दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
प्रारंभिक षडङ्ग: देवी कवच, अर्गला स्तोत्र, कीलक एवं तन्त्रोक्त रात्रि सूक्त
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
प्रवक्ता :
आचार्य भागवतानन्द सरस्वती
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श्री दुर्गा सप्तशती
पारिजात सौरभ
प्रवक्ता
आचार्य श्रीभागवतानन्द सरस्वती
प्रकाशक
स्वामी सत्यानन्द सरस्वती
पुस्तक प्राप्ति स्थान—
स्वामी सत्यानन्द सरस्वती
श्रीराम धाम मानस मन्दिर
रामदास बावाश्रम,
चौक सिटी,
पटना-८००००८ ( बिहार )
☐
श्री कैलाश चन्द्र माहेश्वरी
'महेश भवन'
खुरजा २०३१३१ (उ० प्र०)
दूरभाष : (०५७३८) २२०४२
☐
सर्वश्री वेद प्रकाश एण्ड सन्स
१८७, सर्राफा बाजार, सदर,
मेरठ कैन्ट-२५०००१ (उ० प्र०)
दूरभाष : (०१२१) ५४०८५१, ५४०२६८
☐
सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करण : २०००
चैत्र शुक्ल नवमी (श्रीराम नवमी)
विक्रमी संवत् २०५०
१ अप्रैल १९९३
☐
न्यौछावर : पच्चीस रुपये मात्र
☐
पुनीत शादमां के प्रबन्ध में
सरस्वती प्रेस, ठठेरवाड़ा, मेरठ शहर में मुद्रित
फोन : २३४८६, २३७३३
प्रकाशकीय
या देवी सर्व भूतेषु स्मृति रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।
जगज्जननी जगदम्बा के अतुल स्नेह से गङ्गा-तट पर इस आश्रम
में पुनः 'दुर्गा-सप्तशती' के प्रवचन की स्वीकृति पूज्य श्री आचार्य जी ने दे
दी । इस स्वीकृति में श्रेय हमारे स्वामी श्री रामानन्द जी तथा सुश्री
कुमारी रमा मिश्रा जी को है । गत वर्षों की तरह प्रवचन रिकार्ड हुआ,
जिसे अथक परिश्रम, उत्साह और बड़े प्रेम से हमारे श्री एस० एस०
त्रिवेदी जी, अवकाश प्राप्त प्रवक्ता, सी०ए०वी० इन्टर कालिज, मेरठ
कैन्ट ने मुद्रण हेतु लिपिबद्ध किया है ।
इस ग्रन्थ में 'दुर्गा-सप्तशती' के प्रत्येक मन्त्र की व्याख्या नहीं है,
और न शाक्त सिद्धांत मात्र का प्रतिपादन है। इसमें पूर्वाचार्यों के ही
भावों को स्पष्ट किया गया है । हमारे शास्त्रों में आध्यात्मिक,
आधिदैविक, आधिभौतिक तीनों अर्थ समाहित होते हैं। यहाँ आचार्य
जी ने मूल ग्रन्थ का आध्यात्मिक स्वरूप, दैनिक जीवन में उसका उपयोग
बतलाया है । विशेष रूप से भक्ति शास्त्र को वैदिक सिद्ध करके और इस
ग्रन्थ को प्रस्थान-त्रयी से तो सम्बद्ध किया ही है विशेषतः भगवद्
गीता के साथ विशेष शैली में तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है।
जिससे शोधार्थी अध्येता विशेष लाभ उठा सकेंगे ।
स्वामी सत्यानन्द
बाबा रामदास आश्रम
रामधाम मानस मन्दिर
मिरचाई गली
पटना सिटी-२०० ००२
[ iii ]
आभार
एकैव शक्तिः परमेश्वरस्य भिन्ना चतुर्धा व्यवहार काले ।
पुरुषेषु विष्णु, भोगे भवानी, समरे च दुर्गा प्रलये च काली ॥
यद्यपि अर्द्ध-शताब्दी से अधिक आयु व्यतीत हो चुकी है किन्तु
जीवन के वे वर्ष आज भी सुनहले कुछ क्षणों के समान धन्य एवं अवि-
स्मरणीय लगते हैं; जब पीताम्बर पीठ दतिया (ग्वालियर के पास)
