ही लिपटा
रहता है उसका वह आचरण भजन के विरुद्ध लक्षण है। वह भजन भक्तों को अभक्त अवश्य बना देते हैं। मुझे
अर्पण न कर जो भी श्राद्ध करता है उसकी कल्पना भी श्राद्ध के विरुद्ध है। श्राद्ध का जो संकल्प है वह मुझे अर्पण
करने से ही विरुद्ध नहीं होता ऐसा वेद भी कहते हैं। 'पितरस्वरूपी जनार्दन' यह श्राद्ध का प्रमुख संकल्प है और
ऐसा होते हुए मुझे नैवेद्य भी अर्पण नहीं करते। अन्न भी ब्रह्म है और मैं भी ब्रह्म हूँ और यही श्राद्ध का गूढ़ रहस्य
है। लेकिन इस शुद्ध कर्म को न समझ वे व्यर्थ ही भ्रम बढ़ाते हैं। सारे जगत को उत्पन्न करनेवाला मैं हूँ, समस्त
पितरों का मुख्य पिता भी मैं हूँ, ऐसे मुझको कर्म अर्पण न कर श्राद्ध करना सभी दृष्टियों से विरुद्ध है। मुझे अर्पण
किये बिना जो भी कुछ किया जाता है, वह सब अभक्त के ही रूप में होता है। ऐसे विरुद्ध धर्म का जो आचरण
करता है उसे अत्यन्त भयंकर दुःख प्राप्त होता है। उत्तम भक्तों का लक्षण यही है कि वे संकल्प के बिना ही मुझे
अन्नपानादि अर्पण करते हैं और उसका रहस्य जानते हैं। जो मेरे प्रति ध्रुव की तरह अटल भजनशील रहते हैं उन्हें
मेरी स्थिर और अटल भक्ति प्राप्त होती है। आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी इन तीनों को जो प्राप्त नहीं होता, उद्धव !
वह मेरी चौथी भक्ति है जो उन्हें उनके मेरे प्रति प्रेम के कारण प्राप्त होती है। आर्त अपनी पीड़ा दूर करने के लिये
मुझे भजता है, जिज्ञासु ज्ञानप्राप्ति के लिये मेरा भजन करता है और तीसरा जो अर्थार्थी है वह मेरा भजन कर पर्याप्त
धन पाने की कामना करता है। लेकिन इनके सिवा चौथा एक ज्ञानी होता है जिसके मन में इन कल्पनाओं का
अंशमात्र भी नहीं होता इसलिये चौथी भक्ति उसके पास घर समझ कर रहती है। जिसे भक्ति में चारों ओर मैं ही मैं
दिखायी पड़ता हूँ उसकी वैसी स्थिति मेरे भजन के ही कारण होती है। बिना संकल्प किये सब कुछ मुझे अर्पण
होता है यह चौथी भक्ति का लक्षण है। उस भक्ति में मेरा भजन अतर्क्य है। उसमें जो भी कर्म किया जाता है वही
मेरी पूजा होती है, वहाँ जो बातें होती हैं वही मेरा जप है, वहाँ जो भी दिखायी देता है वह अधोक्षजा का ही दर्शन
होता है। वहाँ चलना वही मेरी यात्रा है, वह जो भक्षण करता है वही यज्ञ में मुझे अर्पित की हुई आहुति होती है।
उसकी निद्रा ही मेरी समाधि होती है। इस प्रकार वह मुझमें ही भजन करता रहता है। इस प्रकार उसके सारे कर्म
सहज रूप में अनायास ही मुझे प्राप्त होते हैं। उद्धव ! यह सनातन चौथी भक्ति उसे पूरी तरह प्राप्त होती है। उद्धव !
अब शायद तुम्हारे मन में यह विचार आये कि यह पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी भक्ति मूल रूप में चली आ

२९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
रही है यह बात काल्पनिक है। तो मेरी जो सहज प्रकाशस्थिति है उसी को 'भागवति शक्ति' कहा गया है। वेदांत में
इसी को 'संविति' कहते हैं और शैवों के अनुसार इसी का नाम 'शक्ति' है। बौद्ध इसे 'जिनेश', 'नेमिनाथ' कहते
हैं, जोगी 'आदिनाथ' कहते हैं, कोई 'भैरव', कोई 'खंडेराव', कोई 'गाणपत्य' कहते हैं तो कोई इसे 'अव्यक्त' भी
कहते हैं। कोई कहते हैं कि यह 'आदिमाता' है। सौर कहते हैं कि यही 'सविता' है। उपासना के भेदों की तरह
इसके नामों में भी अनेक भेद हैं। तो यह जो प्रकाश की स्थिति है उसी को 'भक्ति' कहते हैं। उसी के प्रकाश से
त्रिभुवन में उत्पत्ति, स्थिति और लय का भास होता है। मेरी जो अनेक अवतार मालिकायें हैं, वे इसी प्रकार से
उज्ज्वल रीति से प्रकाशित हैं। देवी, देवतागण सब इसी प्रकार से प्रकाशित दिखाई देते हैं। मेरे अवतारों की
उत्पत्ति भी उसी प्रकाश से होती है और मेरे अनेक चरित्र उसी प्रकाश में प्रवेश करते हैं। इस प्रकाश की जो प्राप्ति
