श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है। फिर भी मेरी मुक्तता को ब्राह्मण स्वीकार नहीं करते, फिर दूसरों की बात क्या करें? सारांश, संसार में अत्यन्त
कुतर्क भरे हुए हैं इसलिये मुक्तों की मुक्तता स्वयं मुक्त ही जानते हैं। दूसरा कितना ही चतुर क्यों न हो वह
उसका लक्षण नहीं जान सकता।
मुक्त इस संसार में जड़ एक मूक पिशाच की तरह विचरण करता है। अब वे लक्षण भी यथार्थ ढंग से
बताता हूँ।
न कुर्यान्न वदेत् किंचिन्न ध्यायेत् साध्वसाधु वा।
आत्मारामोऽनया वृत्त्या विचरेज्जडवन्मुनिः ॥ १७॥
मुक्त कायिक, वाचिक अथवा मानसिक इनमें से कोई भी कर्म उद्देश्यपूर्वक नहीं करता। उससे जो भी
कर्म होता है, वह स्वाभाविक रूप में होता है। इसी का नाम है 'अहेतुक' कर्म। गुणों में ध्यान रखकर स्तुति
अथवा निंदा की बातें न कर व मौन रहता है। लेकिन मौन का अहंकार करना भी उसका उद्देश्य नहीं होता।
अगर वह मौन का अहंकार रखता है तो वह मुक्त बन्धन में पड़ जायेगा। इसलिये बोलना और न बोलना यह
दोनों छोड़ वह मौनी हो जाता है। असत् वृत्ति से अर्थात् अनात्मवस्तु के निषेध से अशाश्वत का निराकरण कर
परब्रह्म का अखण्ड चिन्तन करने बैठा तो पुण्याई के कारण सद्गुरु की पहचान मिली जिससे ध्येय, ध्याता,
ध्यान समाप्त होकर भेद की भावना ही नष्ट हो गयी और चारों ओर चैतन्य ही भर गया। शास्त्रों की सहायता से
शाश्वत और अशाश्वत की जो दीवार खड़ी की जाती है वह चैतन्य की बाढ़ में ढह जाती है। तब सन्त और
असंत का भान ही नहीं रहता और चारों ओर चैतन्य ही भर जाता है। मन का मनपन टूट कर वृत्तिशून्य अवस्था
प्राप्त हो गयी। उस चैतन्य का मन में ध्यान करो तो मन ही चैतन्य हो जाता है। इससे ध्यान सहज ही टूट गया।
यही मुक्त का प्रमुख लक्षण है। उद्धव! चैतन्य में ही चित् खो जाने के कारण सच्चा मुक्त लोगों में जड़-मूक-
पिशाच की तरह विचरता हुआ दिखाई देता है। (इसीलिये वह औरों में अच्छी तरह पहचाना जाता है। इसलिये
उसका यह भी एक लक्षण है) नैष्कर्म ब्रह्म की उसे दृढ़ प्राप्ति हुई रहती है। अन्तर के निज बोध के कारण वह
प्रसन्न दिखाई देता है। हाँ बाह्य संसार में वह अवश्य ही जड़ बना दिखाई देता है जैसे अचेतन पत्थर हो।
संकल्प और विकल्प को उभारने वाला मन आत्मस्वरूप में ही लीन हो जाने के कारण वह अपने स्थान से नहीं
उठता। इसीलिये जड़ मालूम होता है। शब्द ब्रह्म को निगल कर वह स्वयं निःशब्द ब्रह्म हुआ रहता है। इसलिये
'निंदा' या 'स्तुति' का नाम नहीं लेता। सदासर्वदा सर्वांग से 'गूंगा' रहता है। 'ब्रह्म' कभी भी वाचा से व्यक्त
नहीं हो सकता। इसलिये यदि वह कहता भी है तो मात्र संकेत से। वह किसी की स्तुति या निंदा भी नहीं
करता। इसीलिये उसे 'गूँगा' कहते हैं। हे उद्धव! उसके मन में धन का कभी भी लोभ नहीं होता। इसीलिये वह
कभी द्रव्य को स्पर्श नहीं करता। इसीलिये लोग उसे पिशाच कहते हैं। उसकी पैशाचिकता का विचित्र चमत्कार
है। संसार जिसका प्राशन नहीं कर सकता उस ब्रह्मरस का वह पान करता है और जिसका भक्षण नहीं किया जा
सकता उस अभक्ष्य का वह भक्षण करता है। संसार जहाँ जा नहीं सकता उस अगम्य स्थान पर वह गमन करता
है। संसार का मन जहाँ प्रवेश नहीं करता वहाँ यह सर्वांग के साथ प्रवेश कर जाता है। विधि-निषेध का विचार
ही वह मन में नहीं लाता। कर्माकर्म का प्रयत्न वह नहीं करता। उसके अंगों से स्वानंद फूटता रहता है।
इसीलिये संसार उसे पिशाच कहते हैं। इस प्रकार मुक्त की जड़ता, गूँगेपन और पिशाच के लक्षण मिथ्या अथवा
बाह्य नहीं होते वे वास्तविक होते हैं। व्यर्थ की किचकिच उसे अच्छी नहीं लगती। ध्यान रखो कि मुक्त के मन