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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 869 में से

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पृष्ठ 305

ग्यारहवाँ अध्याय २८९
गां दुग्धदोहामसतीं च भार्यां देहं पराधीनमसत्प्रजां च।
वित्तं त्वतीर्थीकृतमङ्ग वाचं हीनां मया रक्षति दुःखदुःखी ॥ १९॥
दूध के लालच में सूखी गाय का दूध निकालने लगो तो चम्मच भर दूध तो हाथ नहीं आता, अलबत्ता गाय
की दुलत्ती खानी पड़ती है। नटखट, अंग-चोर हर किसी को मारने वाली, ढेर सारा खाने वाली, अधर्मशील, लात
मारने वाली और बेकाबू, छूटी तो भाग कर राजमहल में घुस जाएगी, लाठी से मारो तो जगह से हिलने का नाम
नहीं लेगी, चाल भी ठीक नहीं, अपने मन से भटकती, चरती रहती है। जिससे दूध कभी न मिले, जो कभी
गाभिन नहीं होती, ऐसी गाय को पोसने में पोषक को ही दुःख होता है। ऐसे ही घर को सुव्यवस्थित रखना यह
गृहिणी का कर्त्तव्य है लेकिन यदि वह स्त्री ही पुरुष के अनुकूल न हो तो उसके कारण पुरुष को दुःख ही
अधिक होता है और हमेशा सिरदर्द रहता है। निन्दा करना, आज्ञा का पालन न करना, पति को ऊलजलूल
बकना, स्वयं मिष्ठान्न खाना यह स्त्रियों का बुरा लक्षण है। व्यवस्थित खाने-पीने को दो, पर्याप्त धन दो तो गुड़
की तरह मधुर बन जाती है लेकिन उसे धर्म करते हुए देखो तो सर फोड़ लेने की इच्छा होती है। यह स्त्री
सचमुच असाध्वी है। जो पापपुण्य का विचार नहीं करती, कामचारी, धर्मशून्य होना यह दुराचारी स्त्री का लक्षण
है यह ध्यान में रखो। ऐसे असाध्वी स्त्री के संग से सुख कैसे प्राप्त होगा? ये पुरुष अति दुःख से दुःखी होते हैं।
जिसका देह पराधीन रहता है वह जीवन में सदा दीन बने रहते हैं। पराधीन को कल्पांत में भी समाधान प्राप्त
नहीं होगा। अपनी सत्ता छोड़ जो पराधीन हो जाता है वह कभी स्वप्न में भी सुख की बात नहीं देखता। जो 'पर'
अर्थात् माया के अधीन हो गया उस पराधीन को स्वप्न में भी सुख का संवाद प्राप्त नहीं होता। वह सदा दुःख में
ही रहता है यह ध्यान में रखो। जो कहता है कि पराधीन को सुख है वह विशुद्ध मूर्ख है। दुःखों का दुःख
पराधीन को अवश्य भोगना पड़ता है। अब 'संतति का विचार' सुनो। किसी को 'सुपुत्र' मिलता है तो किसी को
'कुपुत्र'। कुछ तो इतने मूर्ख होते हैं कि उनसे माँ-बाप को रात-दिन दुःख ही प्राप्त होता है। जो नरक से तारता
है, जो पूर्वजों का उद्धार करता है, जो माँ-बाप को परमेश्वर समझ कर उनकी अनन्य भक्ति करता है, जो माँ-
बाप को छोड़ अन्य तीर्थों को जाने की इच्छा नहीं करता, उनके चरणों के तीर्थ से असीम पवित्रता प्राप्त होती है
ऐसी जिसकी भावना रहती है; जिस प्रकार लक्ष्मी और नारायण हैं उसी प्रकार मेरे माता-पिता हैं यह समझ कर
जो अत्यधिक भक्ति से उनका भजन करता है, उनकी सेवा से कभी नहीं ऊबता; जो सत्त्व से अधिक सात्त्विक,
जो पितृवचन का पालन करता है, धर्म और अधर्म का सतत विचार करना यही जिसका स्वाभाविक धर्म है, जो
माता-पिता की सेवा से ही अपना उद्धार कर लेता है और सारे पितरों को मुक्त करता है, वही संसार में 'सत्पुत्र'
है। ऐसे पुत्र का पालन-पोषण करने में माँ-बाप को आनन्द प्राप्त होता है। वह पितृभक्ति कर स्वयं भी तरता है
और पूर्वजों का भी उद्धार करता है। 'सत्पुत्र' उत्पन्न होने पर इतना सुख प्राप्त होता है। अब तुम्हें 'असत्प्रजा'
की स्थिति बताता हूँ। मूल में यह शब्द 'असत्प्रज' है। उसके व्यवहार के बारे में बताते हुए लज्जा आती है।
लेकिन वह भी तुम्हें बताता हूँ। ऐसे जो पुत्र पैदा होते हैं उनका प्रेम केवल पत्नी और धन पर होता है। माँ-बाप
की बिलकुल उपेक्षा करते हैं। ये दुष्ट, शठ, कर्मभ्रष्ट और अत्यन्त दुर्जन होते हैं, इनकी पूँजी है झूठ बोलना,
झूठी कसम खाना, माँ-बाप को ठगना और सात्त्विक लोगों को कष्ट देना यही इनका धन्धा होता है, स्वयं तो
नरक जाते ही हैं पर पूर्वजों को भी वहाँ ले जाते हैं। ऐसे कुपुत्रों का जो पोषण करते हैं वे अति दुःख से दुःखी
होते हैं। पेट में फोड़ा पैदा हो जाये तो जैसे उसे फोड़ना सम्भव नहीं है उसी प्रकार असत् संतति का संसार उसे
असह्य दुःख भोगने का बाध्य करता है। ऐसे पुत्र जब तक जीवित रहते हैं तब तक दुःख भोगना पड़ता है और