है वही मेरी सनातन भक्ति है यह जान लो। उद्धव ! मैंने उसे यथार्थ रूप में समझाया। निश्चल भक्ति सनातन है यह
मूल श्लोक में है। इसीलिये मैंने सनातन भक्ति का सविस्तार वर्णन किया। मूल श्लोक के पद तथा पद का अर्थ
छोड़कर व्यर्थ की बात नहीं की। अब श्रोतागण सावधान रहें क्योंकि आगे की कथा अत्यन्त रमणीय है। लेकिन हे
उद्धव ! मेरी यह भक्ति कैसे प्राप्त होगी यह पूछोगे तो उत्तर यही है कि भक्तिभाव से सत्संगति करने से मेरी भक्ति
प्राप्त होती है।
सत्सङ्गलब्धया भक्त्या मयि मां स उपासिता।
स वै मे दर्शितं सद्भिरञ्जसा विन्दते पदम् ॥ २५॥
मुख्य रूप से संतों की सेवा यही साधन भगवान को भाता है। वह जब साध्य होता है तो संतवचन की ही
तरह वह आत्मभाव और आत्मभक्ति प्रदान करता रहता है। जिसे सत्संगति के मेले में रहना अच्छा लगता है, जो
साधुवचनों का भूखा रहता है, साधु के मुख से निकले शब्द को अमान्य करना जो नहीं जानता, वही आत्मभक्ति
का भाग्यवान पुरुष है। साधुवचनों पर उसकी अपार श्रद्धा है यह देख कर ही सद्गुरु उस पर कृपा करता है।
साधु चराचर में श्रेष्ठ गुरु है। सचमुच गुरु के अलावा संसार से तारने वाला कोई अन्य नहीं है। गुरुवचन से भक्तों
को आत्मभक्ति देने वाला सर्वथा मैं ही हूँ। संसार में जो सद्गुरु है उसकी आज्ञा मैं माथे से लगाता हूँ। वह जिस
पर कृपा करता है उसका मैं तत्काल उद्धार करता हूँ। उस सद्गुरु में मेरा स्वरूप है यह जानकर जो भजन करता
है उसे मैं कितना लाड़ करता हूँ यह कहना मेरे लिये भी कठिन है। उसका इहलोक और परलोक दोनों चलाने
वाला मैं ही हूँ। उसके कारण मुझे अत्यन्त आनन्द प्राप्त होता है और उसके आनन्द से मेरे आनन्द को भी उफान
आता है। उसके गुरु ने उसे जो मार्ग दिखाया है उस पर चलने में उसे जरा भी प्रयास या परिश्रम नहीं करना
पड़ता। अगर कोई संकट सामने आता है तो मैं श्रीकृष्ण दौड़कर सशरीर उसके सामने खड़ा हो जाता हूँ। उसे जो
पद प्राप्त करना है वह पद ही मैं उसके पास ले आता हूँ। संतों की सेवा के प्रति कितना प्रेम है इसे श्रीकृष्ण बता
रहे हैं। ऐसा भाषण सुनकर उद्धव भाव विह्वल हो गये और मन ही मन विचार करने लगे कि ऐसा साधु पुरुष
कौन होगा? उसके स्वरूप के बारे में क्यों न पूछा जाय? उस भक्ति का लक्षण भी क्या होगा? भजन की वह
पहचान कौन-सी है? इसे सविस्तार जानने के लिये उद्धव ने प्रश्न किया।
उद्धव उवाच
साधुस्तवोत्तमश्लोक मतः कीदृग्विधः प्रभो।
भक्तिस्त्वय्युपयुज्येत कीदृशी सद्भििरादृता ॥ २६॥

ग्यारहवाँ अध्याय २९९
ज्ञानी और वक्ता अनेक हैं, पर वे रजतमगुणयुक्त हैं। वे अपने-अपने गुणों के अनुसार निरूपण करते हैं
: इसलिये उन्हें पूछना मन को स्वीकार नहीं होता और अति सात्विक पुरुष सत्वगुण से ही व्याप्त रहता है इसलिये
वह जब बोलने लगता है तो उसका वाक् प्रवाह गलत दिशां की ओर होने लगता है। इससे शुद्ध आत्मज्ञान नहीं
हो पाता। लेकिन हे कृष्णनाथ ! तुम वैसे नहीं हो। सच्चे गुण तुम्हारे ही पास हैं। तुम केवल लीला से देह धारण
करते हो और आत्मज्ञान देने वाले एक तुम ही हो। इसीलिये तुम्हें त्रिभुवन में 'उत्तमश्लोक' (जिसकी कीर्ति
पवित्र है) कहते हैं। इसलिये तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कोई हमें स्वीकार नहीं है। हे कृष्णनाथ मेरे प्रश्न का उत्तर
देने वाले एक तुम ही हो। तो तुम्हें जो सर्वथा मान्य हो ऐसा साधु कौन है? जो जो साधु पुरुष तुम्हें मान्य है
उनके लक्षण बताओ। कौन-सी भक्ति तुम्हें प्रिय है? उसके भी लक्षण बताओ। जो तुम्हें प्राप्त करा दे, अत्युत्तम,
श्रेष्ठों में श्रेष्ठ तथा संतों ने आदरपूर्वक जिसे स्वीकार किया हो ऐसी श्रेष्ठ भक्ति कौन-सी है? तुम कहोगे, संतों