के पूज्यपाद श्री स्वामी जी के चरणों में उनके स्नेहिल सान्निध्य में
यापित हुये थे । उनकी असीम कृपा याद आते ही वाणी मूक, कण्ठ
अवरुद्ध और लेखनी विरत हो जाती है । अहेतुकी प्रेम तो संतों में ही
होता है, वैसा भला दूसरा कोई कहाँ से दे सकता है ? उन क्षणों में
जो कुछ अल्पमति अनुसार प्रसाद पा सका, उतने में ही परम आह्लादित
एवं आनन्दानुभूति से भाव विभोर होकर धन्य समझने लगा । पराम्बा
की कृपा का प्रसाद ही मेरा जीवन है "इतना ही कह सकता हूँ" और
मात्र सजल नयन ही कृतज्ञता का अभिनय कर सकते हैं । तभी से
“दुर्गा-सप्तशती” ग्रन्थ के सम्बन्ध में कुछ कहने का विचार था;
विद्वानों के लेख, उनकी पुस्तकें, विभिन्न टीकायें यदा-कदा देखता
रहा; पढ़ता रहा; फिर भी वह स्वप्न साकार न हो सका । मानस
पारिजात के प्रकाशन के बाद त्रिवेदी जी बार-बार अनुनय विनयपूर्वक
'दुर्गा-सप्तशती' पर लिखने का आग्रह करते रहे । अवसर मिला और
उनकी करुणामयी प्रार्थना को कृति रूप में परिणत करने की माँ भगवती
ने प्रेरणा दी ।
गीता गङ्गा च गायत्री गोविन्देति हृदि स्थिते ।
चतुर्गकार संयुक्ते, पुनर्जन्म न विद्यते ॥
के अनुसार हृदय में स्थित माँ गङ्गा ने इस बार अपने पावन तट
के जगन्नियन्ता मर्यादा पुरुषोत्तम राम के अनन्य भक्त बाबा रामदास
के आश्रम में बैठकर बुलवा ही लिया, जो कुछ भी बोला गया, पराम्बा
ने ही बोला है । व्यावहारिक दृष्टि से भी मेरा कोई शब्द इसमें अपना
मौलिक नहीं है । पूर्व आचार्यों की ही बात है; उच्छिष्ट है, संकलन
मात्र है । पाठक या श्रोतागण भी पराम्बा के ही अनन्याश्रित हैं । अतः
इस ग्रन्थ से उन्हें जीवन में कुछ प्रेरणा मिले, रस मिले तो माँ की
कृपा का ही फल समझें ।
[ iv ]
पुनः कृतज्ञतापूर्वक उन्हीं की धरोहर उन्हीं को सादर समर्पित
करता हूँ; क्योंकि वे ही सर्व-शक्ति सम्पन्न, सर्वत्र व्याप्त, सर्व-पूज्या
जगदम्बा हैं, उन्हें ही सतत नमस्कार है ।
देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या,
निश्शेष देवगण शक्ति समूह मूर्त्या ।
तामम्बिकामखिल देव महर्षि पूज्यां
भक्त्या नताः स्म विद-धातु शुभानि सा नः ॥दु०स०४/३॥
-आचार्य भागवतानन्द सरस्वती
चैत्र शुक्ल नवमी परमार्थ आश्रम, सप्त सरोवर, हरिद्वार
(राम नवमी) एवम्
१ अप्रैल १६६३ आनन्द वृन्दावन (मथुरा)
[ v ]
श्री हरिः शरणम्
सम्मति
स्वामीवर्य आचार्य श्री भागवतानन्द सरस्वती जी से विरचित
मार्कण्डेयपुराणान्तर्गत दुर्गा-सप्तशती की 'सप्तशती पारिजात सौरभ'
नामक व्याख्या की रहस्यमयी चर्चा सुनने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ।
इस व्याख्या में शब्दों की व्युत्पत्ति के द्वारा आध्यात्मिक संकेत
अत्यन्त हृदयोल्लासकारी मिलता है। जैसे चडि कोपे एवं मुडि खण्डने
धातुओं से चण्ड एवं मुण्ड शब्द की निष्पत्ति से आध्यात्मिक भाव का
झटिति अधिगम हो जाता है।
आचार्य श्री ने भगवद्गीता से इस ग्रन्थ की तुलना में बड़ा ही
