सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 306, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 306

२९० श्रीमद् एकनाथी भागवत
मरने पर नरक देते हैं। इस प्रकार दुष्ट संतति के लाड़-प्यार का अर्थ है दुःख से असीम पाप भोगना। उसी प्रकार
गांठ में धन होते हुए उसे सत्पात्र को दान न करना यही सब दुःखों का मूल है। इसीलिये धन के लोभी को
अपार दुःख भोगना पड़ता है। धन प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार के प्रयत्न तथा धोखाधड़ी करनी पड़ती है।
तिस पर यदि अनेक प्रकार के संकट सह कर धन प्राप्त हो भी जाय तो पहले उसे संग्रह करने के लिये दुःख
भोगना पड़ता है, फिर उसकी रक्षा करने के लिये दुःख भोगना पड़ता है, उस धन के लिये जब पत्नी और बच्चे
भी घात करने के लिये तैयार हो जाते हैं तो फिर औरों की क्या कथा वर्णन की जाय ? सत्पात्र को दान न देकर
जो कुबेर का धन सुरक्षित रखता है उसे दुःखातिरेक के कारण अनेक विघ्नों का सामना करना पड़ता है और
इससे धर्म की रक्षा नहीं होती। इस प्रकार रखा हुआ धन चला जाता है तो उससे दुःख की ज्वाला भड़क उठती
है। इस प्रकार अमीरों को सैकड़ों जन्म लेने पड़ते हैं और वे करोड़ों दुःख भोगते रहते हैं। नरदेह प्राप्त कर जिसे
अव्यंग वाणी प्राप्त हुई है और फिर भी जो हरिनाम का उच्चार नहीं करता उसके लिये तो पाप रखा ही हुआ है।
जमीन में गाड़ कर रखे हुए लोहे को जिस प्रकार मिट्टी खा जाती है और उसका कोई उपयोग न होकर वह व्यर्थ
नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार नामोच्चार के बिना वाणी व्यर्थ नष्ट हो जाती है। आसन, ध्यान आदि की चिन्ता में
न पड़ जो राम का नाम लेता है उसके करोड़ों जन्मों के कष्टों का परिहार उससे होता है, वही वाणी अत्यन्त
उत्तम है। जो नित्य रामनाम का जाप करता है उसे मेरे ही जैसा (परमेश्वर जैसा) समझना चाहिये। सारे नियमों
का पालन उसी ने किया यही माना जायेगा और सभी पुरुषों में वही उत्तम पुरुष है इसे ध्यान में रखो। चतुर्वर्णों में
जो कोई रामनाम का अखण्ड जप करेगा वही मेरा लाड़ला बन जायगा। त्रिभुवन में भी मेरा उससे अधिक दुलारा
कोई नहीं है। जिसे यह रामनाम अच्छा नहीं लगता, समझ लो उसके मुँह में पातकरूपी मुखरोग लग गया है।
वह स्वयं ही अपने सुख से वंचित हुआ और आत्मघाती सिद्ध हुआ ऐसा समझना चाहिये। रामनाम के सिवाय
जो मुँह है उसे केवल चमड़े का कुण्ड समझना चाहिये और उसमें की जीभ को केवल चमड़े का टुकड़ा
समझना चाहिये। असत्य मल से वह जीभ लिपटी रहती है अथवा हरिनाम के सिवाय जो वाणी है वह गलित
कुष्ट से सड़ी हुई है ऐसा समझना चाहिये। उसमें से असत्यरूपी कोढ़ का पानी रिसता रहता है और निन्दा की
बदबू फैली रहती है। ऐसी वाणी में सचमुच अधर्म के कीड़े पड़ते हैं ओर वे चारों ओर बिलबिलाते रहते हैं।
ऐसी वाणी जिसके सामने आती है, वह उससे मुँह फेर लेता है और नाक पर कपड़ा रखकर 'हरहर' कहता है।
छोटे-बड़े सभी उस वाणी पर थूकते हैं। उस वाणी की दुर्गन्ध मुझे भी असह्य हो उठती है। ऐसी वाणी का जो
रखवाला है वह दुर्बुद्धि है। उस पर अनर्थों का पहाड़ टूटता है और अनेक दुःख प्राप्त होते हैं। ऐसे पुरुष की
वाणी सचमुच दुःखों का परिपाक है। जो वाणी नाम से विमुख होती है वह वाणी शुद्ध नरक है ऐसा समझो फिर
वह वाणी वेदश्रुत ही क्यों न हो ? जो नामकीर्त्तन की निन्दा करता है वह महापातकी से भी अधिक पापी है।
उसके कारण पृथ्वी को भी अत्यन्त पीड़ा होती है। नामकीर्तन से ही वाणी धन्य हो उठती है इस भाव का
निरूपण स्पष्ट करने के लिये श्रीकृष्ण तैयार हुए।
यस्यां न मे पावनमङ्ग कर्म स्थित्युद्भवप्राणनिरोधमस्य।
लीलावतारेप्सित जन्म वा स्याद् वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः॥२०॥
मेरे नाम, कर्म और गुणों की कीर्ति संसार को पवित्र करती है तथा महान दोषों का विनाश करती है।
हरिनाम का स्मरण करने से जड़ जीवों का उद्धार होता है। तुम कहोगे "मैं विद्या तथा अविद्यातीत ब्रह्मस्वरूप