ने किस भक्ति को आदर से स्वीकार किया है इसे संतों से ही पूछो, तो मेरा सारा विश्वास तुम्हारे भाषण पर है।
इसलिये दूसरे से पूछना मुझे स्वीकार्य नहीं है। जो लोग अलग-अलग देवताओं का भजन करते हैं, वे अपने ही
देवता की भक्ति को उत्तम कहते हैं। लेकिन हे श्रीकृष्ण! आपको जो मान्य हो वही मुझे बतायें। कुल, शील और
भाषण जिनका समान होता है उस पुरुष को ही साधु कहते हैं। लेकिन तुम अपने मुख से जिसे शुद्ध कहोगे वही
मेरे लिए वन्दनीय है। अगले श्लोक में उद्धव ने शार्ङ्गधर श्रीकृष्ण की तीन सम्बोधनों से प्रार्थना की है। उन तीन
सम्बोधनों में नियोजित तीन विशेषणों से उसने अपने विचार श्रीकृष्ण को समर्पित किये और मैं श्रवण करने का
अधिकारी हूँ यह भी बताया।
एतन्मे पुरुषाध्यक्ष लोकाध्यक्ष जगत्प्रभो।
प्रणतायानुरक्ताय प्रपन्नाय च कथ्यताम् ॥ २७॥
पुरुषों में उत्तम पुरुष तुम हो, सारे कर्मों का तथा धर्मों का विचार करने वाले तुम हो इसीलिये हे सर्वसाक्षी
गोविन्द ! तुम्हें 'पुरुषाध्यक्ष' कहते हैं। जैसा कर्म रहता है उसी के अनुसार उसका फल देने वाले तुम हो इसीलिये
तुम्हारा वर्णन लोकाध्यक्ष के रूप में होता है। उसी प्रकार ब्रह्मादिकों के नियंता और संसार का प्रतिपालन करने
वाले तुम ही हो। हे श्रीकृष्ण! "यदि संसार का पालन करने वाला मैं ही हूँ, और उस संसार में तुम भी हो तो
तुम्हें ही मैं ज्ञानकथा सुनाऊँ ऐसी कौन सी विशेषता तुझमें है?" ऐसा तुम कहोगे। लेकिन तुम्हारे यह कहने पर
भी तुम सर्वज्ञ और सर्वेश्वर हो, तुम अन्तरात्मा तथा सबका नियमन करने वाले ईश्वर हो इसलिये यदि तुम्हें मेरा
अधिकार ठीक लगता हो तो मुझे ज्ञान का निर्धार बताओ। मुझे अधिकार न भी हो तो भी मैं तुम्हारी शरण/में
आया हूँ। तुम्हारे यहाँ तो शरणागत की उपेक्षा कभी नहीं होती। विषयवासना में दारुण दुःख है यह जानकर ही
तुम्हारे चरणों में आया हूँ। अत्यन्त दीन होने के कारण मैं तुम्हारा भिखारी हो गया हूँ। इसलिये मुझ पर अवश्य
कृपा करो। मेरी वासनाएँ असीम हो गयी हैं उनका निस्तारण करना मेरे बस में नहीं है। हे कृष्ण! उनका तुम
निवारण करो। इसलिये मैं तुम्हारे चरणों में आया हूँ। मैं तुम्हारा लाडला भक्त हूँ यह कहने में भी अहंकार मालूम
होता है। लेकिन हे अनन्त ! तुम सर्वज्ञ हो और दीनों के प्रति कृपालु हो। हे श्रीकृष्ण! मैं ही एक श्रवण का
अधिकारी हूँ यह भी मैं नहीं कह सकता। इसलिये हे कृपानिधे ! मुझ पर कृपा करें। यह कहकर उसने उनके पैर
पकड़ लिये। "हम दोनों एक ही कुल में पैदा हुए नैसर्गिक मित्र हैं इसलिये मेरा पैर पकड़ना ठीक नहीं है।"
ऐसा यदि तुम कहोगे तो हे गोविन्द ! यह कहने का मर्म भी मैंने जान लिया है।

३०० श्रीमद् एकनाथी भागवत
त्वं ब्रह्म परं व्योम पुरुषः प्रकृतेः परः।
अवतीर्णोऽसि भगवन् स्वेच्छोपात्तपृथग्वपुः ॥ २८ ॥
तुम निर्गुण और सर्वत्र समान हो, तुम चित्स्वरूप और चिदाकाश हो, पुरुषों में उत्तम तथा वन्दनीय ऐसे
एक तुम ही हो। प्रकृति-पुरुषों से भी महान जो परब्रह्म है वह तुम हो। वेदशास्त्र तुम्हारी थाह नहीं लगा पाते।
तुम इन्द्रियों के लिये अगोचर हो। अब हमारे भाग्य का स्वरूप देखो। तुम्हें हम प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देख रहे
हैं। मुकुट, कुण्डल तथा वनमाला धारण की हुई तुम्हारी मेघ श्यामल मूर्ति कैसे शोभायमान हो रही है। तुम्हारे ये
सुन्दर कमलनेत्र, पीताम्बर धारण किया हुआ तुम्हारा ऐसा स्वरूप देखकर तन-मन बिलकुल तृप्त हो जाता है।
तुम सारे जगत का ही जीवन हो। तुम्हारा दर्शन अत्यन्त मधुर है। उस दर्शन से संसार की इच्छा पूर्ण हो जाती है।
लेकिन ऐसे उस देह की भी तुम्हें इच्छा नहीं है। भगवन! तुम इतने निरिच्छ हो। फिर भी भक्तों पर कृपा करने