कौशल दर्शाया है, जैसे महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा दोनों की रचना,
दोनों में सात सौ श्लोकों का संग्रथन, एवं सुरथ नाम से अर्जुन का
संकेत इत्यादि। 'यो मां जयति संग्रामे' इत्यादि श्लोक पर आपने
संग्रामजित्, अहंकार विजेता तथा वीर बलवान् ही शक्ति को वश में कर
सकता है, ऐसे भाव बताते हुये शक्ति की उपासना में इनको साधन
बताया है।
इस प्रकार आपने आध्यात्मिक भावों का रहस्यमय चित्रण करते
हुये महाशक्ति की उपासना की प्रेरणा देकर अत्यन्त लोक-कल्याण
किया है।
सम्मानित अध्यक्ष भवदीय मङ्गलाभिलाषी
भूतपूर्व व्याकरण विभागाध्यक्ष डा० रामप्रसाद त्रिपाठी
वेद-वेदाङ्ग संकायाध्यक्ष सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय
राष्ट्रपति सम्मानित वाराणसी
भूतपूर्व अध्यक्ष
उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी, लखनऊ
[ vi ]
पराम्बायै नमः
आमुख
मौलिक तत्वों का चिंतन करने से विदित होता है कि
तत्वान्वेषी मनीषियों एवं साधकों ने अपनी मान्यताओं की
स्थापना अपने-अपने दृष्टिकोण से आस्तिकता या नास्तिकता के
आधार पर ही की है जिससे उस या उन तत्वों का विभिन्न
नामों से उल्लेख किया है। आस्तिक भाव के साथ दार्शनिक
प्रणाली पर चिन्तन करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि
इस प्रक्रिया में ज्ञान-विज्ञान के साथ भावना का भी विशिष्ट
महत्त्व है क्योंकि भावना हृदय की आधिभौतिक शक्ति की सूक्ष्म
प्रक्रिया है इसमें आप्त वाक्य “न तास्तर्केण साधयेत्” (उस
परम तत्व को तर्क से सिद्ध न करे) प्रमाण हैं। आस्था और
भावना के पवित्र सोपानों से ही उस परम तत्व की उपलब्धि
होती है।
भारतीय ज्ञान के आदि स्रोत श्रुति-भगवती ने स्वीकार
किया है कि वह परम तत्व एक है :—“एकं सद्विप्राः बहुधा
वदन्त्यग्निः यमं मातरिश्वानमाहुः”। ऋग्वेद १/१६४/६
“भूतस्यजातः पतिरेक आसीत्” पंचभूतों से उत्पन्न जीवों या
वस्तुओं का स्वामी एक है। “एकोवशी सर्व भूतान्तरात्मा”
सब भूतान्तरात्मा उस एक तत्व के ही आधीन हैं। श्वेताश्वतरोप
निषद् का कथन है :—“एकः देवः सर्वभूतेषुगूढ़ः सर्वव्यापी
सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षीचेता केवलो
निर्गुणश्च।” अतः स्पष्ट है कि समस्त भारतीय दर्शन सर्वतो
भावेन एक तत्व की प्रतिष्ठा करते हैं। नाम, रूप, लिङ्ग, भेद
होना नैसर्गिक ही है।
इसी चिन्तन की परिधि में शाक्त-दर्शन का प्रादुर्भाव हुआ;
जिसे तत्कालीन आचार्यों ने उस तत्व को 'अपरिमित शक्ति'
[ vii ]
माना। महर्षि मार्कण्डेय ने भी उस मूल तत्व को “शक्ति
रूपेण संस्थिता” एक शक्ति रूप मे स्वीकार किया है। सृष्टि की
उत्पत्ति, पोषण, संहार, का मूल कारण वही एक शक्ति है
जिसके अगम्य स्वरूप का वर्णन निगमागम से परे है। वही सब
का मङ्गल करें :-
वेदत्रयी वा निगमत्रयी वा यस्या स्वरूपं गदितुं न शक्ताः ।
