श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
केवल ब्राह्मण हैं किन्तु मेरे नाम के अधिकारी चारों वर्ण हैं और संसार का उद्धार मेरे नाम से ही होता है इसे
ध्यान में रखो। जहाँ नित्य मेरा नाम लिया जाता है, वहाँ सचमुच मैं ही रहता हूँ। इसमें सोचने या विचार करने
की कोई आवश्यकता नहीं है। मेरा नाम ही तारने में समर्थ है। जिस वाणी से मेरा जन्म, नाम, कीर्ति अथवा
गुणानुवाद का पठन नहीं होता वह वाणी व्यर्थ की बकवास करने वाली पिशाचिनी है, यह जान लो। जिस मुँह
से मेरी कीर्ति का वर्णन नहीं किया जाता है वह केवल मदिरा भरा प्याला है। उस मद्य के प्याले के नशे की
गन्दगी के भय से नाम वहाँ आता ही नहीं है। जिस वाणी से नाम का उच्चार नहीं होता उसे बाँझ समझना चाहिये
क्योंकि वह हरिकथा का गर्भ धारण नहीं करती। उस वाणी के अन्य सारे उद्योग निष्फल हैं। श्रीकृष्ण ने उद्धव से
कहा, भैय्या! एक अच्छा उपाय सुनो। मेरा नाममार्ग अत्यन्त सुगम होने के साथ ही परिपूर्ण है। वहाँ किसी अन्य
मार्ग की आवश्यकता ही नहीं है। इसलिये सज्जनों को हरि के नाम के अतिरिक्त वाणी का उपयोग करना ही
नहीं चाहिये। यही उद्देश्य श्रीकृष्ण ने अत्यन्त प्रेम से प्रदर्शित किया। शब्दव्युत्पत्ति का ज्ञान प्राप्त कर लेने से
उसकी योग्यता बढ़ेगी। उसे पंडिताई प्राप्त होगी लेकिन वैराग्य प्राप्त नहीं होगा और वैराग्य के बिना मेरी प्राप्ति
कदापि नहीं होगी। मान लो वैराग्य प्राप्त हो भी गया तो वह भी यदि विवेक के बिना उत्पन्न हुआ तो जिस प्रकार
आँखें न होने के कारण ज्येष्ठ होते हुए भी धृतराष्ट्र का राजपाट चला गया, उसी प्रकार विवेक के बिना वैराग्य
अन्धा है और अनधिकारी है। उसमें सन्मार्ग देखने का सामर्थ्य नहीं है। उसका परिभ्रमण व्यर्थ है। जो विवेक से
परिपूर्ण है उसका वैराग्य उफन कर बाहर आता है। उसे मेरी कुछ विचित्र जिज्ञासा रहती है। उसी का वर्णन
श्रीकृष्ण करते हैं।
एवं जिज्ञासयापोह्य नानात्वभ्रममात्मनि।
उपारमेत विरजं मनो मय्यर्प्य सर्वगे॥ २१॥
जरा देखो! जिसके मन में मेरा नित्यमुक्त तथा नाशरहित स्वरूप जानने की उत्कट इच्छा बनी रहती है, उसे
उसके अतिरिक्त और कुछ स्मरण नहीं होता। मुझे जानने की इसी तीव्र उत्कंठा को जिज्ञासा कहते हैं। मुझे प्राप्त
करने के लिये वह कभी विद्वत्ता या मान-सम्मान को स्वीकार नहीं करता। श्रवण और मनन तथा मन में विचार
करने के बाद देहादिक संसार चिन्तन व्यर्थ है ऐसा उसने निश्चित किया रहता है। इससे गुरुचरणों में उसका पूर्ण
विश्वास रहता है और पूर्ण ब्रह्म के प्रति दृढ़ निश्चय रहता है। अतः अगले मार्ग पर चलने के लिये वह
भगवद्भजन के प्रति तत्पर हो जाता है अथवा कर्म की झंझट छोड़कर वह ध्याननिष्ठ हो जाता है। अतः ध्येय,
ध्याता और ध्यान इस त्रिगुट का उसे भान नहीं रह जाता, चारों ओर चैतन्य भर जाने के कारण वह भी सनातन
परब्रह्म होकर रह जाता है। वहाँ कर्त्ता, कर्म और क्रिया का क्या काम? भेदभाव का भ्रम मिट जाता है, अन्दर
बाहर परब्रह्म ही भरा रहता है और गुरुकृपा से मन निश्चल हो जाता है। चारों ओर सर्वकाल, सभी देशों में जहाँ
परब्रह्म व्याप्त हो जाता है वहीं आत्मज्ञान स्थिर हो जाता है। ऐसे परब्रह्म का ध्यान जो नहीं कर पाता उसके लिये
दूसरा आसान उपाय बताता हूँ।
यद्यनीशो धारयितुं मनो ब्रह्मणि निश्चलम्।
मयि सर्वाणि कर्माणि निरपेक्षः समाचर॥ २२॥
मन स्वभावतः चंचल होता है और विषयवासना उससे भी अधिक चपल! इसी कारण से निर्गुण ब्रह्म में
प्रवेश करने का सामर्थ्य मन नहीं जुटा पाता। वह सामर्थ्य लाने के लिये सांख्य, योग अथवा संन्यास का जो मार्ग