की प्रबल इच्छा से तुम अनेक अवतार धारण करते हो। भक्तों की ही इच्छा के लिये तुम अपनी लीला से देह का
नाटक दिखाते हो। हे कृष्णनाथ! सचमुच, भक्तों पर कृपा करने के लिये ही तुमने अवतार लिया है, इसलिये मेरे
प्रार्थना किये बिना ही तुमने मेरे प्रश्नों का उत्तर देना स्वीकार किया है। जिस प्रकार बछड़े की हुंकार सुनते ही
गाय के स्तनों से दूध बहने लगता है उसी प्रकार देखो, उद्धव के प्रश्न से भगवान भी आत्मज्ञान से सराबोर हो
गये। सुबह शाम गृहस्वामी को दूध मिलता है वह बछड़े के कारण ही। वत्स को देखते ही जिस प्रकार गाय को
दूध उतर आता है उसी प्रकार श्रीकृष्ण उद्धव के वश हो गये। उद्धव श्रीकृष्ण के प्रेम के कारण ही अच्छा लगता
था इसलिये उद्धव के प्रश्न उसे अत्यन्त प्रिय लगते थे। श्रीकृष्ण का साथ मिलने के कारण उद्धव का भाग्य
कितना महान है। उद्धव जो भी प्रश्न पूछते, उसे सादर स्वीकार करने के लिये श्रीकृष्ण अंजुली आगे बढ़ाकर
तैयार रहते थे। श्रीकृष्ण उसकी भक्ति पर इतने मुग्ध हो गये थे कि वे उसे चाटने के लिये उद्यत थे। जिसके पंख
भी अभी नहीं निकले हैं ऐसे बच्चों को चिड़िया जिस प्रकार अपनी चोंच से चारा चुगाती है, उसी प्रकार
आत्मज्ञान की गूढ़ बात श्रीकृष्ण उद्धव के हृदय में उड़ेलने लगे। अब श्रीकृष्ण पाँच श्लोकों में उद्धव के प्रश्नों
का उत्तर देंगे और उनमें साधुओं के अत्यन्त पवित्र लक्षण बतायेंगे। साधुओं के लक्षण अपार हैं लेकिन श्रीकृष्ण
उनमें से तीस लक्षण चुनकर उद्धव को बतला रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
कृपालुरकृतद्रोहस्तितिक्षुः सर्वदेहिनाम्।
सत्यसारोऽनवद्यात्मा समः सर्वोपकारकः ॥ २९ ॥
कृपा का कोई स्वतंत्र स्थान नहीं है। वह जिसके प्रति उत्पन्न होती है वही साधु है। कृपा संतों की ही देह
में रहती है। इसी कारण उसे सारे संसार में मान्यता प्राप्त हुई है। कृपा को उनके ही कारण महत्त्व प्राप्त हुआ,
उनकी ही कृपा पर दया जीवित रही, उन्होंने ही कठोरता का काँटा दूर किया और उन्होंने ही निष्ठुरता का
समूल उखाड़ फेंका। साधु की कृपा समस्त प्राणिमात्र पर एक सी रहती है। यहाँ कुछ तथा वहाँ कुछ इस
प्रकार का भेदभाव वहाँ नहीं होता। उनके हृदय में अवकृपा नहीं रहती। दयालु मनुष्य का हृदय बड़ा विचित्र
रहता है। वह प्राणिमात्र का जीवन अपने जीवन में समाहृत कर लेता है और उनका दुःख हरण कर सुख देता
है। इस प्रकार उसकी कृपा अद्भुत रहती है। जिसके कारण उसे दुःख होता है उसे वह दूसरों को कदापि नहीं
देता और जिसके कारण उसे सुख मिलता है उसे वह प्राणिमात्र को अवश्य देता है। इसी का नाम है कृपा। यह

ग्यारहवाँ अध्याय ३०१
संतों का प्रथम लक्षण है। दूसरा लक्षण है अद्रोहता। उसके बारे में भी बताता हूँ। अद्रोहता लोगों के बीच भटक
रही थी, उसे रहने के लिये स्थान नहीं मिल पा रहा था। तब वह साधु संतों की शरण में आयी। वहाँ उसे रहने
के लिये पर्याप्त स्थान मिला। साधु शरणागत पर दया करते हैं इसलिये उन्होंने अद्रोहता का प्रतिपालन किया।
वे प्राणिमात्र में भगवान का ही दर्शन करते हैं अतः उनमें द्रोह का नामोनिशान भी नहीं रह जाता। उनमें
व्याघ्रसर्प आदि के प्रति भी द्वेष उत्पन्न नहीं होता। वे उन्हें उपद्रव दें तो भी साधु उनका द्वेष नहीं करते। देह पर
कोई विपदा आ जाय तो उससे प्रारब्ध कर्म का ही नाश होता है इसलिये साधु उस आपत्ति के प्रति मन में द्वेष
नहीं आने देता और आत्मज्ञान के कारण क्रोध का स्पर्श भी नहीं करता। इसी को अद्रोहता कहते हैं। यह दूसरा
लक्षण है। अब तितिक्षा के सम्बन्ध में बताता हूँ, सुनो। इसका अर्थ है साधुओं के मन में होने वाली
सहनशीलता। शान्ति परदेसी हो गयी थी। वह जिसके पास भी जाती वह उसे लौटा देता था। तब वह अत्यन्त
