श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उद्धव को आलिंगन दिया। श्रीकृष्ण का प्रेम ही अद्भुत था। आँखें अश्रुपूरित हो गयीं और वे स्वानंदजीवन की
वर्षा करने लगीं। मानों श्रीकृष्ण अपने आसुओं से उद्धव को भक्ति के साम्राज्य का राज्याभिषेक कर रहे थे।
प्रसंगानुसार, भक्तों की कथा कहते-कहते उनकी आँखों के सामने उद्धव दिखायी दिया और उन्होंने दौड़ कर उसे
बाहुपाश में बाँध लिया। श्रीकृष्ण को भक्तों से बहुत प्रेम था। जिस समय उसने आलिंगन दिया उस समय वह
कार्यकारण भी भूल गया, अपने धाम जाने का भी उसे विस्मरण हो गया और 'मैं' और 'तुम' का तो उसे स्मरण
ही नहीं रहा। मैं देवता हूँ और उद्धव भक्त हैं इस भेदभाव का भी उसे स्मरण नहीं रहा। कथा निरूपण की बात
भी उसे याद नहीं रही। उद्धव अपने आपको भूल गया और कृष्ण अपने को। प्रिय लोगों की बात सुनाते समय
परस्पर की बात से परे एकता के कारण दोनों गले मिले। प्रेम की चाह बहुत बड़ी चीज है। भक्ति का सच्चा सुख
क्या है वह आज उद्धव को मालूम हुआ। भक्ति का जो अलौकिक प्रेम होता है उसी को इस समय उद्धव ने
अभिव्यक्त किया। श्रीकृष्ण निजधाम की ओर जा रहे थे उस समय यदि उद्धव ने नहीं पूछा होता तो श्रीकृष्ण ने
ज्ञान, वैराग्य और भक्ति की कथा क्यों सुनायी होती ? उद्धव ने सचमुच भक्तिप्रेम विशेष होता है यह बात उजागर
की। उद्धव के उस प्रश्न से ही श्रीमद्भागवत त्रिभुवन में पूज्य हो गये। इसलिये तन, मन और प्राण से उद्धव की
बड़े प्रेम से आरती उतारनी चाहिये। इससे अधिक उसकी स्तुति करने में वाणी असमर्थ है। जो शब्दों में भी
व्यक्त नहीं किया जा सकता, बुद्धि भी जिसका आकलन नहीं कर सकती वह भक्तिप्रेम का आत्मगुह्य उद्धव को
देने के लिये श्रीकृष्ण ने आलिंगन का केवल बहाना किया। उस पुरुषोत्तम ने भक्ति का शुद्ध और अति उत्तम प्रेम
उद्धव को दिया और उससे श्रीकृष्ण आनन्दित हुआ। प्रेमी भक्तों की कथा सुनाते-सुनाते, महाराज ! मैं श्लोक का
अर्थ भी भूल गया। कृष्ण को भी प्रेम की यह कथा अच्छी लगी इसलिये उसे नियंत्रण में रखना कठिन हो गया।
प्रेम का स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि वह स्मरण का मरण नहीं होने देता। यह बात सज्जन जानते ही हैं क्योंकि वे
भक्तिप्रेम को जानते हैं। लेकिन यह सब होते हुए भी मेरा सबसे बड़ा अपराध तो है ही क्योंकि श्लोक का अर्थ
भूलकर मैं बहक गया। इसके लिये लोग मुझे क्षमा करें। इस पर श्रोताओं ने कहा, “रुको! जिस निरूपण से
आनन्द प्राप्त होता है उसके सम्बन्ध में ऐसी बातें सहन नहीं होतीं। इतना मधुर है वह रहस्य। भागवत वैसे भी
उत्तम है, तिस पर उसमें भक्तिप्रेम का वर्णन है, उससे मानों परब्रह्म ही प्रकट हो गया और हमारा मनोरथ पूर्ण हो
गया। श्लोकों का सम्बन्ध छूटा और कथाभाग दूर हट गया ऐसी प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं है। हमलोग
श्रीकृष्णगुणानुवाद में तल्लीन हो गये हैं। तुम्हारे इस भक्तिप्रेम का निरूपण सुनकर श्रवणसुख में बाढ़ आ गयी है,
वह रुकेगी ऐसा नहीं लगता। इसलिये चुपचाप निरूपण को चलने दो।” प्रेमी भक्तों की कथा कहते समय कृष्ण
और उद्धव एकरूप होकर गले में बाँहें डालकर बैठे थे वह दुनिया से न्यारी मिलनी श्रीकृष्ण ने छुड़ायी और मन
ही मन बोले, यह बिलकुल अयोग्य है क्योंकि उद्धव यदि अभी ही ऐक्यरूप में पहुँच गया तो फिर मेरी कथा को
इससे अच्छा श्रोता और कौन मिलेगा? मेरे भक्तिज्ञान का विस्तार करने के लिये मेरे भक्तों का सखा एक उद्धव
ही है, इसीलिये उसे सच्चे आत्मज्ञान का बोध कराकर उसे ब्रह्मपाप से विलग किया। गुह्यज्ञान की सारी मिठास
और भक्तिप्रेम की चाह, साथ ही श्रीकृष्ण की दृढ़ मधुरता तथा चाह सचमुच उद्धव के पास ही थी। भक्तिप्रेम का
एकमेव भोक्ता श्रीकृष्ण हैं और कृष्ण की कृपा भक्त ही जानते हैं। यह बात अनिर्वचनीय है। उसका शब्दों में
वर्णन नहीं हो सकता। कृष्ण ने उद्धव से कहा, हुँ! अब सावधान हो जाओ और भक्तिमार्ग के लिये उपयोगी आगे
की कथा सुनो। फल का त्याग कर यदि सारे कर्म मुझे अर्पण करना सम्भव न हो तो प्रेमलक्षण का अत्यन्त सरल
निरूपण सुनाता हूँ, उसे ध्यान से सुनो।