संसारजन्म स्थिति नाश हेतु सा कापि ‘शक्ति’ कुशलं करोतु ।।
पाश्चात्य वैज्ञानिक उसे ही ‘सुपर पावर’ कहते हैं ।
हमारे शाक्त ‘परा पराणां परमा’ परा से परां परमा शक्ति कहते
हैं। संसार में सद् असद् जो कुछ कहीं भी कोई भी पदार्थ है,
उसमें वही शक्ति है। वही एक शक्ति जड़, चेतन, स्थावरजंगम
में व्याप्त है :-“एकैव सर्वत्र वर्तते तस्मादुच्यते एका” (अथर्व)
जगत् का आधारभूत वही है “आधारभूता जगतस्त्वमेका”
दुर्गा सप्तशती ।
देवी भागवत उसे ब्रह्मरूपा, नित्या, सनातनी, आत्मा की
शक्ति, अग्नि की दाहकता की तरह सब वस्तुओं में उसी एक
शक्ति को अनुस्यूत कहती हैं :-
सा च ब्रह्म रूपा च नित्या सा च सनातनी ।
यथात्मा च तथा शक्ति यथाऽग्नौदाहिकास्थिता ॥
वह सर्व रूपा शक्ति विश्व का बीज रूप है, शक्ति पुञ्ज
है, सतत् एवं सनातन है। वह सब रूपों में सबकी स्वामिनी
एवं समस्त शक्तियों से समन्वित हैं :-
विश्वस्य बीजं शक्तिभूते सनातनी ॥
सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते ॥
लक्ष्यालक्ष्यस्वरूप चिद् शक्ति (चैतन्य शक्ति) के रूप में
विराट रूप में चारों ओर व्याप्त हैं :—
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्यस्थिता ।
लक्ष्यालक्ष्यस्वरूपा साव्याप्यकृत्स्नं व्यवस्थिता ॥
[ viii ]
यही आद्याशक्ति जगत् का आश्रय है, जगत् इसका एक
अंश मात्र है, वही विश्व का धारण, सृजन, पोषण, संहरण
करती है :-
सर्वाश्रयाखिलमिदं जगदंशभूतत्याकृता हि परमा प्रकृतिः त्वमाद्या ।
त्वयैतद्धार्यते विश्वं, त्वयैतत्सृज्यते जगत्, त्वयैतत्पाल्यते देवि,
त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ॥ दु० स० ४
इस शाक्त दर्शन में एकमात्र जो कुछ है वह पराशक्ति
ही है। उनके अनुसार शक्ति की व्युत्पत्ति इस प्रकार है :-'श'
ऐश्वर्य वाचक है। विश्व के समस्त ऐश्वर्य 'श' से अभिव्यक्त
होते हैं; 'क्ति' पराक्रम वाचक हैं। सृष्टिगत समस्त पराक्रम,
बल, ओज और तेज 'क्ति' से व्यञ्जित होते हैं; अर्थात् सृष्टि के
षड् (छः) ऐश्वर्य और पराक्रम जिस तत्व में अन्तर्निहित है वह
'शक्ति' पद वाच्य है।
इसी तत्व को शक्ति या महाशक्ति भी कहते हैं।
इसलिए योगीजन इस तत्व को स्त्री या पुरुष भेद में भी नहीं
मानते—अत एवहि योगीन्द्रियैः स्त्री पुं भेदो न मन्यते 'सर्वब्रह्म-
मयं ब्रह्मञ्छ स्वपि नारद ॥ महाशक्ति के बिना यह सृष्टि संभव
नहीं। शक्ति के बिना शक्तिमान शिव 'शव' हो जाते हैं “नहि
क्षमस्तथात्मा च सृष्टि स्रष्टुं तथा बिना 'सर्वशक्तिस्वरूपा सा
यथा च शक्तिमान् सदा'
शाक्त-दर्शन और ईश्वरवादी दर्शन का आधार तत्वतः
वह एक ही है। जब वह परम-शक्ति-विश्व रुपधारिणी अपनी
इच्छा से अपने में स्फुरण करती है श्रुति “वहुस्याम” तब
संसार-चक्र की उत्पत्ति होती है। पराशक्ति शिव शक्ति रुप धारण
कर जगत का अभिन्न निमित्तोपादान कारण होती है। इसे ही
परम वाक् तथा सांविदी कला कहते हैं :-यदा सा परमाशक्तिः
स्वेच्छया विश्वरुपिणी । स्फूरतामात्मनः पश्येत् तदा चक्रस्य