दीन होकर संतों के घर आयी। संतों ने अत्यन्त प्रेम से उसका प्रतिपालन किया इससे वह भगवान की भी
लाडली हो गयी और उन्होंने सारा वैभव उसके सुपुर्द किया। वह सारा वैभव लेकर शान्ति संतों के ही पास ही
निरन्तर रहती है। इसीलिये उनमें दिन रात शान्ति दिखाई देती है। समस्त प्राणिमात्र भी यदि उन्हें त्रस्त करें तो
भी वे किसी को 'भला' या 'बुरा' नहीं कहते। वह आत्मशान्ति के आधार पर नाचता रहता है। वह उत्तम संत
है। ऐसी जो सहनशीलता होती है उसी का नाम 'तितिक्षा' है यह ध्यान रखो। यह संतों का तीसरा लक्षण है।
अब सत्य की सत्यता सुनो। सत्य इस जग में अल्पायु ही होता है, वह यहीं जन्म लेता है और यहीं मर जाता
है। उसका कहीं विकास नहीं होता था इसलिये वह संतों के पास आया। सत्य और संत की भेंट होते ही दोनों
का सत्यस्वरूप में विलय हो गया, सत्य संतरूप हो गया और सृष्टि में चिरंजीव हो गया। इस प्रकार सत्य संतों
की कृपादृष्टि से ही सत्यत्त्व से पुष्ट हो गया। वह संतों के बल से ही संसार में सर्वत्र फैल गया। इसीलिये
सत्य के योग से परब्रह्म से भेंट होती है। संतों के इस उपकार से उपकृत होने के लिये सत्य उनके चरणों पर
गिर पड़ा इसलिये सत्य को संतों के चरणों के सिवा कोई ठौर नहीं है। इस प्रकार जो सत्य का आधारस्वरूप
रहते हैं, जिनके पंखों के नीचे सत्य जीवित रहता है, जिनके बल से सत्य समर्थ होता है, जिनकी दृष्टि सत्य से
तृप्त होती है और जिनका व्यवहार सत्य भाषण से ही होता है, यही श्रेष्ठ की महानता है। वही संतों का घर
है। ऐसे ही संतों का मैं सम्मान करता हूँ। मैं निरन्तर उनके ही पास रहता हूँ। जिन्होंने असत्य आचरण न करने
का निश्चय किया रहता है, जिनके पास सत्य सप्रमाण उपस्थित रहता है, जो निरन्तर सत्य से सम्पन्न रहते हैं
उनका आचरण साधु का प्रमुख लक्षण है। इसी का नाम है 'सत्यसार'। यही संतों का सच्चा लक्षण है। यह
संतों का चौथा प्रमुख लक्षण है। अब शुद्ध और अपार गुण बताता हूँ, सुनो। जिसने निन्दा, मत्सर आदि सारे
दोषों को आत्मज्ञान से धो दिया और अनिंदित आत्मज्ञान से चित्त को अत्यन्त पवित्र कर लिया, जिसने गुरु
आज्ञारूप तीर्थ में स्नान किया और जिसके कारण सर्वांग रूप से शान्ति प्राप्त की, उसी प्रकार जो त्रिविध तापों
से मुक्त हो गया और मत्स्वरूप से पवित्र हो गया उसकी पवित्रता का क्या वर्णन किया जाय ? स्वयं तीर्थ भी
उसके चरणों के तीर्थ की इच्छा करते हैं। मैं स्वयं भी उसके पदरज की आकांक्षा करता हूँ फिर दूसरों की क्या
कथा कही जाय ? श्रीकृष्ण ने कहा, "हे उद्धव ! यह 'अनवद्य' नाम का पाँचवाँ गुण है। अब सबको समान
दृष्टि से देखने के छठवें गुण के बारे में सुनो। आत्मस्वरूप के कारण साधु को सर्व समता प्राप्त रहती है
इसलिये वह प्राणिमात्र को समान दृष्टि से ही देखता है। समुद्र में नमक का ढोंका डालने से जिस प्रकार वह
उसमें विलीन हो जाता है, उसी प्रकार उस साधु के अंतर में विषमता पूर्ण रूप से नष्ट हो जाती है। अनेक

३०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रकार के सुवर्ण के अलंकार खरीदने पर यदि उन्हें बाद में तोड़ा न जाय तो वे स्वाभाविक रूप से सुवर्ण ही
बने रहते हैं उसी प्रकार विविध प्रकार के आकार और नाम के कारण संसार विषम दिखायी देता है किन्तु साधु
चित्तस्वरूप होने के कारण जग को समान स्वरूप में देखता है। आत्मज्ञान के कारण वह विषमता को नहीं
देखता। ऐसी समसमान स्थिति में, दैवयोग से सुख-दुःख प्राप्त होते हुएं भी वह साम्यावस्था तद्रूपता के
स्वाभाविक ऐक्यभाव के कारण द्वंद्वभाव से मुक्त रहती है। दाहिनी ओर से आ मिली महानदी तथा बायीं ओर से
मिले गाँव के नाले को गंगा नदी उनके सारे गुणदोष त्याग कर अपने में एकरूप कर लेती है। फिर वहाँ यह
