श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय २९३
है उसमें आने वाले परिश्रम से यदि बचना है तो बस अत्यन्त उल्हास से मेरे प्रति भक्ति बढ़ानी चाहिए। इससे
पहले बद्धमुक्तों के लक्षण बताते समय मुक्तों का लक्षण भी बताया था और शब्दों का पांडित्य करने वालों के
खोखले शब्दज्ञान का भी विवेचन किया था। अब अपनी आत्मभक्ति का उद्धव से वर्णन करने के उद्देश्य से
श्रीकृष्ण आदरपूर्वक भक्ति का स्वरूप बता रहे हैं। उद्धव! यदि इच्छापूर्वक मत्कर्म करने हों तो मनोधर्म भक्ति को
अर्पण कर देना चाहिये और आनन्दपूर्वक मेरे गुण, कीर्ति तथा नाम आदि का स्मरण करना चाहिये। मेरे भजन से
ही कार्य सम्पन्न होगा यह विश्वास मन में दृढ़ कर दिन रात, अथक मेरे भजन में प्रवृत्त होना चाहिये। भजन पूर्ण
होने पर भी मन नहीं भरता एक पल भी व्यर्थ नहीं जाने देना चाहता। मेरे भजन में विशेष प्रेम होते हुए भी
वैदिक, लौकिक अथवा दैहिक नैमित्तिक कर्म नहीं छोड़ना चाहिये। वह कर्म भक्तों को बाधक नहीं होता।
लेकिन मेरे सभी कर्मों का आचरण करते समय फल की आकांक्षा की कल्पना नहीं करनी चाहिये यही भक्तों का
गूढ़ मर्म है।
जो अन्तर से बिना ऊबे मुझ पर भक्ति रख सारे कर्म करता है और कभी फल की आशा नहीं करता वही
भक्ति का अधिकारी होता है इसे ध्यान में रखो। पीपल का पेड़ फल खाने की आशा से नहीं लगाया जाता उसी
प्रकार इच्छापूर्वक कर्म करने से आगे फल की इच्छा उत्पन्न ही नहीं होती। मेरा भजन करने पर ज्ञान की भी कमी
नहीं पड़ती मुझ पर भक्ति कर मेरा भजन करने से ही मेरे भक्तों को नित्यमुक्तता प्राप्त होती है। ज्ञान के बिना
भक्ति नहीं होती यह केवल शब्दज्ञान है। भक्ति से ही प्रत्यक्ष अपरोक्ष ज्ञान की प्राप्ति होती है इसलिये मेरा भजन
करते समय भक्तों को ज्ञान की कमी नहीं होती। घर गृहस्थी में रहने पर भी मेरे भक्तों को उसका बन्धन नहीं
होता। जिसके मुख में मेरा नाम होता है, जिसे मेरे भजन की लगन रहती है, जिसके मन में मैं आत्माराम रहता हूँ
उसके घर मुक्ति दासी की तरह रहती है। लेकिन जिसकी प्रवृत्ति निर्विषय हो जाती है उसके लिये मुक्ति का क्या
महत्त्व है ? भक्तों को किसी भी कर्म में विषय की आसक्ति नहीं रहती है। उसका मन विषय में नहीं रहता।
उसका विषय मैं भगवान ही रहता हूँ। वे सदा मुझमें ही लोलुप रहते हैं इसलिये वे नित्यमुक्त रहते हैं। भक्त यदि
विषयों का सेवन करते भी हैं तो उसे कण-कण में मुझे ही अर्पित करते हैं और समस्त प्राणिमात्र में वे मेरा ही
रूप देखते हैं। इसीलिये मुक्ति उनका वन्दन करती है। इसलिये मेरे भक्तों पर कर्मों का बन्धन तो नहीं ही लगता,
बल्कि मेरा स्मरण और कीर्तन करते हुए वे संसार का बन्धन तोड़ देते हैं। मेरे भक्तों का जो निवास होता है वही
मेरा भी निवास रहता है इसे ध्यान में रखो। उसके द्वार पर मुक्ति आठों पहर हाथ जोड़ कर खड़ी रहती है। मेरा
भजन करते रहने से किसी बात की कमी नहीं रह जाती। चारों पुरुषार्थों की अपेक्षा भक्ति मुझे अधिक प्रिय है।
ज्ञान, नित्यानित्यविवेक तथा भक्ति इनमें भी मेरा अत्यन्त प्रेम रहता है। उसी प्रकार प्यारे भक्तों का भी मुझे रात
दिन अधिक से अधिक सुख प्राप्त होता है। जिस प्रकार एकमेव बच्चा रहने पर माँ को वह अधिक प्रिय रहता है
उसी प्रकार प्यारे भक्तों का कौतुक करने में मुझे अत्यन्त सुख का अनुभव होता है। इसलिये ऐसे भक्तों को मैं
तत्काल अपनी छत्रछाया में ले लेता हूँ और उसे आत्मसुख देता हूँ। अगर वह उसे ग्रहण नहीं करता तो मैं उसका
दास बन जाता हूँ जिसने अपने प्रेम के कारण अपनी चित्तवृत्ति मुझे अर्पण की उसकी सेवा करने का निश्चित
विचार मैं उसी क्षण से करता हूँ। प्यारे भक्तों का जूठा खाने में अथवा उनके घोड़ों को नहलाने में मुझे जरा भी
लज्जा नहीं होती। अधिक क्या कहा जाय ? उनके घर की जूठन उठाने में मुझे जरा भी लज्जा नहीं होती। प्यारे
भक्तों की मुझे इतनी अधिक चाह है कि उनके जूते भी मैं अपने मस्तक पर धारण करता हूँ। प्रेमी भक्तों की बात
कहते-कहते श्रीकृष्ण भाव विह्वल हो उठे। उनका कंठ भर आया। शरीर पर रोमाञ्च उभर आये। उन्होंने दौड़कर