सम्भव । तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम् । सुधी पाठक
[ ix ]
वृन्द स्वत ही निम्न दो श्लोकों से दोनों दर्शनों के समन्वय भाव
का अवलोकन कर सकते हैं :—
भागद्वयवती यस्मात् सृजति सकलं जगत् ।
तत्रैकभागे सा प्रोक्तः सच्चिदानंद नामकः ॥१॥
मायाप्रकृति संज्ञास्तु द्वितीयाभाग ईरितः ।
सा च माया पराशक्ति मस्यहमेश्वरी ॥२॥
जैसा पहले कहा जा चुका है कि आस्तिकवाद में भावना
की प्रधानता होती है, इसी से भक्ति की प्राप्ति होती है । भक्ति
की आत्मैक्यता से शक्ति या शक्तिमान अथवा भगवती एवं
भगवान् का सामीप्य एवं सायुज्य उपलब्ध होता है अतः शक्ति
साधकों नै उस सर्जनात्मक व्यापार विस्तार के कारण महनीया
माता के रुप में स्वीकार किया है । वह मातृ शक्ति भाव रुप
में अलौकिक और कार्य रुप में लौकिक है “मातृ देवो भवः”
का उद्घोष सर्वप्रथम मातृशक्ति-पराशक्ति की ही मान्यता है ।
यही सृष्टि का मूल तत्व है ।
शैव, वैष्णव, सौर, गाणपत्य और शक्ति वैचारिक
एवं साधना परक सम्प्रदाय भी वस्तुतः एक ही सनातन धर्म के
विविध रूप हैं । आसेतु-हिमालय एवं चतुरुदधि पर्यन्त विशाल
भारत धराधाम की वेश-भूषा, भाषा तथा जलवायु एवं ऋतुएँ
भी विविध ही हैं; किन्तु भारतीय जन-जीवन में इन विविधताओं
जागतिक एवं आध्यात्मिकता, को एकरुपता प्रदान करने वाले
जीवन एवं संस्कारों की अनुप्राणित करने वाले, इहलौकिक एवं
पारलौकिक सिद्धियाँ तथा मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले ग्रन्थों
में वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस, श्रीमद्भागवतगीता,
महाभारत के साथ-साथ दुर्गा-सप्तशती भी अमूल्य रत्न-परिपूरित
मंजूषा रुप लोक प्रिय ग्रन्थ है । जिससे भक्तजनों को सदैव
प्रकाश एवं बल मिला है । इस रहस्यमय सिद्ध ग्रन्थ की गुणवत्ता
और माहात्म्य इसके उपासक-साधक ही जान सकते हैं । यह
[ x ]
सभी अलषित मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु स्वयं उद्घोष करता हैं
“यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्”
‘मेरे प्रसाद (अनुग्रह) से मेरे भक्त-जन परम ऐश्वर्य के
साथ जिस कामना की अभिलाषा करेंगे, उसे निश्चित रूप से
प्राप्त करते हैं।’
इस प्रकार अनेक रहस्यमय अलौकिक शक्तियाँ तथा
तत्वों से परिपूरित मार्कण्डेय पुराणान्तर्गत इस “दुर्गा-सप्तशती”
के कथन विषयों की विवेचना, सारगर्भित व्याख्या, समन्वयात्मक
चिन्तन और उसे जीवन में व्यावहारिक रूप में उतारने-वरतने
की सरणी हेतु इसके कीलित, तान्त्रिक ग्रन्थियों का उन्मोचन
और आध्यात्मिक तत्वों का उद्घाटन महामान्य भारत प्रसिद्ध
पुराण निगमागम-षट् दर्शनों के व्याख्याता श्रीमद्भागवत तथा
रामचरितमानस के तत्वोपदेष्टा, तपो-पूत-काय परमहंस
परिव्राजक शिरोमणि पूज्यपाद आचार्य श्री भागवतानन्द
सरस्वती महाराज (परमार्थ निकेतन, हृषिकेश) आनन्द धाम
वृन्दावन जी ने अपने प्रवचनों के माध्यम से किया है जिसे जन-