पवित्र है और वह अपवित्र है यह कहना बिलकुल ही सम्भव नहीं है। मधुरता तथा कटुता के भेद को गंगा
अपने स्वरूप से समरूपता प्रदान करती है। उसी प्रकार समदृष्टि होने के कारण साधु को सुख-दुःख की
भावना एक ही जैसी होती है। सदा आत्मज्ञान से परिपूर्ण रहना यही संतों का महान लक्षण है। बहुरूपिया एक
होते हुए भी गाय, बाघ के अलग-अलग रूप लेता है लेकिन उस स्वांग में एक बार बहुरूपिये को पहचान लेने
पर स्वांग का भ्रम दूर हो जाता है। उसी प्रकार भय अथवा अभय यह भाषा केवल द्वैत की भावना के कारण
होती है। साधु द्वैत की दृष्टि से एकरूपता से परिपूर्ण होने के कारण भय और निर्भय का भेद नहीं जानता। द्वंद्व
के समय समत्व से परिपूर्ण रहना यह साधु का छठवाँ लक्षण है। अब 'परोपकार' उसका सातवाँ लक्षण है।
वृक्ष अपने पत्ते, फूल, छाया, फल, छाल, लकड़ी, जड़ आदि से लोगों के लिये फलदायी होता है और सभी पर
सदा उपकार करता रहता है। जो वृक्ष का पालन-पोषण करता है अथवा उसे तोड़ने के लिये उसकी जड़ पर
जो प्रहार करता है उन दोनों को वह पुष्प, फल आदि से समान रूप से संतुष्ट करता है। वृक्ष फलों से लदा
रहता है लेकिन उनमें से एक भी फल वृक्ष चख कर नहीं देखता। उसी प्रकार जो कर्मफल का स्पर्श नहीं
करता वह अनायास ही परब्रह्मस्वरूप हो जाता है। उसी प्रकार साधु की काया, वाचा तथा मन से उपकार करने
के लिये ही होती है, अपना पराया का भेद वह जानता ही नहीं। सब पर उपकार करना ही वह जानता है। उसी
प्रकार जिस प्रकार चन्द्रमा आकाश में उदित होकर सारे संसार का अन्धकार दूर करता है, विश्व का ताप दूर
करता है और अपने किरणों से सबको शान्त कर देता है। उससे निकलने वाला अमृत केवल चकोर ही प्राशन
करे अन्य कोई न करें ऐसा भेद चन्द्रमा नहीं करता। जो भी जिस भावना से भजन करता है, उसी प्रकार उसे
सुख प्राप्त होता है। उसी प्रकार साधु के प्रति जो जैसी श्रद्धा रखता है, उसे वैसा ही सुख प्राप्त होता है। इस
प्रकार साधु सब पर उपकार करता है। कौए चन्द्रमा का धिःकार करते हैं और चकोर चन्द्रामृत प्राशन करते हैं।
उसी प्रकार दुष्ट साधुओं का धिःकार करते हैं और भक्तिवान साधु समागम से आत्मलाभ प्राप्त करते हैं। सातवें
गुण का विस्तार बताते समय परोपकार का वर्णन किया। अब अगले श्लोक में श्रीकृष्ण साधु के लक्षणों में से
ग्यारह और गुणों का लक्षण बता रहे हैं।
कामैरहतधीर्दान्तो मृदुः शुचिरकिंचनः ।
अनीहो मितभुक्शान्तः स्थिरो मच्छरणो मुनिः ॥ ३० ॥
शय्या पर उर्वशी भी आ जाय लेकिन फिर भी वह काम से क्षुब्ध नहीं होता, दिन रात स्वानंद में रमण
करते रहने के कारण वह विषयवासना को प्रायः भूल जाता है। भिखारी जब पालकी में बैठता है तो उसे पहले
के वाहनों का जिस प्रकार विस्मरण होता है उसी प्रकार यह भी आत्मानंद से तृप्त होने के कारण विषयवासना
उसे तुच्छ मालूम होती है और उसे उसका विस्मरण होता है। कोई वस्तु प्राप्त करने में असम्भव हो तो उसकी

ग्यारहवाँ अध्याय ३०३

इच्छा की जाती है। लेकिन साधु को कोई वस्तु प्राप्त न हो सके यह सम्भव ही नहीं है। वह प्राप्त होने की
स्थिति में ही आनन्दपूर्वक आत्मानंद में सुखी रहता है। सूर्य जब जुगनूँ से मिलने जाता है तो वह जुगनू को देख
नहीं सकता और जुगनू भी सूर्य से भेंट नहीं कर पाता उसी प्रकार साधुओं की भी दुर्लभता से भेंट नहीं हो पाती।
इस प्रकार दोनों ओर से देखने पर उसकी विषयवासना पूरी तरह नष्ट हो जाती है। साधु की यही निरिच्छता
उसका आठवाँ गुण है। सावधानी से मन पर नियंत्रण करने से वही नियंत्रण बाह्य इन्द्रियों में अपने आप हो जाता
है। जिस प्रकार बेटी को सिखलाते समय बहू थर-थर काँपने लगती है, मुख्य सेनापति हाथ में आते ही बाकी
सेना बिना युद्ध किये ही पराजित हो जाती है या वृक्ष की जड़ काटने से टहनियाँ अपने आप मर जाती है उसी
प्रकार जो मनोवृत्ति का नियमन है वही बाह्येन्द्रियों का नियमन होता है। ऐसी स्थिति में जो कर्म होता है वह
निःसन्देह निष्काम होता है। जब मन आत्मस्वरूप में लग जाता है और बाह्येन्द्रिय मेरी भक्ति में लीन हो जाते हैं
उस समय जो भी कर्म होते हैं वे सब ब्रह्मस्वरूप होते हैं। अथवा बाह्येन्द्रियों का संयमन करने से मनोमय कर्म में
भी परब्रह्म प्रकट होता है। बाह्येन्द्रियों का यह नियमन आत्मा में रमण करने वाले पुरुष ही जानते हैं। इस प्रकार
बाह्येन्द्रियों का नियमन करने का गुण यही साधु की निग्रहशक्ति है। यही वास्तव में नववाँ गुण है। अब दसवाँ
गुण सुनिये। आकाश सभी को आवृत्त करता है लेकिन वह किसी को कठोर नहीं मालूम होता। उसी प्रकार साधु
भी सर्वांग से सभी को मृदु लगता है। जिस प्रकार धुनी हुई रुई के गोले से किसी का सिर नहीं फूटता उसी
प्रकार साधु का अंतःकरण सभी को अत्यन्त कोमल लगता है। जरा देखो, जिस प्रकार गंगा का जल गाय और
बाघ दोनों को समान रूप से शान्त करता है, उसी प्रकार साधु भी सबके प्रति मृदु और मधुर रहता है। इसी को
साधु की अत्यन्त मृदुलता कहा गया है, इसे ध्यान में रखो। यह दसवें गुण की योग्यता है। अब ग्यारहवाँ लक्षण
सुनो। साधु को जो पवित्रता प्राप्त होती है वह वास्तव में भगवद्भजन के कारण ही। व्रत, तप, ज्ञान, तीर्थ आदि
को जो पवित्रता प्राप्त हुई है वह उन्हें साधुओं से प्राप्त हुई है। परस्त्री और पराया धन इन्हें जिसका मन स्पर्श
नहीं करता उन्हीं के चरणस्पर्श की इच्छा गंगादिकतीर्थ करते हैं। मेरी स्त्री, मेरा धन आदि के लोभ का अर्थ ही है
अधोगति की ओर जाना। अतः स्त्री को धन की इच्छा न करना ही साधुओं की पवित्रता है। ऐसी पवित्रता होते
हुए भी वह व्रत, तप, तीर्थ आदि की निन्दा नहीं करता। उन व्रतादिकों का विधिपूर्वक आचरण करते समय
अत्यन्त श्रेष्ठ ब्राह्मणों का सा सदाचरण करता है। मगर के पाश में आने वाला पुरुष जिस प्रकार प्राणसंकट आने
पर भी उस पाश से नहीं छूटता उसी प्रकार वह जीवब्रह्म को गले लगाता है। उस ब्रह्म को आगे करके ही वह
गृहस्थ धर्म का उत्तम रीति से पालन करता है और उस कर्म में उसे साक्षात ब्रह्म का ही अनुभव होता है। लोगों
के अनुसार वह कर्म करता रहता है लेकिन वास्तव में वह ब्रह्मस्वरूप में ही विचरण करता रहता है। इसे वही
जानता है। इसका अनुभव दूसरों को नहीं होता। कुम्हार मटकी तैयार हो जाने पर उसे चाक पर से उतार लेता है
किन्तु चाक पहले की ही गति से घूमता रहता है। उसी प्रकार साधु पूर्व संस्कार के अनुसार कर्म करता रहता है
लेकिन उसकी प्रवृत्ति शून्य रहती है। साधु का यह बहुत महान लक्षण है। यह सुनने में आसान है किन्तु आचरण
करने के लिये कठिन है। यह ग्यारहवाँ लक्षण अत्यन्त पवित्र है। अब बारहवाँ विचित्र लक्षण सुनो। किसी भी
वस्तु का संग्रह करने अथवा उसे स्वीकार करने का विचार मन को स्पर्श ही नहीं करता ऐसी वृत्ति साधु की
'अपरिग्रहता' है। देह की अथवा घरबार की भी संगति न करना इसी का नाम है 'अकिंचनता'। स्फटिक को
काजल पर रखा जाय तो वह काला दिखायी देता है, लाल रंग पर रखो तो उत्तम लाल रंग का दिखाई देता है,
नीले रंग पर रखो तो नीले रंग का ही लगता है, लेकिन उसका शुद्ध स्वरूप निराला ही होता है। उसी स्फटिक

३०४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
को यदि अड़हुल के फूल पर रखें तो वह लाल रंग का हो जाता है लेकिन वह फूल से बिलकुल अलिप्त रहता
है। वह उस फूल के रंग में रंग नहीं जाता। उसी प्रकार साधु वस्तुओं का संग्रह करने वालों के बीच रहता है,