हिताय “सप्तशती पारिजात सौरभ” ग्रन्थ के रूप में प्रकाशित
किया जा रहा है; जो साधकों और भक्तों के लिए परमोपयोगी
सिद्ध होगा ।
जिज्ञासु पाठक जब पारिजात-सौरभ का मनोयोग से
अध्ययन और मनन करेंगे तो उन्हें वैदिक, दार्शनिक एवं शाक्त
दर्शन के तत्वों का समन्वयात्मक बोध होगा । यद्यपि आचार्य
श्री का लक्ष्य चिन्तन-मनन के उसी एक केन्द्र बिन्दु तत्व को
भाषित करना है । तथापि सामान्य जन हिताय यन्त्र-तन्त्र मन्त्रों
की साधना और फल श्रुति भी प्रतिपादित की है । वस्तुतः
आध्यात्मिक मर्मों के गवेषणात्मक बोध की जिज्ञासा तो आचार्य
चरणों में बैठकर उनके प्रवचनों को सुनकर ही शान्त होती है;
किन्तु क्षणिक शान्ति को स्थायित्व एवं शाश्वत बोध को
[ xi ]
अमरता प्रदान करने के लिए 'सप्तशती पारिजात सौरभ' का
चिन्तन-मनन एवं अध्ययन अनिवार्य है, जो महाराज श्री की
अनुपस्थिति में भी तात्त्विक बोध के साथ-साथ इस मातृशक्ति
के रहस्य एवं चमत्कार से परिचित करायेगा।
प्रचार-प्रसार से दूर रहने वाले सन्तों की सिद्ध-वाणियों
को संगृहीत कर सर्व जनहिताय ग्रन्थ के रूप में प्रकाशित
करना महान उपकार है क्योंकि सद्ग्रन्थों के प्रचार से मानव
संस्कृति का अभ्युदय होता है। इसे प्रकाशित कराने का श्रेय
पटना-सिटी (पाटली पुत्र) में स्थित श्रीराम-धाम मानस-मन्दिर
के कर्मठ संचालक स्वामी श्री सत्यानन्द जी सरस्वती जी को है;
जो स्तुत्य है।
माँ जगदम्बा विश्व के समस्त मानवों को सुख-शान्ति
का वरदान दें, यही हमारी कामना है :—
प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणी,
त्रैलोक्य वासिनामीड्ये लोकानां वरदाभव।
विश्व की पीड़ा दूर करने वाली देवी! हम तुम्हारे
चरणों में नत मस्तक हैं। आप प्रसन्न होइए। तीनों लोकों के
निवासियों की पूजनीय माँ! सबको वरदान दो।
महाशक्तिमहं वन्दे, मातृवत् स्नेह दायिनीम्।
आचार्य चरणं नौम्युक्तं, पारिजात सौरभम् ॥
सम्पादित :
एस. एस. त्रिवेदी आचार्य श्री सूर्यदत्त शास्त्री 'रक्ताभ'
ए-३१, शिवाजी कालोनी महर्षि गर्गाचार्य ज्ञानपीठम्
मेरठ कैन्ट। सूर्यलोक, धर्मशाला घाट
पटना सिटी-२ (बिहार)
[ xii ]
सम्पादकीय
नवीन प्रकाशनों की बाढ़ में, लोकेषणा के व्यामोह के
कारणों से देवी-जागरणों की कलियुगी भक्तों की अपार भीड़ का
ऐसा सामुद्रिक ज्वार उमड़ रहा है जिसमें अमूल्य रत्न विलुप्त
हो जाते हैं। यह भी सर्व विदित है कि अथाह जल राशि का
स्वामी होने पर भी सागर किसी की पिपासा शान्त करने में
अक्षम है; क्योंकि उसके क्षार जल में यह क्षमता है ही नहीं
समुद्र की महत्ता के कारण तो दूसरे ही हैं। इस कलिकाल में
विद्वानों, संतों, महात्माओं का भी अभाव नहीं है और एक से एक
बढ़कर सिद्ध महात्मा अपनी सिद्धियों के चमत्कार से अथवा प्रारब्ध
से या वैयक्तिक कौशल से राजकीय प्रश्रय से अभिवन्दित तथा
अर्चित होते हुए उच्च गद्दियों पर आसीन हैं। उद्योग-पतियों,