ऐसा भी आभास होता है कि वह संग्रहकर्ता है, किन्तु जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति किसी अवस्था में भी वह संग्रही
भाव का स्पर्श नहीं करता। पारस जिन धातुओं को स्पर्श करता है उन धातुओं को वास्तव में सुवर्ण बना देता है
लेकिन वह सुवर्ण के अलावा दूसरे धातुओं को स्पर्श ही नहीं करता। उसी प्रकार साधु जिस चीज को अपना
कहता है वह उसे दूसरे का मालूम ही नहीं होता। श्रीकृष्ण द्वारा ही अंकित होने के कारण वह ऐक्यभाव का ही
महत्त्व बढ़ाता रहता है। जब चैतन्यस्वरूप में मन लग जाता है, सारा विश्व चैतन्यमय मालूम होता है, परिग्रह का
विस्मरण हो जाता है, ऐसी स्थिति को 'अकिंचनभाव' कहते हैं। गृहस्थी त्याग कर जंगल में गया और वहाँ भी
स्त्री का चिंतन करने लगा उस समय वह त्याग ही बाधक बना और वह पुनः परिग्रह में आ गया। कीट दीवार
पर चढ़ता रहता है लेकिन उसका यह परिश्रम व्यर्थ है क्योंकि वह पहले से भी अधिक नीचे गिर पड़ती है और
दुःख भोगती है लेकिन चींटी की बात वैसी नहीं है। वह कीट को लेकर पेड़ पर चढ़ती है उसी प्रकार सत्संग से
मूर्ख उद्धार कर सकता है लेकिन वे मूर्ख उपाय ही नहीं करते। देखा जाय तो चींटी छोटी और कीट बड़ा होता है
फिर भी चींटी कीट का उद्धार कर सकती है। उसी प्रकार जो अकिंचन पुरुष होते हैं वे भी सबका उद्धार करते
हैं। अस्तु! मूर्ख का त्याग करने का जो ढंग है वह अत्यन्त बाधक और कष्टदायक होता है क्योंकि जब तक
सत्संगति नहीं होती तब तक त्याग की स्थिति समझ में नहीं आती। मूर्ख गृहस्थी को छोड़कर जंगल में जाता है
लेकिन वहाँ भी वह देह के प्रपंच में फँस जाता है। लेकिन देह में रहते हुए भी जो देह को मिथ्या कर देता है
वही सचमुच अकिंचन बनता है। मूर्ख को त्याग भी बाधक होता है और साधु परिग्रह में रहते हुए भी मुक्त रहता
है। अंतर्बाह्य त्याग करके ही शुक और नारद तीनों लोकों में अत्यन्त पवित्र हो गये। लेकिन वे दोनों जनक राजा
के चरणों पर गिर पड़े क्योंकि जनक राज्य करते हुए भी विदेही था। मैं भी उसका सम्मान करता हूँ। देखो, साधु
का माहात्म्य कितना आश्चर्यजनक है। इसी का नाम अकिंचनता है। यह बारहवाँ लक्षण है। अब 'अनीहा' के
बारे में सुनो। अनीहा (अर्थात् निरिच्छता) दीन हो गयी थी। वह जिसके पास भी जाती, वह उसे लौटा देता।
कोई उसे पलभर के लिये भी अपने पास नहीं रहने देता था। इस प्रकार निराश्रित हो जाने के कारण वह
तिलमिला रही थी। तीनों लोक घूमते रहने पर भी उसे बैठने के लिये तिलमात्र की जगह तो नहीं ही मिली उलटे
'ईहा' (इच्छा) वैरन उसके पीछे लग गयी और जहाँ भी वह जाती वहाँ वह उसे मार खिलाती थी। उस अनीहा
को कोई द्वार पर पैर भी धरने नहीं देता था। तब वह बेचारी अत्यन्त दीन दुःखी होकर रोने लगी और अपनी
स्थिति का दुखड़ा रोने संतों के पास पहुँची। स्वभाव से ही दयालु होने के कारण उन्हें उस पर दया हो आयी और
उन्होंने हल्के हाथों से उसकी आँखें पोंछी और अपने हित के लिये उसका पालन-पोषण किया। इस प्रकार वह
संतों के बल पर बढ़ी और पुराना बैर याद कर उस ईहा का (अर्थात् इच्छा का) बदला लेने के लिये संतों से
उसका उपाय पूछ कर वह उसका छल करने के लिये प्रवृत्त हो गयी। अहं और ममता ईहा की सहेलियाँ थीं।
ईहा के साथ अनेक प्रकार के खेल खेलते हुए उसने उसे काम के हवाले किया और वह काम की स्त्री बनी।
काम का अनुमोदन मिलते ही इच्छा अत्यन्त प्रबल हो गयी और वह घर-घर में पहुँच गयी। तब उसका बदला
लेने के लिये निरिच्छा शीघ्रता से चल पड़ी। उसने संतों से असंग होने का शस्त्र माँग लिया और इच्छा पर प्रहार
करने के लिये वह पहले 'अहं' और 'ममता' इन दोनों को मारने के लिए दौड़ पड़ी। वे दोनों भय के कारण वहीं
की वहीं मर गयीं। निरिच्छा ने पीछा करते ही अहं-ममता को वृद्धावस्था प्राप्त हो गयी अर्थात् उनका अन्त हो