नेताओं तथा मंत्रियों के भी अलग-अलग स्वामी हैं। ऐसी स्थिति
में जन-साधारण तथा स्वाध्यायी विद्वानों की पहुँच सन्तों,
महात्माओं के चरणों तक असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है।
इस कथन से मेरा यह प्रयोजन नहीं है कि सन्तों या महात्माओं
की उदारता, निष्कामिता या विद्वता अथवा निरीहता एवं
उन्मुक्तता का अभाव है। भला वसुन्धरा-रत्नगर्भा माँ भारती
ऐसे महामना उदार पुत्रों से विहीन कैसे हो सकती है ? आज
भी वह इस गरिमा से परिपूर्ण रूपेण मंडित है। ऐसे ही
महिमान्वित सन्त प्रवरों में से एक श्रद्धेय आचार्य भागवतानन्द
जी सरस्वती माँ सरस्वती के वरद-पुत्र हैं, जिनका करुणार्द्र हृदय
सदैव 'सर्वत्र-सर्व-जन-हिताय' द्रवित रहता है।
“श्री दुर्गा-सप्तशती पारिजात सौरभ” प्रस्तुत ग्रन्थ महाराज
श्री के माँ पराम्बा के प्रेमपूरित करुणाद्राप्लावित हृदय-निसृत
भक्तिरसामृत वर्षण है; जो सामान्यजन से लेकर मूर्धन्य विद्वद्वृंद
के लिए समान रूप से स्पृहणीय तथा कल्याण करणीय है। ग्रन्थ
[ xiii ]
को उपादेयता एवं उपयोगिता तो सुधीजन ही बता सकेंगे किन्तु
सौन्दर्य लहरी, दुर्गा-महिमा, षट्चक्रनिरुपण, वरिवर्या रहस्य
आदि अनेक ग्रन्थों के जीवन-ग्राह्य बोध का समावेश ग्रन्थ का
एक बार सिंहावलोकन मात्र से दृष्टिगोचर कर सकेंगे । इस तथ्य
को किसी प्रकार नकारा नहीं जा सकता । जिन्होंने महाराज श्री
के प्रवचनामृत का पान किया है वे भली-भाँति जानते हैं कि कम
से कम समय में कम से कम शब्दों में अधिकतम दुरुहज्ञान को
सहज आत्मीय करा देने की कला में वे सिद्ध-हस्त हैं; 'भागवत
पारिजात' तथा 'मानस-पारिजात' इसके ज्वलंत दृष्टांत हैं ।
लोकप्रियता इससे अधिक क्या होगी कि एक ही वर्ष में 'भागवत
पारिजात' की एक प्रति भी अवशेष नहीं रही । तब उनके समस्त
ज्ञान को लिपिबद्ध करने की क्षमता कैसे हो सकती है ? दूसरे टेप
निर्जीव से चेतनानंद की अभिव्यक्ति और वह भी सजीवता-सम्पन्न
उल्लासमय कैसे बनी, यह आचार्य श्री का आशीष ही है ।
इस सम्बन्ध में मेरा वैयक्तिक यही निवेदन है कि श्रद्धा के
साथ सन् १६४४ से प्रत्येक नवरात्र में 'दुर्गा-सप्तशती' का पाठ
कर्म-काण्ड के विधि विधान के साथ करते रहने पर भी सहज
अनुराग और जीवन-दर्शन में बदलाव नहीं आया था जो लिपिबद्ध
करने पर पराम्बा के साथ नैसर्गिक आत्मीयता और जीवन-
दर्शन की व्यावहारिकता का बोध हुआ, वह अपने आप में स्वयं
एक महती उपलब्धि है । अतः ग्रन्थ प्रत्येक जन-जन के लिए
अत्यन्त अपेक्षणीय है ।
अन्त में इस ग्रन्थ में जो पद, वाक्य, विन्यास अथवा
वर्तनी की अशुद्धियाँ हैं; वे सब मेरी भूलें हैं, उनके लिये मैं
सभी से क्षमा-याचना करते हुए पुनश्च निवेदन करता हूँ कि
छिलके के कारण जैसे आप केले का त्याग नहीं करते, अपितु
उसके गुणों के कारण उसका विविध रूपों में प्रयोग करते हैं
उसी प्रकार इस ग्रन्थ का अवश्य स्वाध्याय कर कामना-सिद्धि
कल्पतरु को न भूलें ।
[ xiv ]
ग्रन्थ की साज-सज्जा, मुद्रण की सुन्दरता, तन्त्रों के
ब्लाक और यहाँ तक कि प्रूफों के संशोधन में सहयोग और
उचित स्थलों के संयोजन में प्रेस के प्रबन्धक एवं स्वामी पुनीत
शादमां का हृदय से आभारी हूँ जिन्होंने अपनी अत्यधिक
व्यस्तता वैविध्य बहुमुखी विस्तृतता के होते हुए भी इस कार्य-
सम्पन्नता में अभिरुचि ली। यद्यपि इससे पूर्व में मैं श्री पुनीत
जी से परिचित नहीं था, परिचय का श्रेय श्री वेद प्रकाश जी
(बिजली वाले) महामन्त्री, औघड़नाथ मन्दिर समिति काली
पलटन मेरठ कैन्ट को है जिन्होंने यह प्रकाशित होने के लिए
दी। धर्म के प्रचार-प्रसार में संलग्न, साधु-सन्तों, महात्माओं
के अनन्य प्रेमी भक्त, उत्साही युवक पुनीत जी से प्रकाशन-
विलम्ब के कारण कभी-कभी खीज भी हुई, किन्तु उनकी मन्द
मुसकान और विनम्र स्वभाव में यह सब बालू रेत की भित्ति
बनकर रह गई। अतः उनसे यह आग्रह करते हुए कि समय की
महत्ता को समझते हुये ही धर्मानुष्ठानों में द्विगुणित उत्साह के
साथ भाग लेकर यशस्वी बनें। यही शुभ कामना है। और
यही माँ जगदम्बा से प्रार्थना भी।
इसमें जो है, जैसा है वह सब गुरु चरणों का विद्वच्चरण-
चञ्चरीक प्रसाद और सब त्रुटियाँ मेरी हैं।
एस० एस० त्रिवेदी
ए-३१, शिवाजी कालोनी
मेरठ कैण्ट।
[ xv ]
अनुक्रमणिका
प्रकाशकीय iii
आभार iv
सम्मति vi
आमुख vii
सम्पादकीय xiii
१ द्वार प्रवेश १
२ दुर्गा-सप्तशती १२
३ अर्गला २१
४ कीलकम् २४
५ रात्रि-सूक्त ३१
६ प्रथमोऽध्यायः ३२
७ ध्यानम् ३७
८ मध्यम चरित्र-द्वितीयोऽध्यायः ६६
६ तृतीयोऽध्यायः ७७
१० चतुर्थोऽध्यायः ८६
११ पंचमोऽध्यायः ६४
१२ षष्ठोऽध्यायः १०१
१३ सप्तमोऽध्यायः १०३
१४ अष्टमोऽध्यायः १०५
१५ नवमोऽध्यायः १०८
१६ दशमोऽध्यायः १११
१७ एकदशोऽध्यायः ११५
१८ द्वादशोऽध्यायः ११६
१६ त्रयोदशोऽध्यायः १२१
२० उपसंहार १२३
२१ क्षमा प्रार्थना १२५
२२ दुर्गाद्वात्रिंशन्नाममाला १२६
२३ देव्य पराधक्षमापन स्तोत्र १२६
२४ श्री दुर्गा जी की आरती १२८
२५ बगला अष्टोत्तरनामस्तोत्रम् १२६
२६ सप्तश्लोकी दुर्गा १३०
भगवती पराम्बा माँ बगुलामुखी
(पीताम्बरा पीठ, दतिया)
माँ का तुमको प्यार मिला है ।
मत समझो तुम हो एकाकी,
नहीं कोई जग में अवलम्ब मिला है
जब-जब ध्यान किया तुमने,
उसका ही सार-सम्भाल मिला है ।
माँ का तुमको प्यार मिला है ॥
सरिता के कल कल निनाद में
और सुमनों के मधुर हास में
भ्रमरों के मधुरिम गुञ्जन में
उसका ही स्वर साकार मिला है। माँ का तुमको.........।
जग-वैभव के काम भोग में
यतियों के अविराम योग में
प्रियतम के दारुण वियोग में
उसका ही आधार मिला है ॥ माँ का तुमको...........।
ज्ञानी की गहन चाह में
दीनों की करुण आह में
भ्रमितों की विषम राह में
वह जीवन पतवार मिला है ॥ माँ का तुमको.........।
तन्त्र-मन्त्र के गहन विज्ञान में
दुःख दैन्य के विषम विधान में
शान्ति सौम्य सँयुक्त विहान में
उसका दिव्य विचार मिला है ॥ माँ का तुमको.........।
—कुमारी रमा मिश्रा